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गोंडा में  लोकसंघर्ष  पत्रिका के कार्यक्रम में हाथ में पीछे पत्रिका लिए है
‘सरयू पार की मोनालिसा’ में कला का एक अनूठापन है जो साधारण होकर भी असाधारण है। गोंडा के एक ग्रामीण परिवेश में ‘मोनालिसा’ की परिकल्पना कितनी सौंदर्यात्मक है और यही अदम की कला का उरूज है। ‘मोनालिसा’ की मुस्कान के पैमाने से दलित लड़की कृष्णा के सौंदर्य को मापने का यह तरीका कवि की कल्पना का उत्कर्ष है।
‘गाँव का परिवेश’ ‘समय से मुठभेड़’ की अंतिम रचना है। अड़तीस पदों की यह रचना गाँव के परिवेश के जीवंत चित्र खींचती है-
व्याख्या ये भ्रम में रखने का अनोखा दाँव है।
नर्क से बदतर तो अपने देश का हर गाँव है।।

इस कविता की ये पंक्तियाँ भीम राव अंबेडकर की याद दिलाती हैं। उन्होंने भारतीय गाँवों को अमानुषिक कहकर दलितों को शहर की ओर जाने की बात कही थी। इस प्रकार इन तीनों नज्मों का रचाव अदम की ग़्ाज़लों का ही एक विस्तार है क्योंकि ग़ज़लों में बंदिश, विस्तारपूर्वक अपनी अनुभूति को ढालने का मौका नहीं देती यह नज्मों में ही संभव था।
कला पक्षः
गज़लगो का काम वकालत का पेशा होता है। मिसरे उला में वह अपनी दलील देता है और मिसरे सानी में उसकी वकालत करता है। इसे हिन्दी में हम तर्क और स्थापना के जरिए भी मोटे तौर पर समझ सकते हैं। ग़ज़ल मुहावरे से बात करती है जबकि हिन्दी की कविता बिम्बात्मक होती है। ग़्ाज़ल उर्दू की चीज है इसलिए उर्दू से दूर रहकर ग़्ाज़ल को नहीं पाया जा सकता। हिन्दी के कई ग़्ाज़लकार इसीलिए फ्लॉप हुए। अदम से पहले दुष्यंत ने भी इस बात को बखूबी समझा था और उनकी ग़ज़लगोई हिन्दी गज़ल के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। अदम दुष्यंत से और आगे गए हैं। उन्होंने न केवल उर्दू और बोलचाल की ‘हिन्दुस्तानी’ के मुहावरों को चुना है बल्कि क्लासिक उर्दू शायरी के प्रतीक भी अपनी गज़लों में इस्तेमाल किए हैं। उदाहरण के लिए‘यूसुफ और ‘जुलेखा’ प्रतीकों को लेते हैं। उर्दू गज़ल की परंपरा में इन प्रतीकों की भरमार है। इन का धार्मिक महत्व भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदम शेर कहते हैं-
सियासी बज़्म में अक्सर जुलेखा के इशारों पर,
हकीकत ये है यूसुफ आज भी नीलाम होता है।

उर्दू के इन परंपरागत प्रतीकों के प्रयोग से शेर लाजवाब हो गया है इसलिए इन प्रतीकों के महत्व को रेखांकित करना भी अभीष्ट होगा- “यूसुफ पैगंबर याकूब के पुत्र थे। ये बहुत ही सुंदर, सुशील और गुणवान व्यक्ति थे। इन के सरल, सौम्य स्वभाव के कारण इन के पिता का इन पर विशेष स्नेह था। यह बात इनके भाइयों को न भाती थी। अतः उन्होंने षड्यंत्र किया और यूसुफ को अंधे कुएँ में धकेल दिया। पिता से आकर कह दिया कि यूसुफ को भेडि़या खा गया। याकूब पुत्र-वियोग में रो-रोकर अंधे हो गए। उधर राह चलते कुछ व्यापारियों ने यूसुफ को देख लिया और उन्हें अंधे कुएँ से बाहर निकाला। वे इन्हें अपने साथ मिस्र ले गए और वहाँ के बाजार में बेंच दिया। मिस्र के वजीर आज़म की पत्नी जुलेखा इनके रूप पर आसक्त हो गयी और जुलेखा के इशारे पर वजीर आज़म ने यूसुफ को खरीद लिया। मगर यूसुफ सदाचारी थे। जुलेखा द्वारा लगाए गए आरोपों को उन्होंने निराधार सिद्ध कर दिया। इससे यूसुफ को बहुत सम्मान मिला। मिस्र का बादशाह भी इन का बहुत आदर करने लगा। इन्होंने मिस्र की जनता की अकाल से रक्षा की। इनकी पैगम्बर के रूप में प्रतिष्ठा हुई। साहित्य में यूसुफ सौंदर्य और सदाचार का प्रतीक हैं। एक उदाहरण देखिए-
दामन उस यूसुफ का आया पुर्जे होकर हाथ में
उड़ गई सोने की चिडि़या रह गए पर हाथ में।

-आरजू लखनवी
प्रिय को यूसुफ भी कहा जाता है और उसके सौंदर्य की तुलना यूसुफ से की जाती है:-
यूसुफ से कोई क्योंकर उस माह को मिला दे,
है वक्त रात दिन का अजदीदा-ता-शुनीदा।

-”मीर तकी मीर”-8
सियासी बज़्म में अक्सर जुलेखा के इशारों पर,
हकीकत ये है यूसुफ आज भी नीलाम होता है।

अदम के इस शेर में प्रतीक वही ईरानी गज़ल परंपरा के यूसुफ और जुलेखा हैं लेकिन यहाँ आकर उनके मानी बदल गए हैं। अदम के शेर में जुलेखा पूँजी का प्रतीक है और युसुफ सर्वहारा का। सत्य यह है राजनीति की महफिल में जुलेखा (पूँजी) के इशारों पर यूसुफ (सर्वहारा या जन) आज भी नीलाम होता है। उर्दू शायरी की परंपरा का एक ऐसा किरदार जो आध्यात्मिक प्रेम, प्रिय के सौंदर्य और सदाचार के लिए प्रयुक्त होता आया है, अदम ने उसे सर्वहारा के लिए प्रयोग करके मानों एक युग का अंत कर दूसरे युग का सूत्रपात किया हो।
अदम की गज़लों की कलात्मकता सिर्फ भाषा, मुहावरों और शेर की रवानी के आधार पर नहीं आँकी जा सकती। शेर की गहराई की थाह उनकी बारीक निगाही से भी नापी जा सकती है। एक किसान के तजुर्बात प्रगतिशील कविता के लिए कितने उपयोगी हो सकते हैं अदम का यह शेर बताएगा-
बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई,
रमसुधी की झोंपड़ी सरपंच की चैपाल में।

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए,
हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में।

रमसुधी की झोंपड़ी का सरपंच की चैपाल में खो जाना उसी तरह की प्रक्रिया है जैसे जमींदारी उन्मूलन के दौरान प्रारम्भ की गई सीलिंग यानी ‘अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम’। इस कानून के तहत जिस किसी के भी पास साढ़े बारह एकड़ से अधिक कृषि योग्य भूमि थी, सरकार द्वारा उसका अधिग्रहण कर भूमिहीन किसानों में बाँट दिया जाता था। यह कानून 1960 ई॰ में आया था लेकिन इसके क्रियान्वयन में जो भ्रष्टाचार राजस्व कर्मियों और जमींदारों की साँठ-गाँठ से हुआ उसको नंगा करने के लिए अदम का यह शेर ही काफी है। यह वही दौर था जब जमींदारों ने गर्भ के बच्चों के नाम भी अपनी जमीनों के पट्टे करा दिए थे और भूमिहीनों को बकौल अदम पट्टे की सनद ताल (तालाब) में मिलती थी। वे उसमें खेती कर पाएँ तो करें नहीं तो कूदकर आत्महत्या कर लें। यह जो बात कहने का चुटीला और चमकता हुआ ढंग है यह अदम की ग़ज़ल का कलात्मक मेयार ऊँचा करता है। रमसुधी की झोंपड़ी के खोने का साक्षी जो बूढ़ा बरगद है वह माक्र्सवादियों का प्रिय प्रतीक है। यह मुक्तिबोध जैसे कवियों के यहाँ बार-बार आया है-
दीखता है सामने ही अंधकार-स्तूप-सा
भयंकर बरगद-
सभी उपेक्षितों, समस्त वंचितों,
गरीबों का वही घर, वही छत,
उसके ही तल-खोह-अँधेरे में सो रहे
गृहहीन कई प्राण।-

(‘अँधेरे में’-मुक्तिबोध)
यह भी वही बरगद है, जो रमसुधी की झोंपड़ी के सरपंच की चैपाल में खोने का गवाह है।
इसी तरह अदम ने कई शेरों में ‘नखाश’ शब्द का इस्तेमाल किया है। लखनऊ की विक्टोरिया रोड पर प्रत्येक रविवार को लगने वाली बाजार को ‘नखाश की बाजार’ कहा जाता है, जहाँ प्रत्येक वस्तु की सस्ती ‘सेकेंड हैंड’ उपलब्धता प्रसिद्ध है। अपने शेर में व्यंग्य की धार तेज करने के लिए ‘नखाश की बाजार’ को अदम इस तरह प्रयोग करते हैं-
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें।
संसद बदल गई है यहाँ की नखाश में।।

ये अदम कीगज़लगोई की नायाब नजीर है। भाषा के भी विविध आयाम अदम की गज़लों में दिखते हैं। एक तरफ तो वे कहते हैं-
अर्ध तृप्ति उद्दाम वासना ये मानव जीवन का सच है।
धरती के इस खंडकाव्य पर विरह दग्ध उच्छ्वास लिखा है।

