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Posts Tagged ‘बाबरी मस्जिद’

स्वयंसेवक के रूप में
शाखा में राष्ट्रभक्ति पर विशेष जोर दिया जाता था, मन में देश प्रेम की भावना तो थी ही, इसलिए शाखा में गाए जाने वाले गीत बहुत लुभाने लगे। एक गीत-‘संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो, भला हो जिसमें देश का, वह काम सब किए चलो’ तो मुझे कंठस्थ ही हो गया था। भारत माता को आराध्य देवी मान कर-‘तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें; और ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ का मन्त्र जपते हुए मैं खुद को धन्य समझने लगा था, इतना ही नहीं बल्कि-‘तन समर्पित मन समर्पित और ये जीवन समर्पित, चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ, जैसे राष्ट्र प्रेम के गीत और बातें मन को अभिभूत कर देती थीं। हर दिन होली दीवाली सा माहौल होता था। मुझे पक्का यकीन होने लगा था कि हम शाखा में जाने वाले लोग ही राष्ट्रभक्त हंै, जो शाखा में नहीं आते वे सब देशद्रोही है।
आर एस एस की काली बिल्ली
जैसा कि आर.एस.एस. का दावा है कि वह अपनी शाखाओं में मानव के चरित्र निर्माण का काम करता है, उसके द्वारा तैयार व्यक्ति एक काली बिल्ली की तरह होता है, जिसको जीवन के किसी भी क्षेत्र में फेंक दिया जाए तो भी वह पीठ के बल नहीं गिरता बल्कि पैरों पर ही खड़ा होता है। अब मैं भी आर.एस.एस. की काली बिल्ली बनना चाहता था, इसलिए पूरे मनोयोग से शाखा की गतिविधियों में शिरकत करने लगा।
शाखा में ही पहली बार मैंने भारत माता की तस्वीर के दर्शन किए, जिसमंे भारत माताजी हाथ में भगवा झंडा लिए शेर के पास खड़ी दिखाई दीं। तब मेरे मन में सवाल उठा कि भारत माता के हाथ में भगवा झंडा क्यों है, राष्ट्रध्वज तिरंगा क्यों नहीं? जवाब मिला तिरंगा झंडा तो सन 1947 में आजादी मिलने के बाद स्वीकार किया गया था, भगवा ध्वज तो आदिकाल से है, इसलिए माँ भारती के कर कमलों में वही सुशोभित है। शाखा में अनुशासन पर बहुत जोर दिया जाता, कहा जाता था कि सैनिकों की तरह पूर्णतः अनुशासित रह कर ही हम स्वराष्ट्र को सशक्त बना सकते हैं हमारा लक्ष्य है हिन्दुआंे का सैन्यकरण और सैनिकों का हिन्दुकरण इसलिए शाखा में तमाम आदेश जिन्हें ‘आज्ञा’ कहा जाता, वह भी सेना की तरह ही दी जाती, सिर्फ भाषा का फर्क था, सारी आज्ञाएँ संस्कृत में दी जाती थीं, चाहे वे दक्ष (सावधान) हो या आराम (विश्राम), स्कूल में संस्कृत के गुरूजी ने बताया था कि-संस्कृत कोई सामान्य भाषा नहीं है यह देवताओं द्वारा बोली जाने वाली भाषा है इसलिए इसे ‘देवभाषा’ कहा गया है। समस्त भारतीय महान ग्रन्थ भी इसी देवभाषा में रचे गए हैं वे चाहे वेद हो या उपनिषद, गीता हो या रामायण, यह बात मन में गहरे घर किए हुए थी सो शाखा में संस्कृत में जब भी कोई आज्ञा दी जाती थी तो वह मुझे ‘दैवीय आज्ञा’ लगती थी। शाखा में खेल के साथ-साथ बौद्धिक चर्चा भी की जाती थी, जब हम खेलते-खेलते हाँफने लगते तो एक अर्धमंडल में बैठकर बातचीत करते इसी को बौद्धिक लेना कहा जाता। इस दौरान भी बेहद सधी हुई संस्कृतनिष्ठ हिंदी में बात कही जाती, जो
सीधे दिल दिमाग पर छा जाती। बौद्धिक चर्चा के दौरान प्रश्नोतर शैली में पूछा जाता-हम कौन हंै, यह देश किसका है, कौन इसे अपनी मातृभूमि मानता है? फिर इन सवालों के जवाब दिए जाते-हम हिन्दू है, सनातनी शुद्ध आर्य रक्त, यह देश हमारा हैं, हम हिन्दू ही इसे अपनी जन्मभूमि, कर्मभूमि और पवित्र भूमि मानते हैं, हमारा देश कालांतर में सोने की चिडि़या था, इसमें दूध, दही और घी की नदियाँ बहती थीं, हम जगतगुरु थे शक, हूण, कुषाण यवन मुसलमान, पठान और अंग्रेज आए, हमारे देश को लूटा और हमें गुलाम बनाया। अन्य लोग न तो भारत को माँ मानते हैं और न ही उनकी पुण्यभूमि भारत है, किसी की येरुसलम है तो किसी की मक्का मदीना, सिर्फ हम हिन्दुओं का ही सब कुछ भारत में है, हम ही माँ भारती के सच्चे पुत्र हैं, मुझमे अन्य समुदायों के प्रति नफरत का भाव पैदा होने लगा था कि ये लोग खाते भारत का हैं और गीत मक्का, मदीना, येरुसलम के गाते हैं उनकी देशभक्ति पर मुझे संदेह होने लगा।
हमारी शाखा हर दिन शाम के वक्त 6 से 7 बजे लगती थी। प्रारंभ में केवल भूगोल के शिक्षक ही आते थे, फिर अन्य शिक्षक भी आने लगे, खास तौर पर यहाँ के प्राथमिक शालाओं के कईं शिक्षक तनख्वाह सरकार की लेते हैं और काम आरएसएस का करते हैं। कभी कभार मांडल तहसील मुख्यालय से बड़े पदाधिकारी भी आते, इन सबको हम भाई साहब कह कर बुलाते थे, शाखा में आने वाले बौद्धिक पत्रक और अन्य साहित्य से मेरी विचारधारा मजबूत हो रही थी। मैं दिनों दिन और अधिक राष्ट्रभक्त बनता जा रहा था, मुझमें हिन्दू होने का गर्व और शुद्ध आर्य खून का अभिमान आने लगा था, बाकी लोग अपने आप ही मुझे नीच और छोटे नजर आने लगे थे।
ढीली खाकी नेकर
शाखा के मुख्य शिक्षक के लिए यह अनिवार्य था कि वह निर्धारित पोशाक (जिसे गणवेश कहा जाता है) पहन कर आए, मैंने भी घरवालों से पैसे लेकर काली टोपी, ढीली खाकी नेकर, चमड़े की बेल्ट, भूरे मोजे और काले जूते तथा कान के बराबर एक लकड़ी (जिसे दंड कहा जाता है) खरीदा, सफेद कमीज तो थी ही, इसलिए खरीदनी नहीं पड़ी। मैं अब गणवेश पहनकर रोज शाखा स्थल पर जाने लगा था, आखिर मुख्य शिक्षक जो ठहरा, मेरा परिवार कभी भी जनसंघी या आरएसएस टाइप की विचारधारा का नहीं रहा, दादाजी से लेकर पिताजी तक इन लोगों के विरोधी ही रहे, एक मैं अपवाद स्वरूप इनके साथ लग गया, जब पहले सिर्फ खेलने जाता था, तब तक तो कोई दिक्कत नहीं थी, पर अब जब मैं पूरी ड्रेस पहन कर रोज-रोज शाखा में जाने लगा तो पिताजी ने टोकना शुरू किया, बोले ये लोग कभी हमारे सगे नहीं हुए और न ही होंगे, नहीं जाना, लेकिन मुझ पर तो देशभक्ति का ऐसा जुनून चढ़ा हुआ था कि कोई भी थोड़ा भी संघ की शाखा के विरोध में बोलता तो वह मुझे देशद्रोही ही लगता था। मेरे से बड़े भाई लोग मेरी ढीली नेकर की बहुत मजाक उड़ाते थे पर मैं सह लेता था।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
edc58-01

