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Posts Tagged ‘भारत’

पांच महीने अभी पूरे हुए हैं और मोदी के प्रचारकों का सुर बदल गया। देखिये कल, 24 अक्तूबर के ‘टेलिग्राफ’ में स्वपन दासगुप्त का लेख – Picky with his symbol (अपने प्रतीक का खनन)।
स्वपन दासगुप्त, मोदी बैंड के एक प्रमुख वादक, चुनाव प्रचार के दिनों में बता रहे थे – गुजरात का यह शेर सब बदल डालेगा। आजादी के बाद से अब तक जीवन के सभी क्षेत्रों में ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का जो नाटक चलता रहा है, उसका नामो-निशान तक मिट जायेगा। इतिहास की एक नयी इबारत लिखी जायेगी।
आज वही दासगुप्ता मोदी विरोधियों को इस बात के लिये लताड़ रहे हैं कि क्या हुआ, मोदी को लेकर इतना डरा रहे थे, कुछ भी तो नहीं बदला। मोदी की राक्षस वाली जो तस्वीर पेश की जा रही थी, अल्पसंख्यकों को डराया जा रहा था, पड़ौसी राष्ट्रों से भारी वैमनस्य की आशंकाएं जाहिर की जा रही थी – वैसा कुछ भी तो नहीं हुआ। बनिस्बत्, अपने राजतिलक के मौके पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री तक को आमंत्रित करके, जापान, अमेरिका सहित सारी दुनिया को आर्थिक उदारवाद की मनमोहन सिंह की नीतियों पर ही और भी दृढ़ता के साथ चलने का आश्वासन देकर और ‘स्वच्छ भारत’ आदि की तरह के अपने प्रचार अभियानों में आमिर खान, सलमान खान को शामिल करके, और तो और, स्वपन दासगुप्त के अनुसार, योगी आदित्यनाथ की जहरीली बातों का खुला समर्थन न करके मोदी ने अपने ऐसे सभी विरोधियों को निरस्त कर दिया है। उनके लेख की अंतिम पंक्ति है – ‘‘ मोदी के आलोचकों को अब उनकी पिटाई के लिए नयी छड़ी खोजनी होगी, पुरानी तो बेकार होगयी है।’’
(Modi’s critics must find a new stick to beat him with. The old one has blunted)
दासगुप्त का यह कथन ही क्या यह बताने के लिये काफी नहीं है कांग्रेस-शासन के दुखांत के बाद, यह ‘कांग्रेस-विहीनता’ का शासन प्रहसन के रूप में इतिहास की पुनरावृत्ति के अलावा और कुछ नहीं साबित नहीं होने वाला !
मार्क्स की विश्लेषण शैली का प्रयोग करें तो कहना होगा – मानव अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं पर मनचाहे ढंग से नहीं। वे अतीत से मिली परिस्थितियों में काम करते हैं और मृत पीढि़यों की परंपरा जीवित मनुष्यों के मस्तिष्क पर एक दुरूस्वप्न सी हावी रहती है। ‘‘ऐसे में कुछ नया करने की उत्तेजना में ही अक्सर वे अतीत के प्रेतों को अपनी सेवा में आमंत्रित कर लेते हैं। उनसे अतीत के नाम, अतीत के रणनाद और अतीत के परिधान मांगते हैं ताकि इतिहास की नवीन रंगभूमि को चिर-प्रतिष्ठित वेश-भूषा में, इस मंगनी की भाषा में पेश कर सके।’’
आरएसएस के प्रचारक और गुजरात (2002) के सिंह के जिन प्रतीकों के आधार पर स्वपन दासगुप्त मोदी को एक नये बदलाव का सारथी बता रहे थे, वे ही अब यह कह करे हैं कि ‘‘प्रधानमंत्री मोदी और चुनाव प्रचार के समय का अदमनीय मोदी बिल्कुल भिन्न है। यह नयी मोदी शैली अभी विकासमान है और इसकी कोई चौखटाबद्ध परिभाषा करना जल्दबाजी होगी।’’
(Modi the prime minister has chosen to be markedly different from Modi the indefatigable election campaigner. The style is still evolving and it would be premature to attempt a rigid definition of the new style)
नयी मोदी शैली ! पहले सरदार पटेल, अब गांधी, नेहरू भी – भारत की राष्ट्रीय राजनीति की चिरप्रतिष्ठित वेश-भूषा और मंगनी की पुरानी भाषा की सजावट से तैयार हो रही नयी शैली !