और दूसरी ओर-
बहरे बेकराँ में ताकयामत का सफर ठहरा।
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाये सफीने से।

कोई भी उर्दू शायरी का पाठक यह नहीं कह सकता कि यह शेर उर्दू का नहीं है। यहाँ सफीने शब्द पर भी गौर करना होगा जो एक धार्मिक इस्लामी प्रतीक है और हिजरत से जुड़ा है। ऐसी भाषा हिन्दी साहित्य में मुंशी प्रेमचंद को ही सधी थी। इसीलिए अदम बार-बार अपने शेरों में मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों के पात्रों को बुला लेते हैं। घीसू, होरी, धनिया, मंगल, गोबर के साथ-साथ एक स्थान पर रेणु का हीरामन भी आया है। उर्दू शायरी के तमाम प्रचलित अरबी, फारसी कचराही शब्द अदम ने जमकर प्रयोग किए हैं जैसे-
रजअत, इलहाम, जदीद, इजारेदार, कुदूरत, नीलगूँ, जाफ़ाश, जद, शफ़क़त, गरानी,  पैहम, हैय्यत, रवायतआहनी, खुदसरी, तबीब, मरदूद, बेजार, फैसलाकुन, फसील, जाँफिशानी, लन्तरानी, सहकार, मर्तबा, इदारा, फर्द, कबा, शिगूफा, नीलोफर, रकाबी, बरहना, जिना, तमद्दुन, बहरे-बेकराँ, तख़य्युल, शीराजा, दहकान, गंदुम आदि। ये सभी शब्द क़स्बाई और कचराही मिठास रखते हैं।  इजाफत जो थोड़ी-बहुत अदम के शेरों में मिलती है वह उर्दू ग़्ाज़ल से प्रेरित है। बोलचाल के शब्दों और मुहावरों का निखरा हुआ रूप है। मुहावरे हिंदी और उर्दू  दोनों के खिले हैं जैसे-बापू  के बंदर, फैसलाकुन जंग, कल तलक, वक्त के सैलाब, साहिबे किरदार, आग का दरिया, ठंडा  चूल्हा, रँगीले शाह का हम्माम, आँख पर पट्टी, अक्ल पर ताला, तालिबे-शोहरत, जाए भाड़ में, खुदा  का वास्ता, शिगूफा उछालना, ढ़ोल पीटना, ढीला गरारा, तवज्जो दीजिए, जहन्नुम में, शीराजा बिखर जाए, दीगर नस्ल, गरीब की आह, रामनामी ओढ़कर आदि।
ठेठ देहाती गँवई-गँवार, अवधी के मुहावरे भी मिलते हैं जैसे-पट्टे की सनद, खेतों में बेगार, दीवार फाँदने में (किसी की बहू-बेटी के प्रति बुरी निगाह या व्यभिचार सूचक), कुर्बोजवार, सोलह-उन्नीस, आक-थू आदि। अंतर इतना है कि मूल मुहावरों को ग़्ाज़ल की बंदिश के अनुसार थोड़ा-बहुत परिवर्तित कर लिया गया है। अंग्रेजी के शब्द भी कहीं-कहीं प्रयोग किए गए हैं मसलन-जजमेंट, रिकार्ड, ब्रेसरी, स्कॉच आदि। साहित्यकारों के नाम और उनके साहित्य के बारे में कसीदे के शेर भी अदम ने कहे हैं। अमृता प्रीतम और प्रेमचंद में उनकी अगाध श्रद्धा है। मंटो को भी उन्होंने अपने एक शेर में याद किया है। कहीं-कहीं व्यंग्य की बारंबारता मोनोटोनी (नीरसता) प्रकट करती है और रचनात्मक व्याकरण भी कभी-कभी बिखर जाता है। फिर भी बहर से खारिज होने के बाद भी शेर दहाड़ता रहता है।
निष्कर्ष यह कि भाषा और भाव के स्तर पर अदम की गज़लें संतुलित हैं जो ‘समय से मुठभेड़’ को  एक शाहकार कृति का दर्जा दिलाती हैं। क्रांतिधर्मा साहित्य उम्रदराज होता है। निश्चय ही अदम की शायरी आने वाली पीढ़ी की रहबरी को आकुल रहेगी। उनमें क्रांति और व्यवस्था को बदल डालने की जो बेचैनी है वह मिट्टी की महक से मह-मह महकती रहेगी। समाज के लिए उपयोगी कलावादी संस्कृति के विकास में अदम की शायरी धीरे-धीरे अपना अव्वल स्थान बनाएगी। क्योंकि बकौल अदम-
इसकी अस्मत वक्त के हाथों न नंगी हो सकी।
यूँ समझिए द्रौपदी की चीर है मेरी
गज़ल।।
संदर्भ- 1.प्रभात रवीन्द्र 2.सिंह विजय बहादुर, भूमिका, ‘समय से मुठभेड़’ वाणी प्रकाशन 2010 संस्करण पृष्ठ-9 3.नसीम कमल, उर्दू साहित्य कोष, वाणी प्रकाशन 1998 संस्करण पृष्ठ-114 4. सिंह विजय बहादुर, भूमिका, ‘समय से मुठभेड़’ वाणी प्रकाशन 2010 संस्करण, पृष्ठ-14 5. प्रभात रवीन्द्र, गद्यकोष 6.सिंह नामवर (संपादक) कला और साहित्य चिंतन कार्ल माक्र्स, राजकमल प्रकाशन 2010 संस्करण, पृष्ठ-124 7.नसीम कमल, उर्दू साहित्य कोष, वाणी प्रकाशन, 1998 संस्करण, पृष्ठ-90 8.वही, पृष्ठ-261, 262             मोबाइल: 09033510239

-संतोष अर्श
समाप्त
लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

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कहीं-कहीं व्यंग्य इतना संवेदनात्मक है कि पाठक को रुला दे, बिल्कुल के.पी. सक्सेना के गद्य जैसा। ऐसी अनुभूतियों को कविता में लाने का कारण हृदय को टूटने से बचाने का अंतिम उपाय होता है, और कहीं-कहीं इतना तीव्र कि घृणा से थूकने पर मजबूर कर दे, निजाम और परिदृश्य पर। उदाहरण स्वरूपः-
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है,
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है।
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी,
ये सुबहे फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।

और
सुरा और सुंदरी के शौक में डूबे हुए रहबर,
दिल्ली को रंगीलेशाह का हम्माम कर देंगे।

दिल्ली हमारी राजनैतिक, प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र है जिसे रंगीलेशाह प्रतीक से भोग-विलास में डूबी हुई  बताया गया है। रजनीश या ‘ओशो’ जो कि भारत के आध्यात्मिक  गुरुओं में शुमार होते हैं। उनके आश्रम में ‘भोग से योग तक’ के पर्दे में होने वाले व्यभिचार को अदम ने अपने कई शेरों में निशाना बनाया है-
डाल पर मजहब की पैहम खिल रहे दंगों के फूल,
सभ्यता रजनीश के हम्माम में है बेनकाब।
अथवा,
‘प्रेमचंद’ की रचनाओं को, एक सिरे से खारिज करके,
ये ओशो के अनुयायी हैं, कामसूत्र पर भाष्य लिखेंगे।
दोस्तों अब और क्या तौहीन होगी रीश की।
ब्रेसरी के हुक पे ठहरी चेतना रजनीश की।।
मोहतरम यूँ पाँव लटकाए हुए हैं कब्र में।
चाहिए लड़की कोई सोलह कोई उन्नीस की।।

कहा जाता है अदम ‘ओशो’ का आश्रम अपनी आँखों से देखकर आए थे। अदम उसी प्रकार ‘पीड़ा से परिहास’ करते हैं जिस प्रकार ग़ालिब जैसे उर्दू के बड़े शायरों ने अपनी शायरी में किया है। भूख अदम के यहाँ सबसे बड़ा सच है। भूख तमाम ज्ञान की जननी है। बुद्ध को भी ज्ञान भूख से मिला। भूख उनकी हर ग़्ाज़ल में आई है, अपने उसी भयानक रूप में जिस रूप में वह भारत की सत्तर फीसदी आबादी का सत्य रही है। शायद इसीलिए अदम के बहुत से शेरों में भूख बार-बार चीखती है:-
इन्द्रधनुष के पुल से गुजरकर उस बस्ती तक आए हैं।
जहाँ भूख की धूप सलोनी चंचल है बिंदास भी है।।
कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद,
जो है संगीन के साए की चर्चा इश्तहारों में,
जुल्फ, अँगड़ाई, तबस्सुम, चाँद, आईना, गुलाब,
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इन का शबाब।
भुखमरी की जद में है या दार के साये में है,
अहले हिंदुस्तान अब तलवार के साए में है।
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून,
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को।

भूख क्रांति का कारण बनेगी यह विश्वास भी शायर को है-
सत्ता के जनाजे़ को ले जाएँगे मरघट तक।
जो लोग भुखमरी के आगोश में आए हैं

इसीलिए वे भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलने की बात करते हैं-
भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो।
या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो।

इसीलिए उन्हें गर्म रोटी की महक पागल कर देती है। गंध की कितनी मादक अनुभूति है, ऐसी भी प्रगतिशील कविता कहीं होगी क्या?
गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे।
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें