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आर एस एस की शाखा में
इस हादसे से हमने कोई सबक नहीं लिया, कारसेवा का जूनून भले ही उतर गया हो लेकिन देशभक्ति का ज्वर चढ़ा ही रहा, यह मात्र 13 साल की उम्र में ही चढ़ गया था, जब मैं कक्षा 6 का विद्यार्थी था, तभी देशभक्ति के सबसे प्रमुख स्वघोषित स्कूल आर.एस.एस. में भर्ती हो गया था। हुआ यह कि राजकीय माध्यमिक विद्यालय मोड़ का निम्बाहेड़ा, जहाँ मैं अध्ययनरत था, वहाँ के भूगोल विषय के अध्यापक महोदय बंशी लाल सेन ने हमारे गाँव के खेल मैदान में हम बच्चों को खेल खिलाना शुरू किया। वे बहुत अच्छा गाते भी थे और व्यायाम भी करवाते थे, हमें बहुत अच्छा लगता था। शुरू में खेल, फिर थोड़ा व्यायाम, एक दो गीत और कुछ अच्छी-अच्छी बातें, कुछ-कुछ बातें समझ में नहीं आती थीं, कुछ बातें उलझन भी पैदा करती थीं, खास तौर पर जब वे क्लास में भूगोल पढ़ाते हुए कहते थे कि-सूर्य आग का एक गोला है, जिसके पास कोई भी नहीं जा सकता है, अगर गया तो नष्ट हो जाएगा। मगर वे खेल के वक्त शाखा में सूर्य नमस्कार करवाते थे, इस दौरान ओऽम् सूर्याय नमः, रवये नमः, ओऽम् सवित्रे सूर्य नारायणाय नमः का मंत्रोचार कराते थे और हनुमानजी द्वारा सूर्य को मुँह में निगल जाने की कहानी बताते हुए सगर्व कहते थे कि-ऐसे थे हमारे बजरंग बली, जिन्होंने सूर्य भगवान को ही निगल लिया, पूरे ब्रह्माण्ड पर अँधेरा छा गया था। मैं इस बात से उलझन महसूस करने लगा, एक दिन हिम्मत करके पूछ लिया कि- गुरुदेव सूर्य देवता हंै, या आग का गोला? उनका जवाब पूर्णतः संघ परिवार की चिंतन प्रक्रिया का साक्षात् सबूत देता हुआ सामने आया, वे बोले-भैयाजी, शाखा में सूर्य देवता हैं लेकिन विद्यालय में वह आग का गोला हैं, मैं और अधिक भ्रमित हो गया, मैंने उनसे कहा कि-फिर हनुमान जी ने कैसे उन्हें निगला? उनका उत्तर था-बजरंग बली तो अतिशय बलशाली थे, सूर्य तो सिर्फ आग का एक गोला मात्र था, उन्होंने उसे न केवल मुँह में ले लिया बल्कि वे तो उसे चबा कर निगल ही जाना चाहते थे, सब लोकों पर छा गए अंधकार के बाद देवताओं ने आकर प्रार्थना की तब कहीं जा कर हनुमान जी ने सूर्य को उगला।
अन्ध आस्था
मेरी आस्था हनुमानजी में अत्यधिक दृढ़ हो गई, मुझे भूगोल विषय बकवास लगने लगा। अब मैं भूगोल के पीरियड में भी मन ही मन हनुमान चालीसा दोहराता रहता था, मुझे मालूम था कि इस विषय में कोई दम नहीं है, दमदार तो बजरंग बली हैं। वैसे भी गुरूजी ने एक दिन शाखा में कहा था कि संशय करने वाले लोग विनाश को प्राप्त हो जाते है (संशयात्मा विनष्यति), फिर मैंने संदेह करना छोड़ दिया, श्रद्धा का नया दौर मेरी किशोरावस्था में ही प्रारंभ हो गया। भूगोल के गुरूजी ने मुझे विज्ञान से भी विमुख कर डाला। अब मेरी आस्था धर्म कर्म में बढ़ने लगी, वैसे भी गुरूजी ने शाखा में बता ही दिया था कि पूरे विश्व में हमारा धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है, तो यह खेल, गीत और व्यायाम तथा थोड़ी सी देर जो बातचीत होती थी रोज, उसका नाम शाखा था और यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा थी। यह आर.एस.एस. की हमारे गाँव में एक ब्रांच थी जो नई नई खुली थी और हम बाल गोपाल उस शाखा की टहनियाँ थे।
हमारे गाँव की शाखा में हम बच्चों की संख्या तकरीबन 50 के आसपास थी ,सभी जातियों के बच्चे इसमें आते थे, उन जातियों के भी जो हम दलितों को नीचा समझते थे और सीधे मुँह बात भी नहीं करते थे, सब एक दूसरे को जी कह कह कर पुकारते थे, मैं भी भँवर से भँवर जी हो गया था और भँवर जी भाई साहेब होने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा था। शाखा में मैंने अप्रत्याशित सफलताएँ प्राप्त कर लीं, मैं गणनायक से मुख्य शिक्षक बना और कार्यवाह बन कर शीघ्र ही जिला कार्यालय जा पहँुचा, जहाँ पर मुझे जिला कार्यालय प्रमुख की जिम्मेदारी मिल गई
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित edc58-01