इसमें शक नहीं कि दुनिया के सभी बड़े-बड़े परिवर्तनों की लड़ाइयों को बल पहुंचाने के लिये अतीत के प्रतिष्ठित प्रतीकों का, आदर्शों और कला रूपों का भी प्रयोग होता रहा हैं। वर्तमान की लड़ाई के सेनानियों में एक नया जज़्बा पैदा करने के लिये अनेक मृतात्माओं को पुनरुज्जीवित किया जाता रहा है। भारत की आजादी की लड़ाई का इतिहास तो ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा हुआ है। आधुनिक जनतांत्रिक विचारों के साथ ही इसकी एक धारा स्पष्ट तौर पर पुनरुत्थानवादी धारा रही है। लेकिन उस लड़ाई में अतीत के आदर्शों और प्रतीकों का, अनेक मृतात्माओं का उपयोग गुलामी से मुक्ति की लड़ाई को गौरवमंडित करने के उद्देश्य से किया गया था, न कि किसी प्रकार की भौंडी नकल भर करने के लिएय उनका उपयोग अपने उद्देश्यों और कार्यभारों की गुरुता को स्थापित करने के लिये किया गया था, न कि अपने घोषित कार्यभारों को पूरा करने से कतराने के लिये, अपने चरित्र पर पर्दादारी के लियेय उनका इस्तेमाल कुंद की जा चुकी प्राचीन गौरव की आत्मा को जागृत करने के लिए किया गया था न कि उसके भूत को मंडराने देने के लिए, अपने समय को भूतों का डेरा बना देने के लिये।
गौरवशाली, वीरतापूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन की कोख से इस देश में एक पूंजीवादी जनतांत्रिक राज्य की स्थापना हुई। राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व से अबतक इसके विभिन्न चरणों में कई प्रवक्ता पैदा हुए – पंडित नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह। इनके अलावा गैर-कांग्रेस दलों से भी छोटे-बड़े अंतरालों के लिये मोरारजी देसाई, चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रवक्ता सामने आएं। यह कहानी, स्वतंत्र भारत में भारतीय पूंजीवाद के विकास की कहानी, पूरे सड़सठ सालों की कहानी है। इतने लंबे काल तक नाना प्रकार के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से लगातार धन के उत्पादन, लूट-खसोट और गलाकाटू प्रतिद्वंद्विताओं में तल्लीन हमारा आज का उपभोक्तावादी समाज इस बात को लगभग भूल चुका है कि उसका जन्म आजादी की लड़ाई के दिनों के वीर सेनानियों की मृतात्माओं के संरक्षण में हुआ हैं। राजनीति एक आदर्श-शून्य, शुद्ध पेशेवरों का कमोबेस खानदानी धंधा बन चुकी है।
ऐसे सामान्य परिवेश में, अतीत के सारे कूड़ा-कर्कट को साफ कर देने की दहाड़ के साथ सत्तासीन होने वाले शूरवीर द्वारा अपनी सेवा के लिये मृतात्माओं का आह्वान किस बात का संकेत है ? क्या तूफान की गति से इतिहास का पथ बदल देने का दंभ भरने वालों में सिर्फ पांच महीनों में ही सहसा किसी मृतयुग में पहुंच जाने का अहसास पैदा होने लगा है? वैसे भी, हाल के उपचुनावों और राज्यों के चुनावों के बाद एक सिरे से सब यह कहने लगे हैं कि भाजपा की बढ़त के बावजूद मोदी लहर जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं रहा है। राजनीति के नाम पर वही सब प्रकार की जोड़-तोड़, सरकारें बनाने-बिगाड़ने की अनैतिक कवायदें, अपराधियों को हर प्रकार का संरक्षण देने की शर्मनाक कोशिशें, एक-दूसरे की टांग खिंचाई की साजिशाना हरकतें, सार्वजनिक धन को निजी हाथों में सौंप देने की राजाज्ञाएं, सीमाओं को लेकर थोथा गर्जन-तर्जन और विश्व पूंजीवाद के सरगना अमेरिका की चरण वंदना। यही तो है, एक शब्द में – राजनीति का मोदी-अमितशाहीकरण !
