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Posts Tagged ‘मसीहुद्दीन संजरी’

दंगे राजनैतिक लाभ के लिए करवाए जाते हैं यह तो पहले भी कहा जाता रहा है। इस बार सभी राजनैतिक दलों ने इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी कर लिया। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार िशंदे ने तो यहाँ तक कह दिया कि चुनाव से पहले इस तरह के और दंगे भी करवाए जा सकते हैं। 1, नवम्बर को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक सवाल के जवाब में कहा कि मुज़फ्फरनगर में कुछ शरारती राजनैतिक तत्व हैं जो माहौल को खराब करने के लिए एक वारदात को दबाना और दूसरी को उछालना चाहते हैं। भाजपा पर राजनैतिक लाभ के लिए दंगा करवाने का आरोप लगभग सभी दलों ने खुले रूप से लगाया है। ऐसा मानने वालों की संख्या बहुत बड़ी है कि दंगे का माहौल तैयार करने की शुरुआत संघ परिवार और भाजपा से जुड़े हुए नेताओं ने ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए की थी। उन्हें अपने लक्ष्य में सफल होते देख अन्य दलों के नेता समाज को बाँटने के उनके इस अभियान का विरोध करने के बजाय भड़की हुई भावनाओं पर राजनैतिक रोटी सेकने के लिए उसमें शामिल हो गए। अगर देश एंव समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को अन्य दलों के नेताओं ने निभाया होता तो भी इस साम्प्रदायिक हवा को रोका या इसकी तीव्रता को कम अवश्य किया जा सकता था। कुल मिला कर यदि देखा जाए तो मूल्यविहीन और सिद्वान्तविहीन राजनीति भी इसकी ज़िम्मेदार है। बेहतर भविष्य और सेकुलर लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमें राजनीति में मूल्यों और सिद्वान्तों की वकालत करने वालों को महत्व देना ही होगा।
मोबाइल : 09455571488
-मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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सवाल यह है कि प्रशासन क्या कर रहा था और सरकार की आँखें बन्द क्यों थीं? सरकार के पास दंगा होने की आशंका की खुफिया जानकारी भी थी। समाचार पत्रों में दंगे की सम्भावना की खबरें छप रही थीं। धारा 144 लगा दी गई थी। फिर भी महापंचायत होने दी गई। भड़काऊ भाषण, ज़हरीले नारों और हथियारों से लैस भीड़ का दृश्य वहाँ मौजूद उच्च पुलिस अधिकारियों के सामने था। पंचायत समाप्त होने से घंटों पहले इसमें भाग लेने आए लोगों द्वारा हत्या की वारदातें अंजाम दी जा चुकी थी। पंचायत समाप्त होने के बाद प्रशासन के पास हालात को सँभालने के लिए पर्याप्त समय था। इसके बावजूद सरकार और प्रशासन ने जिस तरह स्थिति से निपटने में आपराधिक लापरवाही का प्रदशर्न किया उससे साफ तौर पर लगता है कि उस समय कानून व्यवस्था बनाए रखने में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी बल्कि यह कहा जाए कि तीनों की मंशा एक ही थी तो गलत नहीं होगा। फिरकापरस्त दंगा करवाना चाहते थे प्रशासन उसे रोकना नहीं चाहता था और सरकार की शान्ति बनाए रखने में कोई रुचि नहीं थी। इसका कारण सरकार व प्रशासन की अक्षमता और संवेदनहीनता थी, दंगाइयों के साथ मिली भगत या दंगा उपरान्त राजनैतिक लाभ हासिल करने की जुगत। मगर सच्चाई यही है कि दंगाइयों ने हत्या के बाद सबूत मिटाने के लिए लाशों को जलाया, बहाया और मिट्टी के नीचे दबा दिया। प्रशासन ने फाँसी पर लटकी हुई लाशों को आत्महत्या साबित करने का प्रयास किया। एफ.आई.आर. दर्ज करने में बाधाएँ उत्पन्न कीं। सत्ताधारी दल ने इसे कभी जातीय संघर्ष बताने की कोशिश की तो कभी सरकार के मंत्रियों ने अपनी रिपोर्ट में राहत कैम्पों में दंगा पीड़ितों को जबरन रोक कर अपना धंधा चलाने का आरोप लगाया। इन सभी प्रयासों का मात्र एक कारण था कि दंगे की व्यापकता और जघन्यता दुनिया पर ज़ाहिर न हो। सरकार और प्रशासन के लिए कानून व्यवस्था की बहाली और दंगा पीड़ितों के पुनर्वास के मुकाबले में तथ्यों पर परदा डालने के मायने ज़्यादा थे। यही कारण है कि सरकारी तौर पर सिर्फ 62 मौतें बताई गईं जबकि मानवाधिकार और सामाजिक संगठनों के प्रयासों से कुछ और हत्याओं से परदा उठा और आँकड़ा 100 पार कर गया। हालाँकि उन सभी की प्राथमिकी अभी तक दर्ज नहीं हो पाई है। इसके अलावा एक बड़ी संख्या लापता व्यक्तियों की है जिनके बारे में आशंका है कि उनकी हत्या हो चुकी है। यही स्थिति घर छोड़ कर जाने वाले दंगा पीड़ितों की संख्या की भी है। सरकार द्वारा इसे भी कम करके बताने का हर सम्भव प्रयास किया गया और फिर दंगा पीड़ितों के प्रति अपनी संवेदनहीनता को छुपाने के लिए राहत कैम्प चलाने वालों को ही सरकार के मंत्रियों ने कटघरे में खड़ा कर दिया।
मुज़फ्फरनगर, शामली व अन्य जगहों पर छोटे बड़े तीन दर्जन से भी ज़्यादा राहत कैम्प काम कर रहे थे। मुज़फ्फरनगर में सज़ाक, तौली, बासी कलां, बु़ाना, सखीपुर, जौला, जोगी खेड़ा लोई, चरथावल, मीरापुर और शामली में मलकपुर, कान्धला, कैराना, खुरगान, मंसूरा, जलालाबाद, सुंता, रसूलपुर के अलावा ग्रामीण अंचलों में छोटे बड़े राहत कैम्पों में दंगा पीड़ितों ने पनाह ले रखी थी। शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या को अपने रिश्तेदारों और सगे
संबधिंयों के यहाँ भी पनाह मिल गई थी। इनमें कई कैम्प ऐसे थे जहाँ एक साथ दस हजार तक दंगा पीड़ितों ने शरण ली थी। प्रदेश सरकार ने कैम्पों में दंगा पीड़ितों की मदद उनके खाने पीने रहने की व्यवस्था करने का कोई आँकड़ा अब तक नहीं दिया है। कुछ कैम्पों के आयाजकों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सरकार की तरफ से उनको एक पैसे की भी कोई सहायता नहीं मिली। समाजवादी सरकार के मुस्लिम नेता और अखिलेश सरकार के विधायक मंत्री पहले की तरह कुछ ऐसे बिन्दुओं की खोज में लगे रहे जिससे पार्टी और सरकार का बचाव किया जा सके। सरकार के वरिष्ठ मंत्री आज़म खान जो उस क्षेत्र के प्रभारी भी हैं, ने दो परस्पर विरोधी भूमिकाएँ अदा करके सबको हैरत में डाल दिया। पहले तो उन्होंने मीडिया के सामने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा किया। विरोध स्वरूप आगरा में पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में नहीं गए। मुलायम सिंह के भाई रामगोपाल यादव और कुछ वरिष्ठ सपा नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा भी खोल दिया। परन्तु विधान सभा के मानसून सत्र में सदन के अन्दर आज़म खान ने ही सरकार का पूरी ताकत के साथ बचाव करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। हालाँकि गृह मंत्रालय का पदभार मुख्यमंत्री के पास होने के कारण यह ज़िम्मेदारी उनकी थी। तीन चार दिनों के भीतर ऐसा कौन सा चमत्कार हुआ जिससे आज़म खान का ह्रदय परिवर्तन हो गया यह तो वही बता पाएँगे। परन्तु जनता इसे उनकी राजनैतिक अदाकारी के रूप में ही देखती है। जब राहुल गांधी ने यह कहा कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. के लोग मुज़फ्फरनगर के 1015 मुस्लिम नौजवान जिनके भाई बहन दंगे में मारे गए हैं, से बात कर रहे हैं तो आज़म खान ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। लेकिन अखिलेश सरकार के मुज़फ्फरनगर सद्भावना मिशन पर गए मंत्री समूह ने अपनी रिपोर्ट में दुर्भावना वश जब ह कहा कि मदरसे के लोग दंगा पीड़ितों को जबरन कैम्पों में रोक कर अपनी दुकान चला रहे हैं तो इस पर आज़म खान ने कोई टिप्पणी करना उचित नहीं समझा। हालाँकि वह यह अच्छी तरह जानते थे कि सरकार ने दंगा पीड़ितों की वापसी पर उनकी सुरक्षा का कोई बन्दोबस्त नहीं किया था। उन्हें यह भी मालूम था कि जो लोग अपने गाँव गए थे उनको मुकदमें वापस लेने के लिए
धमकियाँ दी जा रही थीं। बुाना के हुसैनपुर में खेत में काम कर रहे तीन मुसलमानों की 30, सितम्बर को की जाने वाली हत्या ने साबित भी कर दिया है कि असुरक्षा की आशंका बेबुनियाद नहीं थी और मंत्री समूह की रिपोर्ट में जो कुछ भी कहा गया वह बदनीयती पर आधारित था। यदि राहुल
गांधी और मंत्री समूह की रिपोर्ट को जोड़ कर देखा जाए तो यह आरोप बहुत आसानी से लगाया जा सकता है कि आई.एस.आई. और दंगा पीड़ित मुस्लिम युवकों की मुलाकात उन्हीं मदरसों में होती थी। राहुल के बयान और शिवपाल की अध्यक्षता वाले मंत्री समूह की इस रिपोर्ट को खुफिया एवं जाँच एजेंसियों में मौजूद साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों को आतंकवाद के नाम पर मदरसों को घेरने और मुसलमानों को प्रताड़ित करने का अवसर प्रदान करने के रूप में भी देखा जा सकता है। इस प्रकार इसे मुसलमानों को पीड़ित और प्रताड़ित कर उनमें असुरक्षा की भावना उत्पन्न करके सुरक्षा देने के नाम पर राजनैतिक ठगी जारी रखने की कोशिश भी कहा जा सकता है। यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि मुसलमानों के हित की बात करने वाली पार्टियों ने सुरक्षा के नाम पर उन्हें गोलबन्द करके सबसे अधिक छला है। भाजपा और शिवसेना जैसे दलों ने उन्हें इसका अवसर भी खूब दिया है। लेकिन जैसे ही मुसलमानों के हित की कोई बात आती है साम्प्रदायिक दल और संगठन तुष्टिकरण का राग अलापने लगते हैं। उसके बाद इन तथाकथित सेकुलर और साम्प्रदायिक दलों के बीच नूरा कुश्ती शुरू हो जाती है। थोड़े समय बाद ही सेकुलर दल हथियार डाल देते हैं और मुसलमानों को यह संदेश देने में लग जाते हैं कि वह तो कुछ करना चाहते हैं परन्तु स्थितियाँ प्रतिकूल हैं। केवल राजनैतिक स्तर पर ही नहीं बल्कि न्यायिक स्तर पर भी मुसलमानों के मामले में यह बार बार देखने को मिला है। आन्ध्र प्रदेश में रिज़र्वेशन का मामला रहा हो या यू.पी. में आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम युवकों की रिहाई का मुद्दा जानबूझ कर ऐसी कमियाँ छोड़ी गईं कि अदालत में जाकर केस गिर जाए और उसके बाद फिर वही राग कि हम तो करना चाहते हैं लेकिन ़ ़ ़। अखिलेश सरकार ने तो एक तीसरा रास्ता भी निकाल लिया है। मुसलमानों के खिलाफ उसी समुदाय के लोगों को इस्तेमाल करने का। खालिद मुजाहिद की हिरासत में मौत के मामले में पंचनामा की बात हो या फिर मुज़फ्फरनगर का दौरा करने वाली टीम में तीन मुसलमानों को शामिल किया जाना इसी नई रणनीति का हिस्सा लगता है। खालिद मुजाहिद के पंचनामे में शामिल मुसलमान यह नहीं कह पाए कि उसमें खालिद के परिवार का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए और दंगों की जाँच का हिस्सा रहने वाले मुस्लिम मंत्री इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए कि दल के अगुवा से यह कह सकें कि जिन लुटे पिटे लोगों की जाँच उन्हें करनी थी उन पीड़ितों से कैम्पों में जाकर उनका दुख दर्द भी सुन लिया जाए। ऐसे लोगों से दंगा पीड़ितों की मदद करने वालों पर कीचड़ उछालने वाली मंत्री समूह की रिपोर्ट पर उंगली रखने की उम्मीद करना सिर्फ धोखा है। इस तरह के मुस्लिम नेता अपने समाज में सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं सरकार में अपने समाज का नहीं। मुस्लिम समाज को यह सब समझना होगा और अपने व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन भी लाना होगा।
क्रमश:
-मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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अमानवीय, पाष्विक, बर्बर या ऐसी कोई संज्ञा मुज़फ्फरनगर, श्यामली और आस-पास घटित होने वाली घटनाओं को अंजाम देने वालों के लिए पर्याप्त होगी? आचर्य और बेशर्मी की बात तो यह है कि इसे जायज़ ठहराने की उसी तरह की कोशिश की गईं जिस तरह गुजरात दंगों को गोधरा कांड की प्रतिक्रिया बताने का प्रयास किया गया था। उत्तर-प्रदेश में इस तरह के साम्प्रदायिक षड्यंत्र पिछले कई दंगों के मामले में पहले ही बेनकाब हो चुके हैं। इन दंगों में आमतौर से दंगाइयों ने समाज में विष घोलने और भावनाएँ भड़काने के लिए महिलाओं के साथ अभद्रता को हथियार रूप में प्रयोग किया है। फैज़ाबाद में तो हिन्दू लड़की से छेड़छाड़ के साथ ही मूर्तियों के खंडित करने की अफवाह भी फैलाई गई थी। बाद में यह तथ्य खुलकर सामने आगया कि मूर्तियाँ सही सलामत थीं। उनकी वीडियो भी जारी हो गई। किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ का कोई मामला कहीं दर्ज नहीं हुआ। यहाँ तक कि कोई यह बताने वाला भी नहीं था कि पीडि़त लड़की कौन और कहाँ की रहने वाली थी। इस बात के भी कई प्रमाण मिले कि दंगा पूर्व नियोजित था और लड़की के साथ छेड़छाड़ या मूर्तियों को खंडित करने की अफवाह जानबूझ कर गढ़ी गई थी। मुज़फ्फरनगर, शामली, मेरठ और बाग़पत में होने वाले दंगे के लिए भी बहाना यही बनाया गया कि जाट लड़की से मुसलमान लड़के ने छेड़छाड़ की थी। हालाँकि यह बात सही नहीं थी। मामला 27, अगस्त को मोटर साइकिल और साइकिल की टक्कर के बाद उपजे विवाद से शुरू हुआ था। बात बढ़ गई और कंवाल ग्राम निवासी शाहनवाज़ की सचिन और गौरव नामक दो जाट युवकों ने चाकू मार कर हत्या कर दी। मुहल्ले के लोगों ने इन दोनों हमलावरों को भी मार डाला। दोनों पक्षों की तरफ से लिखवाई गई एफ.आई.आर. में भी मोटरसाइकिल और साइकिल की टक्कर को ही विवाद का कारण बताया गया है। इस घटना से फिरकापरस्तों को पीढि़यों से चले आ रहे मुसलमान-जाट शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व को दंगों की आग में जलाने का मौका मिल गया। नफरत के सौदागरों ने मोटर साइकिल-साइकिल टक्कर की जगह लड़की के साथ छेड़छाड़ का प्रचार करना शुरू कर दिया। इस आग में घी डालने के लिए यू ट्यूब से पाकिस्तान की एक वीडियों डाउन लोड की गई जिसमें कुछ दाढ़ी टोपी वालों को एक व्यक्ति की पिटाई करते दिखाया गया था। इस वीडियो द्वारा प्रचारित किया जाने लगा कि मुसलमान जाट लड़के की पिटाई कर रहे हंै और विभिन्न माध्यमों से इसका बहुत व्यापक स्तर पर वितरण होने लगा। कथित रूप से यह काम भाजपा विधायक संगीत सिंह सोम ने किया था। वातावरण इतना दूषित कर दिया गया कि इससे निपटने के लिए विभिन्न खापों ने पंचायतों का दौर शुरू कर दिया और 7, सितम्बर को कई खापों ने मिलकर ’बहू-बेटी बचाओ’ महापंचायत बुलाई जिसमें जमकर साम्प्रदायिक भाषण बाज़ी हुई। उसके बाद बड़े पैमाने पर दंगा भड़क गया। एक बार फिर यह प्रचारित किया गया कि पंचायत से वापसी पर मुसलमानों ने जाटों पर हमला कर दिया जिससे दंगा भड़का। यह बात सही है कि पंचायत से वापसी पर दोनों समुदाय के लोगों में कई स्थानों पर टकराव हुआ जिसमें दोनांे तरफ के लोग हताहत और घायल भी हुए थे। हमले की शुरुआत करने के मामले में परस्पर विरोधी आरोप भी हैं। परन्तु जहाँ तक दंगों की शुरूआत की बात है तथ्य कुछ और ही कहते हैं।
5, सितम्बर को एक खाप पंचायत के बाद नफीस नामक व्यक्ति को चाकू मार दिया गया। 7, सितम्बर को होने वाली महापंचायत में शामिल होने के लिए बड़े पैमाने पर हथियारों के साथ मुसलमानों के खिलाफ साम्प्रदयिक नारे लगाते हुए लोग नगला मंदौड़ में इकट्ठा हुए। कहा जाता है कि यह संख्या एक लाख से भी अधिक थी। दोपहर में ही गढ़ी दौलत, कांधला निवासी नफीस अहमद ड्राइवर जो किराए पर महापंचायत में अपनी बोलेरो लेकर गया था उसकी हत्या कर दी गई। 4 बजे शाम में नंगला बुज़ुर्ग निवासी असगर पुत्र अल्लाह बन्दा को मार डाला गया। दिन में ही लपेड़ा निवासी फरीद पुत्र दोस्त मुहम्मद, सलमान पुत्र अमीर हसन, गढ़ी फीरोज़ाबाद निवासी नज़र मुहम्मद पुत्र मूसा, लताफत पुत्र मुस्तफा की भी हत्या कर दी गई। इन घटनाओं के बाद फैलने वाली अफवाहों से एक बड़े दंगे की पृष्ठिभूमि तैयार हो गई। पंचायत से वापसी पर रास्ते में हथियारों के प्रदर्षन और नारेबाज़ी से कई स्थानों पर टकराव हुए और मुज़फ्फरनगर तथा शामली पूरी तरह दंगे की चपेट में आ गया। इसकी लपटें मेरठ और बाग़पत तक भी पहुँच गईं। करीब डेढ़ सौ गाँव मुसलमानों से खाली हो गए। उनके घरों को जला दिया गया। 7, अगस्त की रात से जो आगज़नी, हत्या, और बलात्कार की घटनाएँ हुईं उसे सही मायने में दंगा कहा ही नहीं जा सकता क्योंकि इसका शिकार वह गरीब मुसलमान मज़दूर हुए जो पीढि़यों से जाट किसानों के यहाँ मज़दूरी करते आ रहे थे। उनके पास अपनी खेती नहीं थी। व्यवसाय के नाम पर लोहारी, बढ़ईगीरी या नाई के काम करते थे और इसके लिए भी उन्हीं जाटों पर आश्रित थे। सामाजिक स्तर पर उनकी जाट किसानों के सामने सर उठाने की भी हैसियत नहीं थी। इस एकतरफा दंगें में नौजवान, बूढ़ों, बच्चों, महिलाओं की निर्मम हत्या की गई। महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की एक साथ इतनी घटनाएँ उत्तर प्रदेश में पहले कभी नहीं हुई। इन घटनाओं को अंजाम देने का जो तरीका इक्कीसवीं सदी के मानव ने अपनाया उसका कोई उदाहरण दुनिया के किसी प्रजाति के जानवरों के इतिहास में नहीं मिलता। बुज़ुर्ग दम्पत्ति को आरा मशीन से काट कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। महिलाओं और कम उम्र लड़कियों के साथ उनके परिजनों के सामने सामूहिक बलात्कार किया गया। दूध पीते बच्चे को गोद में लिए हुए महिला को बच्चे समेत जि़न्दा आग में जला दिया गया। जले हुए शवों को अलग करने का प्रयास जब विफल रहा तो दोनों को एक साथ ही दफन कर दिया गया। कितने ही लोगों की हत्या कर सबूत मिटाने के लिए लाशों को नहर में बहा दिया गया, जला दिया गया या खेतों में मिट्टी के नीचे दबा दिया गया।
क्रमश:

मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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01
25, जुलाई 2013 को बटला हाउस मुठभेड़ के समय पुलिस बल पर गोली चलाते हुए फरार होने और
अपराधमुक्त करने के लिए अपराधियों के चुनाव लड़ने के खिलाफ सख्त फैसला सुनाता है तो सभी राजनैतिक दल उस फैसले के खिलाफ एक स्वर में बोलने लगते हैं। सरकार इस विषय पर सर्वदलीय बैठक बुलाती है और सर्वसम्मति से यह तय होता है कि इस फैसले के खिलाफ संसद प्रभावी कदम उठाए। भा.ज.पा. उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोलने में सबसे आगे दिखाई देती है। भा.ज.पा. के धर्मेन्द्र यादव टेलीवीज़न पर पूरे देष के सामने यह तर्क देते हैं कि सत्ता पक्ष विरोधियों के खिलाफ इसका दुरुपयोग कर सकता है। यही आषंका अन्य राजनैतिक दलों ने भी जाहिर की। दूसरे शब्दों में सत्ता पक्ष न सिर्फ फर्जी मुकदमे कायम करवा सकता है बल्कि अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए न्यायालय के फैसलों को भी प्रभावित कर सकता है। इन दोनों परस्पर विरोधी विचारों के बीच कुल एक सप्ताह का अन्तर यह बताने के लिए काफी है कि बटला हाउस मामले में न्यायालय के फैसले पर राजनैतिक रोटी सेकने में अपने आपको सबसे आदर्षवादी पार्टी कहने वाली भा.ज.पा. भी अपने नेताओं के साथ होने वाली किसी नाइंसाफी की आषंका से वह तमाम मर्यादाएँ भूल गई जिसका वह प्रचार कर रही थी। निचले स्तर पर न्यायपालिका में कितनी राजनैतिक दखलअंदाज़ी होती है यह तो सत्ता में रह चुके या उसकी दहलीज़ पर खड़ी पार्टियों के राजनेता ही बता सकते हैं जिन्हें इस तरह की आषंका सताती रहती है। परन्तु इससे यह अवष्य जाहिर होता है कि कुछ होता तो ज़रूर है। इससे भी ज़्यादा आष्चर्य मुख्य धारा की उस मीडिया के रवैये पर होता है जो न्यायालय के फैसले से असहमति जताने वाले समाचारों को अवमानना से जोड़कर देखने का पाखंड करता है और इस प्रकार मात्र एक ही तरह की प्रतिक्रियाओं का प्रकाषन एंव प्रसारण कर दूसरे पक्ष के खिलाफ नकारात्मक वातावरण निर्मित करता है। जिस दिन शहज़ाद के मामले में फैसला सुनाया जाने वाला था, पूरे देष की मीडिया के लोग उसके गाँव खालिसपुर, आज़मगढ़ में मौजूद थे। वहाँ उपस्थित ग्राम प्रधान और गाँव के निवासियों समेत कई लोगों ने अपने विचार रखे। संजरपुर में भी प्रिन्ट और एलेक्ट्रानिक मीडिया से लोगों ने बात की। शाम को जब एन.डी. टी.वी. के लोग गाँव में आए तो पूरी भीड़ इकट्ठा हो गई, हालाँकि मौसम की खराबी के कारण जीवंत प्रसारण नहीं हो पाया। परन्तु अगले दिन समाचार पत्रों में यह भ्रामक खबर छपी कि खालिसपुर और संजरपुर में सन्नाटा पसरा रहा, गलियाँ सुनसान थीं, कोई रास्ता बताने वाला नहीं था आदि। शायद मीडिया के लोग एक पक्ष की ऐसी तस्वीर पेष करना चाहते थे जिससे अपराध बोध झलकता हो। इस संदर्भ में जब एक हिन्दी समाचार पत्र के ब्यूरो चीफ से बात की गई तो न्यायालय के फैसले से असहमति जताने वाले बयानों को अखबार में स्थान न मिल पाने का कारण पूछने पर उनका कहना था कि न्यायालय की अवमानना वाले समाचारों को नहीं छापा गया और यह नीति उच्चतम स्तर पर बनी थी। हालाँकि यह तर्क किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं हो सकता। यदि मीडिया ने वास्तव में जान-बूझकर ऐसी कोई नीति अपनाई थी तो इसे असंवैधानिक और सुनियोजित दुष्प्रचार ही माना जाएगा। संविधान हमें न्यायालय के फैसलों से असहमति का पूरा अधिकार देता है। यदि ऐसा न होता तो एक अदालत के फैसले के खिलाफ अगली अदालत में अपील करने या पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का अधिकार कानून क्यों देता? अदालती फैसलों के खिलाफ असहमति को अवमानना की चादर उढ़ाना लोकतांत्रिक मूल्यों, मर्यादाओं और उसकी मूल भावनाओं के विरुद्व है। यदि यह निर्णय उच्चतम स्तर पर लिया गया है तो मीडिया का यह व्यवहार धार्मिक समुदायों के बीच भय और संदेह उत्पन्न करने वाले सुनियोजित कदम के तौर पर ही देखा जाएगा जो साम्प्रदायिक सौहार्द और स्वस्थ समाज के ताने-बाने को गहरा आघात पहुँचा सकता है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर सर्वदलीय बैठक में सत्ता के दुरुपयोग के मामले में जो सवाल उठाए गए हैं वह स्वतः स्पष्ट करते हैं कि फैसलो को प्रभावित करने की मात्र आषंका ही नहीं होती बल्कि वास्तव में ऐसा होता भी है। उसका कारण भ्रष्टाचार भी हो सकता है, साम्प्रदायिकता या राजनैतिक सत्ता का दाँवपेच भी।
शहज़ाद के मामले में जो निर्णय आया है उसकी भूमिका में विद्वान न्यायाधीष ने पुलिस बल की सेवाओं के प्रति जो टिप्पणी की है कि ’पुलिस के कारण ही हम सुरक्षित हैं। पुलिस का हमारे जीवन में काफी महत्व है और वह जब जागती है तब हम सोते है’ सिद्वान्त रूप में बिल्कुल सही है। यदि ऐसा न होता तो पुलिस विभाग के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो जाता। कोई यह नहीं कहता कि देष को पुलिस बल की आवष्यक्ता नहीं है या कानून व्यवस्था बनाए रखने में उसकी भूमिका नहीं है। न इस बात से इनकार किया जा सकता है कि हमारे जवानों को बहुत ही विषम परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। परन्तु इसका एक और पहलू भी है। उसी पुलिस बल में ऐसे तत्व भी रहे हैं जिन्होंने वर्दी को शर्मसार किया है। सत्ता के इषारे पर राजनैतिक विरोधियों को झूठे मामलों में फँसाना, उनके साथ दुव्र्यवहार, महिलाओं के साथ बलात्कार, दलितों और आदिवासियों के साथ अत्याचार और रिष्वत, लालच और साम्प्रदायिक सोच के चलते दोषियों को बचाने और निर्दोषों को फँसाने का दुष्चक्र, ऐसे हजारों मामलों से आँखें बंद नहीं की जा सकतीं। पुरस्कार, नकद और पदोन्नति के लिए बेगुनाहों को सलाखों के पीछे पहुँचा देने और फर्जी मुठभेड़ों में मासूमों की हत्या तक कर देने के अनेक उदाहरण मौजूद हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। साम्प्रदायिक दंगों में सत्ता के इषारे और अपनी साम्प्रदायिक मानसिकता की तृप्ति के लिए सामूहिक हत्या और महिलाओं एवं दूध पीते बच्चों को कत्ल करने जैसी वारदातों को अंजाम देने और और ऐसी घटनाओं के होने पर मूक दर्षक बने देखते रहने की मिसालें भी मौजूद हैं। ऐसी काली भेड़ें भी हमारे पुलिस बल में मौजूद हैं और निष्चित रूप से उनके कारण आम जनता आराम से सोती नहीं बल्कि उसकी नींद हराम हो जाती है। शायद यही कारण रहा होगा कि विधि निर्माताओं ने पुलिस के सामने दिए गए बयान को न्याय की कसौटी नहीं माना था। प्रस्तुत मामले में बटला हाउस इंकाउन्टर की घटना को अंजाम देने वाली दिल्ली स्पेषल सेल की भूमिका आतंकवाद से सम्बंधित कई मामलों में बहुत ही संदिग्ध रही है। पत्रकार काज़मी से लेकर लियाकत अली शाह के मामले अभी ताज़ा हैं। स्वयं बटला हाउस मुठभेड़ के छापा मार दस्ते में शामिल स्पेषल सेल के कई
अधिकारियों की इससे पहले के मामलों में अदालतों ने आलोचना की है। कुछ एक मामलों में तो फर्जी छापामारी एवं बरामदगी, सुबूत गढ़ने और बेकसूरों को फँसाने के लिए न्यायालय ने फटकार भी लगाई है। इस सम्बंध में जामिया टीचर्स सालिडैरिटी एसोसिएषन ;श्रज्ै।द्ध ने आतंकवाद से जुड़े मामलों में दिल्ली स्पेषल सेल की कार्रवाई और उसके द्वारा कायम किए गए 16 मुकदमों और उनके अदालती फैसलों का अध्ययन करने के बाद ’आरोपित, अभिषप्त और बरी’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है जो स्पेषल सेल के कई अधिकारियों के गैरकानूनी एवं आपराधिक कारनामों की पोल खोलने के लिए काफी है। संक्षिप्त में रिपोर्ट से कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-
राज्य बनाम गुलज़ार अहमद गने और मो0 अमीन हजाम एफ0आई0आर0 संख्या 95/06 तथा सेषन केस संख्या 13/2007 का फैसला 13 नवम्बर 2009 में आया। दिल्ली स्पेषल सेल की कहानी के मुताबिक पाक निवासी लष्कर का आतंकी, जम्मू कष्मीर के पट्टन क्षेत्र में काम कर रहा जिला कमांडर मो0 अकमल उर्फ अबू ताहिर, हथियार, गोला बारूद और फंड इकट्ठा करने के लिए अपने साथियों को दिल्ली व भारत के अन्य शहरों में भेज रहा है। ए.सी.पी. संजीव कुमार यादव और इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा द्वारा एक दल का गठन किया गया, जिसमें इंस्पेक्टर संजय दत्त, मोहन चंद शर्मा, एस.आई. राहुल कुमार, कैलाष बिष्ट, पवन कुमार, राकेष मलिक, हरिन्दर, अषोक शर्मा, हेड कांस्टेबल सुषील, सतिन्दर कृष्ण राव, कांस्टेबल नरेन्दर, रन सिंह शामिल थे। स्पेषल सेल के छापामार दस्ते ने गुलज़ार अहमद गने उर्फ मुस्तफा और मो0 अमीन हजाम को महिपालपुर के बस स्टैंड से गिरफ्तार किया दिखाया। इस केस में स्पेषल सेल के अधिकारियों ने आर.डी.एक्स., रिवाल्वर, डेटोनेटर और ग्यारह लाख रूपये की बरामदगी दिखाई थी। इस मामले की विवेचना ए.सी.पी. संजीव कुमार यादव ने की थी। इस केस में जिस बस पर आरोपियों को सवार दिखाया गया था उस बस के कंडक्टर सोनू दहिया ने अदालत को बताया कि उस दिन बताए गए स्थान पर बस की सेवा ही नहीं थी। विवेचक एसीपी संजीव कुमार यादव ने अदालत को बरामदगी का जो विवरण दिया वह चार्जषीट में दर्ज कहानी का उलटा था। सबसे बड़ी बात तो यह कि बरामदगियों के बारे में श्री शर्मा ने विवेचक को पहले ही बता दिया था। दरअसल अभियुक्तों ने अदालत को बताया कि उन्हें पुलिस के कहने के अनुसार 10 दिसम्बर को नहीं बल्कि 27 नवम्बर को ही गिरफ्तार किया गया था। इस केस का फैसला सुनाते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीष, उत्तरी दिल्ली
धर्मेष शर्मा ने यह टिप्पणी की ‘तो क्या मैं यह मान लूँ कि यह एक मानवीय गलती थी या कुछ और! मूल बात यह थी कि क्या उपरोक्त गलतियाँ वास्तविक थीं या जान-बूझकर पूरी कहानी को गढ़ने की कोषिष में हो गई थीं‘।
राज्य बनाम मुख्तार अहमद खान एफ.आई.आर. व सेषन केस संख्या 48/07, फैसला 21, अप्रैल 2012 में आया। अभियोजन की कहानी के अनुसार अबू मुसाब उर्फ ताहिर और अबू हमज़ा पाक निवासी तथा कुपवाड़ा और बारामुला के लष्कर के जिला कमांडर दिल्ली में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने की योजना बना रहे हैं। गुप्त सूचना के अनुसार कुपवाड़ा निवासी मुख्तार के हाथों घटना अंजाम दी जानी थी। एसीपी संजीव कुमार यादव के निरीक्षण और इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के नेतृत्व में एक टीम गठित की गई। इस टीम में इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा, एस.आई. राहुल कुमार, रमेष लांबा, दिलीप कुमार, रवीन्दर त्यागी, धर्मेंद्र कुमार, ए.एस.आई. चरन सिंह, संजीव कुमार, हरिद्वारी, अनिल त्यागी, प्रहलाद, हेड कांस्टेबल उदयवीर, कृष्ण राम, संजीव, कांस्टेबल राजिंदर, राजीव, बलवंत, अमर सिंह और राम सिंह शामिल थे। खबरी से एस.आई. धर्मेन्द्र को सूचना मिली कि मुख्तार हथियारों का एक बड़ा कंसाइनमेन्ट अपने साथियों को सौंपने आज़ादपुर मंडी आ रहा है। चार सदस्यीय टीम को सीमा लाज जहाँ वह ठहरा हुआ था, की निगरानी के लिए भेज दिया गया, बाकी को हथियारों और गोला-बारूद, बुलेट प्रूफ जैकेटों और आई.ओ. किट से लैस करके निजी वाहनों में आज़ादपुर फल मंडी रवाना कर दिया गया। पुलिस बल ने उसे दबोच लिया। तलाषी लेने पर डेढ़ किलो आर.डी.एक्स., डेटोनेटर और टाइमर बरामद हुआ। ए.सी.पी. संजीव कुमार ने इस केस की तफतीष की। हकीकत यह थी कि मुख्तार को 7, जून 2007 को गिरफ्तार किया गया था और पाँच दिन गैर कानूनी हिरासत में रखने के बाद फर्जी तरीके से उसकी गिरफ्तारी व बरामदगी दिखाई गई थी। स्पेषल सेल की सारी कहानी फर्जी साबित हुई। यह रहस्य भी खुला कि फर्जी विस्फोटक विषेषज्ञ से बरामद वस्तुओं की जाँच करवा कर नियमों के विरुद्ध रिपोर्ट प्राप्त की गई थी। फोरेंसिक विषेषज्ञ ने भी माना कि आई.ओ. द्वारा निर्देषित पैरामीटरों पर ही उसने रिपोर्ट तैयार की थी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीष-02, तीस हज़ारी कोर्ट, नई दिल्ली सुरेन्दर एस राठी ने मुख्तार को बरी कर दिया। अदालत ने यह टिप्पणी भी की ’स्पेषल सेल को मिलने वाली गुप्त सूचनाओं के दावों अथवा उसके काम करने के तरीकों में कुछ तो गम्भीर रूप से गड़बड़ है’।
राज्य बनाम खोंगबेन्तबम ब्रोजेन सिंह एफ.आई.आर. संख्या 93/02 का फैसला 12, मई 2009 को सुनाया गया। ए.सी.पी. राजबीर सिंह को आई.बी. से सूचना मिली कि पी.एल.ए. के आतंकवादी ब्रोजेन सिंह व उसका साथी पी.एल.ए. के लिए हथियार जुटाने दिल्ली आए हैं। स्पेषल सेल की एक टीम गठित की गई जिसमें ए.सी.पी. राजबीर सिंह, इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा, एस.आई. हृदय भूषण, बद्रीषदत्त, शरद कोहली और माहताब सिंह शामिल थे। उसके पास से रिवाल्वर, सी.पी.यू. और लैपटाप बरामद दिखाया गया। मुकदमे के दौरान यह पाया गया कि 15, मार्च 2002 को ए.सी.पी. राजबीर द्वारा गिरफ्तारी के समय लिया गया ब्रोजेन का खुलासा बयान और उपायुक्त उज्ज्वल मिश्रा द्वारा 23, अप्रैल 2002 को पोटा की धारा 32 के तहत दर्ज किया गया हलफनामा एक ही था। अदालत ने कहा कि ’कामा और पूर्ण विराम सहित पूरा का पूरा बयान ज्यों का त्यों है ़ ़ ़ ़ इससे पता चलता है कि इंसानी तौर पर ऐसा हलफनामा देने वाले और दर्ज करने वाले दोनों व्यक्तियों के लिए एक जैसा हूबहू शब्द दर शब्द हलफिया बयान दर्ज करना असंभव है’। यह भी पाया गया कि कंप्यूटर में कई फाइलें ऐसी भी थीं जो जब्त किए जाने के महीनो बाद का समय दर्षाती थीं और ऐसी फाइलों को आपत्तिजनक सबूतों के तौर पर दिखाया गया था। वास्तविकता यह है कि ब्रोजेन सिंह ने अफसपा के खिलाफ आन्दोलनों मे हिस्सा लिया था जिससे रुष्ट होकर मणिपुर पुलिस ने उसे फर्जी मुकदमों मे फँसाया था, जिसे उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। उसके बावजूद उसे गैर कानूनी तौर पर बंद रखा गया। उसने सरकार के खिलाफ अवमानना का मुकदमा कायम किया जिसमें अधिकारियों को सजा और जुर्माना हुआ। दिल्ली में वह अपना इलाज करवाने के लिए आया तो खुफिया एजेंसी की साजिष के तहत उसे यहाँ फँसा दिया गया। अतिरिक्त सत्र
