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Posts Tagged ‘भँवर मेघवंशी’

स्वयंसेवक के रूप में
शाखा में राष्ट्रभक्ति पर विशेष जोर दिया जाता था, मन में देश प्रेम की भावना तो थी ही, इसलिए शाखा में गाए जाने वाले गीत बहुत लुभाने लगे। एक गीत-‘संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो, भला हो जिसमें देश का, वह काम सब किए चलो’ तो मुझे कंठस्थ ही हो गया था। भारत माता को आराध्य देवी मान कर-‘तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें; और ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ का मन्त्र जपते हुए मैं खुद को धन्य समझने लगा था, इतना ही नहीं बल्कि-‘तन समर्पित मन समर्पित और ये जीवन समर्पित, चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ, जैसे राष्ट्र प्रेम के गीत और बातें मन को अभिभूत कर देती थीं। हर दिन होली दीवाली सा माहौल होता था। मुझे पक्का यकीन होने लगा था कि हम शाखा में जाने वाले लोग ही राष्ट्रभक्त हंै, जो शाखा में नहीं आते वे सब देशद्रोही है।
आर एस एस की काली बिल्ली
जैसा कि आर.एस.एस. का दावा है कि वह अपनी शाखाओं में मानव के चरित्र निर्माण का काम करता है, उसके द्वारा तैयार व्यक्ति एक काली बिल्ली की तरह होता है, जिसको जीवन के किसी भी क्षेत्र में फेंक दिया जाए तो भी वह पीठ के बल नहीं गिरता बल्कि पैरों पर ही खड़ा होता है। अब मैं भी आर.एस.एस. की काली बिल्ली बनना चाहता था, इसलिए पूरे मनोयोग से शाखा की गतिविधियों में शिरकत करने लगा।
शाखा में ही पहली बार मैंने भारत माता की तस्वीर के दर्शन किए, जिसमंे भारत माताजी हाथ में भगवा झंडा लिए शेर के पास खड़ी दिखाई दीं। तब मेरे मन में सवाल उठा कि भारत माता के हाथ में भगवा झंडा क्यों है, राष्ट्रध्वज तिरंगा क्यों नहीं? जवाब मिला तिरंगा झंडा तो सन 1947 में आजादी मिलने के बाद स्वीकार किया गया था, भगवा ध्वज तो आदिकाल से है, इसलिए माँ भारती के कर कमलों में वही सुशोभित है। शाखा में अनुशासन पर बहुत जोर दिया जाता, कहा जाता था कि सैनिकों की तरह पूर्णतः अनुशासित रह कर ही हम स्वराष्ट्र को सशक्त बना सकते हैं हमारा लक्ष्य है हिन्दुआंे का सैन्यकरण और सैनिकों का हिन्दुकरण इसलिए शाखा में तमाम आदेश जिन्हें ‘आज्ञा’ कहा जाता, वह भी सेना की तरह ही दी जाती, सिर्फ भाषा का फर्क था, सारी आज्ञाएँ संस्कृत में दी जाती थीं, चाहे वे दक्ष (सावधान) हो या आराम (विश्राम), स्कूल में संस्कृत के गुरूजी ने बताया था कि-संस्कृत कोई सामान्य भाषा नहीं है यह देवताओं द्वारा बोली जाने वाली भाषा है इसलिए इसे ‘देवभाषा’ कहा गया है। समस्त भारतीय महान ग्रन्थ भी इसी देवभाषा में रचे गए हैं वे चाहे वेद हो या उपनिषद, गीता हो या रामायण, यह बात मन में गहरे घर किए हुए थी सो शाखा में संस्कृत में जब भी कोई आज्ञा दी जाती थी तो वह मुझे ‘दैवीय आज्ञा’ लगती थी। शाखा में खेल के साथ-साथ बौद्धिक चर्चा भी की जाती थी, जब हम खेलते-खेलते हाँफने लगते तो एक अर्धमंडल में बैठकर बातचीत करते इसी को बौद्धिक लेना कहा जाता। इस दौरान भी बेहद सधी हुई संस्कृतनिष्ठ हिंदी में बात कही जाती, जो
