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Posts Tagged ‘संस्कृत’

हिन्दू राष्ट्र की ओर..
मेरी जल्दी ही पदोन्नति हो गई, मैं मुख्य शिक्षक से कार्यवाह बना दिया गया, दोनों ही नियुक्तियाँ जबानी ही थी, किसी प्रकार का लिखित आदेश नहीं, जब स्वयंसेवकों को ही सदस्यता की कोई रसीद या पहचान पत्र देय नहीं है तो पदाधिकारियों को भी उसकी क्या जरुरत है? मैंने पूछा था इस बारे में भी तो जवाब मिला कि संघ में इस प्रकार की कागजी खानापूर्ति के लिए समय व्यर्थ करने की परम्परा नहीं है।
खैर, कार्यवाह बनने के बाद मेरी जिम्मेदारियों में प्रखण्ड (ब्लॉक) स्तरीय बैठकों में भाग लेना भी शामिल हो गया, जब मैं पहली बार दो दिवसीय बैठक में भाग लेने तहसील मुख्यालय मण्डल गया, तो साथ में बिस्तर, गणवेश, लाठी और खाने के लिए थाली कटोरी भी साथ ले जानी पड़ी। किराया भी खुद देना पड़ा और बैठक का निर्धारित शुल्क भी चुकाना पड़ा। रात का खाना भी घर से बाँधकर ले गया। दूसरे दिन भोर में तकरीबन 5 बजे विसल की आवाज से नींद खुली, नित्यकर्म से निवृत होने के बाद संस्कृत में प्रातः स्मरण
मधुर समवेत स्वरों में दोहराया गया, प्रातःकालीन शाखा लगी, दिन में पूरे प्रखण्ड में आरएसएस के काम का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। भोजन और बौद्धिक सत्र चले, अलग-अलग समूहों में बैठकर राष्ट्र की दशा और दिशा पर गंभीर चर्चा हुई, इस दो दिन के एकत्रीकरण से मुझे स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राष्ट्र निर्माण का कार्य ‘मानवीय’ न होकर ‘ईश्वरीय’ कार्य है, इसमंे काम करने का अवसर बिरले और नसीब वाले लोगों को ही मिलता है, संघ कोई संस्था नहीं है, यह तो व्यक्ति निर्माण का कारखाना है। जिससे हम जैसे संस्कारवान युवाओं का निर्माण हो रहा है, जिला स्तर से आए प्रचारक जी और संघ चालक जी ने बहुत ही प्रभावी उद्बोधन दिया, उनका एक-एक वाक्य मुझे वेद वाक्य लगा, कितने महान और तपस्वी लोग है ये, जिन्होंने अपना जीवन राष्ट्र सेवा में समर्पित कर दिया, मैंने भी मन ही मन निश्चय कर लिया कि अपना जीवन भी संघ के पवित्र उद्देश्यों को पूरा करने में लगाऊँगा। मैंने जीवन व्रती प्रचारक बनने की ठान ली।
हमें प्रचारक चाहिए विचारक नहीं
घर परिवार त्याग कर सन्यासी की भाँति जीवन जीते हुए राष्ट्र सेवा में स्वयं को समर्पित करने के लिए पूर्णकालिक प्रचारक बनने की अपनी इच्छा को मैंने संघ के जिला प्रचारक जी के समक्ष रखा, उनके द्वारा दिए गए लम्बे जवाब में से दो बातें अब तक मुझे जस की तस याद है।
मैं: भाई साहब मैं प्रचारक बनना चाहता हूँ।
जिला प्रचारक: बन्धु, आपके विचार तो बहुत सुन्दर हैं, लेकिन दृष्टि समग्र नहीं है, आज उत्साह में हो तो प्रचारक बन जाना चाहते हो, लेकिन हमारा समाज काफी विषम है, कल कोई आपसे नाम पूछेगा, गाँव पूछेगा और अंततः समाज (जाति) भी पूछेगा और अगर उन्हें पता चला कि ये प्रचारक जी तो वंचित (दलित) समुदाय से आए हैं, तो उनका व्यवहार बदल सकता है, तब अपमान का घूँट भी पीना पड़ेगा, मुझे मालूम है, आप यह नहीं सह पाओगे, दुखी हो जाओगे, प्रतिक्रिया करने लगोगे, वाद विवाद होगा, इससे संघ का काम बढ़ने के बजाए कमजोर हो जाएगा, इसलिए मेरा सुझाव है कि आप प्रचारक नहीं विस्तारक बन कर थोड़ा समय राष्ट्र सेवा में लगाओ।