इसीलिये, स्वपन दासगुप्त जो भी कहे, अब इतना तो साफ है कि मोदी का सत्ता में आना किसी आकस्मिक हमले के जरिये बेखबरी की स्थिति में किसी को अपने कब्जे में ले लेना जैसा ही था। वैसा धुआंधार, एकतरफा प्रचार पहले किसी ने नहीं देखा था। अन्यथा, न भ्रष्टाचार-कदाचार में कोई फर्क आने वाला है, न तथाकथित नीतिगत पंगुता में। जब आंख मूंद कर पुराने ढर्रे पर ही चलना है तो क्या सजीवता, और क्या पंगुता ! इस पूरे उपक्रम में यदि कुछ बदलेगा तो, जैसा कि नाना प्रकार की खबरों से पता चल रहा है, पिछली सरकार द्वारा मजबूरन अपनाये गये गरीबी कम करने के कार्यक्रमों में कटौती होगीय भूमि अधिग्रहण कानून में किसानों के हित में किये जारहे सुधारों को रोका जायेगाय और भारत में विदेशी पूंजी के अबाध विचरण का रास्ता साफ किया जायेगा। भारत सरकार गरीबों को दी जाने वाली तमाम प्रकार की रियायतों में कटौती करें, इसके लिये सारी दुनिया के  बाजारवादी अर्थशास्त्री लगातार दबाव डालते रहे हैं। इसीप्रकार भूमि अधिग्रहण के मामले में बढ़ रही दिक्कतों को खत्म करने और बैंकिंग तथा बीमा के क्षेत्र को विदेशी पूंजी के लिये पूरी तरह से खोल देने के लिये भी दबाव कम नहीं हैं। मनमोहन सिंह इन सबके पक्ष में थे, फिर भी विभिन्न राजनीतिक दबावों के कारण अपनी मर्जी का काम नहीं कर पा रहे थे। इसीलिये उनकी सरकार पर लगने वाले ‘नीतिगत पंगुता’ के सभी सच्चे-झूठे अभियोगों में ये सारे प्रसंग भी शामिल किये जाते थे। मोदी सरकार ने इसी ‘नीतिगत पंगुता’ से उबरने के लिये सबसे पहले गरीबी को कम करने वाली योजनाओं की समीक्षा करनी शुरू कर दी है। बीमा क्षेत्र को तो विदेशी पूंजी के लिये खोल ही दिया है, भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले में भी पहले सर्वसम्मति से जो निर्णय लिये गये थे, उन सबको बदलने के बारे में विचार का सिलसिला शुरू हो गया है।
चन्द रोज पहले ही प्रकाशित हुई विश्व बैंक की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि सन् 2011 से 2013 के बीच दुनिया में गरीबी को दूर करने में भारत का योगदान सबसे अधिक (30 प्रतिशत) रहा है। खास तौर पर मनरेगा और बीपीएल कार्ड पर सस्ते में अनाज मुहैय्या कराने  की तरह के कार्यक्रमों ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इन कार्यक्रमों के चलते भारत में मजदूरी के सामान्य स्तर में वृद्धि हुई है। लेकिन भारतीय उद्योग और मोदी सरकार भी सस्ते माल के उत्पादन की प्रतिद्वंद्विता में भारत को दुनिया के दूसरे देशों से आगे रखने के नाम पर मजूरी के स्तर को नियंत्रित रखना चाहती है। ‘श्रमेव जयते’ योजना, पूंजी और श्रम के बीच की टकराहट में सरकार की अंपायर की भूमिका के अंत की योजना, जिसकी घोषणा के दिन को खुद भाजपा के श्रमिक संगठन, भारतीय मजदूर संघ ने भारत के मजदूरों के लिये एक काला दिवस कहा, मोदी उसीकी शेखी बघारने में फूले नहीं समा रहे। हांक रहे हैं – ‘श्रमयोगी बनेगा राष्ट्रयोगी’।
इन सारी स्थितियों में, ‘कांग्रेस-विहीन’ भारत सिर्फ चमत्कारों पर विश्वास करने वाले कमजोर लोगों में ही किसी नये विश्वास का उद्रेक कर सकता है। भविष्य के उन कार्यक्रमों के गुणगान में, जिनकी उन्होंने अपने मन में योजनाएं बना रखी है, लेकिन उन पर असल में अमल की कोई मंशा या अवधारणा ही नहीं हैं, ये वर्तमान के यथार्थ के अवबोध को ही खो दे रहे हैं।