सीधे दिल दिमाग पर छा जाती। बौद्धिक चर्चा के दौरान प्रश्नोतर शैली में पूछा जाता-हम कौन हंै, यह देश किसका है, कौन इसे अपनी मातृभूमि मानता है? फिर इन सवालों के जवाब दिए जाते-हम हिन्दू है, सनातनी शुद्ध आर्य रक्त, यह देश हमारा हैं, हम हिन्दू ही इसे अपनी जन्मभूमि, कर्मभूमि और पवित्र भूमि मानते हैं, हमारा देश कालांतर में सोने की चिडि़या था, इसमें दूध, दही और घी की नदियाँ बहती थीं, हम जगतगुरु थे शक, हूण, कुषाण यवन मुसलमान, पठान और अंग्रेज आए, हमारे देश को लूटा और हमें गुलाम बनाया। अन्य लोग न तो भारत को माँ मानते हैं और न ही उनकी पुण्यभूमि भारत है, किसी की येरुसलम है तो किसी की मक्का मदीना, सिर्फ हम हिन्दुओं का ही सब कुछ भारत में है, हम ही माँ भारती के सच्चे पुत्र हैं, मुझमे अन्य समुदायों के प्रति नफरत का भाव पैदा होने लगा था कि ये लोग खाते भारत का हैं और गीत मक्का, मदीना, येरुसलम के गाते हैं उनकी देशभक्ति पर मुझे संदेह होने लगा।
हमारी शाखा हर दिन शाम के वक्त 6 से 7 बजे लगती थी। प्रारंभ में केवल भूगोल के शिक्षक ही आते थे, फिर अन्य शिक्षक भी आने लगे, खास तौर पर यहाँ के प्राथमिक शालाओं के कईं शिक्षक तनख्वाह सरकार की लेते हैं और काम आरएसएस का करते हैं। कभी कभार मांडल तहसील मुख्यालय से बड़े पदाधिकारी भी आते, इन सबको हम भाई साहब कह कर बुलाते थे, शाखा में आने वाले बौद्धिक पत्रक और अन्य साहित्य से मेरी विचारधारा मजबूत हो रही थी। मैं दिनों दिन और अधिक राष्ट्रभक्त बनता जा रहा था, मुझमें हिन्दू होने का गर्व और शुद्ध आर्य खून का अभिमान आने लगा था, बाकी लोग अपने आप ही मुझे नीच और छोटे नजर आने लगे थे।
ढीली खाकी नेकर
शाखा के मुख्य शिक्षक के लिए यह अनिवार्य था कि वह निर्धारित पोशाक (जिसे गणवेश कहा जाता है) पहन कर आए, मैंने भी घरवालों से पैसे लेकर काली टोपी, ढीली खाकी नेकर, चमड़े की बेल्ट, भूरे मोजे और काले जूते तथा कान के बराबर एक लकड़ी (जिसे दंड कहा जाता है) खरीदा, सफेद कमीज तो थी ही, इसलिए खरीदनी नहीं पड़ी। मैं अब गणवेश पहनकर रोज शाखा स्थल पर जाने लगा था, आखिर मुख्य शिक्षक जो ठहरा, मेरा परिवार कभी भी जनसंघी या आरएसएस टाइप की विचारधारा का नहीं रहा, दादाजी से लेकर पिताजी तक इन लोगों के विरोधी ही रहे, एक मैं अपवाद स्वरूप इनके साथ लग गया, जब पहले सिर्फ खेलने जाता था, तब तक तो कोई दिक्कत नहीं थी, पर अब जब मैं पूरी ड्रेस पहन कर रोज-रोज शाखा में जाने लगा तो पिताजी ने टोकना शुरू किया, बोले ये लोग कभी हमारे सगे नहीं हुए और न ही होंगे, नहीं जाना, लेकिन मुझ पर तो देशभक्ति का ऐसा जुनून चढ़ा हुआ था कि कोई भी थोड़ा भी संघ की शाखा के विरोध में बोलता तो वह मुझे देशद्रोही ही लगता था। मेरे से बड़े भाई लोग मेरी ढीली नेकर की बहुत मजाक उड़ाते थे पर मैं सह लेता था।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
edc58-01

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आर एस एस की शाखा में