न्यायाधीष, दिल्ली जे0आर0 आर्यन ने उसे मुक्त करने का फैसला सुनाते समय यह टिप्पणी की ’राज्य अधिकारियों को आतंकी होने का शक था और वह पहले से ही अवमानना के मामले में राज्य अधिकारियों को सजा दिलवाकर क्रोधित कर चुका था। पुलिस ने उसे इस अपराध के लिए टार्गेट बनाया’।
ऐसे कई और मामले सामने आ चुके हैं जब न्यायालय ने दिल्ली स्पेषल सेल के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियाँ की हैं और ए.सी.पी. संजीव कुमार यादव समेत बटला हाउस छापामार दस्ते में शामिल शायद ही ऐसा कोई पुलिस अधिकारी हो जो इन टिप्पणियों की परिधि में पहले न आ चुका हो। राज्य बनाम साकिब रहमान, बषीर अहमद शाह, नज़ीर अहमद सोफी आदि एफ.आई.आर. संख्या 146/05 सेषन केस नम्बर 24/10 में 2, फरवरी 2011 को फैसला सुनाते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीष, द्वारका कोर्ट, नई दिल्ली वीरेन्द्र भट्ट ने न सिर्फ स्पेषल सेल के पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई बल्कि एस.आई. विरेन्दर, एस.आई. निराकार, एस.आई. चरन सिंह एस.आई. महेन्दर सिंह के खिलाफ कानूनी कारवाई सुनिष्चित करने की संस्तुति भी की। उन्होंने कहा ’ये चारो अधिकारी दिल्ली पुलिस बल के लिए शर्मनाक साबित हुए हैं। मेरी राय में किसी पुलिस
अधिकारी द्वारा किसी बेगुनाह नागरिक को झूठे आपराधिक मामले में फँसाए जाने से और कोई गम्भीर और संगीन अपराध नहीं हो सकता। पुलिस अधिकारियों में ऐसी प्रवृत्ति को हल्के तौर पर नहीं देखा और डील किया जाना चाहिए, बल्कि इस पर सख्त हाथों लगाम कसी जानी चाहिए’। अन्य मामलों में विद्वान न्यायाधीषों ने भले ही ऐसी कठोर टिप्पणी नहीं की हों परन्तु न्याय की कसौटी पर उन मामलों में शामिल पुलिस अधिकारियों की गवाही किसी भी स्थिति में खरी नहीं मानी जा सकती। उपर्युक्त मामलों में शामिल दिल्ली स्पेषल सेल के छापामार दस्तों की सूची का अध्ययन करने से पता चलता है कि बटला हाउस इंकाउन्टर में शामिल और शहज़ाद केस के 6 प्रत्यक्षदर्षी अधिकारियों के साथ-साथ आपरेषन में शामिल ज़्यादातर अधिकारियों पर न्यायालय द्वारा एक से
अधिक बार उँगली उठाई जा चुकी है। मज़े की बात तो यह है कि इन अधिकारियों को सरकार और प्रषासन की तरफ से पुरस्कार और अदालतों की ओर से फटकार मिलती रही और यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा।
शहज़ाद मामले में न्यायालय ने यदि उसके द्वारा इंस्पेक्टर एमसी शर्मा को गोली मारने और फायर करते हुए भागने के तर्कों को स्वीकार किया है तो उसके पीछे निष्चित रूप से पुलिस के प्रति उसकी उसी भावना की भूमिका है जो उसने निर्णय सुनाते समय व्यक्त की थी। लेकिन इससे बटला हाउस इंकाउन्टर के समय उठने वाले सवालों के जवाब नहीं मिलते बल्कि सच्चाई तो यह है कि कई और नए सवाल जन्म लेते हैं। शहज़ाद के गोली चलाते हुए फरार होने के मामले में फैसले में यह संभावना व्यक्त की गई है कि हो सकता है कि उसने किसी अन्य फ्लैट में शरण ले ली हो या अपने आपको स्थानीय जाहिर करते हुए वहाँ से निकल गया हो। परन्तु ऐसा कैसे सम्भव हुआ कि अपने साथी को गोली मार कर फरार होने वाले की तलाष उन सम्भावित स्थानों पर भी पुलिस ने नहीं की जो उसी इमारत में थी! या क्या यह मुमकिन है कि इतने बड़े आपरेषन के दौरान जबकि गोलियाँ चल रही हों उसकी निगरानी के लिए तैनात पुलिस कर्मी वहाँ से किसी को बगैर तलाषी के आसानी से निकल जाने दें और हथियार समेत वहाँ से कोई भाग निकले? इससे भी अधिक आष्चर्य की बात यह कि बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया गया कि आतिफ और साजिद के शरीर पर चोट के निषान हैं जिससे साबित होता है कि पहले उनके साथ मार पीट की गई फिर गोली मारी गई। फैसले में कहा गया है कि आतिफ और साजिद के शरीर पर आई चोट गोली लगने के बाद फर्ष पर गिरने के कारण आई। फैसले में आतिफ के शरीर पर गन शाट के अलावा मात्र एक चोट का उल्लेख है जो उसके पैर के सामने के हिस्से पर आई है। जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उसकी पीठ और कूल्हे के पिछले हिस्से पर चोटों के कई निषान हैं जो फर्ष पर गिरने से चोट आने के तर्क को नकारते हैं। परन्तु एमसी शर्मा के शरीर पर गोली लगने के बाद ज़मीन पर गिरने से चोट आने का कोई उल्लेख नहीं है जबकि भारी भरकम शरीर के कारण साजिद और आतिफ के मुकाबले में उनके लिए यह सम्भावना अधिक थी? एमसी शर्मा को जिस समय गोली लगी वह खड़े थे यह बात हेड कांस्टेबल बलवंत ने अपनी गवाही में भी कही है। परन्तु साजिद यदि खड़ी मुद्रा में था तो उसके सिर के ऊपरी हिस्से पर आमने-सामने की मुठभेड़ में गोलियाँ कैसे लगीं और यदि वह खड़ा नहीं था तो गिरने के कारण शरीर पर चोट आने का सवाल कहाँ पैदा होता है। ऐसी हालत में उसके शरीर पर चोटें कैसे आईं?
छापामार टीम के मात्र एक सदस्य हेड कांस्टेबल राजबीर ने ही बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखी थी। आष्चर्य की बात तो यह है कि उस पुलिस बल के दो जवानों के पास कोई असलहा भी नहीं था जिसके लिए न्यायालय ने फटकार भी लगाई है। परन्तु क्या इस बात को आसानी से हज़म किया जा सकता है जबकि छापामार दल के पास यह सूचना थी कि दिल्ली धमाकों को अंजाम देने वाला आतिफ अपने साथियों के साथ वहाँ मौजूद है। एस0आई0 धर्मेन्द्र कुमार ने पहले ही वहाँ कई लोगों के मौजूद होने की तस्दीक भी कर दी थी। ऐसे में दल में शामिल मात्र एक बुलेट प्रूफ जैकेट पहने हुए हेड कांस्टेबल राजबीर को कमरे में दाखिल होने वाली टीम में शामिल क्यों नहीं किया गया। सच्चाई तो यह है कि बिना बुलेट प्रूफ जैकेट और दो सदस्यों का बगैर हथियार के आतंकवादियों को पकड़ने के लिए चले जाने की थ्योरी विष्वसनीय नहीं हो सकती। राज्य बनाम मुख्तार अहमद केस में स्पेषल सेल की टीम के जवानों ने अदालत को बताया था कि छापामार दल ने खुफिया खबरी की सूचना पर कार्रवाई करने से पहले अपने आपको हथियारों और गोला, बारूद, बुलेटप्रूफ जैकेटों और आई.ओ. किट से लैस किया था। बटला हाउस इंकाउन्टर में शामिल इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा, एस.आई. राहुल कुमार, एस.आई. रविन्दर त्यागी, एस.आई धर्मेन्द्र कुमार, ए.एस.आई. अनिल त्यागी, उदयवीर और बलवंत मुख्तार को घेरने वाली टीम में भी थे। आखिर इन अधिकारियों ने वही तैयारी बटला हाउस मामले में भी क्यों नहीं की जो मुख्तार के मामले में की थी जबकि यह मामला उससे ज़्यादा संगीन भी था। क्या इससे निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पुलिस बल को पहले से मालूम था कि यह बच्चे खतरनाक आतंकवादी नहीं हैं और वह उन्हें आसानी से टार्गेट कर लेंगे। पुरस्कार, पदक और पदोन्नति के आभास से ही अति उत्साहित कार्रवाई में शामिल टीम के सदस्यों को न तो बुलेट प्रूफ जैकेटों का ध्यान रहा और न हथियारों की फिक्र। कुल मिलाकर इस इंकाउन्टर को सही साबित करने के लिए इंस्पेक्टर शर्मा और बलवंत को लगी गोलियों के अलावा दूसरा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य शहज़ाद के फैसले के बाद भी सामने नहीं आया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि पुरस्कार और पदक की दौड़ में हमेषा आगे निकल जाने वाले इंस्पेक्टर शर्मा किसी अंदरूनी ईष्र्या का षिकार हो गए हों! कुल मिलाकर यह जाँच का विषय था जिसके लिए लगातार माँग भी होती रही परन्तु हर स्तर पर इसे ठुकरा कर पारदर्षिता के सभी रास्ते बंद कर दिए गए।
अदालत ने अभियोजन पक्ष की इस दलील को भी स्वीकार किया, जिसमें कहा गया था ’छापमार दल को दिल्ली धमाके के संदिग्धों को पकड़ने की जल्दी थी। इसके अलावा उस क्षेत्र के अधिकतर रहवासियों का धर्म वही था जो उन संदिग्धों का था। यदि पुलिस अधिकारी ऐसे स्थानीय लोगों को शामिल करने की कोषिष करते तो इससे क्षेत्र में सामाजिक बेचैनी उत्पन्न हो जाती जो पुलिस वालों की जान के लिए भी खतरे का कारण बन जाती’। अभियोजन ने इस सिलसिले में आजमगढ़ प्रशासन के बारे में कहा है कि कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए छापामार दल को शहजाद के गाँव जाने की प्रषासन ने अनुमति नहीं दी थी। इस पर अदालत ने यह तो कहा कि कोई धर्म अपराध करने की आज्ञा नही देता परन्तु उसका यह भी कहना था ’विभिन्न धर्मों के बीच टकराव की घटनाओं को देखते हुए जैसा कि पुलिस वालों के टारगेट किए जाने के भय की आषंका अभियोजन ने जताई, को साफ तौर पर नकारा नहीं जा सकता’। अभियोजन की यह दलील घोर आपत्तिजनक और पूरी तरह से साम्प्रदायिक है। यह पूरे मुस्लिम समुदाय को कलंकित करने के सुनियोजित प्रयास और उस मुस्लिम विरोधी मानसिकता का विस्तार है जो आतंक विरोधी अभियान के नाम पर मालेगाँव, मक्का मस्जिद, अजमेर, समझौता एक्सप्रेस आदि मामलों में पहले ही बेनकाब हो चुकी है। उससे भी अधिक चिन्ता का विषय विद्वान न्यायाधीष का अभियोजन की इस दलील से सहमति जताना है। इस सहमति के पीछे जो तर्क दिया गया वह यह है कि आज़मगढ़ प्रषासन ने कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए शहजाद के घर छापामारी की अनुमति देने से इंकार कर दिया था। परन्तु इस बात का संज्ञान नहीं लिया गया कि शहजाद को उसके घर से ही गिरफ्तार किया गया था और कोई तनाव नहीं पैदा हुआ और न ही छापामार दल के सदस्यों की जान को कोई खतरा ही। जब मिजऱ्ा शादाब बेग के घर पर कुड़की के आदेष का पालन करने के लिए गोरखपुर पुलिस आई तो आज़मगढ़ शहर के मुस्लिम बाहुल्य मुहल्ले में मात्र चार पुलिस कर्मियों ने सैकड़ांे स्थानीय निवासियों की मौजूदगी में शान्तिपूर्वक अपना काम सम्पन्न किया और स्थानीय लोगों ने उन्हें पूरा सहयोग दिया। यह बात सही है कि आज़मगढ़ के लोगों ने बड़े पैमाने पर आन्दोलन किया, आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों को फँसाने को लेकर यहाँ के लोगो में व्यापक असंतोष था, बगैर नम्बर प्लेट की गाडि़यों में आकर सादे कपड़ों में कार्रवाई करने समेत एस.टी.एफ. और ए.टी.एस. की गैर कानूनी कार्यषैली से लोगों में गुस्सा भी था परन्तु इसका यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि यहाँ कोई साम्प्रदायिक तनाव या कानून व्यवस्था की कोई समस्या उत्पन्न हो गई थी। यदि आज़मगढ़ प्रषासन स्थिति का सही आंकलन नहीं कर सका तो यह उसकी समस्या थी परन्तु उस आधार पर स्पेषल सेल के स्थानीय गवाहों को शामिल न करने की थ्योरी को सही नहीं ठहराया जा सकता। बटला हाउस इंकाउन्टर के बाद उसकी न्यायिक जाँच की माँग को सरकार ने ठुकरा दिया था। लेफटीनेंट गवर्नर दिल्ली ने मानवाधिकार आयोग के दिषा निर्देष के अनुसार इंकाउन्टर में मौत के बाद मजिस्ट्रेट द्वारा नियमित जाँच को भी रद कर दिया था। मानवाधिकार आयोग ने अपनी जाँच में पहले तो मुठभेड़ को सही बताया और दिल्ली विधान सभा के चुनाव में कांग्रेस को उसका लाभ भी मिला। बाद में आयोग ने उसे फजऱ्ी मुठभेड़ों की सूची में डाल दिया। बटला हाउस इंकाउन्टर को वैधता प्रदान करने और शहज़ाद को दोषी करार देने के अदालती फैसले से एक बार फिर 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को लाभ मिल सकता है। यदि बाद में उच्च न्यायालय के निर्णय में बदलाव आता है तो आयोग की वह सूची और सर्वदलीय बैठक में अन्य राजनैतिक दलों की आषंका जनता के दिमाग़ को अवष्य झिंझोड़ेगी। मो0-09455571488
मोहन चन्द्र शर्मा की हत्या आदि आरोपों का दोषी मानते हुए दिल्ली साकेत न्यायालय ने 30 जुलाई को खालिसपुर, आज़मगढ़ निवासी शहजाद अहमद को आजीवन कारावास और 95000 हजार रूपये जुर्माना की सजा सुनाई। फैसला आते ही भा.ज.पा. प्रवक्ताओं ने कांग्रेस पर बटला हाउस मामले में राजनीति करने को लेकर हल्ला बोल दिया। दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्षीद को पहले इस इंकाउन्टर पर सवाल उठाने के लिए न्यायालय के फैसले से सीख लेने और उसी आधार पर देष से माफी माँगने की माँग कर डाली। भा.ज.पा. प्रवक्ताओं ने उन मानवाधिकार संगठनों को भी निषाना बनाया जिन्होंने पहले इंकाउन्टर को फर्जी कहा था। हालाँकि यह फैसला निचली अदालत का है। यदि मामला ऊपर की अदालतों में जाएगा तो फैसला इससे उलट भी आ सकता है। लेकिन हैरत की बात है कि माननीय उच्चतम न्यायालय जब राजनीति को