‘स्वच्छता अभियान’ का ही प्रसंग लिया जाए। साफ और स्वच्छ भारत के पूरे मसले को जनता के शुद्ध आत्मिक विषय में तब्दील करके पूरे मामले को सिर के बल खड़ कर दिया जा रहा है। इन्हीं तमाम कारणों से वह समय दूर नहीं होगा, जब यह प्रमाणित करने के लिये इकट्ठे हुए लोग कि हम अयोग्य नहीं है, अपना बोरिया-बिस्तर समेटते हुए दिखाई देने लगेंगे – ‘जो आता है वह जाता है’ का बीतरागी गान करते हुए। स्वपन दासगुप्त मोदी-विरोधियों से मोदी की पिटाई के लिये नयी छड़ी खोजने की बात करते हैं। यह नहीं देखते कि जो पिटे हुए रास्ते पर चलने की पंगुता का शिकार हो, उसे पीटने के लिये किसी छड़ी की जरूरत ही नहीं होगी। मोदी शासन के प्रारंभ में ही उसके दुखांत के बीज छिपे हुए हैं।

——अरुण माहेश्वरीphoto

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संसार के दूसरे सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले देश भारत में मुसलमानों की स्थिति आजादी के 65 वर्ष बाद भी अति दयनीय है। बहुत अधिक बताने की जरूरत नहीं, केन्द्र सरकार द्वारा मुसलमानों के हालात का जायजा लेने के लिए गठित की गई राजेन्द्र सच्चर कमेटी के अनुसार वर्तमान समय में मुसलमानों की आर्थिक एवं शैक्षिक स्थिति दलितों से भी गयी गुजरी हो चुकी है।
मुसलमान ऐसी स्थिति में क्यों पहुँचे और इन्हें इस गर्त में डालने के पीछे किन शक्तियों का हाथ है?यदि इन प्रश्नों के उत्तर का आकलन किया जाए तो हम पाते है कि आज़ादी के बाद जब देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान की उत्पत्ति धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देकर की गई तो भारत के प्रति अपनी वफ़ादारी जता कर बाकी बचे मुसलमानों को संकीर्ण विचार धारा वाली शक्तियों ने सदैव इस मानसिक स्थित में डुबो कर रखा कि मुसलमानों के कारण ही देश का विभाजन हुआ और वह मुस्लिम कौम, जिसके पूर्वजों ने सबसे पहले देश की स्वाधीनता 1857 के संग्राम में अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ा या और हजारों मुसलमानों ने अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजी शासकों की मजबूत हुकूमत की चूलें हिला दी थीं, हीन भावना का शिकार हो गई, वह यह सोचने पर मजबूर हो गई कि उनकी देश के प्रति आस्था व देश भक्ति को सशंकित नजरों से देखा जाता है।
कहा तो यह जाता रहा है कि मुसलमान कौम से अपने को अलग रखकर देश में रहता है परन्तु वास्तविकता यह है कि मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरियों के दरवाजे बंद कर तथा उच्च शिक्षा की ओर बढ़ने वाले उनके हर कदम पर अनेक बाधाएँ उत्पन्न कर उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया गया कि वे अपने बच्चों को केवल धार्मिक शिक्षा देकर हाथ का हुनर सिखाएँ और दुनियाबी शिक्षा से अपने बच्चों को दूर रखें जहाँ उनके बच्चों को हिन्दुत्ववादी विचारधारा के अध्ययन करने पर मजबूर किया जाता है। हिन्दू कट्टर पंथी सोच के समर्थन में मुस्लिम कट्टर पंथियों की संकीर्ण विचारों से प्रभावित मुसलमानों के एक बड़े तबके के चलते मुसलमान नवीन शिक्षा से काफी पिछड़कर देश में मात्र कारीगर, दस्तकार या शिल्पकार बनकर रह गया। वहीं दूसरी ओर जमींदारी विनाश अधिनियम 1952 के पश्चात अधिकांश मुसलमानों के हाथ से खेती योग्य भूमि भी जाती रही। भूमिहीनों को सरकार की ओर से यहाँ भूमि वितरण में भी मुसलमानों को हिस्सा नहीं दिया गया। तो जिन मुसलमानों के पास हाथ का हुनर नहीं था उनका जीवन केवल मेहनत मजदूरी पर ही आकर निर्भर हो गया।