इस हादसे से हमने कोई सबक नहीं लिया, कारसेवा का जूनून भले ही उतर गया हो लेकिन देशभक्ति का ज्वर चढ़ा ही रहा, यह मात्र 13 साल की उम्र में ही चढ़ गया था, जब मैं कक्षा 6 का विद्यार्थी था, तभी देशभक्ति के सबसे प्रमुख स्वघोषित स्कूल आर.एस.एस. में भर्ती हो गया था। हुआ यह कि राजकीय माध्यमिक विद्यालय मोड़ का निम्बाहेड़ा, जहाँ मैं अध्ययनरत था, वहाँ के भूगोल विषय के अध्यापक महोदय बंशी लाल सेन ने हमारे गाँव के खेल मैदान में हम बच्चों को खेल खिलाना शुरू किया। वे बहुत अच्छा गाते भी थे और व्यायाम भी करवाते थे, हमें बहुत अच्छा लगता था। शुरू में खेल, फिर थोड़ा व्यायाम, एक दो गीत और कुछ अच्छी-अच्छी बातें, कुछ-कुछ बातें समझ में नहीं आती थीं, कुछ बातें उलझन भी पैदा करती थीं, खास तौर पर जब वे क्लास में भूगोल पढ़ाते हुए कहते थे कि-सूर्य आग का एक गोला है, जिसके पास कोई भी नहीं जा सकता है, अगर गया तो नष्ट हो जाएगा। मगर वे खेल के वक्त शाखा में सूर्य नमस्कार करवाते थे, इस दौरान ओऽम् सूर्याय नमः, रवये नमः, ओऽम् सवित्रे सूर्य नारायणाय नमः का मंत्रोचार कराते थे और हनुमानजी द्वारा सूर्य को मुँह में निगल जाने की कहानी बताते हुए सगर्व कहते थे कि-ऐसे थे हमारे बजरंग बली, जिन्होंने सूर्य भगवान को ही निगल लिया, पूरे ब्रह्माण्ड पर अँधेरा छा गया था। मैं इस बात से उलझन महसूस करने लगा, एक दिन हिम्मत करके पूछ लिया कि- गुरुदेव सूर्य देवता हंै, या आग का गोला? उनका जवाब पूर्णतः संघ परिवार की चिंतन प्रक्रिया का साक्षात् सबूत देता हुआ सामने आया, वे बोले-भैयाजी, शाखा में सूर्य देवता हैं लेकिन विद्यालय में वह आग का गोला हैं, मैं और अधिक भ्रमित हो गया, मैंने उनसे कहा कि-फिर हनुमान जी ने कैसे उन्हें निगला? उनका उत्तर था-बजरंग बली तो अतिशय बलशाली थे, सूर्य तो सिर्फ आग का एक गोला मात्र था, उन्होंने उसे न केवल मुँह में ले लिया बल्कि वे तो उसे चबा कर निगल ही जाना चाहते थे, सब लोकों पर छा गए अंधकार के बाद देवताओं ने आकर प्रार्थना की तब कहीं जा कर हनुमान जी ने सूर्य को उगला।
अन्ध आस्था
मेरी आस्था हनुमानजी में अत्यधिक दृढ़ हो गई, मुझे भूगोल विषय बकवास लगने लगा। अब मैं भूगोल के पीरियड में भी मन ही मन हनुमान चालीसा दोहराता रहता था, मुझे मालूम था कि इस विषय में कोई दम नहीं है, दमदार तो बजरंग बली हैं। वैसे भी गुरूजी ने एक दिन शाखा में कहा था कि संशय करने वाले लोग विनाश को प्राप्त हो जाते है (संशयात्मा विनष्यति), फिर मैंने संदेह करना छोड़ दिया, श्रद्धा का नया दौर मेरी किशोरावस्था में ही प्रारंभ हो गया। भूगोल के गुरूजी ने मुझे विज्ञान से भी विमुख कर डाला। अब मेरी आस्था धर्म कर्म में बढ़ने लगी, वैसे भी गुरूजी ने शाखा में बता ही दिया था कि पूरे विश्व में हमारा धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है, तो यह खेल, गीत और व्यायाम तथा थोड़ी सी देर जो बातचीत होती थी रोज, उसका नाम शाखा था और यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा थी। यह आर.एस.एस. की हमारे गाँव में एक ब्रांच थी जो नई नई खुली थी और हम बाल गोपाल उस शाखा की टहनियाँ थे।