जिला प्रचारक के इस जवाब से मैं बहुत दुखी हुआ, मुझे अपने निम्न समाज में पैदा होने पर कोफ्त होने लगी, पर इसमें मेरा क्या कसूर था? यह कैसी विडम्बना थी कि मैं अपना पूरा जीवन संघ के ईश्वरीय कार्य हेतु समर्पित करना चाहता था, लेकिन मेरी जाति इसमें आड़े आ रही थी, पर यह सोच कर मैंने खुद को तसल्ली दी कि महर्षि मनु के विधान के मुताबिक हम सेवकाई करने वाले शूद्र समुदाय हैं, अभी सम्पूर्ण हिन्दू समाज में हमारी स्वीकार्यता नहीं बन पाई है, खैर, कोई बात नहीं है, संघ सामाजिक समरसता के लिए प्रयासरत तो है ही, जल्दी ही वह वक्त भी आ जाएगा, जब मेरे जैसे वंचित समुदाय के स्वयंसेवक भी पूर्णकालिक प्रचारक बन कर अपना जीवन राष्ट्र सेवा में लगा पाएँगे, ये वे दिन थे जब मैंने लिखना शुरू कर दिया था, मैं शुरू शुरू में उग्र राष्ट्रभक्ति की कविताएँ लिखता था, मैंने एक हस्तलिखित पत्रिका ‘हिन्दू केसरी’ का पाकिस्तान मिटाओ अंक भी निकाला था, स्थानीय समाचार पत्रों में राष्ट्र चिंतन नाम से स्तम्भ लिखने लगा था, कई शाखाओं में गणवेश धारण किए हुए जाकर बौद्धिक दे आया था मैंने खुद को हिंदूवादी बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रखी थी, फिर भी मैं महसूस करता था कि मुझे वह स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है, जिसका मैं हकदार था, लेकिन उस दिन प्रचारक बनने के सवाल पर जो उनकी दूसरी बात थी, उसने मुझे अपनी औकात दिखा दी, प्रचारक जी ने मेरे सिर की तरफ इशारा करके मेरी बुद्धिजीविता का मखौल उड़ाते हुए साफ तौर पर कह दिया कि-आप जैसे ज्यादा सोचने वाले लोग केवल अपनी गर्दन के ऊपर-ऊपर मजबूत होते है, शारीरिक रूप से नहीं, वैसे भी संघ को ‘प्रचारक’ चाहिए, जो नागपुर से कही गई बात को वैसा का वैसा हिन्दू समाज तक पहँुचाए, आप की तरह के सदैव सवाल करने वाले विचारक हमें नहीं चाहिए और इस तरह मैं विचारक से प्रचारक बनते बनते रह गया।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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भगवा ही गुरु है हमारा
उन दिनों संस्कृत सीखने और याद करने की मैं हर तरह से कोशिशें करता था, कई श्लोक मुझे कंठस्थ थे, जिन्हें मैं धारा प्रवाह बोल सकता था, मुझे पंचांग देखने का भी नया-नया शौक लग गया था। भगवत गीता और सुन्दर कांड तथा हनुमान चालीसा तो दिनचर्या का अंग ही बन गई थी। शाखा में ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दू भूमे नमस्ते नमस्ते’ की प्रार्थना की जाती थी। तब तक हमारी शाखा को भगवा झंडा (ध्वज) नहीं मिला था, इसलिए हम लोग एक गोल घेरा बनाकर उसके मध्य में एक बिंदु लगा लेते थे और कल्पना करते थे कि उस स्थान पर भगवा ध्वज लहरा रहा है, उसी की छत्र छाया में हम भारत माता की स्तुति करते थे, हमें बताया गया था कि मनुष्यों के मन में तो विकार आ जाते है मगर निष्कलंक और वैराग्य के प्रतीक भगवा ध्वज में किसी प्रकार का कोई खोट नहीं आ सकता है, इसलिए संघ (आरएसएस) ने उसे अपना गुरु माना है गाँव में शाखा लगते हुए 6 माह हो चुके थे, विजयदशमी का पर्व आ गया था, जिला प्रचारक जी ने हमारी शाखा को