-मसीहुद्दीन संजरी

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संघ और भा0ज0पा0 ने षिंदे के इस वक्तव्य पर अपनी राजनैतिक बिसात बिछाना शुरू कर दिया। बहुत साफ तरीके से इसे हिन्दुओं का अपमान बता कर भावनात्मक शोषण और नफरत की राजनीति का शंखनाद हो गया। हालाँकि अगर उन्होंने स्वंय आतंकवाद को धर्म से जोड़कर मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करने और उससे राजनैतिक लाभ उठाने की परम्परा कायम न की होती तो शायद आतंक के इस चेहरे के सामने आने के बाद भी इसे मात्र आतंकवाद ही कहा जाता। देष का सामाजिक ढाँचा भी और मजबूत होता और आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई भी। भा0ज0पा0 ने इतने ही पर बस नहीं किया उसने षिंदे के वक्तव्य पर हाफिज सईद की प्रतिक्रिया का भी भरपूर इस्तेमाल करने की कोषिष की। देष की अखंडता से जुड़े इस गम्भीर मुद्दे पर अपनी सांगठनिक वफादारी को कुर्बान कर देने के बजाए हाफिज सईद की बकवास के नाम पर आतंकवाद के इस दूसरे चेहरे को फिर से नकारने के प्रयास में लग गए। प्रचारित यह किया जाने लगा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का केस कमजोर हो गया। वास्तविक्ता तो यह है कि समझौता एक्सप्रेस धमाके के बाद लष्कर-ए-तैयबा और सिमी पर आरोप लगा कर इनकी संलिप्तता के जो सुबूत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को दिए गए थे वह झूठे और गढ़े हुए थे। बाद की तफतीष के नतीजे में होने वाली गिरफ्तारियों से उन प्रमाणों का दूर का भी कोई सम्बन्ध साबित न होने की वजह से हमारी विष्वसनीयता को गहरा आघात लगा था। परन्तु भा0ज0पा0 को इससे कोई आघात नहीं पहुँचा। उसने यह सवाल उस समय नहीं उठाया कि इससे आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई को नुकसान पहुँचा है। समझौता विस्फोट के मामले में पाकिस्तानी अधिकारियों की टिप्पणियों पर भी उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। इस बार भी संघ या भा0ज0पा0 को आतंकवाद के खिलाफ देष के अभियान के कमजोर पड़ने की चिन्ता नहीं है। दरअसल बौखलाहट उस हकीकत से है जिसका उल्लेख षिंदे ने पहली बार नाम लेकर कर दिया।
सवाल यह भी उठाया गया कि षिंदे ने यह बात 2014 के आम चुनाव के मद्दे नजर अल्पसंखयकों को लुभाने के लिए कही है परन्तु इससे सच्चाई तो नहीं बदल सकती। षिंदे के बयान और कांग्रेस सरकारों की आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों के साथ होने वाली ज्यादतियों के प्रति संवेदनहीन रवैयों को देखते हुए वक्तव्य के समय और कांग्रेस के दोगलेपन की आलोचना की जानी चाहिए। परन्तु इस बहाने से तथ्यों पर परदा डालने की कोई भी कोषिष निंदनीय है। सवाल यह भी है कि कांग्रेस सरकार के गृहमंत्री को अगर यह पता था कि धमाके करवा कर मुसलमानों को फँसाने का खेल खेला गया है तो उन्हें यह भी बताना चाहिए था कि उनकी सरकार ने इस सिलसिले में कौन से कदम उठाए हैं? आतंकवाद के आरोप में गिरफतार आरोपियों में कांग्रेस शासित प्रदेषों में धर्म के आधार पर भेदभाव क्यों हो रहा है? जिन स्थानों पर तफतीष से यह साबित हो चुका है कि धमाकों में उन बेकसूरों का हाथ नहीं था जिन्हें पहले गिरफ्तार किया गया था तो अब तक उनके ऊपर से मुकदमें उठा कर उनके पुनर्वास के लिए कुछ क्यों नहीं किया गया? महाराष्ट्र और केन्द्र में सरकार में होने के बावजूद नान्देड़, परभनी, जालना और पूरना के धमाकों की जाँच करवा कर इंसाफ क्यों नहीं किया गया? मामला इंसाफ करने और दोषियों पर षिकंजा कसने का नहीं है। बात वोट बैंक की है। सपा ने बेकसूर मुस्लिम नौजवानों को रिहा करने का वादा करके मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ लाने में सफलता पाई थी। कवायद बस इतनी है कि अखिलेष सरकार के वादा नहीं पूरा करने पर नाराज मुस्लिम मतदाता को अपनी ओर आकर्षित किया जाए। भा0ज0पा0 भी अपने उसी एजेन्डे पर है। आतंकवाद, मुसलमान, हाफिज सईद, पाकिस्तान किसी भी बहाने से ध्रुवीकरण हो और उसका लाभ उसे मिले, देष और समाज का उससे अहित होता है तो होता रहे।
षिंदे के वक्तव्य और संघ व भा0ज0पा0 की प्रतिक्रिया ने जो बहस छेड़ी है राष्ट्रीय स्तर पर इसकी आवष्यकता थी। इससे देष की सुरक्षा से जुड़े इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर जनता में सकारात्मक समझ विकसित होने का अवसर मिलेगा।
-मसीहुद्दीन संजरी

मोबाइल: 9455571488

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जयपुर चिन्तन शिविर के बाद आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के खुले अधिवेषन में गृहमंत्री सुशील कुमार सिंदे ने एक खुले रहस्य से परदा उठा दिया। एक ऐसा रहस्य जिससे देष पहले से वाकिफ था। एक ऐसा वक्तव्य जिससे एक वर्ग कांग्रेस के हृदय परिवर्तन से हैरान और उत्साहित हो गया। उसे लगा कि आतंकवाद के नाम पर उसके साथ जो अन्याय हो रहा था अब यह उसके अन्त का संकेत है। दूसरा वर्ग षिंदे के इस दुस्साहस पर आष्चर्यचकित, बौखलाया हुआ और आक्रोशित था। अपनी तीव्र प्रतिक्रिया से शायद वह देष को यह जताना चाहता था कि गृहमंत्री ने कोई नई और तथ्यहीन बात कह दी हो। भाजपा को सबसे अधिक आपत्ति हिन्दू आतंकवाद कहे जाने पर थी। राजनाथ सिंह ने भाजपा अध्यक्ष चुने जाते ही देषव्यापी आन्दोलन का एलान कर दिया और साथ ही यह कहा कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की माफी से कम कुछ भी मंजूर नहीं। माफी न माँगने पर संसद को भी न चलने देने की धमकी भी दे डाली। षिंदे के आरोप और भाजपा की प्रतिक्रिया ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे को दो तरफा चर्चा में लाकर खड़ा कर दिया। इस विषय पर बात करने से पहले यह जान लेना आवष्यक है कि षिंदे ने कहा क्या था?
खुफिया एजेंसियों का हवाला देते हुए षिंदे ने कहा उनके पास ऐसी रिपोर्ट आई है जिससे साबित होता है कि भाजपा और संघ अपने कैम्पों में आतंकवाद की ट्रेनिंग दे रहे हैं। (अमर उजाला, पेज-13, 21 जनवरी, 2013)। हमारे पास ऐसी रिपोर्ट आई है कि संघ के लोगों ने कई बम लगाए हैं। (दैनिक जागरण, पेज-3, 21 जनवरी 2013)। ‘षिंदे ने कहा कि आर0एस0एस0 और बी0जे0पी0 के लोग बम प्लांट करते हैं ताकि इसका दोष अल्पसंख्यकों पर मढ़ा जा सके‘। (अमर उजाला, पेज-13, 21 जनवरी 2013)। उन्होंने कहा कि हमें भाजपा के विष फैलाने वाले प्रचार को रोकना होगा। (अमर उजाला, पेज-13, 21 जनवरी 2013)। ‘बी0जे0पी0 या आर0एस0एस0 के लोग, उनके ट्रेनिंग कैम्प हैं जो हिन्दू दहषतगर्दी को फरोग दे रहे हैं। इस पर हमारी गहरी नजर है। (इंकलाब उर्दू, पेज-1, 21 जनवरी 2013)। ‘बवाल मचने पर बाद में सफाई देते हुए षिंदे ने कहा कि उन्होंने हिंदू आतंकवाद नहीं भगवा आतंकवाद कहा था। (अमर उजाला, पेज-13, 21 जनवरी, 2013)। भाजपा ने ‘हिंदू आतंकवाद‘ कहे जाने पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की। संघ प्रवक्ता राम माधव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़ना गलत है। सवाल यह है कि आतंकवाद को धर्म से जोड़ने की परम्परा का सृजन और जन-जन तक उसको पहुँचाने का काम भी तो भा0ज0पा0 और संघ के लोगों ने ही किया था। सर संघचालक से लेकर भजपा अध्यक्ष और इन संगठनों के तमाम पदाधिकारियों और नेताओं ने इस्लामी आतंकवाद कहने में कोई संकोच नहीं किया। इस्लामी आतंक, जेहादी आतंक, मुस्लिम आतंक, जेहादी साहित्य यह सब शब्दावलियाँ किसी और ने नहीं संघ और भा0ज0पा0 के लोगों ने ही प्रचारित की थीं। आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों की छवि को खराब करने का कोई भी अवसर कभी हाथ से नहीं जाने दिया। ऐसा वातावरण निर्मित हो गया कि आतंकवाद का मतलब ही मुस्लिम आतंकवाद हो कर रह गया था। ऐसे में आतंकवाद के इस देर से पहचाने गए चेहरे को जाहिर करने के लिए नए प्रतीक की जरूरत तो पड़नी ही थी। समय रहते यदि आतंकवाद को मात्र आतंकवाद समझने दिया गया होता तो उसके विरुद्ध अधिक प्रभावी तरीके से लड़ा जा सकता था। इतना ही नहीं आतंकवादी वारदातों में लिप्त आरोपियों के प्रति संघ परिवार और उस मानसिकता के लोगों ने साबित किया कि कोई डार्लिंग आतंकवादी है और कोई दुष्मन आतंकवादी, और इस भेदभाव का आधार भी धर्म ही था। एक पृष्ठभूमि के आरोपी की अदालत में पेषी के समय वकीलों द्वारा पिटाई का सामना और जेल में कैदियों के हमले का जोखिम तो दूसरे का फूलों से स्वागत और श्रद्वा भरी नजरों का नजराना। एक के लिए बार कौंसिलों द्वारा आतंकी का मुकदमा न लड़ने का फरमान और पैरवी करने वाले अधिवक्ताओं पर हमले तो दूसरे के लिए अच्छे वकीलों का प्रबंध और मुकदमा लड़ने के लिए समाचार पत्रों में विज्ञापन तथा आर्थिक सहायता की अपील। एक तरह के आरापियों का नाम आते ही फाँसी पर लटकाने की माँग और दूसरे की सिफारिष के लिए प्रधानमंत्री तक से मुलाकात तथा जाँच अधिकारियों पर भारी दबाव और
धमकियाँ। क्या इस आचरण से आतंकवाद के खिलाफ देष के अभियान को झटका नहीं लगा? आतंकवाद के नाम पर इन अनैतिक, गैरकानूनी एंव फिरकापरस्त कारगुजारियों का औचित्य ढूँढने वाले कौन लोग थे। निष्चित रूप से इसके पीछेे संघ और भा0ज0पा0 से जुड़े बडे़ नाम अवष्य मिल जाएँगे। आज यदि हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद की संज्ञा दी गई है तो यह पूर्व में आतंकवाद को इस्लामी या जेहादी नाम से जोड़ने का दुष्परिणाम ही तो है।
यह बात भी ढकी छुपी नहीं है कि संघ परिवार के कुछ संगठनों ने खुलेआम अपने कैम्पों में आधुनिक हथियारों को चलाने का सामूहिक प्रषिक्षण दिया है और उसकी तस्वीरें भी समाचार पत्रों में छप चुकी हैं। इसमें किसी अगर-मगर या किन्तु-परन्तु की कोई गुंजाइष नहीं है। रहा आतंकवाद के प्रषिक्षण का मामला तो संघ से जुड़े कई कार्यकर्ता बम बनाते और एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते समय विस्फोट में मरे और घायल हो चुके हैं। यह भी सही है कि मुसलमानों के खिलाफ नफरत और हिंसा की खुलेआम वकालत करते हैं। एस्थान, प्रतापगढ़ के दंगों के तुरंत बाद विष्व हिन्दू परिषद के प्रवीण तोगडि़या ने उस क्षेत्र से मुसलमानों को बल पूर्वक निकाल देने के लिए हिन्दुओं को ललकारा था। फैजाबाद में देवकाली मंदिर चोरी के मामले में योगी आदित्य नाथ ने मुसलमानों के खिलाफ जहर उगला और असम में मुसलमानों को कत्ल करने के लिए बोडो चरम पंथियों की जमकर तारीफ भी की। इस तरह फैजाबाद में उन दंगों की बुनियाद रखी जिसमें एक तरफा मुसलमानों के सैकड़ों दुकानें और मकान जला दिए गए। मध्य प्रदेष के जनपद ीरोंज के कस्बे दामोह में कहा ‘यदि हम इस देष के प्रधानमंत्री बन जाएँ तो सबसे पहले मुसलमानों से वोट का अधिकार छीन लेंगे। देष के किसी भी विधिक पद पर मुसलमानों को नहीं रहने देंगे‘। (अनुवाद उर्दू इनकलाब, 2, फरवरी, 2013 पेज-1)। ऐसे सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं। परन्तु हमारा मीडिया धड़ल्ले के साथ इन संगठनों को समाज का सेवक बनाकर प्रस्तुत करता है और शासन प्रषासन की आँखें इनकी तरफ से बन्द होती हैं। परन्तु अकबरुद्दीन ओवैसी यदि ऐसा कोई बयान दे दें तो पुलिस प्रषासन स्वयं नोटिस लेकर मुकदमा दर्ज करता है और तुरंत कार्रवाई होती है। वह मीडिया जो तोगडि़या और योगी जैसे लोगों की देष भक्ति के अलावा कुछ नहीं लिखता अचानक बड़ी-बड़ी खबरें छापने लगता है। दरअसल मीडिया में कुछ सफेद पोष भी वही काम कर रहे हैं जो मिषन योगी और तोगडि़या का है। षिंदे के बयान के समर्थन में बोलते हुए दिग्विजय सिंह ने हाफिज सईद को ‘साहब‘ कह दिया। बनारस से प्रकाषित होने वाले हिन्दी के एक समाचार ने 22, जनवरी को इस पूरे प्रकरण पर सम्पादकीय लिखा जिसमें कहा गया ‘आखिर षिंदे के बयान के बाद दिग्विजय सिंह का जमात उद दावा के प्रमुख और भारत में वांछित आतंकी हाफिज सईद के नाम का अदब से जिक्र करने का क्या मतलब है? यदि वाकई यह वोट बैंक की राजनीति नहीं है तो षिंदे के इस बयान की अभी जरुरत भी नहीं थी‘। यह बात बिल्कुल सही है कि इस बयान को बहुत पहले आना चाहिए था और मात्र बयान ही नही कार्रवाई भी होनी चाहिए थी। परन्तु शायद सम्पादक की यह मंषा नहीं थी। उनके हिसाब से यह बयान आना ही नहीं चाहिए था। इतना ही नहीं इसमें ऐसी भाषा का प्रयोग किया गया है कि सरसरी तौर पर पाठक को ऐसा लगे कि भगवा आतंक पर बयान देने और हाफिज सईद का नाम अदब से लेने से भारतीय मुसलमान खुष होता है