हमारे गाँव की शाखा में हम बच्चों की संख्या तकरीबन 50 के आसपास थी ,सभी जातियों के बच्चे इसमें आते थे, उन जातियों के भी जो हम दलितों को नीचा समझते थे और सीधे मुँह बात भी नहीं करते थे, सब एक दूसरे को जी कह कह कर पुकारते थे, मैं भी भँवर से भँवर जी हो गया था और भँवर जी भाई साहेब होने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा था। शाखा में मैंने अप्रत्याशित सफलताएँ प्राप्त कर लीं, मैं गणनायक से मुख्य शिक्षक बना और कार्यवाह बन कर शीघ्र ही जिला कार्यालय जा पहँुचा, जहाँ पर मुझे जिला कार्यालय प्रमुख की जिम्मेदारी मिल गई
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित edc58-01

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नफरत विधर्मी मुसाफिरों से
बड़े-बड़े भाई साहबों के अजमेर में ही गायब हो जाने से हम थोड़े असहज तो हुए, थोड़े से उदास और निराश भी लेकिन जैसे जैसे ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी, निराशा का दौर जाता रहा, हमारा जुनून लौट आया, अगले स्टेशन पर स्थानीय लोगों ने हमारा जोरदार स्वागत किया, खाने को फल दिए, चाय पिलाई, बीड़ी, गुटखा भी मिला लोगों को, सब आनंद से सराबोर हो गए, ट्रेन में ज्यादातर कारसेवक ही थे, थोड़े बहुत रेगुलर यात्री भी थे, जो कि सहमे हुए बैठे थे, हमारी बोगी में कुछ मुस्लिम मुसाफिर भी थे, हमने उन्हें देख कर खूब नारे लगाए ‘भारत में यदि रहना होगा वंदेमातरम् कहना होगा।’ हमने उन्हें जी भर कर घूरा भी, इच्छा तो यह थी कि चलती ट्रेन से बाहर फेंक दें इनको, इन्हीं विधर्मी तुर्काे की वजह से हमारे भगवान राम एक जीर्ण शीर्ण ढाँचे में कैद हैं। हमारा देश, हमारे राम और उनकी जन्म स्थली पर मंदिर नहीं बनाने दिया जा रहा है, हम हिन्दू अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक हो गए हंै और ये मलेच्छ मजे ले रहे हैं, चार-चार शादियाँ करके बच्चों की फौज पैदा करके अपनी आबादी बढ़ाते जा रहे हैं। पहले देश बाँट दिया, आधे वहाँ चले गए, बाकि हमारी छाती पर मूँग दलने के लिए यहीं रह गए, ऐसे ही तरह-तरह के विचारों के चलते मैं इन मुस्लिम मुसाफिरों के प्रति नफरत के अतिरेक में डूबा हुआ था, उस वक्त मुझमें इतना गुस्सा था कि अगर मेरे हाथ में हथियार होते तो राम जन्म भूमि की मुक्ति से पहले ही इन मुस्लिम, पठान विधर्मियों को जिन्दगी से मुक्त कर देता। कुछ तो माँ भारती का बोझ हल्का होता। हमारी नफरत से घूरती आँखों ने उन्हें जरूर आतंकित किया होगा लेकिन हमें तो उन्हें इस तरह सहमे, सिमटे और भयभीत देखकर बहुत आनंद आया, जीवन में पहली बार लगा कि साले कट्टुओं को हमने औकात दिखा दी। अच्छा हुआ वे लोग चुपचाप ही रहे वरना उस रात कुछ भी हो सकता था। खैर, रात गहराती जा रही थी, धीरे-धीरे नींद पलकों पर हावी होने लगी, भजनों, नारों और उन्मादी गीतों का कोलाहल शांत हो गया, कारसेवक अब सो रहे थे, या यों समझ लीजिए कि सो ही चुके थे, मैंने अपनी उनींदी आँखों से देखा कि बाकी के यात्री अब थोड़ा राहत महसूस कर रहे थे राम के भक्तों से, फिर हम सो गए, एक मीठी सी नींद जिसमे सरयू किनारे बसी भगवान श्री राम की नगरी साकेत में प्रवेश का सुन्दर सा सपना था, जिसे जल्दी ही साकार होना था।

पहली जेल यात्रा