अदम गँवई-गँवार के अगुवा, अलमबरदार कवि हैं, इसलिए वे श्रम की महत्ता जानते हैं। उन्हें किसान के श्रम की फिक्र भी है और झोंपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार करने की कोशिश भी है। माक्र्सवादियों ने श्रम की गरिमा और महिमा बखान की है। “माक्र्स ने बताया कि जब श्रम अलगाव का रूप अख्तियार कर लेता है तब श्रमिक और श्रम के बीच एक विरोध की स्थिति ज़रूर बनती है। लेकिन ऐसा तब नहीं होता जब श्रम रचनात्मक होता है और जब उन वस्तुओं का उत्पादन करता है जिनमें मनुष्य अपने को वस्तुरूपांतरित और व्यक्त करता है। इसके अलावा मनुष्य कलाकृतियों में ही नहीं बल्कि श्रम में भी आनंद ले सकता है। पूँजी में माक्र्स ने श्रमिक के काम में मिलने वाले सुख के बारे में लिखते हुए कहा कि श्रम ‘ऐसी क्रिया है जो उसकी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को खुलकर सक्रिय होने का अवसर देती है’।”6 दुनिया में जो कुछ भी सुंदर है वह श्रम से निर्मित हुआ है। किन्तु मेहनतकश को जब उसके श्रम के एवज में भुखमरी के सिवाय कुछ नहीं मिलता तो अदम की शायरी अपने चिर-परिचित अंदाज में कहती है-
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है।
उसी के दम से रौनक आपके बँगलों में आई है।

यहाँ तक सभ्यता का निर्माण भी घीसू के पसीने से ही हुआ है-
न महलों की बुलंदी से न लफ्जों के नगीने से।
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से

गाँव के अमानुषिक वातावरण, गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, शोषण, दमन सबको देखने की बारीक निगाह अदम में है इसीलिए वे जनकवि हैं। सरयू नदी  की बाढ़ का कैसा जीवंत चित्र है, इस शेर में जो हश्र (प्रलय) का प्रभाव  पैदा कर रहा है-
कितनी वहशतनाक है सरयू की पाकीजा कछार।
मीटरों लहरें उछलतीं हश्र का आभास है

गाँव के बारे में महानगरों में बैठकर आँकड़े जुटाने और बनाने वाले लोगों को यह खबर नहीं है कि कितने लोग गाँव छोड़कर शहरों की ओर कमाने निकल गए हैं। विस्थापन की यह पीड़ा और लाचारी कैसी होती है, यह महानगरीय अफसरशाही और मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसी की पहुँच से दूर की बात हैः-
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।
हमारे गाँव का ‘गोबर’ तुम्हारे लखनऊ में है,
जवाबी ख़त में लिखना किस मोहल्ले का निवासी है।

सिर्फ एक प्रतीक के रूप में प्रेमचंद के किसान जीवन पर लिखे गए महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘गोदान’ के पात्र ‘गोबर’ का प्रयोग करने मात्र से शेर कितना प्रभावी और वजनदार हो गया है। पूरे गोदान का सत्व ही इसमें निचुड़कर आ गया है। अपसंस्कृति, साहित्यकारों की खेमेबाजी और हवाई साहित्य, सांप्रदायिकता, लालफीताशाही, पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति आक्रोश, क्रांतिधर्मी चेतना और राजनैतिक अगुवाकारी की विफलता से जन-सामान्य में उपजा संत्रास अदम की ज़लों का बीज-भाव है। सर्वत्र विद्रोह और नकार, प्रतिरोध और मुक्ति की कामना उनके शेर-शेर में व्यंजित होती है:-
जनता के पास एक ही चारा है बगावत।
ये बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में।।

क्रांति की यह उद्दाम चाह जीवन में तमाम मानसिक और भावनात्मक यातनाओं से गुजरने के बाद पैदा होती है। यही हिन्दी ग़्ाज़ल का मिजाज भी रही है, दुष्यंत भी ‘यातनाओं’ के अँधेरे में सफर करते थे। यह अँधेरा अदम के यहाँ और स्पष्ट है लेकिन, प्रकाश के साथ अचेतन मन में प्रज्ञा कल्पना की लौ जलाती है। सहज अनुभूति के स्तर में कविता जन्म पाती है-
उठाता पाँव है विज्ञान संशय के अँधेरे में।
अचानक उस अँधेरे में ही बिजली कौंध जाती है
धर्म, इतिहास और शास्त्र का नकार बहुत कड़े शब्दों में है। शायद दलितों के हवाले से-
वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं,
वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें।
लोकरंजन हो जहाँ शंबूक वध की आड़ में,
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें।

दलित-विमर्श पर संग्रह में एक अकेली लंबी नज़्म ‘चमारों की गली’ भी है, जिस पर आगे चर्चा होगी। कुछ ग़्ाज़लों के शेर भी दलित-चिंतन की ओर ले जाते हैं मसलन-
अंत्यज कोरी पासी हैं हम, क्यूँ कर भारतवासी हैं हम।
छाया भी छूना गर्हित है, ऐसे सत्यानासी हैं हम।

कुल मिलाकर अदम की  ज़लें उस हिंदुस्तान का साफ नफीस आईना हैं जहाँ रहकर उन्होंने अपनी ग़्ाज़ल को रवानी दी है और जिन पर मुख्तसर चर्चा पर्याप्त नहीं है। उनकी शायरी को कविता की मुख्य धारा की चर्चा में शामिल करना बहुत जरूरी है क्योंकि-
दिल लिए शीशे का देखो संग से टकरा गई।
बर्गे गुल की शक्ल में शमशीर है मेरी
ग़ज़ल
अदम की ग़ज़ल सम्पूर्ण मानवता की ग़ज़ल है।
कत्आत और नजमें
कत्आ हिन्दी में मुक्तक के आस-पास ठहरता है। “यह भी रुबाई की तरह चार मिसरों में होता है और इसके दूसरे और चैथे मिसरे समान रदीफ-काफिये के होते हैं। यह रुबाई से इस तरह भिन्न है कि ग़ज़ल की सभी बहरों में कहा जा सकता है। अगर क़ते का पहला शेर मतला बन जाए तो पहले दूसरे और चैथे मिसरे का रदीफ काफिया एक ही हो जाता है। कई बार कोई एक भाव दो मिसरों में न समा पाने पर उसे क़तेे में बखूबी व्यक्त किया जा सकता है। इसे ग़्ाज़ल के रंग में कहकर उसके साथ ही लिखा पढ़ा जा सकता है।”7 ‘समय से मुठभेड़ में चैदह क़ते हैं। इनमें भी सर्वहारा की हिमायत शायराना रंग-ढंग में मिलती है-
रोटी के लिए बिक गई धनिया की आबरू।
‘लमही’ में प्रेमचंद का ‘होरी’ उदास है।

शायर की जो ग़्ाज़लें गैर मुकम्मल रह जाती हैं वे कते की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं। लेकिन इनमें भी अदम का तेवर कमजोर नहीं पढ़ा है-
भुखमरी की रुत में नग्में लिख रहे हैं प्यार के,
आज के फनकार भी हैं दोगले किरदार के।
दोस्तों इस मुल्क में जम्हूरियत के नाम पर,
सिक्के कितने दिन चलेंगे एक ही परिवार के।।

नज़्मों में ‘चमारों की गली’ नज्म अधिक मजबूत है क्योंकि इसमें दलित-चिंतन के साथ एक कथानक भी है। ‘हथियार उठा लंे’ दस पदों की एक पोस्टर-छाप राजनैतिक रचना है। इसकी निस्बत ‘गाँव का परिवेश’ कहीं अच्छी रचना है।
    ‘चमारों की गली’ दलितों के शोषण और सामंती सवर्ण जातियों द्वारा उन पर ढाए गए जुल्मों का बयान करने वाली रचना है। पचपन पदों वाली इस रचना में कृष्णा नाम की एक दलित लड़की की करुण कहानी है जिसके साथ गाँव ही के ठाकुर ने बलात्कार किया है, और पुलिसिया दमन का सामना भी पीडि़त और उसके परिवार को करना पड़ रहा है। कहते हैं यह रचना अदम के गाँव में घटी एक घटना पर आधारित है जिस पर पुलिस, मीडिया और प्रशासन का ध्यान नहीं गया था। ठाकुरों की सामंती ठसक और पुलिस की नपुंसक, भ्रष्ट छवि को उजागर करती यह रचना अपनी भाषा, शैली और कथ्य में भी ठोस है। रचना के पहले ही बंद में एक विशिष्ट ओज है-
आइये महसूस करिए जिंदगी के ताप को।
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आप को।।

दलित लड़की कृष्णा के लिए उन्होंने यूरोपीय नवजागरण काल के प्रसिद्ध चित्रकार लिओनार्दो द विंची के प्रसिद्ध चित्र ‘मोनालिसा’ का बिम्ब प्रयोग किया है जो अपनी सादगी के बावजूद चित्रकला के इतिहास में कालजयी रचना है-
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा।
मैं इसे कहता हूँ सरयू पार की मोनालिसा।।
-संतोष अर्श
क्रमस:
लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