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नफरत विधर्मी मुसाफिरों से
बड़े-बड़े भाई साहबों के अजमेर में ही गायब हो जाने से हम थोड़े असहज तो हुए, थोड़े से उदास और निराश भी लेकिन जैसे जैसे ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी, निराशा का दौर जाता रहा, हमारा जुनून लौट आया, अगले स्टेशन पर स्थानीय लोगों ने हमारा जोरदार स्वागत किया, खाने को फल दिए, चाय पिलाई, बीड़ी, गुटखा भी मिला लोगों को, सब आनंद से सराबोर हो गए, ट्रेन में ज्यादातर कारसेवक ही थे, थोड़े बहुत रेगुलर यात्री भी थे, जो कि सहमे हुए बैठे थे, हमारी बोगी में कुछ मुस्लिम मुसाफिर भी थे, हमने उन्हें देख कर खूब नारे लगाए ‘भारत में यदि रहना होगा वंदेमातरम् कहना होगा।’ हमने उन्हें जी भर कर घूरा भी, इच्छा तो यह थी कि चलती ट्रेन से बाहर फेंक दें इनको, इन्हीं विधर्मी तुर्काे की वजह से हमारे भगवान राम एक जीर्ण शीर्ण ढाँचे में कैद हैं। हमारा देश, हमारे राम और उनकी जन्म स्थली पर मंदिर नहीं बनाने दिया जा रहा है, हम हिन्दू अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक हो गए हंै और ये मलेच्छ मजे ले रहे हैं, चार-चार शादियाँ करके बच्चों की फौज पैदा करके अपनी आबादी बढ़ाते जा रहे हैं। पहले देश बाँट दिया, आधे वहाँ चले गए, बाकि हमारी छाती पर मूँग दलने के लिए यहीं रह गए, ऐसे ही तरह-तरह के विचारों के चलते मैं इन मुस्लिम मुसाफिरों के प्रति नफरत के अतिरेक में डूबा हुआ था, उस वक्त मुझमें इतना गुस्सा था कि अगर मेरे हाथ में हथियार होते तो राम जन्म भूमि की मुक्ति से पहले ही इन मुस्लिम, पठान विधर्मियों को जिन्दगी से मुक्त कर देता। कुछ तो माँ भारती का बोझ हल्का होता। हमारी नफरत से घूरती आँखों ने उन्हें जरूर आतंकित किया होगा लेकिन हमें तो उन्हें इस तरह सहमे, सिमटे और भयभीत देखकर बहुत आनंद आया, जीवन में पहली बार लगा कि साले कट्टुओं को हमने औकात दिखा दी। अच्छा हुआ वे लोग चुपचाप ही रहे वरना उस रात कुछ भी हो सकता था। खैर, रात गहराती जा रही थी, धीरे-धीरे नींद पलकों पर हावी होने लगी, भजनों, नारों और उन्मादी गीतों का कोलाहल शांत हो गया, कारसेवक अब सो रहे थे, या यों समझ लीजिए कि सो ही चुके थे, मैंने अपनी उनींदी आँखों से देखा कि बाकी के यात्री अब थोड़ा राहत महसूस कर रहे थे राम के भक्तों से, फिर हम सो गए, एक मीठी सी नींद जिसमे सरयू किनारे बसी भगवान श्री राम की नगरी साकेत में प्रवेश का सुन्दर सा सपना था, जिसे जल्दी ही साकार होना था।