दूसरी महत्वपूर्ण बात जो षिंदे ने कही वह है धमाके को अंजाम देकर अल्पसंख्यकों के सिर आरोप मढ़ने की। नया इसमें भी कुछ नहीं है। अब यह बात पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। मालेगाँव, अजमेर, हैदराबाद और समझौता एक्सप्रेस धमाकों में इस साजिष का परदा फाष हो चुका है। जो कुछ बचा है वह सिर्फ इतना कि और कितनी आतंकी वारदातों में यह खेल खेला गया है। जमीनी वास्तविकता और निमेष आयोग की रिपोर्ट से उत्तर प्रदेष की कचहरियों में होने वाले सिलसिलेवार धमाकों में ऐसे ही षड्यंत्र की प्रबल आषंका बनती है। कचहरी धमाकोें के बाद प्रदेष के उच्च पुलिस अधिकारियों ने भी कहा था कि इन धमाकों और मक्का मस्जिद की वारदात में काफी समानताएँ हैं। कानपुर में बम बनाते समय होने वाले विस्फोट में विष्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के मारे जाने और भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री बरामद होने से यह साबित भी हो गया था कि ऐसे तत्व प्रदेष में मौजूद हैं। फिर भी तत्कालीन मायावती सरकार ने साम्प्रदायिक शक्तियों से साँठ-गाँठ करके इतने बड़े मामले पर फाइनल रिपोर्ट लगवा कर दफन करवा दिया। यही खेल कांग्रेस शासित महाराष्ट्र के नान्देड़ में किया गया था। यदि साम्प्रदायिकता और मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह अपनी भूमिका न अदा करता तो कोई कारण नहीं था कि नान्देड़ में बम बनाते समय संघ और उसके द्वारा संचालित अन्य संगठनों के सदस्यों के मारे जाने और घायल होने की घटना के बाद ही असली षड्यन्त्रकारियों के चेहरे से नकाब न उतर जाती। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि 5,अपैल 2006 के नान्देड़ धमाके के जिम्मेदार अपने अंजाम को पहुँचे होते तो उसके बाद उसी वर्ष 8, सितंबर को मालेगाँव घटना और सन् 2007 में 19, फरवरी को समझौता एक्सप्रेस, 18, मई को मक्का मस्जिद और 11, अक्तूबर को अजमेर दरगाह की आतंकी वारदातों को होने से रोका जा सकता था। लेकिन उस समय नान्देड़ की घटना को पहले पटाखा धमाका बता कर बन्द करने का प्रयास किया गया बाद में जिंदा बम बरामद होने पर यह थ्योरी खारिज हो गई। परन्तु जिंदा बम के साथ आमतौर पर मुसलमानों के वेषभूषा की सामग्री कुर्ता पाजामा, टोपी, नकली दाढ़ी आदि का बरामद होना इस बात का साफ संकेत था कि
धमाके करने के साथ साथ मुसलमानों के सिर आरोप मढ़ने की योजना भी उनके षड्यंत्र का हिस्सा थी। इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि यह सब एक बडे़ षड्यंत्र का हिस्सा था और षड्यंत्रकारियों का संघ से अहम रिष्ता भी। इन तत्वों द्वारा अंजाम दी गईं वारदातें देष के जितने बड़े भूभाग में फैली हुई हैं और इतने बड़े धमाकों के लिए जिस ताने बाने की आवष्यक्ता होगी उससे तय है कि यह काम मात्र दस बारह लोगों का ही नहीं था जिन्हें अब तक आरोपी बनाया गया है और न ही इस षड्यंत्र को उन्हीं वारदातों तक सीमित समझा जा सकता है जो अब तक सामने आ चुकी हैं। कम से कम 2006 और 2007 में देष में होने वाले अन्य धमाकों की भी इस दृष्टिकोण से जाँच होनी चाहिए थी। परन्तु ऐसा होना तो बहुत दूर स्वयं नान्देड़ की घटना की जाँच पहले ए0टी0एस0 उसके बाद सी0बी0आई0 ने ठंडे बसते में डाल दिया। ऐसा भी अकारण नहीं हुआ है। यदि संघ परिवार के पास सांगठनिक ताकत और भा0ज0पा0 के रूप में राजनैतिक शक्ति न होती और कांग्रेस के पास इच्छा शक्ति का अभाव न होता तो इतने बड़े-बड़े मामलों को बहुत आसानी के साथ दफन नहीं किया जा सकता था। अब गृहमंत्री श्री षिंदे ने नान्देड़ की घटना के साथ जालना, पूरना और प्रभनी की मस्जिदों में होने वाले विस्फोटों की जाँच एन0आई0ए0 को सौंप दी है। इस जाँच का अंजाम क्या होगा यह तो कहना मुष्किल है लेकिन जब तक इन घटनाओं की पिछली जाँचों में राजनैतिक दखलअंदाजी और उन्हें बन्द कर दिए जाने के कारणों को जाँच में शामिल नहीं किया जाता इसे पूर्ण नहीं माना जा सकता।
-मसीहुद्दीन संजरी

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उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जनता को बहुत आशाएँ थीं। देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक मुसलमान खास तौर से बहुत उत्साहित था। समाजवादी पार्टी द्वारा चुनाव पूर्व किए गए वादों को साकार होते हुए देखने के लिए वह व्याकुल था। चुनाव पश्चात पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से जब यह स्वीकार किया कि पार्टी को बहुमत दिलाने में प्रदेश के मुसलमानों का बहुत बड़ा योगदान है तो उसे इस बात का विश्वास हो चला कि अब उसकी कि़स्मत बदलने वाली है। प्रदेश में अब वह अमन चैन से जी सकेगा। आतंकवाद के नाम पर फँसाए गए निर्दोष युवकों की रिहाई का कोई रास्ता अवश्य निकल आएगा। अपनी सुरक्षा को लेकर उसकी असहजता और अनिश्चितता का दौर समाप्त हो जाएगा। शिक्षा, नौकरी और व्यवसाय में उसे पहले से अधिक अवसर मिल पाएँगे। परन्तु बेकसूरों की रिहाई का मार्ग प्रशस्त होने की बात तो दूर आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तारियों का सिलसिला भी नहीं थमा। मुसलमानों की सुरक्षा संबन्धी चिन्ताएँ और बढ़ गईं। दो महीने से भी कम समय में तीन बड़े दंगे और उसमें पुलिस प्रशसन के साथ-साथ नेताओं एंव मंत्रियों की संदिग्ध भूमिका तथा प्रदेश सरकार की संवेदनहीनता ने समूचे मुस्लिम समुदाय को सक्ते मंे ला दिया। उत्तर प्रदेश का वातावरण समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के उद्दंडता भरे ताजपोशी के पथ से होता हुआ सीधे साम्प्रदायिक्ता की गोद में चला गया। मस्जिदों पर हमले, मरम्मत के काम में रुकावट, कब्रिस्तानों की आराज़ी पर नाजायज़ कब्ज़ा, मदरसों में तोड़फोड़, दो व्यक्तियों के बीच के विवाद को साम्प्रदायिक रंग देना, और इसी प्रकार के छोटे मोटे मामलों को लेकर दो दर्जन से अधिक स्थानों पर तनाव की स्थिति है। साम्प्रदायिक शक्तियों के हौसले बुलंद हैं। वह बड़ी आसानी से माहौल को बिगाड़ रही हैं और सरकार का उनपर कोई अंकुश नहीं है।
मथुरा के कोसी कलां, जनपद प्रतापगढ़ के ग्राम एस्थान और बरेली के दंगों के त्वरित कारणों एवं उनसे निपटने के तौर तरीकों को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि यह दंगे पूर्वनियोजित और पूरी तरह से संगठित थे। शायद प्रशासन को भी पता था कि उन्हें कैसी भूमिका निभानी है। जून महीने के पहले ही दिन कोसी कलां में जुमा की नमाज़ अदा करने वालों के लिए मस्जिद के बाहर शर्बत रखा हुआ था। किसी शरारती तत्व ने पेशाब करने के बाद शर्बत के टब में हाथ धुल लिया। थोड़ी कहा-सुनी के बाद मामला रफ़ा दफ़ा हो गया। वह अपने रास्ते गया और मुसलमान नमाज़ पढ़ने चले गए। नमाज़ समाप्त होते ही मस्जिद पर पथराव शुरू हो गया। आधे घंटे के अन्दर भीड़ जमा होना और इतने व्यापक स्तर पर हिंसा का शुरू हो जाना इस बात का प्रमाण है कि तैयारी पहले से थी। मात्र इतना ही नही बल्कि कुछ ही घंटों के अंदर आस पास के गाँवों से भी लोगों की बड़ी भीड़ वहाँ पहुँच गई। क्या इससे यह संदेह नहीं होता कि सब कुछ पहले से तय था बस दंगाइयों को ज़रूरत थी खेल शुरू होने का समाचार पाने की? इसी प्रकार जनपद प्रतापगढ़ के ग्राम एस्थान में 20 जून को एक दलित बालिका के बलात्कार और हत्या की घटना होती है। इसमे चार मुस्लिम युवकों को नामज़द किया जाता है। आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो जाती है। घटना के तीन दिन बाद गाँव में कोई साम्प्रदायिक तनाव नहीं था। पकड़े गए युवक अपने को निर्दोष बताते रहे। बाद में समाचार पत्रों में यह खबर भी आई कि बलात्कार की घटना के दिन से दो साधू और गाँव के ही तीन युवक फरार हैं। फिर भी कथित आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद किसी हिंसात्मक प्रतिक्रिया का औचित्य नहीं रह जाता है। परन्तु 23 जून को एस्थान एवं आस पास के लगभग एक दर्जन गाँवों से आए हुए सैकड़ों दंगाइयों ने मुसलमानों के घरों को घेर कर आग के हवाले कर दिया। तीन दर्जन से अधिक मकान जल कर खाक हो गए। दंगाई माल मवेशी भी लूट कर ले गए। समाचारों के अनुसार दंगाइयों ने आग लगाने के लिए छः ड्रम मिट्टी के तेल का प्रयोग किया। जब पीडि़त जान बचाने के लिए एक मकान की छत पर इकट्ठा हो गए तो उस छत को गैस सिलेंडर से धमाका कर उड़ाने का प्रयास भी किया गया। क्या यह सब पूर्व योजना के बिना सम्भव था? 23 जुलाई की शाम को बरेली के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से ठीक नमाज़ के समय काँवरियों का जुलूस जाता है। जुलूस जैसे ही शाहाबाद के उस स्थान पर पहुँचता है जहाँ करीब में ही दो मस्जिदें़ हैं तो ज़ोर ज़ोर से गाना बजाना और नृत्य शुरू हो जाता है। नमाज़ का समय होने की बात कहने के बावजूद जत्था वहीं गाने बजाने की जि़द पर अड़ जाता है। अभी बातचीत का सिलसिला चल ही रहा था कि आस-पास की कुछ दुकानों पर पथराव शुरू हो जाता है। जुलूस का मुस्लिम मुहल्लों से होकर गुज़रना और एक खास स्थान पर रुक कर नमाज़ के समय गाने बजाने पर अड़ जाना किसी पूर्व योजना के बगैर सम्भव था?
दंगों के दौरान पुलिस प्रशासन की भूमिका बिल्कुल निष्क्रिय और मूक दर्शकों जैसी थी। कोसी कलां में दंगे की शुरुआत दिन में एक से दो बजे के बीच हुई और रात दस बजे तक दंगाई खुलेआम मुसलमानों के मकान और दुकान चुनचुन कर लूटते और जलाते रहे। पुलिस वहाँ मौजूद थी परन्तु दंगाइयों को खदेेड़ने का प्रयास करने के बजाय वह अपना बचाव करने का नाटक करती रही। आस-पास के गाँवों से दंगाई तो लूट मार करने कोसी कलां पहुँच गए लेकिन मथुरा प्रशासन अतिरिक्त पुलिस बल की व्यवस्था नहीं कर सका। एस्थान में दंगा दिन में ग्यारह बजे के आस-पास शुरू हुआ। एस्थान और करीब के लगभग एक दर्जन गाँवों से दंगाइयों ने सभी रास्ते बंद कर दिए। उसके बाद मुसलमानों के घरों को आग लगा दी। पुलिस प्रशासन के उच्च अधिकारियों समेत पुलिस बल तथा फायर ब्रिगेड के लोग घटना स्थल तक पहुँच ही नहीं पाए। नतीजे के तौर पर न तो दंगाइयों पर काबू पाने का प्रयास ही किया जा सका और न ही आग बुझाने की रस्म ही अदा हो पाई। हद तो यह है कि एक स्थान पर आठ दस महिलाओं ने पुलिस की एक कुमक को घंटों रोके रखा। यह सब कुछ दिन में ग्यारह बजे से शाम लगभग साढ़े चार बजे तक चलता रहा और पुलिस एवं प्रशासन के लोग दंगाइयों के चले जाने की प्रतीक्षा करते रहे। बरेली के शाहाबाद क्षेत्र में पथराव की घटना के बाद मामला शान्त हो गया था। परन्तु दो घंटे बाद दंगाइयों ने बाहर के कइ
क्षेत्रों मे लूटमार और आगज़नी शुरू कर दी। दो घंटे का समय मिलने के बावजूद प्रशासन स्थिति का सही आंकलन करने और उससे निपटने की व्यवस्था करने में पूरी तरह विफल रहा। इन तीनों घटनाओं में पुलिस एवं प्रशासन की निष्क्रियता और दंगाइयों के बुलंद हौसलों के साथ बेखौफ लूटमार करने से इस संदेह को बल मिलता है कि दंगाइयों की पीठ पर कुछ शक्तिशाली एंव प्रभावशाली लोगों का हाथ था।
कोसी कलां के दंगों के पीछे कथित रूप से बसपा एमएलसी लेखराज सिंह और उनके भाई लक्ष्मी नारायण सिंह की सक्रिय भूमिका थी और इन्हें समाजवादी पार्टी की जिला इकाई के कुछ प्रभावशाली नेताओं का समर्थन प्राप्त था। कोसी कलां दंगे में दर्जनों मकान और दुकान जला दिए गए, निर्दोषों की बेदर्दी के साथ हत्या कर दी गई, फिर भी कई दिनों तक सरकार द्वारा इसका संज्ञान न लिया जाना कई तरह की शंकाएँ पैदा करता है। घटना की नामज़द रिपार्ट होने के बावजूद कई दिनों तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। दस दिन बाद प्रदेश सरकार के काबीना मंत्री अहमद हसन का यह बयान अवश्य आया कि बलवा करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। परन्तु कुल मिलाकर प्रदेश सरकार का रवैया संवेदनहीन ही रहा। एस्थान में दलित बालिका के बलात्कार और हत्या की घटना के बाद तीन दिन तक शान्ति बनी रही। परन्तु 22 जून को समाजवादी पार्टी के स्थानीय एमपी शैलेन्द्र कुमार के एस्थान दौरे के अगले ही दिन दंगाइयों का उत्पात गहरा संदेह उत्पन्न करता है। शैलेंद्र कुमार को राजा भैया का करीबी बताया जाता है। बार-बार यह आरोप लगा है कि दंगे में राजा भैया के करीबी लोगों की सक्रिय भूमिका थी। दंगा पीडि़तों ने अबू आसिम आज़मी के एस्थान दौरे के समय राजा भैया के खिलाफ नारेबाज़ी भी की थी और स्वयं राजा भैया को अपने दौरे के वक्त उनकी खरी खोटी सुननी पड़ी थी। एक तरफ दंगा पीडि़तों को सुरक्षा के नाम पर कुंडा के पी0टी0 कालेज में ले जा कर बंद कर दिया गया ताकि उनकी आवाज़ मीडिया या बाहर के लोगों तक न पहुँच सके। दूसरी तरफ धारा 144 लागू होने के बावजूद भड़काऊ भाषण देने और अपनी मुस्लिम दुश्मनी के लिए विख्यात विश्व हिन्दू परिषद के प्रवीण तोगडि़या को पूरे दल बल के साथ एस्थान जाने की अनुमति दे दी गई। उसके उकसाने पर फिरकापरस्तों ने मुसलमानों के उसी दिन दस और घर जला दिए। हालाँकि एक दिन पहले ही स्थानीय लोगों ने इस प्रकार की आशंका जताई थी और कुछ समाचार पत्रों ने इस आशय का समाचार भी प्रकाशित किया था। सरकार में बैठे प्रभावशाली लोगों के आशीर्वाद के बिना स्थानीय प्रशासन इतना बड़ा जोखिम नहीं उठा सकता था। बरेली दंगों के एक सप्ताह बाद वहाँ दौरे पर गए समाजवादी सरकार के वरिष्ठ मंत्री शिवपाल यादव ने सर्किट हाउस में प्रेस से बात करते हुए स्पष्ट शब्दों मेें कहा था कि बरेली में दंगा भारतीय जनता पार्टी ने करवाए हैं। परन्तु दंगाइयों और दंगा भड़काने के लिए जि़म्मेदार व्यक्तियों या संगठनों के खिलाफ प्रदेश सरकार का रवैया इतना लचर क्यों रहा।
सम्भवतः यही कारण है कि कोसी कलां और एस्थान में मुसलमान आज भी दहशत मंे जीने पर मजबूर हैं। बरेली में कफ्र्यू समाप्त होने के बाद दंगा फिर से भड़क उठा। कफ्र्यू के कारण स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर भी बरेली वासी आज़ादी के एहसास से वंचित रहे। यदि कोसी कलां में दंगाइयों के साथ सख्ती से निपटा गया होता तो एस्थान और बरेली में इन तत्वों की ऐसा करने की हिम्मत न होती।
इन दंगों में कुछ ऐसी चीज़ें भी सामने आई हैं जिनपर काबू नहीं किया गया तो आने वाले समय में इसके परिणाम खतरनाक होंगे। एस्थान में गैस सिलेंडर से धमाका करने की घटना प्रदेश में प्रशिक्षित दंगाइयों की उपस्थिति का संकेत है। कोसी कलां के दंगे में दो लोगों को जि़ंदा जला देने की घटना देश में होने वाले संगठित और कुछ फासीवादी संगठनों द्वारा संचालित दंगों की ओर इशारा करती है। दंगों के शान्त हो जाने के बाद कोसी कलां के पीडि़तों को दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई की माँग और कानूनी लड़ाई से दूर रहने अन्यथा बुरे अंजाम की धमकी या फिर एस्थान में मुसलमान किसान पर अपने खेत में काम करते समय होने वाला हमला कुछ ऐसी घटनाएँ हैं जो गुजरात दंगों से मिलती जुलती हैं। उसके बाद प्रवीण तोगडि़या का एस्थान के लोगों को यह कहकर उकसाना इस तरह के संदेह को एक तरह से प्रमाणित करता है ‘मुसलमान इस क्षेत्र को खाली कर दें क्योंकि पुलिस उनको सुरक्षा नहीं दे सकती। पुलिस हमारी कार्रवाइयों को नहीं रोक सकती। हिन्दू इस क्षेत्र में हिन्दुत्व नगर की आधारशिला रखें और आस-पास के मुसलमानों को भागने पर मजबूर कर दें’। प्रवीण तोगडि़या का यह जहरीला भाषण और बरेली में शिवपाल यादव की प्रेस वार्ता ऐसा लगता है कि दोनों एक दूसरे को जानते भी हैं और समझते भी।
2014 के लोकसभा चुनावों में यदि समाजवादी पार्टी को अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखनी है तो उसे इस तरह की चुनौतियों का मज़बूती से सामना करना होगा। यदि प्रदेश सरकार साम्प्रदायिक और फासीवादी शक्तियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने से हिचकिचा रही है कि इससे हिन्दू नाराज़ हो जाएगा तो यह उसकी बड़ी भूल है। दंगाई और देश का आम हिन्दू दोनों को जोड़कर नहीं देखा जा सकता। न तो सरकार दंगाइयों को छूट देकर हिन्दुओं को अपने पक्ष में कर सकती है और न दंगा पीडि़तों की आर्थिक सहायता करके मुसलमानों की सहानुभूति ही प्राप्त कर सकती है। दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई और तोगडि़या जैसों पर अंकुश लगाने के बजाए भाजपा और संघ परिवार को बुरा भला कहकर मुसलमानों का दिल नहीं जीता जा सकता। कांग्रेस की यह चाल मुसलमान पहले ही पहचान चुका है। जिस प्रकार राम मंदिर के शिलान्यास का लाभ कांग्रेस के बजाए भाजपा को मिला था उसी तरह साम्प्रदायिक शक्तियों को छूट का लाभ भी समाजवादी पार्टी को कभी नहीं मिलेगा। हालाँकि दंगों की राजनीति अब प्रभावहीन होती जा रही हैं फिर भी यदि इस तरह के षड्यन्त्रों के सफल होने की कोई सम्भावना बनती है तो वह कांग्रेस के पक्ष में होगी न कि सपा के। कांग्रेस शासित असम के वर्तमान दंगों में अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। मुम्बई में असम और म्यांमार में मुसलमानों के नरसंहार के विरुद्व होने वाला प्रदर्शन हिंसक हो गया। आयोजक हैरान हैं कि लगभग शान्तिपूर्ण तरीके से समापन तक पहुँच गया कार्यक्रम अचानक हिंसा का शिकार कैसे हो गया। कार्यक्रम के अन्त में पचास साठ लोग कौन थे जो नारेबाज़ी करते हुए वहाँ पहुँचे थे। आयोजक सरकार से इसकी जाँच की माँग कर रहे हैं। परन्तु कांग्रेस की महाराष्ट्र सरकार ने घायल प्रदर्शनकारियों को ही आरोपी बनाना शुरू कर दिया। इस प्रकार कांग्रेस ने एक बार फिर साबित कर दिया कि खून और षड्यन्त्र के इस खेल में वह अब भी अन्य किसी भी सेकुलर दल से आगे है और सेकुलर होने की हैसियत से उसके जो भी लाभ हो सकते हैं उन पर उसका सबसे ज्यादा हक है।
-मसीहुद्दीन संजरी