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                                           मेरठ का खरखौदा सामूहिक बलात्कार और धर्म परिवर्तन मामला, जिसे  ‘लव जिहाद’ का नाम दिया गया, के झूठे होने की बात सामने आ रही है। पीडि़ता ने खुद ही पुलिस के पास जाकर यह बयान दिया है कि न तो उसका अपहरण और बलात्कार किया गया था और न ही उसका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया था। बल्कि, वह अपनी मर्जी से दूसरे समुदाय के अपने प्रेमी के साथ गई थी। उसने अपने परिवार से ही जान का खतरा होने की शिकायत दर्ज कराई है। उसने यह भी बताया कि घरवालों को नेताओं से पैसे मिलते थे जो कि अब बंद हो गए हैं। ऐसे में उससे पूछा जाता था कि आखिर अब पैसा क्यों नहीं आ रहा? इस वजह से घरवाले उसके साथ मारपीट भी करते थे और उसे जान से मारने की साजिश भी रच रहे थे। इसलिए, वह घर से चुपचाप भाग आई है। वहीं एक न्यूज चैनल ने सात अगस्त 2014 को भाजपा के व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष विनीत अग्रवाल द्वारा पीडि़त लड़की की माँ को पैसे देने की बात कहते हुए भाजपा को सवालों के घेरे में ला दिया है। अब आरोप और सबूत दोनों भाजपा को आईना दिखा रहे हैं। अब देखना है, सपा सरकार को कि क्या वह ‘लव जिहाद’ के नाम पर पीडि़ता के परिजनों को पैसा देकर झूठा मामला बनाने वाले सांप्रदायिक नेता के खिलाफ कोई कार्यवाही करने की हिम्मत करती भी है या नहीं? इस झूठे आरोप में फँसाए गए मुस्लिमों, जिनकी देश की जेलों में आबादी से ज्यादा संख्या होने की नियति हो गई है, को अगर ताक पर रख भी दिया जाए तो क्या इस सवाल को आधार बनाकर पूरे मुस्लिम समुदाय और मदरसों पर जो आरोप लगाए गए थे, वे खत्म हो गए? यह एक बड़ा सवाल है?
तो वहीं, खरखौदा प्रकरण को लेकर जिन हिन्दुत्ववादी संगठनों ने ‘लव जिहाद’ का माहौल बनाकर इसे अन्तर्राष्ट्रीय साजिश करार दिया था, के मकसद की तफ्तीश अनिवार्य हो गई हैं। पूरे प्रकरण को उनके द्वारा ‘दिखाने’ का और उसे ‘हल’ करने का क्या नजरिया था? ऐसा इसलिए कि इस प्रकरण की सच्चाई जो पहले भी सामने थी और आज भी है, से समाज में जो विघटन हुआ, उसे जोड़ना इतना आसान नहीं होगा। क्योंकि निर्माण एक धीमी गति से चलने वाली सृजनात्मक प्रक्रिया है और विघ्वंस एक तीव्र आक्रोश की प्रतिक्रिया है। यह हमारे समाज के हर उस ढांचे को नेस्तानाबूद कर देना चाहती है, जो हमें जोड़ती है। यहाँ हिन्दुओं की ‘बड़ी चिंता’ करने वाले विश्व हिन्दू परिषद सरीखे संगठनों से सवाल है कि अगर वे इस षड्यंत्र में नहीं शामिल हैं तो हिन्दू धर्म की एक लड़की को मोहरा बनाकर उसे बदनाम करके राजनीति करने वाली भाजपा के खिलाफ क्या वे जाएँगे, बहुसंख्यक हिन्दू समाज को बरगलाने वाले इन संगठनों की माँगों पर गौर करें तो इनकी सांप्रदायिक जेहनियत का पता चल जाएगा कि यह ‘हिन्दू लड़की’ को न्याय नहीं बल्कि मुस्लिम समाज को उत्पीडि़त करने के लिए ऐसा कर रहे थे।
विश्व हिंदू परिषद ने पीडि़ता को ‘हिन्दू अध्यापिका’ कहते हुए महिला उत्पीड़न की घटना को सांप्रदायिक रूप दिया। वहीं मदरसे में मोलवियों द्वारा सामूहिक बलात्कार और जबरन धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए, देशभर के मदरसों पर छापा मारकर खोई लड़कियों को तलाश करने की माँग की। ऐसा माहौल बनाया जैसे पूरे देश में जिन लड़कियों का अपहरण हो रहा है, उसके लिए मुस्लिम समाज और मदरसे ही जिम्मेदार हैं। विश्व हिंदू परिषद के ‘अन्तर्राष्ट्रीय’ अध्यक्ष प्रवीण तोगडि़या ने और आगे बढ़कर मेरठ, हापुड़, मुजफ्फरनगर व अन्य ऐसे मदरसों पर ताला लगाने की माँग करते हुए कहा कि मदरसे जिस इस्लामिक मूल संगठन से जुड़े हैं, उनके प्रमुखों और इन मदरसों के सभी मोलवियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए। बजरंग दल ने मदरसों को बदनाम करने के लए अफवाह फैलाई कि चार और हिंदू लड़कियों की बरामदगी मदरसे से हुई।
विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू जागरण मंच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोर्चा ने ’लव-जिहाद’ से लड़ने के लिए ’मेरठ बचाओ मंच’ तक का गठन कर दिया। हर बात के लिए इस्लाम को दोष देने वाले इन संगठनों ने इसे अन्तर्राष्ट्रीय साजिश करार देते हुए कहा कि मेरठ की ‘हिन्दू अध्यापिका’ अकेली इस गैंग की शिकार नहीं है। हिन्दू लड़कियों के साथ मदरसों में सामूहिक बलात्कार किया जा रहा है और उन्हें जबरन मुसलमान बनाकर अरबी शेखों के लिए दुबई भेजा जा रहा है।
‘सिर्फ यूपी के मदरसों में ही ऐसे ‘जिहादी गुनाह’ होते हैं, ऐसा नहीं है,’ कहते हुए पूरे देश में ‘लव जिहाद’ का माहौल बनाया गया। विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू हेल्प लाइन ने दावा किया कि केरल, तमिलनाडु, आंध्र, महाराष्ट्र, बंगाल समेत पूरे देश से उनके पास शिकायतें हैं। ऐसे में भारत का केंद्रीय गृह विभाग ऐसे मामलों में गंभीरता से संज्ञान लेकर देश के सभी मदरसों की तलाशी ले और ऐसी लड़कियों को मुक्त कराए।
बची-खुची कसर संचार माध्यमों ने घटना का नाट्य रूपांतरण कर पूरी कर दी। और हाँ कई ने तो नाट्य रूपान्तरण कर ‘लव जिहादियों’ के स्टिंग करने का दावा करते हुए, खूब टीआरपी बटोरी। चेहरे पर हल्की दाढ़ी दिखाते हुए, कैमरा उसके होठों पर जूम हो जाता और वह बताने लगता कि वह एक मुसलमान है। पर वह अपना हिंदू नाम बताता है और हिंदू लड़की को अपने प्रेम जाल में फँसाने के लिए कलावा बांधे हुए है, ऐसा वह एक साजिश के तहत कर रहा है। इस तरह से अफवाह वाले कार्यक्रम और पीडि़त लड़कियों के फर्जी नाट्य रूपान्तरण से समाज में एक दूसरे के प्रति गहरी खाई, टीवी स्क्रीनों ने प्रायोजित की। स्क्रीनों पर चीखती आवाजें जो ‘लव जिहाद’ की आड़ में एक पूरे समुदाय को हैवान के बतौर पेश कर रही थीं, को भूलना शायद मुश्किल होगा। लड़कियों के गायब होने, मानव अंग तस्करी और अमानवीय सेक्स व्यापार की घटनाओं व आकड़ों को एक सांप्रदायिक नजरिया दिया जा रहा था।
जिस मदरसे ने एक हिन्दू लड़की को आर्थिक सहयोग देने के लिए, बिना किसी धार्मिक भेद-भाव के उसे अध्यापिका के रुप में नियुक्त किया, वही उसका सबसे बड़ा गुनाह हो गया। हिन्दुत्वादी समूहों ने मदरसों के प्रति हीन भावना पैदा करते हुए प्रचारित किया कि ग्रेजुएट होकर भी मेरठ की हिन्दू लड़की को मदरसे जैसे स्थान पर नौकरी ढूँढने जाना पड़ता है। ‘लव जिहाद’ के बहाने वे अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की नीति पर निशाना साधते हुए, इसे बहुंसख्यकों के प्रति दोहरा रवैया बताकर, सांप्रदायिक विभाजन की अपनी रणनीति पर काम करते हैं। ‘लव जिहाद’ की ओट लेकर अल्पसंख्यक आयोग की तरह हिन्दू मानवाधिकार आयोग की ‘सख्त जरूरत’ की बात कही जाने लगी। इसके लिए प्रचारित किया गया कि विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू हेल्प लाइन का हिन्दू मानवाधिकार आयोग पहले से है। अब केंद्र सरकार को इस आयोग को कानूनन मान्यता देकर उसे कार्मिक और कानूनी अधिकार दे देना चाहिए।
हिन्दू अस्मिता के नाम पर ‘मेरठ बचाओं मंच’ जैसे संगठनों का निर्माण कर वे एक क्षेत्रीय आक्रामक अस्मितावादी सांप्रदायिकता को भड़काने की फिराक में हैं। खरखौदा प्रकरण की वास्तविकता के बाद वे थोड़ा ठहर भले सकते हैं। पर वे उस सांप्रदायिक जेहनियत के विस्तार में और तेजी लाएँगे, जिसे हमारे समाज में निहित पितृसत्ता खाद-पानी देती है। वे इसको प्रचारित करेंगे कि एक हिंदू लड़की जो एक मुसलमान के पास चली गई थी, को वापस लाने के लिए उन्होंने यह सब किया। जिसका, उनको समाज का रुढि़वादी ढाँचा मौन स्वीकृति देता है। ऐसे में हमें व्यापकता में प्रेम संबन्धों पर अपनी जेहनियत का विस्तार करना होगा। सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर 1857 की साझी शहादत और साझी विरासत की नगरी मेरठ को ठहर कर सोचना होगा, नहीं तो वे उसके इस ऐतिहासिक ढाँचे को ध्वस्त कर देंगे।
-राजीव कुमार यादव
मोबाइल: 09452800752
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
दिसम्बर –2014