रात कब बीती पता ही नहीं चला, सुबह-सुबह किसी टुंडला नामक स्टेशन पर मचे भारी शोरगुल ने नींद उड़ाई, कारसेवकों में हड़कंप सा मचा हुआ था, पुलिस ने ट्रेन रुकवा रखी थी शायद आगे नहीं जाने देंगे, जाँच शुरू हुई, सारे कारसेवक धरे गए, टिकटें हमसे ले ली गईं और स्टेशन पर उतार लिया गया। पूरा स्टेशन कारसेवकों से अटा पड़ा था, कल सुबह फिर से गगन भेदते उन्मादी नारे हवा में गुंजायमान थे-सौगंध राम की खाते है, हम मंदिर वही बनाएँगे, रोके चाहे सारी दुनिया, रामलला हम आएँगे, पर हमारी शपथ पूरी न हो सकी, मुल्ला यम की सरकार ने हमें रोक लिया था। हमें गिरफ्तार कर लिया गया। रात का धुँधलका अब छँटने लगा था। भोर के उजास में हमने अपने आपको भेड़ बकरियों की तरह पुलिस के ट्रक में भरे पाया, पहले मथुरा इंटर कॉलेज ले जाए गए, जगह नहीं मिलने पर वहाँ से आगरा के बहुउद्देश्यीय स्टेडियम में बनाये गए अस्थाई जेल में ले जाए गए। वहाँ भी क्षमता से अधिक लोग पहले से ही बंद थे, इसलिए तकरीबन 80 कारसेवक बाहर ही रह गए, उनमे से एक मैं भी था, हमने इसी जेल में जाने की जिद की, नारे लगाए, हंगामा किया, तब कहीं जा कर हमें उस अस्थाई जेल में ठूँसा गया। काफी जद्दोजहद के बाद हमें जेल में प्रवेश का सौभाग्य मिला, अन्दर घुसे, जेल क्या थी, बड़ा सा ग्राउंड था, जिसमें टेंट लगे हुए थे, दीवारें इतनी छोटी कि कोई भी कूद कर बाहर निकल सकता था लेकिन बाहर कहाँ जाते? आगरा शहर में तो कफर््यू लगा हुआ था। पुलिस पीछे पड़ी थी, इलाका अनजान था, हमें प्रेरित करके शहीदी जत्थे में भेजने वाले सारे परम पूज्य भाई साहेब लोग अजमेर से ही भाग छुटे थे, यहाँ पर हम थे या थे वीतराग संत गण, चिलमची, अफीमची, गंजेड़ी, भंगेड़ी, उनमे से कइयों ने तो गांजा पीना शुरू कर दिया। एक दो को छोड़कर बाकी सब मस्त हो गए।
अब तो हम थे और हमारी यह अस्थायी जेल थी। ऊपर टेंट, नीचे दरी, खाने में सबसे घटिया गुणवत्ता वाली कंकर पत्थर युक्त दाल, जली हुई रोटियाँ, बेस्वाद पानी और पुलिस वालों की झिड़कियाँ खाते-खाते किसी तरह हमने अपनी जिन्दगी की पहली 10 दिवसीय जेल यात्रा पूरी की इस तरह हम चले तो थे राम जन्म भूमि के लिए और पहँुचे कृष्ण जन्म भूमि में।
गालियाँ,पत्थर ,हमला,भय और दुर्गन्ध
जिस दिन हमें जेल से रिहा किया गया, हमारे नाम पते लिखे गए, हाथों पर जेल की मुहर लगाई गई और छोड़ दिया गया। वैसे भी जेल में जेल जैसा कुछ था ही नहीं। अन्दर ही शाखा लगती थी, बातें होती, साधू संत अपना भजन, कीर्तन और प्रवचन करते रहते थे, जेल जैसी तो कोई बात थी ही नहीं, फिर भी कैद तो कैद ही है। जेल प्रवास पूरा हुआ तो जो ट्रक हमें लाये थे, वे गायब थे, बस यूँ ही छोड़ दिए गए, शहर में अभी भी कफर््यू जारी था, सो तय यह हुआ कि रेल की पटरियों पर हो कर स्टेशन तक पहँुचा जाए, पटरी-पटरी हम आगरा केंट की ओर चले। बलिदानी मानस थोड़ा थक चुका था, कारसेवा सफल नहीं रही थी। धर्मद्रोही, मुस्लिमपरस्त मुल्ला मुलायम सिंह ने सरयू के पुल पर ही कारसेवकों पर गोलियाँ चलवा दी, सैकड़ों कारसेवक मौत का ग्रास बन गए, कइयों को गोली लगी तो कई सारे गोली लगने के डर से वेगवती सरयू के पानी में कूद कर काल कवलित हो गए। राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद का ढाँचा तोड़ना तो दूर की बात, पुलिस की सख्ती के चलते परिंदा भी वहाँ पर नहीं मार सका, वाकई मुलायम कारसेवकों