पहली जेल यात्रा
रात कब बीती पता ही नहीं चला, सुबह-सुबह किसी टुंडला नामक स्टेशन पर मचे भारी शोरगुल ने नींद उड़ाई, कारसेवकों में हड़कंप सा मचा हुआ था, पुलिस ने ट्रेन रुकवा रखी थी शायद आगे नहीं जाने देंगे, जाँच शुरू हुई, सारे कारसेवक धरे गए, टिकटें हमसे ले ली गईं और स्टेशन पर उतार लिया गया। पूरा स्टेशन कारसेवकों से अटा पड़ा था, कल सुबह फिर से गगन भेदते उन्मादी नारे हवा में गुंजायमान थे-सौगंध राम की खाते है, हम मंदिर वही बनाएँगे, रोके चाहे सारी दुनिया, रामलला हम आएँगे, पर हमारी शपथ पूरी न हो सकी, मुल्ला यम की सरकार ने हमें रोक लिया था। हमें गिरफ्तार कर लिया गया। रात का धुँधलका अब छँटने लगा था। भोर के उजास में हमने अपने आपको भेड़ बकरियों की तरह पुलिस के ट्रक में भरे पाया, पहले मथुरा इंटर कॉलेज ले जाए गए, जगह नहीं मिलने पर वहाँ से आगरा के बहुउद्देश्यीय स्टेडियम में बनाये गए अस्थाई जेल में ले जाए गए। वहाँ भी क्षमता से अधिक लोग पहले से ही बंद थे, इसलिए तकरीबन 80 कारसेवक बाहर ही रह गए, उनमे से एक मैं भी था, हमने इसी जेल में जाने की जिद की, नारे लगाए, हंगामा किया, तब कहीं जा कर हमें उस अस्थाई जेल में ठूँसा गया। काफी जद्दोजहद के बाद हमें जेल में प्रवेश का सौभाग्य मिला, अन्दर घुसे, जेल क्या थी, बड़ा सा ग्राउंड था, जिसमें टेंट लगे हुए थे, दीवारें इतनी छोटी कि कोई भी कूद कर बाहर निकल सकता था लेकिन बाहर कहाँ जाते? आगरा शहर में तो कफर््यू लगा हुआ था। पुलिस पीछे पड़ी थी, इलाका अनजान था, हमें प्रेरित करके शहीदी जत्थे में भेजने वाले सारे परम पूज्य भाई साहेब लोग अजमेर से ही भाग छुटे थे, यहाँ पर हम थे या थे वीतराग संत गण, चिलमची, अफीमची, गंजेड़ी, भंगेड़ी, उनमे से कइयों ने तो गांजा पीना शुरू कर दिया। एक दो को छोड़कर बाकी सब मस्त हो गए।
अब तो हम थे और हमारी यह अस्थायी जेल थी। ऊपर टेंट, नीचे दरी, खाने में सबसे घटिया गुणवत्ता वाली कंकर पत्थर युक्त दाल, जली हुई रोटियाँ, बेस्वाद पानी और पुलिस वालों की झिड़कियाँ खाते-खाते किसी तरह हमने अपनी जिन्दगी की पहली 10 दिवसीय जेल यात्रा पूरी की इस तरह हम चले तो थे राम जन्म भूमि के लिए और पहँुचे कृष्ण जन्म भूमि में।
गालियाँ,पत्थर ,हमला,भय और दुर्गन्ध
जिस दिन हमें जेल से रिहा किया गया, हमारे नाम पते लिखे गए, हाथों पर जेल की मुहर लगाई गई और छोड़ दिया गया। वैसे भी जेल में जेल जैसा कुछ था ही नहीं। अन्दर ही शाखा लगती थी, बातें होती, साधू संत अपना भजन, कीर्तन और प्रवचन करते रहते थे, जेल जैसी तो कोई बात थी ही नहीं, फिर भी कैद तो कैद ही है। जेल प्रवास पूरा हुआ तो जो ट्रक हमें लाये थे, वे गायब थे, बस यूँ ही छोड़ दिए गए, शहर में अभी भी कफर््यू जारी था, सो तय यह हुआ कि रेल की पटरियों पर हो कर स्टेशन तक पहँुचा जाए, पटरी-पटरी हम आगरा केंट की ओर चले। बलिदानी मानस थोड़ा थक चुका था, कारसेवा सफल नहीं रही थी। धर्मद्रोही, मुस्लिमपरस्त मुल्ला मुलायम सिंह ने सरयू के पुल पर ही कारसेवकों पर गोलियाँ चलवा दी, सैकड़ों कारसेवक मौत का ग्रास बन गए, कइयों को गोली लगी तो कई सारे गोली लगने के डर से वेगवती सरयू के पानी में कूद कर काल कवलित हो गए। राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद का ढाँचा तोड़ना तो दूर की बात, पुलिस की सख्ती के चलते परिंदा भी वहाँ पर नहीं मार सका, वाकई मुलायम कारसेवकों के लिए मुल्ला यम साबित हुए असफलता और घनघोर निराशा तथा डर और अवसाद की स्थिति में हम किसी तरह रेंगते हुए से रेल पटरियों पर आगरा कैंट की और बढ़ रहे थे, अचानक सामने से तकरीबन एक दर्जन लोग ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाते हुए आते दिखाई दिए, हम में पुनः जोश का स्फुरण होने लगा, कफर््यू के बावजूद रामभक्त हमारे स्वागत को आ गए हैं, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। बहुत अच्छा लगा, हमने अपने अंदर उत्साह महसूस किया, हमारे कदम खुद ब खुद उठने लगे पर यह क्या? ये तो मुल्ले निकले, इनके तो हाथों में पत्थर हैं, अब इनकी जबान से जय श्रीराम नहीं निकल रहा था, हमारी सात पुश्तों तक उनकी भद्दी गालियाँ पहँुच रही थी-मादर …द यहाँ क्या लव… पकड़ने आए हो, मारो मादर …दो को, हम तो स्तब्ध रह गए, आँखों के आगे
अँधेरा छाने लगा, आसपास की बस्ती की ओर मदद के लिए हमने कातर निगाहों से देखा। मगर सब तरफ इंकार ही इंकार के भाव थे। दरअसल इस रेल पटरी के चारों ओर सिर्फ मुस्लिम बस्ती ही थी। सामने से आए इन मुस्लिम युवाओं से छोटा सा संघर्ष हुआ, कुछ लोगों को चोटें आई, सामान भी गिरा, एक कारसेवक होतुमल की उन्होंने जमकर पिटाई की, वह भारी शरीर था, भाग नहीं पाया, उनके हत्थे चढ़ गया। हमारे पीछे भी दौड़े, पत्थर फेंके, हम आगे-आगे और वे पीछे-पीछे किसी तरह जान बचाने के लिए हमने रेलवे पुलिस थाने की शरण ली, दरोगा जी यदुवंशी निकले, मुल्ला यम के वंश के, उनके श्रीमुख से भी हजारों गालियों की बौछार से हम नहाए, जिस पुलिस से मदद की उम्मीद थी, वही लट्ठ लेकर मारने को पीछे दौड़ी, पीछे पत्थर बरसाते मुल्ले और आगे लाठियाँ लिए खड़े ठुल्ले हे भगवान, अब कहाँ जाएँ, हे राम जी, आप ही जान बचाओ अब हमारी, एक क्षण तो लगा कि अब मौत ही हमारी अंतिम मुकाम है, लेकिन जहाँ राम रक्षा मंत्र नहीं चल पाया वहाँ रेल रक्षा यंत्र ने काम किया। आगरा कैंट पर खड़ी एक मालगाड़ी के खाली डिब्बों में घुस कर हमने दरवाजे बंद करके किसी तरह जान बचाई। गालियाँ देते मुस्लिम नौजवान और पुलिसकर्मी जब वापस चले गये। तब हमारी रुकी हुई साँसे फिर से चलने लगी, मालगाड़ी के डिब्बों से निकल कर हम वापस स्टेशन पर खड़े हुए। बाद में जयपुर की ओर जाने वाली किसी ट्रेन में हम सवार हुए। ट्रेन में भारी भीड़ थी, टॉयलेट के पास खड़े रहने भर की जगह मिली। टिकट भी नहीं खरीद पाए, बेटिकट ही बैठ गए थे, भारी भीड़, भय और पाखाने की भयंकर दुर्गन्ध सब एकाकार हो गए थे। कारसेवा के दौरान शहीद होने की इच्छा अब तक मर चुकी थी, एक ही इच्छा थी कि जल्दी से जल्दी घर पहँुचा जाए, घर पर परिजनों के हाल बेहाल थे अयोध्या की खबरें सुन-सुन कर, चूँकि हम दोनों ही भाई इस कारसेवा का हिस्सा बनने चले गए थे, इसलिए माँ बाप ने सोच लिया कि हम जरूर पुलिस की गोली के शिकार हो गए होंगे और इस तरह वे बेऔलाद, मगर न तो हमें रामजी के नाम पर मौत आई और न ही वे निःसंतान हुए, महज 15 दिनों में हम घर लौट आए सही सलामत एकदम जिंदा।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित edc58-01