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प्रधानमंत्री जी, यह कर्जे कारपोरेट सेक्टर को पिछले एनडीए सरकार में दिए गए थे और अब फिर एनडीए सरकार आ गई है इन लोगों ने एक भी रुपया अदा नहीं किया है।
क्र0सं0 ऋण जो अदा नहीं किया गया (एनपीए. करोड़ रूपये में)
1. किंगफिशयर एयरलाइन 2673
2. विनसम डायमंड एंड ज्वैलरी कं.लि. 2660
3. इलेक्ट्रोथर्म इंडिया लि. 2211
4. जूम डेवलपर्स प्रा.लि. 1810
5. स्टेरलिंग बायोटेक लि. 1792
6. एस कुमार्स नेशनवाइड लि. 1692
7. सूर्यविनायक इंडस्ट्रीज लि. 1446
8. कार्पोरेट इस्पात एलोइज लि. 1360
9. फोरएवर प्रीशियस ज्वैलरी एंड डायमंड 1254
10. स्टेरलिंग आयल रिसोर्स लि. 1197
11. वरूण इंडस्ट्रीज लि. 1129
12. आर्किड केमिकल्स फार्मास्यूटिकल्स लि. 938
13. केमरोक इन्डस्ट्रीज एंड एक्सपोर्ट्स लि. 929
14. मुरली इंडस्ट्रीज एंड एक्सपोटर््स लि. 884
15. नेशनल एग्रीकल्चरल कोआपरेटिव 862
16. एसटीसीएल लि. 860
17. सूर्य फार्मा प्रा.लि. 726
18. जाइलोग सिस्ट्म्स (इंडिया) लि. 715
19. पिक्सीओन मीडिया प्रा.लि. 712
20. डेक्कन क्रोमिकल होल्डिंग्स लि. 700
21. केएस आयल रिसोर्सेज लि. 678
22. आईसीएसए (इंडिया) लि. 646
23. इंडियन टेक्नोमेक कं.लि. 629
24. सेन्चुरी कम्युनिकेशन लि. 624
25. मोजरबेयर इंडिया लि. एण्ड ग्रुप कम्पनीज 581
26. पीएसएल लि. 577
27. आईसीएसए इंडिया लि. 545
28. लेंको होसकोर्ट हाइवे लि. 533
29. हाउसिंग डेवलपमेंट एण्ड इन्फ्रा लि. 526
30. एम.बी.एस. ज्वैलर्स लि. 524
31. यूरोनियन प्रोजेक्ट्स एण्ड
एविएशन लि. स्कूल मेन 510
32. लियो मेरीडियन इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स 483
33. पर्ल स्टूडियोज प्रा.लि. 483
34. एडुकोम्प इन्फ्रास्ट्रक्चर एण्ड स्कूल मेन 447
35. जैन इन्फ्राप्रोजेक्ट्स लि. 472
36. के.एम.पी. एक्सप्रेस वे लि. 461
37. प्रदीप ओवरसीज लि. 437
38. रजत फार्मा/रजत ग्रुप 434
39. बंगाल इंडिया ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर लि. 428
40. स्टेरलिंग एसईजेड एण्ड इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा.लि. 408
41. शाह एलोइज लि. 408
42. शिववाणी आॅयल एण्ड गैस एक्सप्लोरेशन लि. 406
43. आंध्र प्रदेश राजीव स्वगृह कार्यों लि. 385
44. प्रोग्रेसिव कन्स्ट्रक्शन लि. 351
45. दिल्ली एयरपोर्ट मेट एक्स लि. 346
46. ग्वालियर झांसी एक्सप्रेसवे लि. 346
47. एल्पस इन्डस्ट्रीज लि. 338
48. स्टेरलिंग पोर्ट लि. 334
49. अभिजीत फेर्रोटेक लि. 333
50. सुजाना यूनिवर्सल इन्डस्ट्रीज 330
कुल 40,528 करोड़ रूपये
आपसे अनुरोध है कि सार्वजनिक बैंक के 40,528 करोड़ रूपये वसूलने के लिए कोई व्यवस्था बनाए।
-उप सम्पादक
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित edc58-01