के लिए मुल्ला यम साबित हुए असफलता और घनघोर निराशा तथा डर और अवसाद की स्थिति में हम किसी तरह रेंगते हुए से रेल पटरियों पर आगरा कैंट की और बढ़ रहे थे, अचानक सामने से तकरीबन एक दर्जन लोग ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाते हुए आते दिखाई दिए, हम में पुनः जोश का स्फुरण होने लगा, कफर््यू के बावजूद रामभक्त हमारे स्वागत को आ गए हैं, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। बहुत अच्छा लगा, हमने अपने अंदर उत्साह महसूस किया, हमारे कदम खुद ब खुद उठने लगे पर यह क्या? ये तो मुल्ले निकले, इनके तो हाथों में पत्थर हैं, अब इनकी जबान से जय श्रीराम नहीं निकल रहा था, हमारी सात पुश्तों तक उनकी भद्दी गालियाँ पहँुच रही थी-मादर …द यहाँ क्या लव… पकड़ने आए हो, मारो मादर …दो को, हम तो स्तब्ध रह गए, आँखों के आगे
अँधेरा छाने लगा, आसपास की बस्ती की ओर मदद के लिए हमने कातर निगाहों से देखा। मगर सब तरफ इंकार ही इंकार के भाव थे। दरअसल इस रेल पटरी के चारों ओर सिर्फ मुस्लिम बस्ती ही थी। सामने से आए इन मुस्लिम युवाओं से छोटा सा संघर्ष हुआ, कुछ लोगों को चोटें आई, सामान भी गिरा, एक कारसेवक होतुमल की उन्होंने जमकर पिटाई की, वह भारी शरीर था, भाग नहीं पाया, उनके हत्थे चढ़ गया। हमारे पीछे भी दौड़े, पत्थर फेंके, हम आगे-आगे और वे पीछे-पीछे किसी तरह जान बचाने के लिए हमने रेलवे पुलिस थाने की शरण ली, दरोगा जी यदुवंशी निकले, मुल्ला यम के वंश के, उनके श्रीमुख से भी हजारों गालियों की बौछार से हम नहाए, जिस पुलिस से मदद की उम्मीद थी, वही लट्ठ लेकर मारने को पीछे दौड़ी, पीछे पत्थर बरसाते मुल्ले और आगे लाठियाँ लिए खड़े ठुल्ले हे भगवान, अब कहाँ जाएँ, हे राम जी, आप ही जान बचाओ अब हमारी, एक क्षण तो लगा कि अब मौत ही हमारी अंतिम मुकाम है, लेकिन जहाँ राम रक्षा मंत्र नहीं चल पाया वहाँ रेल रक्षा यंत्र ने काम किया। आगरा कैंट पर खड़ी एक मालगाड़ी के खाली डिब्बों में घुस कर हमने दरवाजे बंद करके किसी तरह जान बचाई। गालियाँ देते मुस्लिम नौजवान और पुलिसकर्मी जब वापस चले गये। तब हमारी रुकी हुई साँसे फिर से चलने लगी, मालगाड़ी के डिब्बों से निकल कर हम वापस स्टेशन पर खड़े हुए। बाद में जयपुर की ओर जाने वाली किसी ट्रेन में हम सवार हुए। ट्रेन में भारी भीड़ थी, टॉयलेट के पास खड़े रहने भर की जगह मिली। टिकट भी नहीं खरीद पाए, बेटिकट ही बैठ गए थे, भारी भीड़, भय और पाखाने की भयंकर दुर्गन्ध सब एकाकार हो गए थे। कारसेवा के दौरान शहीद होने की इच्छा अब तक मर चुकी थी, एक ही इच्छा थी कि जल्दी से जल्दी घर पहँुचा जाए, घर पर परिजनों के हाल बेहाल थे अयोध्या की खबरें सुन-सुन कर, चूँकि हम दोनों ही भाई इस कारसेवा का हिस्सा बनने चले गए थे, इसलिए माँ बाप ने सोच लिया कि हम जरूर पुलिस की गोली के शिकार हो गए होंगे और इस तरह वे बेऔलाद, मगर न तो हमें रामजी के नाम पर मौत आई और न ही वे निःसंतान हुए, महज 15 दिनों में हम घर लौट आए सही सलामत एकदम जिंदा।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित edc58-01

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सौगंध राम की खाते है!