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सौगंध राम की खाते है!
बात सन् 1991की है, जब राम जन्म भूमि- बाबरी मस्जिद का विवाद देश में चरम पर था। हवा में चारों तरफ ‘बच्चा बच्चा राम का-जन्म भूमि के काम का’ और ‘जन्म भूमि के काम ना आए वह बेकार जवानी है-जिस हिन्दू का खून ना खौले, खून नहीं वह पानी है’ जैसे नारे गूँजते थे। मेरी उम्र उस वक्त 17 वर्ष की थी, बाहरवीं कक्षा में पढ़ता था। मैं बिना घर वालों को बताए कारसेवा करने के लिए घर से भाग गया। राम शिलाएँ पूजित हो चुकी थीं, हम लोग उन दिनों भीलवाड़ा में राम मंदिर के लिए अभियान चला रहे थे। मेरी कारसेवा में शामिल होने की बेहद इच्छा थी, ताकि अपने स्वयंसेवक होने को और मजबूती दे सकूँ। अंततः मौका मिल गया और मुझे भी सैकड़ों लोगों के एक बलिदानी जत्थे में शामिल कर लिया गया। हमारी रवानगी से पहले जगह-जगह हमारे जुलूस निकाले गए, मैं बेहद रोमांचित था, मुझे याद है कि हम लोग गले में मालाएँ और सर पर भगवा पट्टी और ललाट पर रक्तिम तिलक लगा कर मुट्ठियाँ बाँधकर जय श्री राम तथा जय जय श्री राम के गगन भेदी नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे.उस वक्त हम सबकी जुबान पर एक ही गीत था रामजी के नाम पर जो मर जाएँगे-दुनिया में नाम अपना अमर वह कर जाएँगे।
मुझे यकीन था कि हमारी भिडंत जरूर मुलायम सिंह की हिन्दू द्रोही पुलिस से हो जाएगी और हम मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्री राम के नाम पर उनकी जन्म स्थली को मुक्त कराने के लिए अपना आत्मोत्सर्ग कर देंगे। हम एक ट्रेन के जरिए भीलवाड़ा से अजमेर पहँुचे, हमारे जत्थे में ज्यादातर नौजवान लोग थे और बाकी के साधू संत थे। अजमेर की एक धर्मशाला में सैकड़ों और लोग भी भगवा दुपट्टा ओढ़े पहले से ही जमा थे, इन सबको भी अयोध्या जाना था, उन्हें देख कर हमारा हौंसला दुगुना हो गया, हर चेहरा बलिदान की भावना से दमक रहा था, सबके मन में एक ही लक्ष्य था, जल्दी से जल्दी राम की जन्म भूमि तक पहुँचना और गुलामी के प्रतीक चिह्न बाबरी ढाँचे को ध्वस्त करना, हमारे साथ संघ (आरएसएस) और विश्व हिन्दू परिषद के
पदाधिकारीगण भी मौजूद थे, खाना खाने के बाद उन्होंने सबको सामूहिक दिशा निर्देश दिए कि हमें हर हाल में अयोध्या पहँुचना है, मुलायम सिंह सरकार अगर रोके, गिरफ्तारी करे या दमन करें, इस परिस्थिति में क्या करना है, उनसे कैसे बचना है, कैसे उन्हें चकमा देकर आगे जाना है। यह बताया गया। वरिष्ठ
अधिकारियों का स्पष्ट निर्देश था कि चाहे हमें खुद को क्यों ना मिटाना पड़े, गुलामी के उस कलंक बाबरी मस्जिद को उखाड़ फेंकना है, दिल कर रहा था कि उड़कर अभी भगवान श्री राम की नगरी अयोध्या पहुँच जाऊँ और राम लला को मलेच्छ विधर्मियों के चंगुल से आज ही मुक्त करवा दूँ, आखिर हिन्दुओं के ही देश में हिन्दुओं के आराध्य देवता राम की जन्म स्थली पर हम गुलामी का यह बाबरी ढाँचा कब तक बर्दाश्त करेंगे। हमें साफ-साफ आदेश मिल चुका था कि किसी भी कीमत पर जान की परवाह किए बगैर हमें अयोध्या पहुँच कर बाबरी मस्जिद के ढाँचे की ओर बढ़ना है, कहा गया कि ढाँचा गिराने के लिए कुदाल, गेंती, फावड़े और सब्बल आदि हमें स्थानीय लोगों की ओर से उपलब्ध करवाए जाएँगे। अब हमारा एक मात्र लक्ष्य था-हर हाल में अयोध्या पहँुच कर बाबरी ढाँचे को गिराना और रामलला को मुक्त करवाना। शाम हुई और हम लखनऊ जाने वाली ट्रेन की ओर बढे़। भीलवाड़ा से संघ, विहिप तथा भाजपा के कई जाने माने चेहरे भी हमारे साथ आए थे, उनका साथ पाकर हमारा हौंसला बढ़ रहा था। मैंने मन ही मन भगवान श्री राम को धन्यवाद् दिया कि उन्होंने इतना शानदार मौका दिया कि आज मुझे इन बड़े-बड़े लोगों के साथ राम काज के लिए चुना गया है। मुझे लगा कि आज वाकई हर व्यक्ति राम के नाम पर शहीद होने को तत्पर है, छोटे- बड़े, अमीर-गरीब, खास या आम आदमी, सभी तरह के फर्क खत्म हो चुके हैं। लोग करोड़ों की दौलत, कारखाने, महल, ऊँचें पद और प्रतिष्ठा सब त्याग कर रामकाज करने को आतुर हैं, वाह रामजी क्या गजब लीला है तेरी हमें लग रहा था कि यह आजादी की दूसरी जंग है, हम खुद को स्वतंत्रता सेनानी समझ कर मन ही मन धन्य हो रहे थे, ऐसे उत्साह और खुशी के माहौल में हम ट्रेन पर सवार हुए। हम सबको अपना अपना टिकट दे दिया गया था यह कह कर कि अगर किसी कारणवश कोई बिछुड़ जाएँ तो खुद का टिकट तो खुद के पास होना ही चाहिए, हमें भी यह बात ठीक लगी, स्टेशन खचाखच भरा था, जाने वालों से ज्यादा पहुँचाने वाले आए थे। तनी हुई मुट्ठियों और चीखते चेहरों ने अपना पूरा दमखम वन्दे मातरम्, जयकारे बजरंगी-हर हर महादेव और जय जय श्री राम के नारों पर लगा रखा था। इतनी उत्तेजना और शोरगुल मैंने आज से पहले कभी नहीं महसूस की, ट्रेन की सीटी बज चुकी थी, हमने भी मुट्ठियाँ बाँधी और पूरा जोर लगाकर चीखे-सौगंध राम की खाते हैं-हम मंदिर वहीं बनाएँगे। हम खुश थे कि हमारा सफर अयोध्या की तरफ शुरू हो चुका था। ट्रेन सरकने लगी और हमारी बोगियों से बड़े-बड़े लोग भी सरकने लगे, अरे यह क्या? ये भाई साहब क्यों उतर रहे है, ये प्रचारक जी क्या यहीं रहेंगे, हमारे साथ नहीं चलेंगे, मैंने देखा कि धीरे धीरे तमाम सारे बड़े लोग, उद्योगपति, संघ प्रचारक, विहिप नेता और भाजपाई लीडरान ट्रेन से उतर गए, सब बड़े लोग हमें अयोध्या रवाना करके अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गए पीछे रह गए हम जैसे जुनूनी दलित, आदिवासी तथा पिछड़े वर्ग के युवा एवं साधू संत और हमें सँभालने के लिए कुछेक छुटभैय्ये नेता गण जो हमें बता रहे थे कि भाई साहब दूसरे जत्थों को रवाना करके सीधे ही अयोध्या पहुँच जाएँगे, हालाँकि उन्हें नहीं आना था, वे कभी नहीं आए, वे समझदार लोग थे, इसलिए घर लौट गए। समझदार लोग सदैव ही हम जैसे जुनूनी लोगों को लड़ाई में धकेल कर अपने-अपने दरबों में लौट जाते हैं, यही उनका बड़प्पन है, शायद इन्हीं चालाकियों से ही वे बड़े बनते होंगे।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
कर्मश :edc58-01
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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भारतीय इतिहास में आज़ादी के बाद हिन्दुवत्वादियों द्वारा बाबरी मस्जिद का ध्वंस सबसे बड़ी आतंकी घटना है। यह घटना 6 दिसंबर 1992 को जर्मन नाजीवादी विचारधारा से लैस हिन्दुवत्वादियों ने की थी और भारतीय लोकतंत्र उसको न बचा पाने पर शर्मिंदा हुआ था। फेसबुक पर मित्रों के निम्नलिखित विचार आयें हैं :-