फिर सोने पर सुहागा यह रहा कि देश में लाखों की तादाद में साम्प्रदायिक दंगे कराकर मुसलमानों द्वारा मेहनत मजदूरी से अर्जित की जाने वाली धन सम्पदा को सरेआम लूटा गया और इस लूट में सैनिक बलों ने भी अपनी सहभागिता की। देश के विभाजन में जितनी जनहानि मुसलमानों की साम्प्रदायिक हिंसा से नहीं हुई थी उतनी आजादी के बाद देश में मुसलमानों का कत्ले आम करके की गई। साम्प्रदायिक दंगा कराने के लिए नए बहाने तलाशे गए। कभी भारत-पाक युद्ध को लेकर, तो कभी भारत-पाक हाकी व क्रिकेट मैच को लेकर कभी कब्रिस्तान को लेकर तो कभी गौकशी को लेकर तो कभी मन्दिर-मस्जिद विवाद को लेकर।
नब्बे के दशक के प्रारम्भ में जब देश में आर्थिक सुधारों की बयार बही और साथ ही विदेशी पूँजी निवेश के साथ कार्पोरेट सेक्टर की कम्पनियों के द्वारा प्राइवेट सेक्टर में नौकरियों के दरवाजे देश के नौजवानों के लिए खुले तो अपनी काबलियत के बल पर मुस्लिम नवयुवकों ने भी नौकरियाँ प्रारम्भ कीं और जो मुस्लिम युवक अपना कैरियर खाड़ी के देशों में तलाशते थे वह अब देश के आईटी हब हैदराबाद, बैंगलोर, गुड़गांव, नोयडा और दिल्ली में नौकरियों से लग गए। उन्हें आर्थिक उन्नति के रास्तों पर आगे बढ़ते देख उ.प्र., बिहार आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा बंगाल आदि के मुस्लिम नवयुवक उच्च शिक्षा की ओर आकर्षित हुए और बी. टेक, एम.टेक, एम.बी.ए. जैसे कोर्सों में मुसलमानों की भागीदारी बढ़ी।
मुसलमानों की आर्थिक स्थिति में होते सुधार से दुर्भावना रखने वाली शक्तियों ने अपनी रणनीति में परिवर्तन कर 21वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षो से देश में आतंकवाद की घटनाओं में इजाफा करना प्रारम्भ कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप देश के कोने-कोने मे बम विस्फोटों से दर्जनों निर्दोषों की जानें गई। हर विस्फोेट के पश्चात् देश की गुप्तचर एजेंसियों, कथित राष्ट्रीय मीडिया एवं पुलिस की जाँच एजेंसियों के गठजोड़ ने नित्य नए आतंकी संगठनों का इस्लामी नामकरण करके सैकड़ों मुसलमानों को बगैर किसी साक्ष्य व दोषारोपण के जेलों में कभी टांडा तो कभी मकोका जैसे विशेष आतंकी विरोधी कानून लगा कर देश द्रोहिता का तमगा उनके गले में लटका कर ठूँस दिया। देश की राजधानी में बाटला हाउस एन्काउन्टर में तीन शिक्षित मुस्लिम युवकों को आतंकवादी करार देकर गोलियों से छलनी कर दिया गया। यह एक ऐसा उदाहरण है जिसके बाद उन बच्चों के गृह जनपदों से कोई मुसलमान यह हिम्मत न कर सका कि उच्च शिक्षा के लिए अपने बच्चों को अपने से दूर भेजकर उनके सुन्दर भविष्य की कामना करें।
मुसलमानों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करने में कोई भी राजनैतिक दल किसी से भी पीछे नहीं रहा यदि केन्द्र में सत्ता के शिखर पर बैठी कांग्रेस के शासित राज्यों में साम्प्रदायिक हिंसा व आतंकवाद के नाम पर निर्दोषों को जेल भेजने का क्रम जारी रहा तो मुसलमानों के लिए हमदर्दी का दम भरने वाले मुलायम सिंह व मायावती की हुकूमतों में भी यह क्रम जारी रहा है। मायावती के कार्यकाल में तारिक कासमी, खालिद मुजाहिद, सज्जादुर्रहमान, मो0 अख्तर, आफताब आलम अंसारी, शहाबुद्दीन, जंग बहादुर खान, मो0 शरीफ, गुलाब खान, कौसर फारूकी, फहीम अरशद अंसारी, मो0 याकूब, नासिर हुसैन, जलालुद्दीन, नौशाद, मो0 अली अकबर हुसैन, शेख मुख्तार, अजीजुर्रहमान और नूर इस्लाम को आतंकवादी घटनाओं या गतिविधियों में लिप्त करार देकर जेल भेजा गया तो वहीं मुलायम सिंह या अखिलेश यादव सरकार भी मुसलमानों को नुकसान पहुँचाने में किसी से पीछे नहीं रही और मौजूदा सपा सरकार में प्रायोजित तरीके से सरकारी मशीनरी के संरक्षण में साम्प्रदायिक दंगे कराए गए, जमकर मुसलमानों की सम्पत्तियों को लूटा गया। बाद में मुसलमानों पर ही साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने के आरोप मढ़कर उन्हें जेलों में भेजा गया। मायावती के शासनकाल में हुए कचेहरी बम विस्फोटों के आरोप में झूठे फंसाए गए आरोपी तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी के लिए गठित आर.