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Posts Tagged ‘वियतनाम’


विडंबना यह है कि खेती में मज़दूर तो सरप्लस हैं लेकिन ज़मीन घट रही है। मज़दूरों की कमी को मशीनों से पूरा करने वालों के पास भी अभी भारत जैसे अन्न मुख्य आहार वाले देश में खेती के लिए ज़मीन का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए ग्रामीण आबादी के पलायन और खेती पर निर्भर आबादी की चिंता में ज़मीन को बचाने की चिंता भी अनिवार्य तौर पर शामिल होगी।

पूरी अर्थव्यवस्था को बदलने की ज़रूरत

एक खेत जितना एक या दो पीढ़ी के लिए पैदा कर सका, उसकी क़ीमत से कई गुना ज्यादा का उछाल उससे बग़ैर फसल लिए काॅलोनाइजर हासिल कर लेता है। आप एक एकड़ वाले किसान को या भूमिहीन मज़दूर को भला कैसे यह समझा सकते हैं कि अपनी छोटी जोत में खेती करते हुए अभी आधापेट खाकर रहो और अगली पीढ़ी को एक-चैथाई पेट खाने की आदत डालो लेकिन ज़मीन मत छोड़ो, खेती मत छोड़ो, क्योंकि लंबे समय में तुम्हारे लिए और इस संसार की खाद्य सुरक्षा के लिए यही ठीक है। यह हरगिज़ नहीं चल सकता। और अनेक बार हमने देखा कि यह नहीं चला। भूख और जीने की ज़रूरत को किसी भी ‘कृषिप्रधान देश की संस्कृति की दुहाई’ से नहीं ढका जा सकता, बल्कि इसके लिए ऐसे ठोस उपाय करने की ज़रूरत होगी जिससे खेती में लगे लोगों को सम्मानजनक रोज़गार और जीवन-सुरक्षा मिल सके। वरना बाज़ार और बाज़ार के मातहत चल रहा राज्य खेती में लगे लोगों के लिए वही विकल्प उपलब्ध करवाता रहेगा जैसे उसने विदर्भ या वारंगल और अनेक अन्य किसान आत्महत्या वाले इलाक़़ों के किसानों को दिए हैं।
बेशक एक जगह से जाकर दूसरी जगह बस जाने का लोगों का हर देश में हजारों वर्षों पुराना इतिहास है। कभी वे प्राकृतिक आपदाओं के चलते सुरक्षित जगहों की तलाश में गए, कभी सामाजिक-आर्थिक कारणों से। पंजाब से लोग कनाडा और इंग्लैंड गए, तमिलनाडु और आँध्रप्रदेश से कम्बोडिया, थाइलैंड और वियतनाम, केरल के लोग पहले बर्मा, श्रीलंका, सिंगापुर गए और बाद में जर्मनी, अमरीका और खाड़ी के देश। इसी तरह गुजरात के लोग भी अफ्रीका और यूरोप के अनेक देशों तक पहुँचे। उड़ीसा के लोग जावा-सुमात्रा पहुँचे तो भोजपुरी लोग फिजी, माॅरीषस, सूरीनाम, त्रिनिडाड, युगांडा तक। वे देषों की सरहदों के भीतर घूमते-भटकते रहे और उन्होंने पर्वतों-समुंदरों को भी लाँघा। अनेक दफ़ा वे गु़लाम मज़दूरों की तरह काम करने के लिए दुनिया के कोने-कोने में ले जाए गए।
पूँजीवाद का पूरा इतिहास संपत्ति संचय के लिए श्रम के शोषण और उसे एक जिंस की तरह इस्तेमाल करने का रहा है। जहाँ पूँजीवाद को ज़रूरत होती है वह उस दिशा में श्रम को पलायन पर मजबूर करता है। संभव हुआ तो ज़ंजीरों में जकड़कर, नहीं तो मोटी तनख़्वाह पर। दोनों ही तरह के पलायन और विस्थापन अंततः पूँजीवादी डिजाइन के ही हिस्से होते हैं जिसका मक़सद मुनाफ़ा होता है – किसी भी क़ीमत पर, और जब श्रम की ज़रूरत ख़त्म हो जाती है तब वह श्रम को अपने आप मरने मिटने के लिए छोड़ देता है। ज़ाहिर है हमारे लिए जो हल स्वीकार्य होगा उसमें मेहनतकश लोग केन्द्र में होंगे। हालाँकि हर जनसंघर्ष और उससे हासिल उपलब्धि का महत्त्व है लेकिन इस परिस्थिति से निपटने के लिए केवल खेती में नहीं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था में ही आमूलचूल परिवर्तन की ज़रूरत है, और अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि राजनीति से होते हैं।
-विनीत तिवारी
मो. 09893192740

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अमेरिकन साम्राज्यवाद की मौत नजदीक आ रही है। पूरी दुनिया को गुलाम बनाने का स्वप्न अधूरा रह जायेगा। ईरान ने आज अपने परमाणु कार्यक्रम को उसके लाख विरोध के बाद आगे बढ़ा दिया है। अमेरिकियों को दिखाने के लिये उसका टेलीकास्ट भी किया है। इसके साथ-साथ ईरान ने यूरोप के छह: देशों को तेल बेचने से भी मना कर दिया है। यह देश हैं इटली, फ्रांस, स्‍पेन, ग्रीस, नीदरलैंड, पुर्तगाल। इन देशों की पहले से अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं है। तेल न मिलने से और व्यवस्था ख़राब होगी। अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था पहले से ख़राब है। अमेरिकी जनता महंगाई, बेरोजगारी के खिलाफ आन्दोलनरत है। इन परिस्तिथियों में अमेरिका और इजराइल व उसके पिट्ठू देशों ने जो युधोन्माद ईरान के खिलाफ पैदा किया था। अगर वास्तविक लड़ाई पर आये तो निश्चित रूप से अमेरिकन साम्राज्यवाद को जबरदस्त धक्का लगेगा। अमेरिका द्वारा अघोषित रूप से शासित ईराक व पाकिस्तान भी ईरान के साथ खड़े होंगे।

चीन ने खुले आम घोषणा कर रखी है कि वह ईरान की मदद करेगा वहीँ भारत भी ईरान को छोड़ना नहीं चाहता है। अमेरिकी प्रयासों के बाद भी भारत ने तेल लेना बंद नहीं किया है और भारत अपने संबंधों को ईरान से ख़त्म नहीं करना चाहता है। ऐसी स्तिथियों में अगर अमेरिकी साम्राज्यवादी व उसके पिट्ठू मुल्क ईरान की तरफ अगर आँखें भी तरेरते हैं तो एशिया की बहुसंख्यक जनता व सरकारें अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब देंगी। जिस तरह से अमेरिकन्स आज भी वियतनाम की मार को भूल नहीं पाए हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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