बात सन् 1991की है, जब राम जन्म भूमि- बाबरी मस्जिद का विवाद देश में चरम पर था। हवा में चारों तरफ ‘बच्चा बच्चा राम का-जन्म भूमि के काम का’ और ‘जन्म भूमि के काम ना आए वह बेकार जवानी है-जिस हिन्दू का खून ना खौले, खून नहीं वह पानी है’ जैसे नारे गूँजते थे। मेरी उम्र उस वक्त 17 वर्ष की थी, बाहरवीं कक्षा में पढ़ता था। मैं बिना घर वालों को बताए कारसेवा करने के लिए घर से भाग गया। राम शिलाएँ पूजित हो चुकी थीं, हम लोग उन दिनों भीलवाड़ा में राम मंदिर के लिए अभियान चला रहे थे। मेरी कारसेवा में शामिल होने की बेहद इच्छा थी, ताकि अपने स्वयंसेवक होने को और मजबूती दे सकूँ। अंततः मौका मिल गया और मुझे भी सैकड़ों लोगों के एक बलिदानी जत्थे में शामिल कर लिया गया। हमारी रवानगी से पहले जगह-जगह हमारे जुलूस निकाले गए, मैं बेहद रोमांचित था, मुझे याद है कि हम लोग गले में मालाएँ और सर पर भगवा पट्टी और ललाट पर रक्तिम तिलक लगा कर मुट्ठियाँ बाँधकर जय श्री राम तथा जय जय श्री राम के गगन भेदी नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे.उस वक्त हम सबकी जुबान पर एक ही गीत था रामजी के नाम पर जो मर जाएँगे-दुनिया में नाम अपना अमर वह कर जाएँगे।
मुझे यकीन था कि हमारी भिडंत जरूर मुलायम सिंह की हिन्दू द्रोही पुलिस से हो जाएगी और हम मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्री राम के नाम पर उनकी जन्म स्थली को मुक्त कराने के लिए अपना आत्मोत्सर्ग कर देंगे। हम एक ट्रेन के जरिए भीलवाड़ा से अजमेर पहँुचे, हमारे जत्थे में ज्यादातर नौजवान लोग थे और बाकी के साधू संत थे। अजमेर की एक धर्मशाला में सैकड़ों और लोग भी भगवा दुपट्टा ओढ़े पहले से ही जमा थे, इन सबको भी अयोध्या जाना था, उन्हें देख कर हमारा हौंसला दुगुना हो गया, हर चेहरा बलिदान की भावना से दमक रहा था, सबके मन में एक ही लक्ष्य था, जल्दी से जल्दी राम की जन्म भूमि तक पहुँचना और गुलामी के प्रतीक चिह्न बाबरी ढाँचे को ध्वस्त करना, हमारे साथ संघ (आरएसएस) और विश्व हिन्दू परिषद के
पदाधिकारीगण भी मौजूद थे, खाना खाने के बाद उन्होंने सबको सामूहिक दिशा निर्देश दिए कि हमें हर हाल में अयोध्या पहँुचना है, मुलायम सिंह सरकार अगर रोके, गिरफ्तारी करे या दमन करें, इस परिस्थिति में क्या करना है, उनसे कैसे बचना है, कैसे उन्हें चकमा देकर आगे जाना है। यह बताया गया। वरिष्ठ
अधिकारियों का स्पष्ट निर्देश था कि चाहे हमें खुद को क्यों ना मिटाना पड़े, गुलामी के उस कलंक बाबरी मस्जिद को उखाड़ फेंकना है, दिल कर रहा था कि उड़कर अभी भगवान श्री राम की नगरी अयोध्या पहुँच जाऊँ और राम लला को मलेच्छ विधर्मियों के चंगुल से आज ही मुक्त करवा दूँ, आखिर हिन्दुओं के ही देश में हिन्दुओं के आराध्य देवता राम की जन्म स्थली पर हम गुलामी का यह बाबरी ढाँचा कब तक बर्दाश्त करेंगे। हमें साफ-साफ आदेश मिल चुका था कि किसी भी कीमत पर जान की परवाह किए बगैर हमें अयोध्या पहुँच कर बाबरी मस्जिद के ढाँचे की ओर बढ़ना है, कहा