डी. निमेष कमीशन की रिपोर्ट यदि मायावती ने नहीं जगजाहिर की तो मुलायम के पुत्र अखिलेश यादव की सरकार भी निमेष कमीशन की रिपोर्ट मीडिया में लीक हो जाने के पश्चात भी छुपाए बैठी हुई है। जिसमें तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद को दोषमुक्त करार दिया गया है।
देश की एकता एवं अखण्डता की रक्षा के लिए इस देश के बहुधर्मीय, बहुजातीय, बहुभाषीय स्वरूप को बरकरार रखा जाना आवश्यक है किन्तु साम्राज्यवादी ताकतों के इशारे पर सभी कट्टरपंथी तत्व साँझी संस्कृति-साँझी विरासत को नुकसान पहुँचाकर देश की एकता को कमजोर कर रहे हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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ब्रिटिश साम्राज्यवाद के आधीन भारत में सत्तारूढ़ अंग्रेजो ने भारतीय प्रजा के साथ जो-जो अत्याचार किये हैं। उनकी कहानियाँ आज भी भारतीय जनमानस में हैं। आदमी को जिन्दा जला देना, बरगद और बड़े-बड़े पेड़ों पर फांसी लगा देना और फिर जनता के ऊपर रौब ग़ालिब करने के लिये उनकी लाशों को महीनो तक टंगे रहने देना, जैसा अपराध अंग्रेज भारतीय जनता के साथ करते थे। इस देश की प्राकृतिक सम्पदा से लूट कर इंग्लैंड ले जाते थे। यहाँ के कुटीर उद्योगों को तबाह करते थे ताकि जनता भूखी और नंगी रहे लेकिन कुछ अंग्रेज चाटुकार अंग्रेजों की प्रशंसा में तरह-तरह के कसीदे गढ़ते रहते हैं। कभी वह कहते हैं कि अंग्रेजों ने भारतीयों को सुसंस्कृत बनाया। पढने लिखने के लिये स्कूल खोले, पोस्ट ऑफिस और तार घर खोले, रेल चलाई आदि आदि। जबकि उनको यह मालूम होना चाहिए। चपरासी और चौकीदार के लिये भारतीय लोगों की जरूरत है तो उन्होंने उनको शिक्षित करने के लिये स्कूल खोले। अपनी डाक को एक स्थान से दूसरे स्थान तक शीघ्र से शीघ्र पहुँचाने के लिये डाक एवं तार घर की स्थापना की। कच्चा माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिये तथा सेना को त्वरित कार्यवाई के लिये रेल चलाई। हाँ इन चीजों का खर्चा निकलने के लिये इनको व्यावसायिक भी बनाया जिससे लाभ भी हुआ। लार्ड मैकाले ने ब्रिटिश संसद को 2 फरवरी 1835 को संबोधित करते हुए कहा था कि भारतीय समाज व्यवस्था को नष्ट करना आवश्यक है अन्यथा अंग्रेजी राज्य कायम नहीं रखा जा सकता है। भारतीय व्यवस्था उच्च कोटि की है इस सन्दर्भ में उनके दिए गए भाषण का सारांश प्रस्तुत किया जा रहा है-

I have travelled across the length and breadth of India and have not seen one person who is beggar, who is thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spritual and cultural heritage. And, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation.
किन्तु इस भाषण की पुष्टि नहीं हो पा रही है। भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा चुनाव २००९ के घोषणा पत्र में भी इस भाषण का उल्लेख किया गया था।