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इन्सानियत जब शर्मसार हुई

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में सबसे घिनौनी और मानवता को झकझोर कर रख देने वाली खबर कि इन्सान के रूप में दरिन्दों ने मुस्लिम महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के साथ (जाट समुदाय के लोगों ने) उनके परिवार के सदस्यों के सामने बलात्कार और अभद्रता का व्यवहार किया और उन्हें बन्दी बनाकर रखा। इनमें लिसा़, लांक, बहावड़ी, हसनपुर, मोहम्मदपुर, कुटबा कुटबी, बाग़पत और शामली के बहुत से गाँव प्रमुख हैं।
गाँव लाँक निवासी सलमा पत्नी शहज़ाद ने बताया कि गाँव में हिंसा तो 7 सितम्बर की नंगलामंदौड़ की महापंचायत के बाद से ही शुरू हो गई थी। लगभग रात 8:00 बजे दंगाई हमारे घर में आ गए। मैने अपने पति को वहाँ से भाग जाने के लिए कहा। दंगाइयों ने सबसे पहले तेल डालकर मेरी 4 महीने की बच्ची को जला दिया, फिर मेरे साथ अभद्रता का व्यवहार करने लगे। दंगाइयों में हमारा पड़ोसी कुलदीप और उसके साथ जाट समुदाय के ही अन्य लोग थे। उन्होंने मेरे साथ सामूहिक बलात्कार किया। मैं ऐसी ही हालत में वहाँ से भागी और पूरी रात ईख़ में छुपी रही। सुबह होने पर लोगों ने मुझे वहाँ से निकाला। अब मैं मलकपुरा कैम्प में रह रही हूँ। हमारे गाँव के प्रधान बिल्लू ने हमारी कोई मदद नहीं की। प्रमोद डीलर ने दंगाइयों को मुसलमानों के घर जलाने के लिए तेल दिया। कोई मेडिकल जाँच नहीं हुई। सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ने जाँच करने से इन्कार कर दिया था। बच्ची की एफ0आई0आर0 दर्ज हो चुकी है।
लाँक गाँव की ही निवासी वसीला खातून की 12 वर्षीय पुत्री शहनाज़ का सामूहिक बलात्कार कर उस पर तेज़ाब डालकर आग लगा दी। वसीला ने बताया कि दंगाई उनके पड़ोसी जाट और दलित समुदाय के ही थे। जिसमें नीरज कश्यप, संजीव और नीटू ने उसकी बच्ची के साथ बलात्कार किया। घर का सब सामान लूटकर आग लगा दी। उनकी बच्ची तड़प रही थी लेकिन वे वहाँ से अपनी जान बचाकर भागे और हसनपुर पहुँचे। रास्ते में जब बच्चों को भूख लगी तो खाने के लिए बच्चों को मिट्टी दी। इसके बाद उनको मलकपुर भेज दिया गया। जहाँ पर 10 दिन बाद एफ0आई0आर0 दर्ज की गई।
गाँव लिसा़ निवासी 70 वर्षीय असग़री ने हमे बताया कि जब गाँव में दंगा शुरू हो गया तो हम अपना घर छोड़कर भागने लगे तो दंगाई हमारे घर में आ गए उनके हाथों में हथियार थे। दंगाई जाट समुदाय के थे। जिनमें हमारे पड़ोसी मुकेश और आर्यन भी शामिल थे। दंगाइयों ने मेरे नाती उमरदीन को गड़ासे से गला काटकर मार दिया। फिर जब हम जान बचाकर भागे और हमारी बहू वकीला घर पर अकेली रह गई। मोहल्ले के बच्चों ने बाद में हमें बताया कि वकीला डर कर छत की ओर भागी लेकिन दंगाइयों ने उसे पकड़ कर खींच लिया और उसके साथ बलात्कार करने के बाद उसको तीन हिस्सों में काट दिया।
गाँव फुगाना निवासी ख़ुशीर्दा पत्नी नसीम अहमद, ने बताया कि 8 सितम्बर दोपहर 2:00 बजे 68 जाट समुदाय के लोग हाथों में हथियार लिए हमारे घर में आए। उनके साथ हमारे पड़ोसी गौरव, सुभाष, कपिल, उद्देश्य, अमरपाल और रॉकी भी शामिल थे। उन सब ने मेरे साथ सामूहिक बलात्कार किया और मुझसे कहने लगे कि अगर तुमने भागने की कोशिश की तो हम तुम्हें जान से मार डालेंगे। मैं ऐसी ही हालत में वहाँ से भागी। रात 11:30 बजे फोन पर सम्पर्क के ज़रिए मैं अपने पति से जोगिया खेड़ा के जंगल में मिली। थाना फुगाना में हमारी एफ0आई0आर0 दर्ज नहीं की गई। सरकारी अस्पताल गए तो डॉक्टर ने मेडिकल जाँच करने से इन्कार कर दिया। एस0पी0 कल्पना ने कहा कि ’तुम झूठे केस लिए फिरते हो’। इसके बाद से हम जौला गाँव में रह रहे हैं। हमारी एफ0आई0आर0 दर्ज हो चुकी है। फुगाना निवासी फ़हमीदा पत्नी युसुफ़, घर पर अकेली थी। बच्चों को पहले ही बु़ाना भेज दिया था। पति भी घर पर नहीं थे। 8 सितम्बर दोपहर करीब 2:00 बजे जाट और सैनी समुदाय के 6 लोग सचिन, वेदपाल, नेक सिंह सैनी, राजपाल, नरेन्द्र और योगेश ने हमारे घर पर हमला बोल दिया। सभी लोग हमारे मोहल्ले के ही थे। सबके हाथों में हथियार थे। मैं डर कर भागने लगी तो उन्होंने मेरी चोटी खींच ली और फिर मेरे हाथपैर पकड़े और मेरे साथ ज़बरदस्ती करने लगे। उन्होंने सामूहिक रूप से मेरे साथ बलात्कार किया, और मैं बेहोश हो गई। जब मुझे होश आया तो मै अपनी जान बचाकर वहाँ से भागी और मैं लोई गाँव पहुँची। फिर सरकारी अस्पताल गई, डाक्टर ने मेडिकल जाँच करने से इन्कार कर दिया। इसके बाद जोगिया खेड़ा आई और फिर 15 दिन बाद यहाँ मेरी मेडिकल जाँच हुई। एफ0आई0आर0 दर्ज हो चुकी है।
गाँव फुगाना निवासी शबनम पत्नी शहज़ाद, ने बताया कि जब गाँव में दंगा शुरू हो गया तो प्रधान हरपाल ने मुसलमानों से विनती की कि वे गाँव छोड़कर न जाएँ। 8 सितम्बर की सुबह 45 लोगों ने घर पर हमला किया। उनके हाथों में हथियार थे। अपने पति को मैंने जान बचाकर भाग जाने के लिए कहा। बच्चे और मैं घर पर ही थे। दंगाइयों में राहुल, सुधीर और मोहित भी शामिल थे। सभी दंगाई जाट समुदाय के थे। उन्होंने मेरे बच्चों की नज़रों के सामने ही मेरा सामूहिक रूप से बलात्कार किया। सब सामान लूट लिया, घर जला दिया, कुछ नहीं छोड़ा। हमारे मोहल्ले में 16 घर मुसलमानों के थे, दंगे में सभी घर जला दिए गए। सेना ने हमें वहाँ से निकाला। मेडिकल जाँच नहीं हुई। डाक्टर ने कहा ’शादी शुदा की मेडिकल जाँच नहीं होती’। 15 दिन बाद एफ0आई0आर0 दर्ज हुई। सरकारी मेडिकल जाँच अभी तक नहीं हुई।
गाँव फुगाना की ही 22 वर्षीय फ़रज़ाना पत्नी शकील, ने बताया कि 8 सितम्बर हम अपने घर पर बैठे हुए थे तो शोर की आवाज़ सुनकर मेरे पति बाहर गए, इतने में जाट समुदाय के करीब 5 आदमी हाथों में हथियार लिए हुए हमारे घर में दाखिल हुए। मेरे साथ ज़बरदस्ती करने लगे। उन्होंने मेरे हाथपैर पकड़े और मुझे नीचे गिरा दिया, और सब ने बारीबारी से मेरे साथ बलात्कार किया। उनमें 3 मेरे पड़ौसी बदलू, नीरु और अमरदीप भी शामिल थे। मैं वहाँ से भागकर जोगिया खेड़ा पहुँची। अस्पताल गई तो डॉक्टर ने मेडिकल जाँच करने इन्कार कर दिया। 8 दिन बाद एफ0आई0आर0 दर्ज हुई।
गाँव फुगाना की एक और महिला 22 वर्षीय तस्मीम पत्नी मुस्तकीम ने हमें बताया कि 8 सितम्बर की सुबह 4 आदमी ज़बरदस्ती घर में आए, सबके हाथों में हथियार थे। घर में घुसने के बाद उन्होंने तोड़फोड़ की और फिर मेरे साथ हाथापाई करने लगे। सभी जाट थे। उन चारों ने मेरे साथ सामूहिक बलात्कार किया। मैं सभी को अच्छी तरह से जानती थी। उनके नाम हैं संजीव, रामदीन, रूपेश और पशमिन्दर। इसके बाद रामदीन ने कहा कि डीज़ल ले आओ इनके घर को आग लगा दो। मैं वहाँ से जान बचाकर भागी। मेरे घर के सभी लोग जोगिया खेड़ा में थे। कोई मेडिकल जाँच नहीं हुई, और एफ0आई0आर0 भी दर्ज नहीं है। जोगिया खेड़ा थाने में गई तो पुलिस ने कहा कि अपने थाने जाओ।
न जाने कितनी महिलाओं और लड़कियों को बलात्कार करने के बाद मार दिया गया और न जाने कितनी अभी तक लापता हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल
मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के कस्बों और गाँवों में जब साम्प्रदायिकता का तांडव चल रहा था और चारो ओर हाहाकार और कोहराम मच रहा था। वहीं कुछ ऐसे गाँव भी हैं जहाँ पर हिन्दूमुस्लिम-जाट ने अपने गाँवों में हिंसा न होने देने के लिए पंचायतें कीं। इन गाँवों में से घासीपुरा, हरसौली और निरमानी गाँव का हमने दौरा किया।