मोबाइल: 09455571488

लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित

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आईबी सुरक्षा कवच

अबुल बशर


2008 के अगस्त महीने में आजमगढ़ के अबुल बशर की गिरफ्तारी और उसके बाद सपा अबू आसिम आजमी और इमाम बुखारी की खरेवां मोड़ सरायमीर पर की गई आम सभा और उसकेबाद बसर के घर पहंुच सान्त्वना देते हए इस जुल्म की खिलाफत करने के बयानों कीयाद दिलाते हुए मानवाधिकार नेता मसीहुद्दीन संजरी कहते हैं कि अब वक्त आ गयाहै कि सपा अपने दिए वादों को पूरा करे। तो वहीं बशर के भाई अबू जफर कहते हैं कि आखिर में जब भाई कि गिरफ्तारी 14 अगस्त 2008 को हई थी जिसकी खबर 15 अगस्त 2008 के अखबारों में भी आई थी और फिर पुलिस ने उन्हें 16 अगस्त को लखनउ से गिरफ्तार करने का दावा किया था तो ऐसे में आज सपा सरकार अपने वादे को पूरा करे और मेरे भाई कि गिरफ्तारी की जांच करवाए। अगस्त 2008 में आजमगढ़ से अबुल बशर की गिरफ्तारी के बाद उनके पिता अबू बकर ने बताया था कि “परसों कुछ गुण्डा बशर के घरे से अगवा कर ले gay तब हम पुलिस के इŸोला कइली त पुलिस हम लोगन से कहलस की आपो लोग खोजिए अउर हमों लोग खोजत हई मिल जाए। पर काल उहय पुलिस साम के बेला आइके हमरे घरे में जबरदस्ती घुसके पूरे घर के तहस नहस कइ दिहिस। हमके धमकइबो किहिस कि तोहार बेटा आतंकवादी ह अउर तोहरे घरे में गोला-बारूद ह। तलाशी के बाद पुलिस बसर के बीबी क गहना, गाँव वाले चंदा लगाके बसर के खोजे बिना पइसा देहे रहे उ अउर जात-जात चूहा मारे क दवइओ उठा ले गई। हमसे पुलिस वाले जबरदस्ती सादे कागद पर दस्खतो करइनन।’’ अबुल बशर की गिरफ्तारी के डेढ़ साल पहले उनके पिता को ब्रेन हैमे्रज हो गया था, एक बसर के सहारे पूरा घर था। बीनापारा गांव के लोग बताते हैं कि पिता के ब्रेन हैम्रेज के बाद बसर पर ही घर की पूरी जिम्मेदारी आ गई थी। इसीलिए वह कमाने के लिए आजमगढ़ के ही अब्दुल अलीम इस्लाही के हैदराबाद स्थित मदरसे में पढ़ाने चला गया था। बशर जनवरी 08 में गया था और फरवरी 08 में वापस आ गया था क्योंकि वहाँ 1500 रू॰ मिलते थे जिससे उसका व उसके घर का गुजारा होना मुश्किल था। दूसरा पिता की देखरेख करने वाला भी घर में कोई बड़ा नहीं था। इस बीच वह गाँव के बेलाल, राजिक समेत कई बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था। अबुल बषर के चाचा रईस बताते हैं कि 14 अगस्त 08 को 11 बजे के तकरीबन दो आदमी मोटर साइकिल से आए और बशर के भाई जफर की शादी की बात करने लगे। बशर ने घर में मेहमानों की सूचना देकर उनसे बात करने लगा। बात करते-करते वे बशर को घर से कुछ दूर सड़क की तरह ले गए जहाँ पहले से ही एक मारूती वैन खड़ी थी। मारूती वैन से 5-6 लोग निकले और बशर को अगवा कर लिया। अगवा करने वालों की स्कार्पियो, मारूती वैन और पैशन प्लस मोटर साइकिल पर कोई नम्बर प्लेट नहीं लगा था। इसकी सूचना हम लोगों ने थाना सरायमीर को लिखित दी। गांव वाले बताते हैं कि 13 मई 08 के जयपुर बम धमाके हों या 25-26 जुलाई 08 के हैरदाबाद और अहमदाबाद के बम धमाके, इस दौरान बशर गाँव में ही था और अपनी अपाहिज माँ और ब्रेन हैम्रेज से जूझ रहे पिता का इलाज करा रहा था। पूर्वी उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ जिला अबुल बशर की गिरफ्तारी के बाद उस दरम्यान जहाँ एक बार फिर चर्चा में आया था तो वहीं एक बार फिर एसटीएफ, एटीएस और आईबी की गैरकानूनी आपराधिक व झूठी कार्यवाही के खिलाफ पूरा जिला आन्दोलित हो गया था। पिछले दिनों जिस तरह सपा सरकार ने यूपी की कचहरियों में हुए बम धमाकों के आरोप में आजमगढ़ जिले से उठाए गए तारिक कासमी की बेगुनाही पर रिहाई की मंसा जाहिर की ऐसे में अबुल बसर का प्रकरण भी काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि जिस तरह एसटीएफ ने आजमगढ़ जिले से 12 दिसम्बर 07 को उठाए गए तारिक कासमी को आजमगढ़ से अगवा कर 22 दिसम्बर 07 को बाराबंकी से गिरफ्तार दिखाया ठीक उसी तरह अबुल बशर को भी उसके गाँव बीनापारा, सरायमीर से 14 अगस्त 08 को साढ़े ग्यारह बजे अगवा कर 16 अगस्त 08 को लखनऊ चारबाग इलाके से गिरफ्तार करने का दावा किया गया था। 15 अगस्त को विभिन्न अखबारों में छपी खबरंे एसटीएफ और एटीएस की इस ‘बहादुराना उपलब्धि’ को झूठा साबित करने के लिए काफी हंै। जिसमें पुलिस ने अहमदाबाद विस्फोटों में सिमी का हाथ होने का पुख्ता प्रमाण मिलने व मुफ्ती अबुल बषर को धमाकों का मास्टर माइंड बताते हुए सिमी का सक्रिय सदस्य बताया था।
ये बात और है कि आजमगढ़ खूफिया विभाग की सीक्रेट डायरी के अनुसार 2001 में सिमी पर प्रतिबंध के बाद उन्नीस लोगों की गिरफ्तारी के बाद अब तक किसी नए व्यक्ति का सिमी का सदस्य बनने का कोई जिक्र नहीं है। सवाल यहां यह है कि जब तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की इसी तरह की फर्जी गिरफ्तारी पर तत्तकालीन मायावती सरकार ने आरडी निमेष जांच आयोग का गठन किया था तो सपा सरकार क्यों नहीं अबुल बशर की गिरफ्तारी पर न्यायिक जांच का गठन करती है। यह जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि बशर की गिरफ्तारी को अहमदाबाद और यूपी एटीएस की संयुक्त गिरफ्तारी कहा गया था। ऐसे में यह जांच प्रदेश के उन आला पुलिस अधिकारियों की साम्प्रदायिक गठजोड़ को बेनकाब भी करेगी जो गुजरात की पुलिस के साथ उसका था। यहां बेगुनाहों को छोड़ने के साथ यह भी सवाल है कि अगर सपा सरकार मुसलामानों पर हुए जुल्मो के खिलाफ लड़ने की बात करती है तो उसे सूबे के ऐसे सांप्रदायिक प्रषासनिक अधिकारियों की शिनाख्त करनी होगी। जो जांच के बगैर संभव नहीं है। क्योंकि अबुल बशर को फसाए जाने में आईबी की भूमिका संदेह के घेरे में है। क्योंकि अबुल बशर प्रकरण में जावेद नाम का एक व्यक्ति मार्च 08 से ही बसर के घर आता था जो कभी बसर से मिलता था तो कभी बशर के पिता अबु बकर से और खुद को कम्प्यूटर का व्यवसायी बताता था और वह बिना नम्बर प्लेट की गाड़ी से आता-जाता था। जावेद, बशर के भाई अबु जफर के बारे में पूछता था और कहता था कि जफर को कम्प्यूटर बेचना है। अबु बकर ने बताया है कि बषर को अगवा किए जाने के बाद जावेद 16 अगस्त 08 की शाम छापा मारने वाली पुलिस के साथ भी आया था। तो वहीं बांस की टोकरी बनाने वाले पड़ोसी कन्हैया बताते है कि 14 अगस्त को बसर को अगवा किया गया तो अगवा करने वालों में दो व्यक्ति जो सिल्वर रंग की पैशन प्लस से थे वे गाँव में महीनों से आया जाया करते थे और वे इस बीच बषर के बारे में पूछते थे। ऐसे में खूफिया विभाग संदेह के घेरे में आता है कि जब महीनों से वह बशर पर निगाह रखे था तो वह कैसे घटनाओं को अंजाम दे दिया? मडि़याहूँ जौनपुर से उठाये गए खालिद प्रकरण में भी आईबी ने इसी तरह छः महीने पहले से ही खालिद को चिन्हित किया था। आतंकवाद के नाम पर की जा रही गिरफ्तारियों में देखा गया है कि कुछ मुस्लिम युवकों को आईबी पहले से ही चिन्हित करती है और घटना के बाद किसी को किसी भी घटना का मास्टर माइंड कहना बस बाकी रहता है। ऐसे में देखा जा रहा है कि एसटीएफ और एटीएस की आपराधिक व गैरकानूनी कारगुजारियों का आईबी सुरक्षा कवच बन गई है।