Jagadishwar Chaturvedi
आज 6 दिसम्बर है।यह स्वतंत्र भारत का कलंकमय दिन है। आज के ही दिन 1992 में बाबरी मस्जिद गिरायी गयी। जब यह मस्जिद गिरायी गयी तो मसजिद गिराने वालों ने एक ऐतिहासिक मसजिद को नष्ट किया, हमारे देश के संविधान और कानून की अवमानना की।इसके अलावा उस दिन अकेले अयोध्या में 14 मुसलमान मारे गए।267घर जलाए गए या तोड़े गए।19मजार और मदरसों को क्षतिग्रस्त किया गया।4500मुसलमानों को अयोध्या छोड़कर भागना पड़ा।इसके अलावा देश के विभिन्न इलाकों में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। दुखद यह है कि जिन संगठनों ने यह सब काण्ड किया उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई।
Anand Pradhan
बाबरी मस्जिद का ध्वंस आधुनिक भारत के इतिहास की सबसे शर्मनाक और त्रासद घटनाओं में से एक है. इस दिन भगवा सांप्रदायिक ताकतों ने एक बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक, बहुराष्ट्रीय और बहुभाषी भारत के विचार को मर्मान्तक चोट पहुंचाने की कोशिश की थी. इसलिए यह आज़ाद भारत के इतिहास का एक काला दिन है जिसे बेहतर समाज और देश चाहनेवालों को कभी भुलाना नहीं चाहिए.

Girijesh Tiwari

आइए, आज फिर एक बार अदम गोंडवी को याद करें
और साम्प्रदायिक सौहार्द की गंगा-जमनी तहज़ीब की हिफ़ाज़त के लिये
पहलकदमी करें.
“हिन्दू और मुस्लिम के एहसासात को मत छेडिये;
अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेडिये.

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है;
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए.

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थी, जुम्मन का घर फिर क्यों जले;
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए.

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ;
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए.

छेड़िए असली जंग, मिल-जुल कर गरीबी ख़िलाफ़;
दोस्त, मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेड़िए !”
Saleem Akhter Siddiqui
छह दिसंबर को आज की पीढ़ी भूलती जा रही है। हो सकता है वक्त के साथ यह तारीख इतिहास में कहीं दफन हो जाए। ऐसे ही जैसे 1949 से लेकर 31 जनवरी 1986 तक का वक्फा दफन रहा था। लेकिन 1 फरवरी 1986 ने सब कुछ बदल दिया। जो एक साल पहले दो सीटें लेकर इतिहास बनने की ओर अग्रसर थे, वे अचानक हमलावर हो गए। 2 से 88 और फिर 180 तक जा पहुंचे। देश की राजनीति का घोर सांप्रदायिकरण कर दिया गया। उस फसल को देश आज तक काट रहा है। मामला भले ही सुप्रीम कोर्ट में हो, लेकिन पता नहीं कौन और कब इसे दोबारा भड़काकर देश को अस्सी के दशक जैसे डरावने दौर में ले जाए।
Ali Sohrab
मंदिर तो एक बहाना है, मक़सद नफरत फैलाना है ,यह देश भले टूटे या रहे उनको सत्ता हथियाना है।
मस्जिद भी रहे, मंदिर भी बने क्या यह बिल्कुल नामुमकिन है?
हिलमिल कर सब साथ रहें क्या यह बिल्कुल नामुमकिन है?

इक मंदिर बने अयोध्या में इसमें तो किसी को उज्र नहीं
पर वह मस्जिद की जगह बने यह अंधी जिद है, धर्म नहीं।

क्या राम जन्म नहीं ले सकते मस्जिद से थोड़ा हट करके?
किसकी कट जाएगी नाक अगर मंदिर मस्जिद हों सट करके?

इंसान के दिल से बढ़कर भी क्या कोई मंदिर हो सकता?
जो लाख दिलों को तोड़ बने क्या वह पूजा घर हो सकता?

मंदिर तो एक बहाना है मक़सद नफरत फैलाना है
यह देश भले टूटे या रहे उनको सत्ता हथियाना है।

इस लम्बे-चौड़े भारत में मुश्किल है बहुमत पायेंगे
यह सोच के ओछे मन वाले अब हिन्दू राष्ट्र बनायेंगे।

इतिहास का बदला लेने को जो आज तुम्हें उकसाता है
वह वर्तमान के मरघट में भूतों के भूत जगाता है।

इतिहास-दृष्टि नहीं मिली जिसे इतिहास से सीख न पाता है
बेचारा बेबस होकर फिर इतिहास मरा दुहराता है।

जो राम के नाम पे भड़काए समझो वह राम का दुश्मन है।
जो खून-खराबा करवाए समझो वह देश का दुश्मन है।

वह दुश्मन शान्ति व्यवस्था का वह अमन का असली दुश्मन है।
दुश्मन है भाई चारे का इस चमन का असली दुश्मन है।

मंदिर भी बने, मस्जिद भी रहे ज़रा सोचो क्या कठिनाई है?
जन्मभूमि है पूरा देश यह इसे मत तोड़ो राम दुहाई है।