सबसे पहले हम निरमानी गाँव पहुँचे 6000 की आबादी वाले इस गाँव में 2000 से ज़्यादा मुसलमान हैं। जिनमें अधिकतर मुस्लिमजाट हैं। हमारी मुलाकात पूर्व सरपंच और पूर्व प्रधान एनुद्दीन से हुईं। उस समय उनकी बैठक पर दोनों समुदायों के 50 लोग बैठे थे। उन्होंने हमें बताया कि, ’’इस गाँव से न तो कोई पलायन हुआ और न ही हिंसा। हाल की घटनाओं का ज़िक्र करते हुए उनका गला भर आया, उन्होंने बताया कि सच कहूँ तो 7 तारीख़ के झगड़े के बाद मुँह तक खाना नहीं गया। कई दिन रोते रहे, दुःख इस बात का है जाटमुस्लिम भाईचारा क्यों टूटा? हमें साज़िश करके लड़या गया है। शासनप्रशासन की भूमिका और भाजपा की चाल को नई पी़ी समझ नहीं रही है। महापंचायत को उनके हवाले कर दिया गया। उन्होंने कहा, कि हमें किसी से कोई शिकवा नही हमारे जाट भाइयों में क्यों बिगाड़ आया?’’
बु़ाना मार्ग पर ही थोड़ा सा आगे हरसौली गाँव में बलियान खाप के थांबेदार चौधरी तपे सिंह की चौपाल पर हिन्दूमुस्लिम एकत्र थे। क़रीब 15000 आबादी वाले इस गाँव में उनकी संख्या करीब आधीआधी है। यहाँ पर हिन्दू जाट भी हैं ओर मुस्लिम जाट भी हैं। तपे सिंह कहते हैं इस गाँव में हम लोग (जाटमुले जाट) एक दादा की औलाद हैं। दादी दो थीं एक के हम हैं और एक के वे। सन 1947 में भी हमने महापंचायत करके तय कर लिया था कि बाहरी लोगों से ख़ुद निपट लेंगे। इस बार भी पंचायत कर तय कर लिया था कि न फ़साद करेंगे न पलायन होने देंगे। नाम गिनाते हुए कहते हैं कि हमारे दूसरे गाँवों में कहीं झगड़े नहीं हुए। सिफ़र पुरबालियान में फ़साद हुआ। वह हमारा आधा गाँव है। अब कोशिश करेंगे कि जहाँ झगड़े हुए हैं वहाँ कमेटियाँ बना कर दिलों की दूरियाँ कम की जाएँ।
साम्प्रदायिक एकता की मिसाल गाँव ॔घासीपुरा’
मेरठ की ओर क़रीब 11 किमी. चलने के बाद घासीपुरा भी मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले का ही एक गाँव है। इस गाँव ने भी साम्प्रदायिकता की आग को अपनी सरहदों तक नहीं आने दिया। वहाँ पहुँचने पर हमने देखा कि यहाँ हिन्दू मुसलमानों को ाढ़स बँधा रहे थे। सबसे पहले हमारी बात गाँव के बुजुर्ग 62 वर्षीय नेत्रपाल से हुई, उन्होंने कहा, घासीपुरा गाँव में कुछ नहीं हो सकता। क्योंकि यहाँ के बच्चे अब भी बुज़ुर्गों की बात मानते हैं। नेत्रपाल की बात में दम था।
एक और युवा प्रवीण सिंह ने नेत्रपाल की बात की तस्दीक की, उसने भी बताया कि गाँव के लोगों के मिलनसार होने की वजह यह है कि सभी बुज़ुर्गों की बात मानते हैं।
पास खड़े 49 वर्षीय अफ़ज़ाल ने बताया ’’मैं बचपन से इस गाँव में रह रहा हूँ। यहाँ के लोगों में मोहब्बत है। यही वजह है कि यहाँ से मात्र चारपाँच कि.मी. दूर पुरबालियान में फ़ायरिंग हुई, लेकिन हमें फिर भी कोई डर नहीं है। हमें अपने गाँव के लोगों की मोहब्बत पर पूरा भरोसा है।’’
हिंसा का शिकार हुआ मन्सूरपुर भी घासीपुरा से लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर है। यहाँ मौजूद लोगों के चेहरे देखकर यह कहना मुश्किल है कौन हिन्दू है? कौन मुसलमान? घासीपुरा, निरमानी और हरसौली मुजफ़्फ़नगर के शायद अकेले ऐसे गाँव नहीं हैं जहाँ गाँव वाले नफ़रत से आपस में नहीं लड़ रहे हैं। हो सकता है ऐसे और भी गाँव हों। देखना यह है कि अफ़वाहों और नफ़रत के इस जंग में प्रशासन इनका साथ दे पाता है या नहीं। दंगा प्रभावित क्षेत्र
मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के क़रीब 100 गाँव दंगे से बुरी तरह प्रभवित हुए। 54 गाँवों से एक समुदाय के लगभग 50,000 से अधिक लोग हिंसा के बाद पलायन कर गए। 40 से भी ज़्यादा जगहों पर शरणार्थियों को जगह मिली है। छोटी सरकार से बड़ी सरकार तक ज़िले में पहुँचीं, लेकिन अभी तक कोई भी ऐसा ब्लूप्रिन्ट सामने नहीं आया जिससे पलायन कर गए लोगों को वापस उनके गाँव लौटाया जा सके। प्रशासन के स्तर पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हल़फ़नामे के अनुसार मुज़फफ़रनगर के 54 गाँव, शामली ज़िले के 31 और शामली के 23 गाँवों से लोगों ने हिंसा के बाद पलायन किया। लगभग 40 ऐसे गाँव हैं जहाँ से लोग दहशत के चलते घर छोड़कर चले गए। दोनों ज़िलों में 31 जगहों के लोग बड़े दिलवाले निकले और पलायन कर गए लोगों को शरण दी।
मुज़फफ़रनगर : बराल, बावली, सोंठा, बदरखा, किशनपुर, शेरपुर, धनौरा, लोहीरा, बामजोली, बिहारीपुर, माँगोजोली, आलम माजरा, डोंगर, हटाना, शीरी ख़ुर्द, खेड़ा, भोपा, लांक, मन्सूरपुर, खतौली,, शाहपुर बसी, धौलरा, ग़ी, गोड़ा, गोयला, बु़ाना, काकड़ा, सिसौली, कुरावली, खरड़, मोहम्मद पुर, खैनी ग़ी, रामराज सिखरेड़ा, करवा, टिकरी, तगाना, पैरोरी, उमरपुर, बुन्दुखेड़ा, लाख बावड़ी, हरौली गाँव, नागंल, भगवानपुर और मुज़फफरनगर शहर समेत 54 गाँवों में साम्प्रदायिक हिंसा हुई। जिसमें फुगाना, लिहसा़, जौली गंगनहर बहावड़ी और कुटबा कुटबी में सबसे ज़्यादा हिंसा हुई।
शामली : कुरमाली, थानाभवन और शामली शहर समेत शामली ज़िले के 23 गाँव हिंसा की चपेट में आ गए।
मेरठ : मवाना, बहसूमा, निलोहा, हस्तिनापुर में भी हिंसा हुई और मेरठ शहर में अभी भी स्थिति तनाव पूर्ण बनी हुई है।
बाग़पत : छपरौली, बड़ौत और बाग़पत शहर आदि में भी हिंसा हुई।
सहारनपुर : देवबन्द, गंगोह, रामपुर मनिहारान, नागल समेत सहारनपुर शहर में भी हिंसा हुई।
इस साम्प्रदायिक दंगे के परिणाम स्वरूप पिश्चमी उ0प्र0 के मुरादाबाद ज़िले समेत पूर्वी उ0प्र0 में भी तनाव व्याप्त है। हुआ यूँ कि मुरादाबाद हिन्दू महासभा के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा समुदाय विशोष को लेकर पोस्टर पर प्रतिकूल टिप्पणी से शहर में साम्प्रदायिक तनाव हो गया। पूर्वी उ0प्र0 के कई क्षेत्ऱों से भी साम्प्रदायिक हिंसा की ख़बरें मिलीं। जिसमें बहराइच के दर्जीपुरवा क्षेत्र में रात 10:30 बजे लाउड स्पीकर को लेकर बवाल हो गया जिसमें 24 लोग घायल हो गए। कुशीनगर में शव दफ़न करने को लेकर एक वर्ग लामबन्द हुआ और बनारस के चार भाजपा विधायकों ने 12.9.2013 को उग्र भाषण देते हुए मुज़फ्फरनगर की तरफ़ कूच किया लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया उसके बाद वे अनशन पर बैठ गए।
दंगे में पुलिस की पक्षपात पूर्ण भूमिका के लिए डी.आई.जी. समेत कुछ अधिकारियों को स्थानान्ति्रत किया गया। गृह सचिव कमल सक्सेना के अनुसार, सहारनपुर रेंज में डी.आई.जी. डी.सी. मिश्रा की जगह अशोक मुथा जैन, मुज़फ़्फ़रनगर में एस.एस.पी. सुभाष चन्द्र दुबे की जगह प्रवीण कुमार और शामली के एस.पी. अब्दुल हमीद की जगह अनिल कुमार राय की तैनाती की गई। दंगा भड़काने के आरोप में लगभग 800 लोगों के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज किया गया है।
ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर के डी.एम. कौशल राज शर्मा ने बताया कि शासन ने कंवाल के अलावा हिंसा में मरे तमाम लोगों को 1010 लाख रुपये, गम्भीर रुप से घायलों को 5050 हज़ार रुपये और घायलों को 2020 हज़ार रुपये देने के आदेश दिए हैं। उन्होंने बताया कि हिंसा में हुए नुकसान का आंकलन कराया जा रहा है। इस नुकसान की मुआवज़ा राशि पीड़ित परिवारों को दी जाएगी। इनमें शाहनवाज़, सचिन और गौरव भी शामिल हैं।
दंगे में हुए कुछ घायल और मृतक
सरकारी आँकड़ों के अनुसार मृतकों की संख्या 5060 है, जबकि कैम्पों में रह रहे प्रत्यक्षदिशर्यों के अनुसार इस साम्प्रदायिक हिंसा में घायलों और मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक है। जिन परिवारों से हमारा सम्पर्क हुआ, और हमने बातचीत की उन परिवारों के मृतकों की सूची अग्रलिखित हैः
सूची मृतक दिनांक07.09.2013 की घटना थाना ’भोपा’