अंग्रेजों ने इस देश को स्थायी रूप से हिन्दू मुसलमान समस्या, हिंदी उर्दू विवाद, भारत का विभाजन उपहार स्वरूप दिया था। उसके बाद भी अगर अंग्रेज भक्तों की आँखें नहीं खुलती हैं तो उनको खोला भी नहीं जा सकता है चाटुकारिता उनका स्वभाव है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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किसान, भारत भाग्य विधाता-किसान भगवान-अन्नदाता आदि नामों से पुकार कर उसको महिमा मंडित कर सबसे ज्यादा शोषण उसी का किया जाता है। किसान मुख्य उत्पादक है। उसी के द्वारा उत्पादित वस्तुओं से मानव शरीर संचालित होता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में उसी की व्यवस्था के लिए राजस्व, न्याय, लोकतंत्र, समानता जैसे शब्द बने हैं, लेकिन वस्तु स्थिति इसके विपरीत है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पंजाब मंे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार सन् 1995 से 2010 तक किसानों की आत्महत्या का आँकड़ा 2 लाख 56 हजार 9 सौ तेरह बताई गई है। वहीं राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आँकड़े भ्रमित करने वाले हैं। वास्तविकता यह है कि देश में हर घण्टे दो किसान आत्महत्याएँ कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण बढ़ती लागत, कम होती आमदनी से कर्ज का मकड़जाल कसना है।
किसान आत्महत्याओं को छुपाने के लिए शासन और प्रशासन तरह-तरह की बातें करता है। अखबारों में यह छपवाते हैं कि ‘नौजवान ने बीबी की आशनाई से मजबूर होकर आत्महत्या की, शराबी पति ने आत्महत्या की, गृहकलह के कारण आत्महत्या, सूदखोरों के उत्पीड़न से आत्महत्या, पुलिस उत्पीड़न से आत्महत्या समाचार प्रकाशित होते हैं। वास्तविक स्थिति यह है कि किसानों की आत्महत्याओं का ग्राफ सामने न आने पाए इसलिए यह बाजीगरी की जाती है।
राहुल गांधी, मुलायम सिंह यादव, मायावती, गडकरी, आडवाणी से लेकर विभिन्न राजनैतिक दलों के नेतागण किसानों की समस्याओं को हल करने के लिए परेशान, हैरान 24 घण्टे रहते हैं। इन लोगों की परेशानियों को ही देखकर शायद किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ये नेतागण जितना परेशान होते हैं, पूँजीपति वर्ग राष्ट्रीय से बहुराष्ट्रीय हो जाता है और किसान अपनी दयनीय हालत से मजबूर होकर आत्महत्या कर लेता है।
केन्द्र सरकार द्वारा 2007, 2008 में किसानों को कर्ज माफी के नाम पर 70 हजार करोड़ रूपये दिए गए, जिसका भी लाभ किसानों को नहीं मिला। किसानों के नाम पर बैंक
अधिकारियों और दलालों के गठजोड़ ने फर्जी ऋण निकाल लिए थे उसको कर्जमाफी योजना में समायोजित कर बैंक अधिकारियों व दलालों ने अपनी गर्दन बचा ली।
बुवाई के समय बाजार मंे ‘बीज’ और खाद गायब हो जाते हंै। किसान व उसके संगठन हल्ला मचाकर रह जाते हैं। शासन व अधिकारी गण व्यवस्था बनाने की बात करने लगते हैं और जब फसलें तैयार होती हैं तो उनको खरीदने के लिए सरकारी एजेंसियाँ कभी बोरा नहीं है तो कभी चेक बुक नहीं है, कभी ट्रान्सपोर्ट की व्यवस्था नहीं है, कहकर भुलावा देते हैं। किसान हल्ला मचाते रहते हैं और सरकारी एजेंसियाँ व्यापारियों का गेहूँ, धान चुपके-चुपके खरीदकर गोदामों को भर देती हैं और इसमें भी किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य न मिलने के कारण हजारों का नुकसान होता है।
यदि राहुल गांधी, मुलायम सिंह यादव, मायावती, गडकरी, आडवाणी जैसे नेतागण किसानों की चिंता छोड़कर अम्बानियों, टाटाओं, बिरलाओं की चिंता करने लगें तो शायद किसानों की स्थिति में सुधार संभव हो, क्योंकि इन राजनैतिक दलों की सहमति द्वारा इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, उद्योगपतियों को लाखों करोड़ रुपये के बेल आउट पैकेज दिए जाते हैं जिनकी चर्चा भी नहीं होती है।
किसानों की संख्या घट रही है, उनकी जमीने किसी न किसी बहाने छीनी जा रही हैं। ये सरकारें और इनके नेतृत्वकारी लोगों का चरित्र किसान विरोधी है। ये बहुराष्ट्रीय, राष्ट्रीय कम्पनियों के अभिकर्ता मात्र हैं।
लो क सं घ र्ष !