-राजीव यादव

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देश में जब भी कोई विस्फोट या आतंकी वारदात होती है तो भय और आक्रोश का माहौल पैदा हो जाता है। खास तौर पर उस भाग में जहाँ उग्रवाद या आतंकवाद की कोई समस्या नहीं है। घटना जिस शहर में होती है विशेष रूप से उस इलाके की भावनाएँ भड़की हुई होती हैं घटना के बाद खुफिया तन्त्र और सुरक्षा एजेन्सियों की विफलता पर जनता मंे रोष होता है, सरकार की जवाबदेही और आतंकवाद से निबटने में उसकी इच्छा शक्ति पर सवाल उठने लगते हैं। देश की जनता घटना को अंजाम देने वाले आतंकियों और उनके संगठन के बारे में जानना चाहती है, जाहिर सी बात है कि अपनी इस जिज्ञासा की पूर्ति के लिए वह लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ मीडिया की ओर आकृष्ट होती है। इलेक्ट्रानिक चैनलों पर सनसनीख़ेज़ जानकारियाँ तुरन्त मिलने लगती हैं परन्तु ग्रामीण अंचलों में जहाँ दो तिहाई भारत बसता है, के लोग शायद इतने खुश किस्मत नहीं हैं। आकाशवाणी समाचारों में ऐसी घटनाओं की विस्तृत या यूँ कहा जाए कि अपुष्ट सूत्रों के हवालों से जन उपयोग की खबरों का प्रायः अभाव ही रहता है। इसी वजह से इस क्षेत्र के लोगों की समाचार पत्रों पर निर्भरता बढ़ जाती है। निजी सूत्रों के अतिरिक्त विश्वस्त सूत्रों, विशेषज्ञों, जानकारों, खुफिया एवं सुरक्षा
अधिकारियों को उद्धृत करते हुए उत्तेजनात्मक खबरों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह दैनिक समाचार पत्रों का बेसब्री से इन्तजार रहता है। परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ के इस महत्वपूर्ण अंग में कई बार जनता तक सच्ची और रचनात्मक खबरें पहुँचाने के दायित्व के निर्वाह से ज्यादा बाजारवाद के तकाजों को पूरा करने की चेष्टा और पूरे घटनाक्रम को एक खास दिशा देने की कवायद नजर आती है। इसी के चलते तथ्यात्मक समाचारों में स्पष्ट भिन्नता और अनुमानित समाचारों में अद्भुत समानता देखने को मिलती है।
वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर शीतला माता मन्दिर के सामने 7 दिसम्बर सन् 2010 की शाम कपूर आरती आरम्भ होने से ठीक पहले होने वाले धमाके ने मासूम स्वस्तिका की जान ले ली और बाद में गम्भीर रूप से घायल इतालवी नागरिक की भी अस्पताल में मृत्यु हो गईं। इस घटना के बाद वाराणसी से प्रकाशित होने वाले प्रमुख समाचार पत्रों के अगले संस्करणों में इस घटना से सम्बन्धित समाचारों पर एक नजर डाली जाय तो उक्त कथन की पुष्टि होती है। विस्फोट में जान गँवाने वाली एक साल से भी छोटी बच्ची को आने वाली चोटों के समाचार कुछ इस प्रकार
थे:-………धमाकों मे एक वर्षीय बच्ची तारिका शर्मा की मृत्यु हो गई। (हिन्दुस्तान 8 दिसम्बर पृष्ठ नं0 1)……. इसमें एक साल की स्वस्तिका की मौत हो गई उसकी कमर से नीचे का पूरा हिस्सा उड़ गया था।
(अमर उजाला 8 दिसम्बर पृष्ठ नं0 1)………. एक पत्थर का टुकड़ा तेजी से स्वस्तिका के सिर पर लगा, खून का फौव्वारा फूट पड़ा, भगदड़ मच गई। माँ जब तक उसे लेकर पार्क पहुँचती उसकी मृत्यु हो गई। (दैनिक जागरण, 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 7)….. इसी प्रकार घटना स्थल पर सी0सी0 कैमरा था अथवा नहीं, दो अलग-अलग अधिकारियों के हवाले से परस्पर विरोधी समाचार प्रकाशित हुए तो घटनास्थल पर पाए जाने वाले अवशेषों को लेकर भी समाचारों मंे समानता देखने को नहीं मिलती। ए0डी0एम0 अटल कुमार राय ने बताया कि अधिकारी घटनास्थल के सी0सी0, पी0डी0 फुटेज की जाँच कर रहे हैं। (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ 10)……… शुक्रवार को उन्होंने (ए0डी0जी0 कानून व्यवस्था वृजलाल) पत्रकारों से बात करते हुए बताया कि शीतला घाट पर सी0सी0 कैमरे नहीं थे। इस लिए घटना से पहले और बाद के फुटेज जुटा कर छान बीन की जा रही है (दैनिक जागरण 11 दिसम्बर पृष्ठ नं0 9) घटनास्थल पर पाए जाने वाले अवशेषों के सम्बन्ध में श्री अटल कुमार राय के हवाले से अमर उजाला लिखता है…….. राय ने बताया कि आगरा से फोरेन्सिक विशेषज्ञों के एक दल ने घटना स्थल के नमूने लिए है। इस बार मौके से छोटे से वायर और प्लास्टिक के टुकड़े के अलावा कोई भी अवशेष नहीं मिला जिसके आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सके। (दैनिक जागरण 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 1)……. आतंकी विस्फोट की जाँच के दौरान तार के एक टुकड़े से सुराग की तलाश की जा रही है………। एजेन्सियाँ इस विस्फोट के बाद मौके पर अवशेष न मिलने पर हैरत में हैं (हिन्दुस्तान 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 7)।
वाराणसी विस्फोट के बाद संजरपुर लगातार सुर्खियों में रहा। 19 दिसम्बर 2008 की बटाला हाउस घटना के बाद से ही यहाँ के लोग हर आतंकी वारदात के बाद संजरपुर और आजमगढ़ को घसीटे जाने को लेकर आशंकित रहते हैं। यह आशंका स्वाभाविक भी है क्योंकि पूना जर्मन बैकरी धमाके के पश्चात जनपद के कुछ लापता युवकों का नाम उछाला गया था। गत सितम्बर में दिल्ली जामा मस्जिद गोलाबारी काण्ड को भी इण्डियन मुजाहिदीन से जोड़ते हुए आतिफ और साजिद की शहादत के बदले के तौर पर प्रस्तुत किया गया था। बनारस विस्फोट के बाद भी इण्डियन मुजाहिदीन के ईमेल के साथ ही मीडिया में संजरपुर के सम्बन्ध में खबरें छपने लगीं। यहाँ के वातावरण और ग्राम वासियों की प्रतिक्रिया को लेकर जो समाचार छपे वे कुछ इस प्रकार थे…………… ग्रामीणों के चेहरे के भाव ऊपर से पूरी तरह सामान्य पर अन्दर से असहज। ग्रामीणों ने कहा कि विस्फोट कहीं भी हो मगर उसके तार आजमगढ़ के संजरपुर से जोड़ दिए जाएँ तो हमारे लिए कोई चैकाने वाली बात नहीं। अब तो हम लोग यह सब सुनने के आदी हो गए हैं। (दैनिक जागरण 9 दिसम्बर आज़मगढ़)…………… सुबह-शाम गुलज़ार रहने वाले संजरपुर के चट्टी चैराहों पर सन्नाटा छा गया। दहशत का आलम यह है कि अभिभावक अपने बच्चों को घर से बाहर नहीं निकलने दे रहे हैं (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ 2 अपना शहर आज़मगढ़)। हिन्दुस्तान में इस विषय पर उस दिन कोई रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुई थी। शायद यही कारण था कि प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अगले दिन हिन्दुस्तान टीम के हवाले से जो रिपोर्ट छपी उसका शीर्षक था पुलिसिया भय से संजरपुर वासी कर रहे पलायन। पत्र आगे लिखता है…….. बनारस विस्फोट में नाम जुड़ने से लोगों के माथे पर चिन्ता की लकीरें खिंच गईं यहाँ के निवासी पलायन कर रहे हैं। गुलजार रहने वाली चट्टी चैराहों पर सन्नाटा पसरा जा रहा है। लोग घरों मंे इस तरह दुबके हैं जैसे कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो (हिन्दुस्तान 10 दिसम्बर पृष्ठ नं0 3 आजमगढ़)।

लगभग सभी समाचार पत्रों में यह खबर भी छपी थी कि गाँव में प्रवेश करने वाले वाहनों को देख कर ग्रामवासी सहम जाते हैं। शायद पत्रकार बन्धुओं ने इसका अर्थ यह निकाला कि ए0टी0एस0 या किसी सुरक्षा एजेंसी के लोगों के आने की आशंका को लेकर सन्देह और भय के कारण ऐसा होता है। परन्तु इस असहजता का एक बड़ा कारण आरोपी युवकों और गाँव के प्रति स्वयं मीडिया का रवैया भी रहा है। ग्रामवासियों में यह आम धारणा है कि पत्रकार बन्धु कितनी ही लुभावनी और सहानुभूतिपूर्ण बातें करें पर छपने वाले समाचार एक पक्षीय और समुदाय विशेष के लोगों की छवि को धूमिल करने वाले ही होते हैं।
बनारस धमाके के बाद जब कुछ पत्रकारांे ने ए0टी0एस0 वालों से गाँव में आने के बाबत सवाल किया तो कई लोगों ने उन्हें बताया कि मंगलवार 7 दिसम्बर को दिन में 10-11 बजे के बीच चार से पाँच अज्ञात लोग जो किसी एजेन्सी से सम्बन्धित लगते थे संजरपुर बाजार में घूमते हुए देखे गए थे। उनके पास कुछ फोटो भी थे। परन्तु किसी समाचार पत्र ने बनारस धमाके से पहले इन अज्ञात लोगों की गतिविधियों का समाचार नहीं प्रकाशित किया। बटाला हाउस काण्ड के बाद से कई अवसरों पर ऐसे समाचार प्रकाशित हुए जो मनगढ़ंत, घोर आपत्तिजनक और वास्तविकता से कोसों दूर थे। गाँव के लोग उस समाचार को अब भी नहीं भुला पा रहें हैं जिसमें कहा गया था कि आतिफ और सैफ के बैंक खातों से बहुत ही अल्प अवधि में तीन करोड़ रूपयों का लेन देन हुआ है। हालाँकि यह समाचार बिल्कुल ही निराधार और झूठा था और इस आशय का प्रमाण भी पत्रकारों को दिया गया परन्तु किसी ने अब तक इसका खण्डन नहीं किया। शायद इन्हीं कारणों से पत्रकार ग्रामवासियों का विश्वास नहीं जीत पा रहें हैं और ग्रामवासी जब उन्हें देखकर असहज होते हैं तो पत्रकार उसका अलग अर्थ निकालते हैं………………….।
ये वे समाचार थे जिन्हें देखा और परखा जा सकता है तथा इनकी सत्यता को प्रमाणित भी किया जा सकता है इसी वजह से हमने इन्हें तथ्यात्मक समाचारों की श्रेणी में रखा है। परन्तु आश्चर्य की बात है कि इनमें स्पष्ट भिन्नता मौजूद है जिसे बहुत आसानी के साथ महसूस किया जा सकता है। दूसरी ओर वे समाचार हैं जिनका सम्बन्ध घटना के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और उनके संगठन से है। यह जाँच का विषय है और जब तक कोई स्पष्ट संकेत न मिल जाय कोई भी समाचार सम्भावना और अनुमान की परिधि से बाहर नहीं जाना चाहिए। परन्तु समाचार माध्यमों ने इस लक्ष्मण रेखा को बार-बार पार किया है। वाराणसी धमाके के बाद भी आई0एम0 संजरपुर और आजमगढ़ को लेकर जिस तरह भावनात्मक समाचारों का प्रकाशन देखने को मिला वह बटाला हाउस काण्ड के पश्चात शुरू हुए मीडिया ट्रायल के विस्तार जैसा लगता है। 7 दिसम्बर को लगभग साढ़े 6 बजे
दशाश्वमेध घाट पर विस्फोट होता है। कथित रूप से आधे घंटे के बाद 7 बजे शाम को घटना की जिम्मेदारी लेने वाले आई0एम0 का ईमेल आता है। इसी ईमेल के आधार पर मुम्बई पुलिस आयुक्त संजीव दयाल की पत्रकार वार्ता के अंश सभी समाचार पत्रों में घटना के तीसरे दिन 9 दिसम्बर को प्रकाशित हुए जिसमें उनका कहना था…………. बनारस धमाके की जिम्मेदारी लेने वाले आई0एम0 के आका इकबाल भटकल और रियाज भटकल पाक में हैं (हिन्दुस्तान 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 1)।……….. लेकिन निश्चित तौर पर इण्डियन मुजाहिदीन के मुख्य खिलाड़ी पाकिस्तान में बैठे हैं और वहीं से आतंक का खेल चला रहे हैं। यह पूछने पर कि मुख्य खिलाड़ी से उनके क्या मायने हैं? दयाल ने कहा निश्चित तौर पर भटकल बन्धुओं से (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 6)। मुम्बई पुलिस आयुक्त का इण्डियन मुजाहिदीन और भटकल बन्धुओं पर इस आरोप का आधार आई0एम0 द्वारा भेजा गया ई-मेल था। हालाँकि ई-मेल जाँच की दिशा को भटकाने के लिए भी भेजा जा सकता है। इस पर हम बाद में चर्चा करेंगे, पहले घटना से सम्बन्धित अन्य समाचारों पर, जिनका सिलसिला विस्फोट के अगले दिन से ही शुरू हो गया, इण्डियन मुजाहिदीन का ई-मेल उसका स्रोत नहीं हो सकता।
7 दिसम्बर को लगभग साढ़े 6 बजे शाम को विस्फोट के बाद समाचार पत्रों के प्रकाशन में मुश्किल से चार घण्टे का समय रह जाता है। चारांे ओर अफरा-तफरी और अफवाहांे का माहौल है। इण्डियन मुजाहिदीन के ई-मेल के अलावा कोई दूसरा सुराग नहीं है और उस ई-मेल की प्रमाणिकता की जाँच अभी होना बाकी है। घटना स्थल पर कोई अवशेष न पाए जाने के कारण जाँच का रुख भी तय नहीं हो पा रहा है ऐसी स्थिति में जब कि समाचारों के प्रकाशन में चार घण्टे से भी कम समय है, फिर भी अगले दिन के समाचार पत्रों में घटना को अंजाम देने वाले सम्भावित कई संगठनों का नाम आया, उस में इण्डियन मुजाहिदीन के साथ आजमगढ़ की ओर भी उँगली उठाई गई। खास बात यह है कि उन्हीं संगठनों को शक के दायरे में रखा गया जिनसे मुस्लिम समुदाय पर ही आरोप आता हो। ………………. वैसे तो हाल फिलहाल अधिकारी हूजी और सिमी पर शक कर रहे हैं परन्तु इसमें लश्कर के हाथ होने का भी सन्देह है (हिन्दुस्तान 8 दिसम्बर पृष्ठ नं0 15)। उसी दिन के दैनिक जागरण में आजमगढ़! पूर्वांचल (पृष्ठ 7) पर दो बड़ी खबरें छपीं। एक का शीर्षक है, ‘‘आतंकियों का ठिकाना रहा है आजमगढ़’’ और दूसरे का (शक की सुईं जनपद के फरार आतंकियों पर) पत्र आगे लिखता है………………… रात 9 बजे जिन संदिग्ध लोगों को पुलिस ने वाराणसी मंे हिरासत में लिया हैं और जो कागजात उनके पास से मिले हैं, उससे यह आशंका और मजबूत हो गई है कि विस्फोट के तार आजमगढ़ से जुड़े हैं। सूचनाओं के बाद ए0टी0एस0 की एक टीम आजमगढ़ के लिए रवाना हो चुकी है। अमर उजाला की उसी दिन पृष्ठ नं0 14 पर हेड लाइन है-छः आतंकी अब भी फरार, कचहरी ब्लास्ट के आरोपी हैं दो आतंकी, इसी के साथ पिछले कुछ धमाकों और आजमगढ़ के गिरफ्तार और लापता युवकों की खबरें भी हैं। परन्तु उन धमाकांे का उल्लेख कहीं नहीं किया गया है जिनमें पहले सिमी. या हूजी जैसे संगठनों पर आरोप लगा था और अन्धाधुन्ध तरीके से मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार भी किया गया था लेकिन बाद में अभिनव भारत, सनातन संस्थान तथा संघ व उससे जुड़े अन्य संगठनों के सदस्यों के नाम प्रकाश में आए। उनमें से कई अब जेल में हैं और कई लापता। एक समाचार और, जो प्रमुखता से सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ वह था भाजपा के बनारस बन्द का। भाजपा की यह प्रतिक्रिया जिस तीव्रता के साथ आई उससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह इसके लिए पहले से तैयार थी। इतने कम समय में घटना की पूरी जानकारी जुटा पाना आसान नहीं वह भी आतंकी विस्फोट जैसे गम्भीर मुद्दे पर।

यदि हम इसके बाद के समाचारों को देखें तो यह आभास होता है कि इण्डियन मुजाहिदीन के बहाने से संजरपुर और आजमगढ़ को टारगेट करने का एक अभियान चल पड़ा है। हालाँकि पहले ही दिन जिस प्रकार से आजमगढ़ का नाम आया उससे यह लगने लगा था कि कोई अज्ञात शाक्ति जाँच की दिशा को आजमगढ़ की ओर मोड़ने का प्रयास कर रही है। वह सिलसिला कुछ इस प्रकार आगे बढ़ता है:- ‘‘आजमगढ़ से जुड़ रहे हैं वाराणसी विस्फोट के तार, दिल्ली पुलिस को शक विस्फोट में फरार आतंकी डाॅ0 शहनवाज और असदुल्ला पर’’ शीर्षक से अमर उजाला लिखता है…………. ए0टी0एस0 ने दिल्ली पुलिस की थ्योरी को जाँच में शामिल कर लिया है (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 6) उसी दिन के हिन्दुस्तान ने सीधे डाॅ0 शाहनवाज या अन्य किसी पर शक की सूईं नहीं घुमाई, परन्तु ‘‘नजरें फिर इण्डियन मुजाहिदीन पर’’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में डाॅ0 शाहनवाज के नाम को हाई लाइट करने का प्रयास अवश्य मालूम होता है। पत्र लिखता है- 9 आरोपित पहले की वारदातों के बाद एजेंसियों के हत्थे चढ़ चुके हैं लेकिन डाॅ0 शाहनवाज सहित 7 आरोपित सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं………….।