-डॉ. रण्जीत
Ranjan Yadav
आज कोई बाबरी विध्वंश का जश्न मना रहा है ,कोई गम में पागल हुए जा रहा है | लेकिन कुछ ऐसा है जो भारत के जातिवाद गद्दार समाज के खिलाफ मुहीम को अंजाम दे रहे है ,मेरा नाम उसी लिस्ट में शामिल करे |
असरफ हिन्दू और स्वरण मुस्लिम के लिए बाबरी और राम मंदिर मुद्दा दोनों में कोई अंतर नहीं है ,इनके लिए धर्म भी कोई मायने नहीं रखती है ,इनके लिए मायने रखती है तो सिर्फ और सिर्फ राज सत्ता !
देश के 60 फीसदी आबादी जब मंडल मुहीम में अपनी सविन्धानिक हक और आर्थिक हितो के लिए एकत्र हो रही थी ,तभी अडवानी मुरलीमनोहर जोशी जैसे जातिवादी असरफ स्वर्णों ने मंदिर -मस्जिद प्रकरण को आवाज दी |मंडल दब के रह गया ,आवाज दबी देश के आधी आबादी की ,अब खुद सोचे क्या इनके पाप इस जन्म में माफ़ किये जा सकते है ?
तुम्हारे शौर्य दिवस कलंक है देश पर !
संक्षेप में इनके लिए सिर्फ और सिर्फ एक शब्द “देशद्रोही गद्दार जातिवादी |
जंग जारी रहे ,लिखते रहिये लोगो को बताते रहिये ,समझाते रहिये ,गद्दार जातिवादी लोगो के चहरे सामने आनी ही चहिये | जब पेट भरा रहेगा तभी राम भजन होगा

Rajendra Singh
हम 6 दिसम्बर को ही भारत के संविधान को तार-तार करने वाली घटना भी हुई थी। मैं मुस्लिम भाइयो से बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए माफ़ी मांगता हूँ। हमारे समुदाय के लोगो ने जो गलत किया इस बात के लिए।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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बाबरी मस्जिद का ध्वंस आज के दिन हिन्दुवत्व वादियों के नेतृत्व में हुआ था। सरकार पहले से ही चुप थी। सरकार पर कारपोरेट जगत का कब्ज़ा या उसके रुपयों से बनने वाली सरकारें देश और प्रदेश में स्थापित हो रही हैं। कारपोरेट जगत चाहता है कि जल, जंगल, जमीन पर उसका कब्ज़ा बढ़ता ही जाए। वह बहुसंख्यक आबादी के हिस्से की जमीन से निकलने वाली बहुमूल्य धतुवों को वह बेच कर अत्यधिक मुनाफा कमा सके। बहुसंख्यक आबादी के हिस्से की हवा पानी वह भी बेचें और मुनाफा कमाए क्यूंकि मुनाफा कमाने के लिए उद्योगों द्वारा आवश्यक प्रबंध न किये जाने से बहुसंख्यक आबादी की हवा भी नष्ट होती है। पानी को तो वह लगभग नब्बे प्रतिशत नष्ट कर ही चुके हैं। शेष पानी पर कब्ज़ा करना चाहते हैं वह पंद्रह रुपये लीटर पानी भी बेच लेते हैं। उनकी लूट खसोट के सम्बन्ध में कोई सवाल न उठ खड़ा हो इसलिए आवश्यक है जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता जैसे भावनात्मक सवालों को लेकर बहुसंख्यक जनता वाक् युद्ध से लेकर मल्ल युद्ध तक करती रहे और उनका मुनाफा बढ़ता रहे। बाबरी मस्जिद का ध्वंस उसी कड़ी का एक हिस्सा रहा है। कट्टरपंथियों की जमात उनकी सेवक रही है। सरकार उनकी गुलाम। यदि देश में संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्ष सरकार होती तो संभव ही नहीं था बाबरी मस्जिद का ध्वंस। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद देश में साम्प्रदायिकता का जो दौर चला उसमें महंगाई, भुखमरी, शोषण, अत्याचार जैसे मुद्दे गायब हो गए और नयी आर्थिक नीतियों के आधार पर कारपोरेट घरानों की लाखों-लाख करोड़ रुपयों की लूट आरंभ हो गयी। सत्तारूढ़ दल और विपक्ष कारपोरेट घरानों की कठपुतलियां ही साबित हो रही हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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इस महीने (दिसंबर 2011) बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के उन्नीस साल पूरे हो गए। इस अवसर पर कुछ मुस्लिम संगठनों ने मस्जिद के पुनर्निर्माण की माँग फिर से उठाई। इस माँग के पूरी होने में कानूनी बाधाएं तो हैं ही, यह एक ऐसी राजनैतिक गुत्थी बन गया है जिसका कोई हल नजर नहीं आ रहा है। कई अलगअलग राजनैतिक ताकतें, इस मुद्दे का इस्तेमाल अपनीअपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर रहीं हैं।