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यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि अमरीकी सेनाएं दक्षिणी एशिया के देशों में पाकिस्‍तान के अलावा भारत, श्रीलंका, बांग्‍लादेश, नेपाल के अलावा मालदीव में भी मौजूद हैं। पेंटागन के शीर्ष कमांडर ने खुलासा किया है कि भारत में अमरीकी सेना के खास दस्‍ते की तैनाती की गई है। चीन, भारत, उत्तरी कोरिया और अंतरराष्ट्रीय खतरों से निपटने के लिए बनाया गया है। यह कमांड पहले तो खतरे को अपने तरीके से रोकने की कोशिश करता है। लेकिन अगर तब भी बात नहीं बनी तो एशिया प्रशांत इलाके में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई के लिए हमेशा तैयार रहता है।

भारत गुट निरपेक्ष आन्दोलन का अध्यक्ष और नेता भी रहा है। छोटे-छोटे जन गणों की आशा का संचार केंद्र रहा है। पता नहीं कब भारत अमेरिकी साम्राज्यवाद का पिट्ठू हो गया है। जैसे बहरीन से लेकर तमाम सारे छोटे छोटे देशों में अमरीकियों ने जेलखाने सी.आई.ए के अड्डे, सैनिक अड्डे बना कर उनकी संप्रभुता का हनन कर लिया है। यह उसी तरह का खतरा है जैसे विधिक अधिकार पत्र के द्वारा सर टामस रो को मुग़लकालीन भारत में व्यापार करने की अनुमति मिली थी और अंत में तिगडम ताल करके भारत को ब्रिटिश आधीन भारत के रूप में परिवर्तित कर दिया था। अभी मालदीव में जो परिवर्तन हुए हैं इस समाचार के आने के बाद यह पुष्टि होती है कि वहां के सत्ता परिवर्तन में अमेरिकी साम्राज्यवादियों का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष हाथ जरूर है।
हमारे देश में तो अमरीकी साम्राज्यवादियों के पैसे से पलने वाले एन.जी.ओ से लेकर राजनीतिक दल तक हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ दल में इतना नैतिक साहस भी नहीं था कि वह खुलेआम इस कृत्य को जनता के बीच में ले जाती।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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अमेरिकन साम्राज्यवाद की मौत नजदीक आ रही है। पूरी दुनिया को गुलाम बनाने का स्वप्न अधूरा रह जायेगा। ईरान ने आज अपने परमाणु कार्यक्रम को उसके लाख विरोध के बाद आगे बढ़ा दिया है। अमेरिकियों को दिखाने के लिये उसका टेलीकास्ट भी किया है। इसके साथ-साथ ईरान ने यूरोप के छह: देशों को तेल बेचने से भी मना कर दिया है। यह देश हैं इटली, फ्रांस, स्‍पेन, ग्रीस, नीदरलैंड, पुर्तगाल। इन देशों की पहले से अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं है। तेल न मिलने से और व्यवस्था ख़राब होगी। अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था पहले से ख़राब है। अमेरिकी जनता महंगाई, बेरोजगारी के खिलाफ आन्दोलनरत है। इन परिस्तिथियों में अमेरिका और इजराइल व उसके पिट्ठू देशों ने जो युधोन्माद ईरान के खिलाफ पैदा किया था। अगर वास्तविक लड़ाई पर आये तो निश्चित रूप से अमेरिकन साम्राज्यवाद को जबरदस्त धक्का लगेगा। अमेरिका द्वारा अघोषित रूप से शासित ईराक व पाकिस्तान भी ईरान के साथ खड़े होंगे।

चीन ने खुले आम घोषणा कर रखी है कि वह ईरान की मदद करेगा वहीँ भारत भी ईरान को छोड़ना नहीं चाहता है। अमेरिकी प्रयासों के बाद भी भारत ने तेल लेना बंद नहीं किया है और भारत अपने संबंधों को ईरान से ख़त्म नहीं करना चाहता है। ऐसी स्तिथियों में अगर अमेरिकी साम्राज्यवादी व उसके पिट्ठू मुल्क ईरान की तरफ अगर आँखें भी तरेरते हैं तो एशिया की बहुसंख्यक जनता व सरकारें अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब देंगी। जिस तरह से अमेरिकन्स आज भी वियतनाम की मार को भूल नहीं पाए हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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मानवता की रक्षा हेतु

विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी बेशर्मी के साथ एशिया के मुल्कों को गुलाम बनाने का कार्य कर रही हैं। जब इनकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी देश के ऊपर हमला करने की बात होती है। तो भारत, चीन, रूस, ईरान सहित कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ में अनुपस्थित हो जाते हैं और जब नाटो की सेनायें कार्यवाई शुरू कर देती हैं तो यह घडियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं। चीन लीबिया में जारी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं और लीबिया में जो हो रहा है उसपर अफसोस जाहिर करता है। चीन ने अपने बयान में लीबिया में विद्रोहियों और गद्दाफी सेनाओं के बीच जारी संघर्ष के सीज फायर की मांग भी नहीं की है और कहा है कि चीन उत्तरी अफ्रीका के स्वतंत्र राष्ट्र लीबिया की स्वतंत्रता, स्वप्रभुता और एकता का सम्मान करता है। बयान में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही लीबिया में जारी संघर्ष थम जाएगा और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। ईरान ने इन हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि लीबिया के तेल पर कब्जा करने का पश्चिमी देशों का यह घिनौना अपराध है। हालांकि ईरान ने लीबिया में गद्दाफी के विरोध में हो रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह गद्दाफी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति है। ईरान ने यह भी कहा है कि लीबिया के लोगों को पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वो अपने खास मकसदों को हल करने के लिए उनके साथ होने का दिखावा कर रहे हैं।
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,”लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.”
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है। विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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