गिरफ्तार किया गया मो0 सैफ डाॅ0 शाहनवाज का छोटा भाई है। डाॅ0 शाहनवाज के बारे में जो जानकारी है उसके अनुसार 2006 में बिहार के सीवान जिले से बी0यू0एम0एस0 की डिग्री प्राप्त कर लखनऊ के मेयो अस्पताल में काम कर चुका है लेकिन 13 सितम्बर 2008 को दिल्ली ब्लास्ट के बाद से फरार है (हिन्दुस्तान 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 3 आजमगढ़)। 9 दिसम्बर को दैनिक जागरण ने अपने पहले पृष्ठ पर जो खबर छापी है उसमें तो लगभग डाॅ0 शाहनवाज को बनारस विस्फोट का आरोपी बना ही दिया है। समाचार पढ़ने पर किसी को भी यही आभास होगा कि मामला हल हो चुका है बस आधिकारिक घोषणा ही बाकी है। शीर्षक है- शाहनवाज का नाम आते ही सक्ते में संजरपुर, खुफिया एजेंसियों ने शक की सुईं यहाँ के डाॅ0 शाहनवाज की तरफ घुमाई है। हालाँकि यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया कि शाहनवाज कौन और कहाँ का रहने वाला है।………. वैसे खुफिया सूत्रों की मानें तो डाॅ0 शाहनवाज ही मंगलवार की शाम वाराणसी में गंगा आरती के समय हुए विस्फोट का सूत्रधार है और वह संजरपुर का ही रहने वाला है। डाॅ0 शाहनवाज के बारे में आई0बी0 के हवाले से वाराणसी विस्फोट के पहले और बाद में भी यह समाचार छप चुका है कि वह शारजह पहुँच गया है। कितनी विचित्र बात है कि यहाँ उसके सम्पर्क सूत्रों का पता लगाने से पहले ही उसे सूत्रधार घोषित कर दिया गया। इस प्रकार के समाचार जाँच एजेंसियों के लिए निमन्त्रण जैसे लगते हैं कि कहीं भटकने की जरूरत नहीं है। संजरपुर और आजमगढ़ चले आइए गुत्थी सुलझ जाएगी। इन समाचारों की विश्वसनीयता का अन्दाजा दैनिक जागरण में प्रदेश सरकार के हवाले से प्रकाशित उस समाचार से किया जा सकता है जिसका शीर्षक है ‘‘अहम सुराग के लिए जी तोड़ मशक्कत’’, पत्र आगे लिखता है……… प्रदेश सरकार ने माना कि वाराणसी में मंगलवार को हुए आतंकी विस्फोट को लेकर उसे कोई सुराग नहीं मिल पाया है………… घटना को अंजाम देने वाले संगठन की पहचान नहीं हो सकी है…….. घटनास्थल से बैटरी रिमोट कंट्रोल डिवाइस एवं छर्रे भी नहीं मिले हैं…………. बृजलाल ने पत्रकारों को बताया कि ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला है जिससे पुख्ता तौर पर किसी आतंकी संगठन का नाम लेकर कहा जा सके कि उसने घटना को अंजाम दिया है……….. रासायनिक जाँच करके यह पता लगाया जाएगा कि विस्फोट को अंजाम देने वाला आतंकी संगठन कौन सा हो सकता है।………. वाराणसी विस्फोट के पीछे डाॅ0 शाहनवाज की भूमिका होने के बाबत पूछे गए सवाल पर उन्हांेने कहा कि विस्फोट में डाॅ0 शाहनवाज शामिल था या नहीं इस बारे मंे अभी तक कोई सुबूत नहीं मिले हैं और न ही ए0टी0एस0 ने पूछ-ताछ के लिए किसी को उठाया है (दैनिक जागरण 9 दिसम्बर पृष्ठ 11)।
ए0डी0जी0 उ0प्र0 के उपर्युक्त स्पष्ट बयान से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि किसी संगठन, व्यक्ति या स्थान विशेष का नाम लेकर उस समय तक प्रकाशित सभी समाचार आधारहीन थे। इसे मात्र कयास या अनुमान ही कहा जा सकता है। परन्तु इस आशय की खबरों को लेकर जिस प्रकार सभी अखबारों में समानता पाई जाती है उस पर सवाल उठना लाजिमी है कि वे अधिकारी, सुरक्षा एजेंसियाँ या खुफिया सूत्र कौन से हैं जिनको उद्धृत करके यह एक तरफा समाचार प्रकाशित हुए और लगभग सभी समाचार पत्रों में इन्हीं सूत्रों के हवाले से छपे। यह मात्र संयोग नहीं हो सकता। इसके पीछे अवश्य कुछ शक्तियाँ हैं जो लगातार समाचार माध्यमों को एक ही प्रकार के इनपुट्स देती रही हैं ताकि जाँच कोे एक खास दिशा दी जा सके। 9 दिसम्बर को इन सभी समाचार पत्रों ने वाराणसी विस्फोट पर सम्पादकीय भी लिखे हैं जो काफी संतुलित हैं।
इसकी सराहना इस लिए भी की जानी चाहिए कि इसमें ए0डी0जी0 कानून व्यवस्था के बयान की झलक भी है और निष्पक्ष जाँच के लिए प्रेरित करने की सामग्री भी। इसके बावजूद डाॅ0 शाहनवाज, संजरपुर और आजमगढ़ को लक्ष्य बनाकर छपने वाली खबरों का सिलसिला जारी रहा। अमर उजाला 10 दिसम्बर पृष्ठ 2 आजमगढ़ में ‘‘शाहनवाज संग तीन अन्य संदिग्धों की तलाश’’ शीर्षक से लिखता है………. मंगलवार को हुए आतंकी विस्फोट के मामले में आजमगढ़ के डाॅ0 शाहनवाज के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी होने के बाद से यहाँ उसके सम्पर्कों की तलाश शुरू हो गई है। गुरुवार की शाम तीन संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है जिनसे किसी अज्ञात स्थान पर पूछ ताछ चल रही है।
(धमाके में आई0एम0 के स्लीपर एजेन्ट का इस्तेमाल सम्भव) शीर्षक से हिन्दुस्तान (10 दिसम्बर पृष्ठ 10) लिखता हैं…………. वाराणसी में हुए बम धमाके को लेकर खुफिया विभाग (आई0बी0) के हाथ पूरी तरह खाली हैं। आई0बी0 को अभी पुख्ता तौर पर यह पता नहीं है कि बम धमाके को अंजाम किस आतंकी संगठन ने दिया है और उसका उद्देश्य क्या है।…………. कामन वेल्थ खेलों से पहले मिले इनपुट्स के आधार पर दिल्ली पुलिस के अधिकारी मान रहे हैं कि इसके पीछे इण्डियन मुजाहिद (आई0एम0) का हाथ हैं, हालाँकि इस मामले में अभी तक दिल्ली पुलिस के हाथ में कुछ नहीं है।

अगर इन सभी समाचारों का विश्लेषण किया जाय तो कई प्रकार के सवाल खड़े होते हैं। पहला तो यह कि डॉक्टर शाहनवाज और असदुल्ला को धमाके से जोड़ने का आधार क्या है? यदि इण्डियन मुजाहिदीन के ईमेल को आधार माना जाय तो आरोप रियाज भटकल और इकबाल भटकल पर जाता है जैसा कि मुम्बई पुलिस आयुक्त के बयान से जाहिर होता है। दिल्ली पुलिस को कामन वेल्थ खेलों से पहले अगर कोई इनपुट्स मिले थे तो उँगली इण्डियन मुजाहिदीन पर जरूर उठती है परन्तु उक्त दोनांे युवकों को इस आधार पर जिम्मेदार मानने का कोई कारण नहीं दिखाई देता। इसके अतिरिक्त देश की सुरक्षा से जुड़ी इस महत्वपूर्ण जानकारी से दिल्ली पुलिस ने उ0प्र0 पुलिस को उस समय आगाह क्यों नहीं किया? दिल्ली पुलिस की बगैर किसी सुबूत के डाॅ0 शाहनवाज और असदुल्ला का नाम धमाके से जोड़ने में दिलचस्पी के अपने कारण हो सकते हैं। बटाला हाउस काण्ड को लेकर उठने वाले सवाल और बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा उसे फर्जी मुठभेड़ों की सूची में शामिल किए जाने पर अपने केस को पुख्ता बनाने के लिए, वहाँ आरोपी बनाए गए युवकों के खिलाफ उनके आतंकवादी

गतिविधियों में लिप्त होने के नवीन पूरक साक्ष्यों की जरूरत है। वाराणसी विस्फोट में डाॅ0 शाहनवाज या असदुल्ला को आरोपी बनाए जाने की सूरत मंे उसकी राह आसान हो सकती है। इसके अलावा अमर उजाला में चण्डीगढ़ से आशीष शर्मा की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है (कराँची में रियाज और शारजाह में शहनवाज ने मिल कर रची साजिश) ब्लास्ट के पीछे गजनी माड्यूल, रिपोर्ट में कहा गया है……… बनारस ब्लास्ट के पीछे मुजाहिदीन (आई0एम0) के नए माड्यूल ‘‘गजनी’’ का हाथ है……….इस बात के संकेत बनारस की जाँच कर रहे एक अधिकारी ने दिए हैं। उनके मुताबिक बटाला हाउस इन्काउन्टर के दौरान पकड़े गए आतंकी सैफ ने बताया था कि आई0एम0 ने भारत मंे तबाही मचाने के लिए तीन माड्यूल बनाए थे। एक महाराष्ट्र और गुजरात के लिए, दूसरा साउथ के लिए और तीसरा उत्तर भारत के लिए। पहले दो को ध्वस्त करने मंे गुजरात और महाराष्ट्र पुलिस ने सफलता प्राप्त कर ली थी लेकिन तीसरे सबसे महत्वपूर्ण गजनी का सुराग नहीं लग पाया था।
इसे आपरेट करने की जिम्मेदारी आजमगढ़ के डाॅ0 शाहनवाज के पास थी…..अधिकारी का यह भी कहना है कि बनारस धमाके से पहले करीब 25 सदस्यों ने रेकी की थी इनमें वे भी शामिल हैं जो अहमदाबाद ब्लास्ट के बाद से फरार चल रहे हैं (अमर उजाला 13 दिसम्बर पृष्ठ 18)। इस रिपोर्ट में भी डाॅ0 शाहनवाज को कटघरे मेें खड़ा किया गया है परन्तु रियाज भटकल के साथ। ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस की थ्योरी और मुम्बई पुलिस आयुक्त के बयान में सामंजस्य उत्पन्न करने का प्रयास करने वाली इस रिपोर्ट से मात्र बनारस धमाके का मामला ही हल नहीं हो जाता बल्कि उत्तर भारत में यदि भविष्य में ऐसी कोई वारदात होती है तो उसकी जिम्मेदारी आसानी से इण्डियन मुजाहिदीन के इसी गजनी माड्यूल के सिर थोपी जा सकती है। रिपोर्ट मंे जिस गजनी माड्यूल का सुराग उस समय न मिल पाने की बात कही गई है उसका नाम गुजरात पुलिस महा निदेशक द्वारा उसी समय लिया गया था जब उन्होंने आई0एम0 के अस्तित्व और उसे सिमी से जोड़ने का (सिमी के पहले एस. और बाद के आई को निकालकर) नाटकीय प्रस्तुतीकरण किया था।
बनारस धमाके के बाद इण्डियन मुजाहिदीन समेत जिन संगठनों पर शक जाहिर करते हुए अधिकारियों, सुरक्षा एजेंसियों तथा खुफिया सूत्रों के हवाले से समाचार प्रकाशित एवं प्रसारित हुए उसमें आतंकवादियों का सम्बन्ध मुस्लिम समुदाय से होना ही जाहिर होता है। साधारण नागरिक के लिए इसमें एक बड़ा सवाल है। सम्भवतः इसके तीन प्रमुख कारण हो सकते हैं। पहला यह कि घटना के तुरन्त बाद आई0एम0 ने ईमेल भेज कर विस्फोट की जिम्मेदारी कबूल की और इससे जुड़े आतंकियों का सम्बन्ध इसी समुदाय से माना जाता है। हालाँकि इस संगठन के अस्तित्व को लेकर लगातार संदेह व्यक्त किया जाता रहा है। दूसरा कारण विस्फोट का एक हिन्दू धर्म स्थल पर होना और तीसरा निहित कारणों से सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों में बैठे साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों की कारस्तानी तथा धु्रवीकरण की राजनीति। जहाँ तक इण्डियन मुजाहिदीन द्वारा ईमेल भेजकर घटना की जिम्मेदारी लेने का सवाल है तो इसमें इस सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जाँच की दिशा को एक खास रुख देने के लिए किसी और ने इण्डियन मुजाहिदीन के नाम से यह ईमेल भेजा हो। ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जब विस्फोट करने वालों ने ऐसे प्रयास किए हैं जिससे आरोप मुस्लिम युवकों पर लगने का मार्ग प्रशस्त हो सके। नांदेड़ में बम बनाते हुए बजरंग दल के कार्यालय में हुए विस्फोट में उसके कार्यकर्ताओं की मौत के बाद वहाँ से नकली दाढ़ी, टोपी और ऐसे वस्त्रों का बरामद होना जो आम तौर से मुस्लिम समुदाय में प्रचलित है ऐसे ही षड्यन्त्र का एक हिस्सा था। मालेगाँव बम धमाके में जिस बाइक का प्रयोग किया गया और जाँच के बाद जिसका सम्बन्ध प्रज्ञा सिंह ठाकुर से स्थापित हुआ उस पर ऐसे स्टीकर चिपकाए गए थे जिससे विस्फोट में सिमी का हाथ होना साबित हो। आतंकी इस प्रयास में उस समय सफल भी रहे थे। कानपुर में बम बनाते समय हुए धमाके में विश्व हिन्दू परिषद के सदस्यों का मारा जाना और भारी मात्रा में गोला बारूद का बरामद होना एक महत्वपूर्ण संकेत था कि उ0प्र0 में भी हिन्दूवादी संगठनों से जुड़े अतिवादी सोच के लोग सक्रिय हैं और इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम दे सकते हंै। यह घटना चूँकि उ0प्र0 में ही हुई थी इस लिहाज से पिछले धमाकों के अवलोक में इसको अवश्य शामिल किया जाना चाहिए था। परन्तु किसी भी समाचार पत्र में यह देखने को नहीं मिला। इसी प्रकार यह मान लेना कि बनारस विस्फोट एक हिन्दू धर्म स्थल पर धार्मिक अनुष्ठान के दौरान हुआ इसलिए इसमें सनातन संस्थान, अभिनव भारत या संघ से जुड़े अन्य संगठनों के चरम पंथियों का हाथ नहीं हो सकता। इसी वजह से शक सिर्फ इण्डियन मुजाहिदीन, हूजी या लश्कर जैसे संगठनों पर किया जाना चाहिए तो यह तर्क मान्य नहीं हो सकत

यदि मक्का मस्जिद में ठीक जुमा की नमाज के समय हुए धमाकों का आरोप मुस्लिम युवकों पर आ सकता है और उनकी गिरफ्तारी भी हो सकती है। अजमेर शरीफ दरगाह में रमजान के महीने में अफ़्तार के समय हुए धमाके के आरोप में मुस्लिम नौजवानों को हिरासत में लिया जा सकता है। मालेगाँव जैसे मुस्लिम बाहुल्य नगर मंे आतंकी विस्फोट के बाद उसी समुदाय के लोगों को मुल्जिम बनाया जा सकता है तो दशाश्वमेध घाट पर हुए आतंकी विस्फोट मंे पहले की आतंकी वारदातों में शामिल हिन्दू संगठनों को शक के दायरे से बाहर रखने का औचित्य क्या है? वाराणसी घटना के बाद एक बार भी किसी ऐसे संगठन के सम्बन्ध में कोई भी खबर प्रकाशित नहीं हुई जिसमें उन पर शक की बात कही गई हो। अब इस बात को स्वीकार किया ही जाना चाहिए कि आतंकवाद की कोई आस्था नहीं होती। आतंकवादी न ही हिन्दू होता है न मुसलमान। वह सिर्फ आतंकवादी होता है। नफरत फैलाना और मासूमों का खून करना ही उसका मकसद होता है वह यह काम मस्जिद-मन्दिर, मधुशाला या बाजार कहीं भी कर सकता है।

किसी आतंकवादी घटना के पश्चात् मीडिया के, एक ही समुदाय से जुड़े संगठनों के प्रति आक्रामक रवैये के पीछे सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सुरक्षा एजेंसियों, खुफिया विभाग, स्वयं मीडिया से जुड़े साम्प्रदायिक मानसिकता के लोग और मीडिया के बाजारवादी सिद्धान्त के साथ-साथ धु्रवीकरण की राजनीति भी है। मक्का मस्जिद हैदराबाद, अजमेर शरीफ दरगाह और मालेगाँव धमाकों के तुरन्त बाद भी इस प्रकार का माहौल बनाया गया था। समझौता एक्स0 धमाकों के रहस्यों पर से पर्दा उठने के बाद तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ रहा है। इन सभी धमाकों में मुस्लिम युवकांे को आरोपी बनाकर षड्यंत्रों का खुलासा कर लेने का दावा किया गया था। गवाह और सुबूत होने की बात भी कही गई थी। निश्चित रूप से सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों में बैठे साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों का उन्हें भरपूर सहयोग प्राप्त था। महाराष्ट्र ए0टी0एस0 प्रमुख के0पी0 रघुबंशी पर कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा सिंह ठाकुर को बचाने का आरोप लगता रहा है। आतंकी विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार कर्नल पुरोहित से उनकी घनिष्टता भी कोई ढकी छुपी बात नहीं रह गई है। गुजरात में पुलिस कमिश्नर बंजारा समेत कई अधिकारी फर्जी मुठभेड़ में आतंकवादी बताकर मुस्लिम युवकों और युवतियों की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके हैं। यदि सघन जाँच की जाए तो यह सूची काफी लम्बी हो सकती है। निःसन्देह उच्चतम स्तर पर इस तिकड़ी को राजनैतिक समर्थन भी प्राप्त था। कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर एण्ड कम्पनी की गिरफ्तारी के बाद संघ और भाजपा ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। स्वर्गीय हेमन्त कर्करे की खुलेआम आलोचना ही नहीं की गई बल्कि प्रत्यक्ष रूप से जाँच को प्रभावित करने की गरज से उन पर दबाव भी डाला गया। हिन्दूवादी संगठनों की तरफ से उन्हें मुसलसल धमकियाँ भी मिलती रहीं। सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं पर सभी आतंकवादी मुसलमान जरूर हैं जैसे बयान देने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी जी के गुस्से को शान्त करने के लिए प्रधानमंत्री के सलाहकार ने उनसे मुलाकात भी की थी। यह सारी कवायद इसलिए थी कि असली आतंकवादी को कानून के शिकंजे से बाहर निकालकर आरोप मुस्लिम युवकों पर ही बना रहे और पूरे मुस्लिम समुदाय को दानव के रूप में प्रस्तुत कर हिन्दुओं में असुरक्षा की भावना को जागृत किया जाए। इस प्रकार राजनैतिक धु्रवीकरण के लिए वातावरण तैयार किया जा सके। वाराणसी विस्फोट के बाद जिस तरह से इण्डियन मुजाहिदीन, डा0 शाहनवाज व असदुल्ला के साथ अन्य संगठनों का नाम बार-बार लिया गया, चाहे वे

अधिकारियों व खुफिया सूत्रों के हवाले से हांे या मीडिया में मौजूद साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों की अपने दिमाग की उपज। वाराणसी विस्फोट के बाद उसी प्रकार का वातावरण निर्मित करने की कोशिश की गई, इससे यह सन्देह अवश्य पैदा होता है कि कहीं फिर वही कहानी दुहराने का षड्यन्त्र तो नहीं रचा जा रहा है जो इससे पूर्व हैदराबाद, अजमेर, मालेगाँव और समझौता एक्स0 धमाकों के बाद किया गया था और इन्हीं धमाकों में संघ के प्रचारक इन्दे्रश कुमार जैसे लोगों के शामिल होने के समाचारों से जनता का ध्यान हटाने की साजिश हो रही है।

-मसीहुद्दीन संजरी

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