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Posts Tagged ‘राष्ट्र’


अब अगर ब्रिटेन के इस एकाधिकारी लूट – पाट एवं प्रभुत्व के संबंधो से अलग करके अंग्रेजो द्वारा ब्रिटिश राज की स्थापना एवं संचालन को ही देश की गुलामी मान लिया जाय तो इससे गुलामी के मूल सम्बन्ध छिपने ही नही जायेंगे , चर्चा तक में नही आयेंगे | फलत: ये सम्बन्ध छिप ही नही जायेंगे बल्कि विरोध से बच जायेंगे और ज्यो के त्यों बने रहेंगे | 1947 में यही हुआ है |
राज के संचालन से अंग्रेजो के हटने और उस राज पर हिन्दुस्तानियों के चढने को ही परतंत्रता का अन्त और स्वतंत्रता का शुभारम्भ घोषित कर दिया गया | मुख्यत: इसीलिए ब्रिटेन और ब्रिटेन की कम्पनियों के साथ बने संबंधो को संचालित करने वाले राज का ढाचा भी जस का तस रह गया | उसमे मुख्य परिवर्तन हुआ तो यही की उसके मुख्य संचालक अब अंग्रेज नही बल्कि भारतीय थे | उच्च अफसरशाही में अंग्रेज नही बल्कि भारतीय बैठे हुए थे | इस राज के मूल ढाचे को ज्यो का त्यों बने रहने का एक बड़ा सबूत यह भी है अभी भी सारे प्रमुख या बुनियादी कानून ब्रिटिश दासता के काल के ही बने हुए है और लागू भी है | कोई भी समझ सकता है की कानून का राज कहे जाने वाले आधुनिक भारतीय राज में अगर मूल या प्रमुख कानून ही दासता के काल के हो तो उसे स्वतंत्र और जनतांत्रिक राज कहना या बताना न्याय संगत नही कहा जा सकता |
इसलिए आँखे मूंदकर 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता को मनाने या मानने की जगह अब यह अहम सवाल खड़ा होना चाहिए की 1947 में ब्रिटेन के साथ लूट व दस्ता के आर्थिक संबंधो को बनाये रखकर फिर ब्रिटिश राज उसके शासन — प्रशासन के मूल ढाचे को , उसे संचालित करने वाले प्रमुख कानूनों को बनाये रखकर 1947 में घोषित स्वतंत्रता को क्या राष्ट्र की स्वतंत्रता माना जाए ? या स्वतंत्रता के रूप में छिपी परतंत्रता ? देश का धनाढ्य वर्ग , कम्पनिया और देश का उच्च हुकुमती तथा गैर हुकुमती हिस्सा इसे स्वतंत्रता मानता है , क्योकि उसे राज के संचालन नियंत्रण से लेकर देश के संसाधनों की लूट का प्रभुत्व अधिकार मिल गया है | ब्रिटिश राज के रहते ही इस देश की धनाढ्य कम्पनियों को तथा उच्च हिस्सों को ( खासकर 1920 के बाद से ) ये अधिकार बढ़ते रहे थे जो 1947 में ब्रिटिश सरकार के आसन पर चढने के साथ परिपूर्ण हो गये | आपसी समझौते से मिली इस स्वतंत्रता में सत्ताधारी , भारतीयों को ये अधिकार ब्रिटेन के साथ ब्रिटिश दासता के समय में बनते बढ़ते रहे आर्थिक , राजनितिक , सामाजिक , सांस्कृतिक संबंधो को बनाये रखने के लिए ही मिले थे | यही सम्बन्ध बाद के दौर में अमेरिका और अन्य साम्राज्यी देशो से भी बढ़ते रहे है | इसके फलस्वरूप इस देश का धनाढ्य एवं उच्च हिस्सा साम्राज्यी देशो के सहयोग व साठगाठ से और ज्यादा धनाढ्य एवं अधिकार सम्पन्न होता गया है | लेकिन इन्ही स्थितियों एवं संबंधो खासकर आर्थिक , कुटनीतिक संबंधो के चलते जनसाधारण हिस्से की बुनियादी समस्याए — महगाई , बेकारी से लेकर साधन — हीनता , अधिकारहीनता की समस्याए प्रत्यक्ष ब्रिटिश दासता काल से लेकर आज तक न केवल विभिन्न रूपों में बढती भी रही है | इन संबंधो में जीते — मरते हुए कोई भी गम्भीर व समझदार आदमी जनसाधारण के लिए इसके निरंतर बदतर होती दिशा या कहिये जन्घाती दिशा का पूर्वानुमान लगा सकता है | ऐसी स्थिति में जन साधारण 1947 की स्वतंत्रता को ज्यादा से ज्यादा ऐसी आशिक स्वतंत्रता कह सकता है , जिसके भीतर परतंत्रता के मूल सम्बन्ध मौजूद थे व है | बाद के दौर में और वे बढ़ते भी रहे है | इसीलिए ब्रिटिश काल से आज तक चली आ रही अपनी इस परतंत्रता तथा संकटों से युक्त अपनी स्थितियों को बदलने के लिए भी तथा 1947 की स्वतंत्रता को पूर्ण स्वतंत्रता में बदलने के लिए भी देश के इसी जनसाधारण को अपरिहार्यत:खड़ा होना पडेगा | इसके लिए अब साम्राज्यी देशो के साठ लूट व प्रभुत्व बनाये रखने वाले संबंधो को तोड़ने इससे इस राष्ट्र को मुक्त कराने औनिवेशिक काल के कानूनों को खत्म करने और औपनिवेशिक राज्य के ढाचे को राष्ट्र हित एवं जनहित के जनतांत्रिक ढाचे के रूप में बदलने की जिम्मेवारी भी अब देश के जनसाधारण की ही है | इसलिए उसे ही 1947 के वास्तविक चरित्र को अब अपरिहार्य रूप से समझना होगा |