गया कि ढाँचा गिराने के लिए कुदाल, गेंती, फावड़े और सब्बल आदि हमें स्थानीय लोगों की ओर से उपलब्ध करवाए जाएँगे। अब हमारा एक मात्र लक्ष्य था-हर हाल में अयोध्या पहँुच कर बाबरी ढाँचे को गिराना और रामलला को मुक्त करवाना। शाम हुई और हम लखनऊ जाने वाली ट्रेन की ओर बढे़। भीलवाड़ा से संघ, विहिप तथा भाजपा के कई जाने माने चेहरे भी हमारे साथ आए थे, उनका साथ पाकर हमारा हौंसला बढ़ रहा था। मैंने मन ही मन भगवान श्री राम को धन्यवाद् दिया कि उन्होंने इतना शानदार मौका दिया कि आज मुझे इन बड़े-बड़े लोगों के साथ राम काज के लिए चुना गया है। मुझे लगा कि आज वाकई हर व्यक्ति राम के नाम पर शहीद होने को तत्पर है, छोटे- बड़े, अमीर-गरीब, खास या आम आदमी, सभी तरह के फर्क खत्म हो चुके हैं। लोग करोड़ों की दौलत, कारखाने, महल, ऊँचें पद और प्रतिष्ठा सब त्याग कर रामकाज करने को आतुर हैं, वाह रामजी क्या गजब लीला है तेरी हमें लग रहा था कि यह आजादी की दूसरी जंग है, हम खुद को स्वतंत्रता सेनानी समझ कर मन ही मन धन्य हो रहे थे, ऐसे उत्साह और खुशी के माहौल में हम ट्रेन पर सवार हुए। हम सबको अपना अपना टिकट दे दिया गया था यह कह कर कि अगर किसी कारणवश कोई बिछुड़ जाएँ तो खुद का टिकट तो खुद के पास होना ही चाहिए, हमें भी यह बात ठीक लगी, स्टेशन खचाखच भरा था, जाने वालों से ज्यादा पहुँचाने वाले आए थे। तनी हुई मुट्ठियों और चीखते चेहरों ने अपना पूरा दमखम वन्दे मातरम्, जयकारे बजरंगी-हर हर महादेव और जय जय श्री राम के नारों पर लगा रखा था। इतनी उत्तेजना और शोरगुल मैंने आज से पहले कभी नहीं महसूस की, ट्रेन की सीटी बज चुकी थी, हमने भी मुट्ठियाँ बाँधी और पूरा जोर लगाकर चीखे-सौगंध राम की खाते हैं-हम मंदिर वहीं बनाएँगे। हम खुश थे कि हमारा सफर अयोध्या की तरफ शुरू हो चुका था। ट्रेन सरकने लगी और हमारी बोगियों से बड़े-बड़े लोग भी सरकने लगे, अरे यह क्या? ये भाई साहब क्यों उतर रहे है, ये प्रचारक जी क्या यहीं रहेंगे, हमारे साथ नहीं चलेंगे, मैंने देखा कि धीरे धीरे तमाम सारे बड़े लोग, उद्योगपति, संघ प्रचारक, विहिप नेता और भाजपाई लीडरान ट्रेन से उतर गए, सब बड़े लोग हमें अयोध्या रवाना करके अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गए पीछे रह गए हम जैसे जुनूनी दलित, आदिवासी तथा पिछड़े वर्ग के युवा एवं साधू संत और हमें सँभालने के लिए कुछेक छुटभैय्ये नेता गण जो हमें बता रहे थे कि भाई साहब दूसरे जत्थों को रवाना करके सीधे ही अयोध्या पहुँच जाएँगे, हालाँकि उन्हें नहीं आना था, वे कभी नहीं आए, वे समझदार लोग थे, इसलिए घर लौट गए। समझदार लोग सदैव ही हम जैसे जुनूनी लोगों को लड़ाई में धकेल कर अपने-अपने दरबों में लौट जाते हैं, यही उनका बड़प्पन है, शायद इन्हीं चालाकियों से ही वे बड़े बनते होंगे।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
कर्मश :edc58-01
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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