1. सोहनबीर पुत्र कृपाल सिंह, निवासी भोकरहेड़ी, थाना, भोपा, मुजफ्फरनगर।
2. अजय पुत्र करण, निवासी सहमतपुर, थाना भोपा, मुजफ्फरनगर।
3. ब्रजपाल पुत्र हुकम सिंह, निवासी बसेडा़, थाना छपार, मुजफ्फरनगर।
4. नज़र मोहम्मद पुत्र मूसा, निवासी खेड़ी फिरोज़ाबाद, थाना ककरौली, मुजफ्फरनगर।
5. सलमान पुत्र उमर, निवासी तेवड़ा, थाना ककरौली, मुजफ्फरनगर
6. लताफत पुत्र मुस्तफ़ा, निवासी खेड़ी फ़िरोज़ाबाद, थाना ककरौली, मुजफ्फरनगर।
7. मोहम्मद नाज़िम पुत्र मुस्तफ़ा सैफ़ी, निवासी लाक, थाना फुगाना, शामली
सूची मृतक गाँव ’लाक’ दिनांक8.9.2013
1. अबलू लुहार, पट्टी भिटरवल सन्नी वाला
2. कासिम डोम, पट्टी मोघा
3. नसरु धोबी ज़िन्दा जला दिया गया।
4. 9 सितम्बर को एक महिला और उसके बेटे का मृतक शरीर प्रप्त हुआ। 8.9.2013 को ही फुगाना में भी 5 लोगों की हत्या की गई।
5. यामीन धोबी ज़िन्दा जला दिया गया।
6. ताहिर पुत्र गंजा वहीद
7. गंजा वहीद की पुत्रवधु
8. गंजा वहीद का एक और पुत्र
9. मेहरदीन तेली, पट्टी मोघा
मृतक सूची गाँव ’बजीटपुर’ दिनांक8.9.2013
1. यामीन का नाती
2. इकबाल, धोबी
घायल : 1. यामीन 2. कमरुद्दीन
सूची मृतक गाँव ’लिसा़’
दिनांक8.9.2013
1. नब्बू धोबी
2. मन्ज़ूरा
3. सिराजुद्दीन और उसकी पत्नी
4. करमू लुहार और उसकी पत्नी
5. भुट्टू परिवार के 7 सदस्य (जीवाँ धोबी, जीवाँ धोबी की पत्नी, बेटा, और जीवाँ धोबी के 2 नाती)
6. बाटी लुहार, आदि
7. एक ही दिन में 14 लोगों की हत्या की गई और अन्य कई घायल हुए।
8. 8.9.2013 को कुटबा गाँव में 4 लोगों की हत्या की गई।
मृतक सूची गाँव ’बहावड़ी, कुरमाली, खरड और हिंडोली 9.9.2013
1. इकरा पुत्री दिलशाद
2. हसीना पत्नी छज्जू
3. दिलशाद पुत्र छज्जू
4. अज़रा पुत्री आस मोहम्मद
5. ताजुद्दीन
6. शकील धोबी पुत्र जमील अहमद, 40 वर्ष
7. हाफ़िज़ साहेब कारी उमर दराज़
8. जुम्मा पुत्र दीनू को मस्जिद समेत जला दिया गया।
9. सग़ीर मनिहार
गाँव ’लिसा़’ में हुई हिंसा और हत्याओं में संलिप्त असामाजिक तत्वों की सूची
यह सूचना उन व्यक्तियों के द्वारा हमें दी गई जिन परिवारों से लोग घायल हुए और लोगों की मृत्यु हुई
1. सुक्खा पुत्र भूरा
2. अन्जु
3. कपिल पुत्र सतेन्द्र फौजी
4. सुरेन्द्र पुत्र खुब्बी
5. अनुज पुत्र चन्दर
6. बीनू पुत्र शानू
7. तोशी पुत्र महेन्द्र
8. सन्दीप पुत्र जीवन
9. मोनू पुत्र बिजेन्द्र फौजी
10. सुरेन्द्र उर्फ काला पुत्र माँगी
11. बबलू पुत्र श्याम
12. ऋषिपाल
13. सुरेन्द्र पुत्र चाही
14. बाबा हरिकिशन
15. राजेन्द्र मलिक पुत्र बाबा हरिकिशन
16. नीटू पुत्र रतन सिंह
17. बिजेन्द्र मलिक पुत्र बाबा हरिकिशन
18. सीतु पुत्र सत्य प्रकाश
19. सत्य प्रकाश पुत्र घासी
20. नीटु पुत्र नवाब कोडा
21. अमित पुत्र किशन, सुनार
22. विकास पुत्र सुखपाल
23. मिन्डा पुत्र सुखपाल
24. मनीष पुत्र स्वराज
25. चन्द्र पुत्र मिम्बर
26. बिट्टू पुत्र अत्तर सिंह
27. अंकुश पुत्र सतबीर और अन्य।
गाँव ’लाँक’ में हुई हिंसा और हत्याओं में संलिप्त असामाजिक तत्वों की सूची
यह सुचना उन व्यक्तियों के द्वारा हमें दी गई जिन परिवारों से लोग घायल हुए और लोगों की मृत्यु हुई
1. वीरपाल नाई का भतीजा
2. डॉ0 सुखदेव उर्फ डॉ0 काला का बेटा और माँगी लाल का नाती, पट्टी मोघा
3. चिराग पुत्र रामपाल गिरोलिया
4. पुत्र डॉ0 शिव कुमार और अन्य
5. धरमपाल झींवर
6. शौकिन्द्र प्रधान, सहयोगी, हुकम सिंह
7. धीरज पुत्र भोपाल
8. गाँधी पुत्र मास्टर सत्यपाल
9. भारत पुत्र भौंदा और नाती पूर्व प्रधान मेहर सिंह
10. भौंदा पुत्र मेहर सिंह
11. नवभारत
12. ओमपाल, पट्टी सालान
13.कपिल पुत्र ओमपाल सचिव, पट्टी सालान
14. पुत्र, डॉ0 नरेन्द्र पण्डित
15. विनोद उर्फ मांगी जोगी का जमाई
16. चमन पुत्र सोहन
17. निप्पल पुत्र मास्टर रणधीर
18. सुधीर उर्फ बिल्लू प्रधान
19. महाराज सिंह पुत्र भीम सिंह
20. राज सिंह पुत्र भीम सिंह
21. सचिन पुत्र साहब सिंह फ़ौजी, पट्टी
22. साहब सिंह, पट्टी मोघा
23. बब्लू पुत्र सोहनधर
24. दीपक पुत्र मास्टर जसवन्त
25. राहुल मलिक पुत्र राजबीर, पट्टी सालान
प्रशासन की भूमिका
पिछले वर्ष हुए साम्प्रदायिक दंगों कोसीकलाँ, प्रतापग़, बरेली, गाज़ियाबाद और फ़ैज़ाबाद आदि की कड़ुवाहट अभी ख़त्म भी नहीं हो पाई थी कि इन दंगों की कड़ी में हाल ही में मुज़फ़्फ़रनगर में जाट और मुस्लिमों के बीच साम्प्रदायिक दंगा भड़क उठा। इस दंगे को आज़ाद हिन्दुस्तान में गुजरात के बाद सबसे बड़ा दंगा कहा जा रहा है। इस क्षेत्र में इमेरजेंसी के समय दंगा भड़का था लेकिन उसकी सूरत ऐसी नहीं थी जिसको देखकर मुर्दा दिल भी पसीज जाए। इस साम्प्रदायिक दंगे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मुसलमानों का न कोई मार्गदशर्क है और न ही कोई उनकी सुनने वाला है। राजनैतिक गलियों में मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक समझा जाता है और कुछ नहीं। इस दंगे को आर.एस.एस. की साज़िश बताया जा रहा है, और कुछ लोग इसे सरकार की नाकामी का नाम दे रहे हैं। दंगे में मरने वालों में सबसे अधिक संख्या में मुसलमान हैं विशोष रूप से बुर्जुगों और मुस्लिम लड़कियों को निशाना बनाया गया। जिन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी कम है वहाँ खास तौर से मुसलमानों पर हमले हुए। उ0प्र0 सरकार ने मौक़े पर लापरवाही बरती है। यह सब सरकार और प्रशासन की सुस्ती का नतीजा है। प्रशासन ने समय पर कार्यवाही न करके एक बार फिर निष्क्रियता का परिचय दिया है। पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता के चलते साम्प्रदायिक तत्व अपने नापाक मंसूबों में कामयाब होते जा रहे हैं।
दंगे के दौरान प्रशासन का रवैया
मुज़फ़्फ़रनगर दंगों को लेकर उ0प्र0 सरकार संदेह के घेरे में है। जब सरकार को इन हालात के बारे में मालूम था तो उन्होंने समय रहते कार्यवाही क्यों नहीं की। यह पहली बार हुआ कि एक के बाद एक मुस्लिम संगठन अखिलेश सरकार हटाने की माँग करने लगे। साम्प्रदायिकता के खेल के दूसरे सिरे पर भा.ज.पा. है जिसे उ0प्र0 जैसे बड़े राज्य में हमेशा किसी ऐसे अवसर की तलाश रहती है। पिछले अवसरों के मुक़ाबले में इस बार फ़र्क सिफ़र इतना है कि यह माहौल बनाकर मुलायम सिंह और इनकी पार्टी की सरकार ने भाजपा को यह अवसर सौग़ात में दे दिया। चौरासी कोसी परिक्रमा की नाकाम कोशिश के बहाने जो भा.ज.पा. नहीं कर पाई वो रास्ता समाजवादी पार्टी ने उसके लिए आसान कर दिया। यही नहीं मुज़फ्फरनगर के इस दंगे ने चौधरी चरण सिंह के समय से बनी मुस्लिम और जाटों की बरसों पुरानी एकता को भी तोड़ दिया। दंगे पहली बार शहर से निकलकर गाँव तक पहुँच गए। दंगों पर अफ़सोस करने वाले भाजपा नेताओं की दबी हुई ख़ुशी उनके चेहरों से देखते ही झलकती है।
भाजपा के सभी नेता अपनी सफ़ाई पेश करने में लगे हैं, और महापंचायत का ठीकरा एक दूसरे के सर पर फोड़ रहे हैं। यह महापंचायत ही मुज़फ़्फ़रनगर के दंगे की जड़ बनी। भाजपा नेताओं ने पंचायत में जाटों को मुसलमानो के ख़िलाफ़ भड़काया। अब यह सभी नेता ख़ुद को बेगुनाह बता रहे हैं और इस महापंचायत को ’’बेटी बचाओ पंचायत’’ का नाम दे रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि ’बेटी बचाओ पंचायत’ में हथियारों की क्या ज़रुरत थी। जो लोग हाथों में लाठी, डंडे और नंगी तलवारें लेकर आए, प्रशासन ने उनको क्यों नहीं रोका और पंचायत में मुसलमानों के खिलाफ़ ज़हर क्यों उगला गया। इन सभी बातों से यह साबित होता है कि यह महापंचायत एक सोची समझी साज़िशके तहत बुलाई गई थी। दंगा भड़काने के इल्ज़ाम में भाजपा के कई बड़े नेता, हुकम सिंह, सुरेश राना, भारतेंदु संगीत सोम, साध्वी प्राची और इनके अलावा चौ0 टिकैत के दोनों बेटे नरेश टिकैत, राकेश टिकैत और हरिन्दर मलिक और ’बहुजन समाज पार्टी’ के नूर सलीम राना और कादिर राना पर भी मुक़द्मा दर्ज किया गया था। इनमें भाजपा के सुरेश राणा और संगीत सिंह सोम को गिरफ़्तार कर लिया गया। संगीत सिंह सोम और भाजपा विधायक सुरेश राणा पर 31 अगस्त और 7 सितम्बर की नंगला मंदौड़ की महापंचायत में भड़काऊ भाषण देने और हिंसा भड़काने के आरोप में रासुका लगाई गई।
1. पिछले 89 महीनों से ज़िले में साम्प्रदायिक प्रक्रिया के संकेत दिखाई दे रहे थे। लेकिन प्रशासन और राज्य खुफ़िया विभाग ख़तरे का आंकलन करने में विफ़ल रहा या नफ़रत फैलाने में संघ के साथ मिल गया।
2. जब एस0एच0ओ0 फुगाना, एस0एच0ओ0 भौंराकला और एस0एस0पी0 ने कोई जवाब नहीं दिया, तो सहारनपुर रेंज के आयुक्त सेना के साथ गाँव के लिए रवाना हुए। उन्होंने 2000 से अधिक लोगों की जान बचाई।
3. अधिकांश एफ0आई0आर0 नाम से पंजीकृत हो रही हैं, लेकिन आरोपी अभी भी मुक्त घूम रहे हैं।
4. गाँव लिसाड़ के अजीत प्रधान साम्प्रदायिक हिंसा के समय पुलिस के साथ था। वह लगभग 20 एफ0आई0आर0 में नामित किया गया है।
5. इन पुलिस थानों में तैनात अधिकांश पुलिस कर्मियों में जो जाट समुदाय से थे, वे दंगाइयों के साथ मिल गए थे।
6. पुलिस कर्मियों में से अधिकांश अपने व्यवहार में अत्यधिक पक्षपातपूर्ण थे।
7. कई दंगा पीड़ितों ने हमें बताया, पुलिस कर्मियों ने उनसे कहा कि, ’’वे उन्हें नहीं बचा सकते क्योंकि वे मुसलमान हैं।’’
8. स्थानीय पुलिस थानों में तैनात लोग मुसलमानों के खिलाफ़ पक्षपातपूर्ण हैं। जिसके परिणाम स्वरूप थानों में मामले दर्ज नहीं किए जा रहे।
9. घटना के दिन , सुबह से ही अल्पसंख्यक समुदाय के लोग थाने में फोन कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने कोई भी प्रतिक्रिया करने से इन्कार कर दिया।
10. पर्याप्त पुलिस व्यवस्था भी परिस्थितियों को सँभाल नहीं सकी, जो कि पिछले 8 से 9 महीनों के लिए विकसित की गई थी।
नारे
1.’’तुमने दो को मारा है, हम सौ
कटवे मारेंगे।’’
2.’’सोनीसोनी लड़कियों के सिन्दूर
भर देंगे, बाकियों को काट देंगे।’’
3.’’ मोदी लाओ, देश बचाओ।’’
4.’’मोदी को लाना है, गोधरा बनाना
है।’’
5.’’देश, बहू और गाय को बचाना
है, तो नरेन्द्र मोदी को लाना है।’’
6’’मुसलमानों का एक स्थान
कब्रिस्तान या पाकिस्तान।’’

-डा0 मोहम्मद आरिफ

क्रमश:
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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रणधीर सिंह सुमन
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