सुनील दत्ता ….पत्रकार

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1947 में अंग्रेजो द्वारा बनाये गये राज शासन – प्रशासन के संचालन व नियंत्रण के अधिकार हिन्दुस्तानियों के हाथ में आ जाने को ही राष्ट्र की स्वतंत्रता का द्योतक माना जाता है | क्योंकि राष्ट्र की परतंत्रता या गुलामी को मुख्यत: ब्रिटिश राज और उसके राष्ट्रव्यापी प्रभुत्व में ही निहित माना जाता था व है | इसे मानने को दो तीन प्रमुख कारण है | पहला तो किसी क्षेत्र या राष्ट्र का राज्य ही उसका सर्व प्रमुख और सर्वाधिक शक्तिशाली शक्ति के रूप में नजर आता है | चाहे वह सामन्ती रहा ब्रिटिश राज हो या चाहे किसी देश का स्वतंत्र माना जाने वाला वर्तमान दौर जैसा जनतांत्रिक राज हो | इसका दुसरा कारण यह है ब्रिटिश राज ही ब्रिटेन द्वारा देश की श्रम संपदा की लूट- पाट को संचालित करने के साथ इसके विरोध के राष्ट्रव्यापी दमन का काम प्रत्यक्षत: करता रहा था | उसके लिए नीतियों और कानूनों को लागू करता रहा था | इसका तीसरा कारण खुद इस राष्ट्र के स्वतंत्रता संघर्ष में लगी रही शक्तियों के एक हिस्से द्वारा लगातार किया जाता रहा यह प्रचार की राज्य का संचालन अंग्रेजो के हाथ से देशवासियों के हाथ में आते ही यह राष्ट्र स्वतंत्र हो जाएगा | जैसा की 1947 के बाद कहा और मान गया |

इन तीनो प्रमुख कारणों के चलते राज व शासन प्रशासन से हटते ही इस देश की जनता ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को स्वतंत्र मान लिया | सवाल है की क्या ऐसा मानना ठीक है ? अशत: जाहिरा तौर पर तो ठीक है , लेकिन दरअसल व मुकम्मल तौर पर इसे राष्ट्र की स्वतंत्रता मानना गलत है भ्रामक है | क्योंकि किसी भी परतंत्र व्यक्ति , वर्ग या राष्ट्र की परतंत्रता उसको परतंत्र बनाने वाली द्रश्य या अदृश्य शक्ति में नही है , बल्कि मुख्यत: उन उद्देश्यों व संबंधो में निहित होती है जो उसे परतंत्र बनाने के लिए बनाये गये होते है | इसलिए ब्रिटिश काल में इस देश की परतंत्रता को जानने समझने के लिए ब्रिटेन द्वारा इस देश के साथ बनाये गये संबंधो और उद्देश्यों को
जरुर देखा जाना चाहिए |