यहां हम एक बार फिर दुहराना चाहेंगे कि हिंदुत्व का हिंदू धर्म से कोई लेनादेना नहीं है। हिंदुत्व तो संघ परिवार की राजनीति का नाम है। हिंदुत्व, संकीर्ण सोच व सांप्रदायिक दृष्टिकोण की राजनीति है। हिंदुत्व, दरअसल, उच्च जातियों के हिंदुओं के उस तबके की सोच को प्रतिबिंबित करता है जो प्रजातंत्र का खात्मा कर देना चाहता है। हिंदुत्व का पैरोकार वर्ग अपेक्षाकृत समॢद्ध और अधिकांशतः शहरी है। हिंदुत्व की राजनीति का उद्देश्य, हिंदू राष्ट्र की स्थापना है जहां समाज के ॐचे तबके का वर्चस्व होगा और जहां सामंती मूल्यों का बोलबाला होगा। जो खेल खेला जा रहा है वह है सामंती मूल्यों व जन्मआधारित ॐचनीच को गौरवशाली परंपरा के नाम पर आधुनिक कलेवर में परोसना।
बाबरी मस्जिद का ़हाया जाना केवल एक राष्ट्रीय स्मारक का विनाश नहीं था बल्कि उसके साथ ही भारतीय राजनीति का एक नया दौर शुरू हुआ जिसमें राजनीति के प्रांगण में अब तक दबेछिपे ंग से काम कर रहीं सांप्रदायिक राजनैतिक ताकतें, खुलकर अपना कुत्सित खेल खेलने लगीं। इसके चलते अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा ब़ी और भारतीय संविधान के मूल्यों का मखौल बना। बाबरी मस्जिद का ़हाया जाना, दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने की ओर सांप्रदायिक राजनैतिक दलों का पहला कदम था।
बाबरी घटना के तुरंत बाद भाजपा राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया परंतु इससे समाज का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण न रूक सका। जमकर सांप्रदायिक हिंसा हुई और हाशिए से खिसककर भाजपा, राजनीति के मंच के केन्द्र में आ पहुँची। वह सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरी। भाजपा के पितृसंगठन आऱएस़एस़ की समाज में स्वीकार्यता ब़ने लगी। अल्पसंख्यकों के विरूद्ध पूर्वाग्रह, सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। मुसलमानों के अलावा ईसाई अल्पसंख्यक भी सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर आ गए। पॉस्टर ग्राहम स्टेन्स को जिंदा जला दिया गया और देश के कई हिस्सों में ईसाई मिश्नरियों के विरूद्ध हिंसा हुई। इसका चरमोत्कर्ष था कंधमाल में खूनी मारकाट।
मूलतः प्रजातंत्रविरोधी व हिंदू राष्ट्र की पक्षधर भाजपा पहली बार सन 1996 में केन्द्र में सत्ता में आई। उस समय सभी अन्य पार्टियों ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया। सत्ता का लालच भी उन्हें न बांध सका परंतु बाद में, शनै:शनै: राजनैतिक पार्टियाँ, सत्ता की खातिर भाजपा से जुड़ने लगीं। उन्हें बाबरी मस्जिद ़हाने के आरोपियों से हाथ मिलाने में कोई संकोच नहीं हुआ। उन्हें उन लोगों से कोई परहेज न रहा जिन्होंने पूरे देश में भारी खूनखराबा मचाया था। भाजपा केन्द्र में सत्ता में आ गई और इससे विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि जैसे संघ परिवार के अन्य सदस्यों की बन आई। वे मनमानी पर उतर आए। राज्यतंत्र और पुलिस बलों का तेजी से सांप्रदायिककीकरण होने लगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी भगवाधारियों ने अपने हाथपैर फैलाने शुरू कर दिए। वैज्ञानिक सोच व तार्किकता के स्थान पर आस्था व विश्वास शिक्षा के आधार बनने लगे।
इससे भाजपा की ताकत और ब़ी। चुनावों में जीत उसके लिए आसान होती गईं। संघ का प्रचार तंत्र केवल अल्पसंख्यकों का दानवीकरण नहीं करता, वह बहुसंख्यकों के मन में अल्पसंख्यकों के “खतरे” का भय भी उत्पन्न करता है। इससे संघ का प्रचार और धारदार बन जाता है और मध्यमार्गी भी संघ के झंडे तले जुटने लगते हैं। कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही, दक्षिण भारत में भाजपा के पैर जमाने की शुरूआत हुई। भाजपा की राजनैतिक विचारधारा पूरे देश में अपनी जडें़ जमा रही है। उसकी जडें़ और मजबूत, और मोटी होती जा रहीं हैं।
बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के साथ ही कई प्रक्रियाएं शुरू हुईं। हिंसा पीड़ित न्याय पाने से वंचित कर दिए गए। उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन जीने पर मजबूर कर दिया गया। बाद में, आतंकवाद का मुद्दा भी मुसलमानों के दानवीकरण का बहाना बन गया। ईसाई अल्पसंख्यक भीविशेषकर आदिवासी इलाकों मेंसाम्प्रदायिक ताकतों के शिकार बनने लगे।
9/11 के बाद, अमरीकी प्रचारतंत्र अल्कायदा को आतंकवाद का स्त्रोत बताने लगा। मुसलमानों व इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ना शुरू कर दिया गया। अमरीकी मीडिया ने “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द ग़ा। तेल संसाधनों पर कब्जे की राजनीति में सफलता की खातिर आमजनों की विचारधारा और सोच में जहर घोलना शुरू कर दिया गया। भारत में भी मुसलमानों के खिलाफ दुष्प्रचार ने नई ॐचाईयाँ छूईं। इस्लाम की शिक्षाओं और मुसलमानों को आतंकवाद के लिए दोषी ठहराया जाने लगा। यह झूठा प्रचार अत्यंत होशियारी से किया गया।
आऱएस़एस़भाजपा की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ सामाजिक धु्रवीकरण को चरम पर पहॅुचा देने के बाद अब इन तत्वों ने अन्ना हजारे के आंदोलन के नाम पर प्रजातांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का अभियान शुरू कर दिया है। वे एक ऐसे तंत्र का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें “लोकपाल” नामक सर्वशक्तिमान संगठन, हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों व संस्थाओं पर नजर रखे। ऊपर से देखने से ऐसा लग सकता है कि लोकपाल से देश की समस्याएं सुलझेंगी। परंतु दरअसल इससे एक ऐसी संस्था अस्तित्व में आएगी जिसपर प्रजातांत्रिक नियमकानून लागू नहीं होंगे। कुछ लोग और संगठन, जो जनता का एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा कर रहे हैं और “अन्ना संसद के ऊपर हैं” जैसे बेमानी नारे लगा रहे हैं, असल में पर्दे के पीछे से देश के संचालन के सूत्र अपने हाथों में लेना चाहते हैं। अन्ना आंदोलन ने एक ऐसे सामाजिक वर्ग को जन्म दिया है जो यह मानता है कि पहचान से जुड़े मुद्दे (राम मंदिर) और भ्रष्टाचार जैसे मसले, जो कि असली बीमारी के लक्षण मात्र हैं, ही देश की मूल समस्याएं हैं। उन्हें दलितों, अल्पसंख्यकों व समाज के अन्य वंचित समूहों की समस्याओं से कोई लेनादेना नहीं है। पहचानआधारित मुद्दे और बाहरी लक्षणों से जुड़े मसले, राजनैतिक यथास्थितिवाद के हामी होते हैं और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले सभी समूहचाहे वे ईसाई कट्टरपंथी हों, इस्लामिक कट्टरपंथी हों या हिंदुत्ववादी भी यही चाहते हैं।
अब चूंकि राममंदिर मुद्दे की चमक खो गई है इसलिए सामाजिकराजनैतिक यथास्थितिवादी तत्वों ने भ्रष्टाचारविरोध का पल्ला थाम लिया है। यह एक चालाकी भरा कदम है। “मैं अन्ना हूँ” “हम जनता हैं” जैसे नारों से वंचित वर्ग स्वयं को अलगथलग महसूस कर रहे हैं। अन्ना आंदोलन के कर्ताधर्ताओं का संदेश साफ है। इस देश की व्यवस्था केवल “शाईनिंग इंडिया” वर्ग से निर्देशित होगी और वंचित वर्ग सदा हाशिए पर रहेंगे।
संघहिंदुत्व राजनीति, समाज का धु्रवीकरण व सांप्रदायिकीकरण करने व मूल मुद्दों से समाज का ध्यान हटाने के लिए नित नई रणनीतियाँ अपनाता रहता है। जहाँ पहले रथ यात्राओं व सांप्रदायिक हिंसा ने समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत करने में भूमिका अदा की वहीं अब भ्रष्टाचार जैसे सामाजिक मुद्दे का इस्तेमाल उस राजनीति को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है जिसका लक्ष्य सामाजिक असमानताओं को बनाए रखना है।

राम पुनियानी

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