सभी जानते है की ब्रिटेन के साथ इस राष्ट्र के दासता के संबंधो की शुरुआत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने की थी | यह उसके विश्वव्यापी बाजार और उस पर एकाधिकार के प्रयासों का ही एक हिस्सा था , ताकि कम्पनी अपने व्यापार , बाजार व लाभ — मुनाफे का निरंतर विस्तार कर सके | कम्पनी ने इस देश के साथ सम्बन्ध बढाने के साथ — साथ उस पर एकाधिकार स्थापित करने में आई हर बाधा को हटाने के लिए सैन्य कारवाइयो को चलाते रहने का भी काम निरन्तर किया | इसी के अंतर्गत उसने सबसे पहले 1757 में बंगाल में छोटे से इलाके में
कम्पनी राज स्थापित किया | फिर बाद में शासन प्रशासन में बदलाव , सुधारों को निरंतर आआगे बढाते हए कम्पनी ने अपने व्यापार के साथ राज्य का विस्तार जारी रखा | कम्पनी ने यह काम पूरे देश की व्यापारिक लूट – पाट के लिए तथा अपने फ्रांसीसी , डच ,जैसे विदेशी व्यापारिक विरोधियो को यहाँ से भगाने के लिए और राजाओं , नबावो द्वारा खड़े किए जाते रहे विरोधो — प्रतिरोधो को खत्म कर देने के लिए किया था | साफ़ बात है की ईस्ट इंडिया कम्पनी वाला ब्रिटिश राज या 1857 के बाद का ब्रिटिश साम्राज्यी राज ब्रिटेन के साथ बने
इन उन संबंधो के बुनियाद में नही था | उसकी बुनियाद तो ब्रिटिश कम्पनी और 1840 के बाद से खासकर 1857 के बाद सभी ब्रिटिश कम्पनियों के व्यापारिक और फिर औद्योगिक व महाजनी लूटपाट के लिए बनाये व बढाये गये आर्थिक संबंधो में निहित थी | कम्पनी यहा के उत्पादनों को कच्चे मालो को तथा श्रम शक्ति को
सस्ते में खरीदने और ब्रिटेन तथा यूरोपीय देशो के उत्पादन को ऊँचे मूल्यों पर बेच करके भारी लाभ लुटने के व्यापारिक सम्बन्ध शुरू से ही अर्थात अपने राज्य की स्थापना के पहले से ही बनाती रही | बाद में वह देश के समूचे बाजार पर कब्जा जमाने के प्रयासों को आगे बढाने के साथ देश के कच्चे माल के स्रोतों पर भी लगातार कब्जा जमाती बढाती रही | अपने उद्योग व्यापार के लिए नए किस्म के कच्चे — पक्के मालो का उत्पादन करवाती रही | नील , अफीम कपास तम्बाकू आदि की खेतियो को बढावा देकर स्थानीय एवं परम्परागत खेतियो को तोड़ने का काम करती रही | दस्तकारियो को नष्ट करने का भी काम किया | इस सारे काम में कम्पनी राज या 1857के बाद ब्रिटेन की संसद सवारा संचालित ब्रिटिश राज , ब्रिटिश कम्पनियों की व्यापारिक लूट व प्रभुत्व के संबंधो को बनाने बढाने एवं चलाने में सहयोग करता रहा | यह राज खुद भी लगान तथा टैक्सों करो आदि के जरिये इस देश की जनता की लूट को उन पर ब्रिटेन के प्रभुत्व व दासता को बढाता रहा | इसके फलस्वरूप और देश के बाजार पर देश की श्रम संपदा पर ब्रिटिश कम्पनियों का और ब्रिटेन का प्रभुत्व स्थापित होता रहा |बीसवी शताब्दी अर्थात १९०० की शुरुआत से इन लूट के संबंधो में व्यापारिक औद्योगिक शोषण लूट के साथ महाजनी लूट का सम्बन्ध भी जुड़ गया | अब ब्रिटेन से मालो मशीनों तकनीको के इस देश में निर्यात के साथ पूंजी का भी निर्यात होने लगा | ब्रिटेन के विशाल बैंको व उद्योगों की सम्मलित पूंजी ने इस देश के विभिन्न क्षेत्रो में माल मशीन तकनीक के बिक्री बाजार से भारी लाभ कमाने के साथ देश की श्रम संपदा से सूद दर सूद कमाने का महाजनी सम्बन्ध भी बना लिए | इन्ही संबंधो में ब्रिटिश कम्पनिया लाभ सूद के साथ ब्रिटेन की औध्यिगिक जरूरतों के साथ आम उपभोग के मालो सामानों को भी इस देश से ले जाती रही है | फलस्वरूप ब्रिटेन को धनाढ्य , विकसित था साधन सिविधा व शक्ति सम्पन्न बनाती रही तो इस देश को पराधीन , परनिर्भर , पिछड़ा . गरीब व कमजोर बनाती रही |
मुल्त: इन्ही संबंधो को बढाने व मजबूत करने के लिए ही ब्रिटेन से आधुनिक एवं अंग्रेजी शिक्षा का अंग्रेजी सभ्यता संस्कृति का भी निर्यात किया जाता रहा | और उसके प्रभाव प्रभुत्व को भी इस देश पर फैलाया , बढाया जाता रहा | स्पष्ट बात है की ब्रिटिश राज को स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेजो ने इस देश को अपना गुलाम नही बनाया था , बल्कि मुख्यत: अपने व्यापारिक , औद्योगिक व महाजनी लूट पाट के लिए तथा इस देश के बाजार से लेकर श्रम संपदा पर एकाधिकार प्रभुत्व जमाने के लिए इस देश को पराधीन बनाया था | लूट के इन संबंधो को संचालित करने और उसे सुरक्षा प्रदान करने के लिए ही ब्रिटिश राज को , शासन प्रशासन व सैन्य व्यवस्था को स्थापित किया था | इसी के लिए ब्रिटिश राज व शासन — प्रशासन ने शताब्दियों तक इस देश में एक के बाद एक नीतियों , कानूनों को बनाया व लागू किया | इनका विरोध करने वाले देशवासियों एवं राष्ट्रवादियो को ब्रिटिश राज अपने पूरे दौर में हर तरह के जुल्म व अत्याचार का शिकार बनाता रहा।
क्रमश:

-सुनील दत्ता
पत्रकार

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