ध्वज प्रदान करने की घोषणा कर दी, हम खुशी से झूम उठे, हमें हमारा गुरु मिल गया था, अब हम निगुरे नहीं रहे, एक बड़े लोहे का सरिया, स्टैंड और सूती कपडे़ का भगवा झंडा हमें मिल गया, हमने अपने जीवन की पहली गुरु दक्षिणा दी, पर मेरा सदैव सवाल करने वाला मन यहाँ भी चुप नहीं रह सका, मैंने पूछ ही लिया कि कोई वस्तु (एक झंडा) कैसे हमारा गुरु की भाँति मार्गदर्शन करेगी? तहसील के सेवा प्रमुख ने मुझे इस तरह जवाब दिया, उन्होंने हँसते हुए एक वैदिक ऋषि का उदाहरण दिया कि-उन्होंने पेड़, पौधे, नदियों, कुत्ते और बिल्ली जैसे 24 सजीव एवं निर्जीव पदार्थों तथा जीव जंतुओं को अपना गुरु माना था, हमारी हिन्दू संस्कृति तो इतनी उदार, उदात्त और विशाल रही है, फिर हम भगवा ध्वज को क्यों गुरु नहीं मान सकते है? मेरी शंका का समाधान हो चुका था, संघ के सब लोगों के पास प्राचीन समय के उदाहरण और तैयार जवाब होते हैं, मैंने मान लिया भगवे झंडे को अपना गुरु और शाखा के डंडे को अपना साथी, मेरी स्वयंसेवक के रूप में शेष यात्रा इसी तरह के जवाबों, तर्कों और कुतर्कों को सुनते हुए ही चली क्योंकि आरएसएस में संशय नहीं श्रद्धा का बड़ा महत्व है, यह मुझे पता चल गया था। एक बार मैंने एक प्रचारक महोदय से पूछा कि भारत में तो हम हिन्दू बहुसंख्यक हैं फिर असुरक्षित कैसे हैं? दरअसल मेरी समस्या यह थी कि मैं जिस गाँव का निवासी हूँ वहां आज तक एक भी मुस्लिम या अन्य धर्मावलम्बी रहते ही नहीं हैं, हमारे यहाँ तो नमाज या अजान की आवाज तक सुनाई नहीं पड़ती थी, इसलिए मैं इन धरम के लोगों को बड़ी मुश्किल से दुश्मन के रूप में देख पा रहा था इसलिए पूछ लिया सवाल, जवाब मिला कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी तक ने कहा था कि आम हिन्दू शांतिप्रिय कायर होता है जबकि आम मुसलमान उपद्रवी, गुंडा, इनका भरोसा नहीं, कब विश्वासघात कर दें इसलिए ज्यादा संख्या होने के बावजूद भी हम हिन्दू अपने ही देश में सुरक्षित नहीं हैं, उस दिन से मुझे यकीन आने लगा कि वाकई ये दूसरे धर्मो के लोग हम हिन्दुओं के दुश्मन है।
पांचजन्य ने बनाया बौद्धिक रूप से कट्टर
शाखा में कुछ साहित्य तो मुफ्त आता था, राजस्थान आरएसएस का मुखपत्र पाथेयकण 30 रुपये सालाना चंदा जमा करवाने पर आने लगा, संघ द्वारा प्रकाशित छोटी छोटी अन्य किताबें भी आती थीं, जिन्हें 2 से 5 रुपये में बेचा जाता था, मैंने उन्हीं दिनों सीताराम गोयल की लिखी पुस्तक ‘हिन्दू समाज खतरे में’ पढ़ी, मेरा मन तड़फ उठा, इसमें इस्लाम, ईसाइयत और कम्युनिस्ट लोगों द्वारा हिन्दू समाज के खिलाफ रचे जा रहे पूरे षड्यंत्र की जानकारी दी गई थी, बेचारा हिन्दू समाज चारों ओर से इन दुष्टों के चक्रव्यूह में फँसा हुआ था।
मेरी जानने की भूख बढ़ती ही जा रही थी, मैं साप्ताहिक समाचार पत्र पांचजन्य का भी नियमित ग्राहक और पाठक बन गया, इसके हर अंक को मंै किसी धर्म ग्रन्थ की तरह पूरे मनोयोग से पढ़ता था, जिस सप्ताह पांचजन्य नहीं पहँुचता, वह हफ्ता सूना-सूना सा गुजरता था, सच कहूँ तो संघ जिस हिन्दू राष्ट्र की बार-बार बात करता है, उसकी पहचान और समझ भी मुझे पांचजन्य पढ़ने से ही हुई, मैं आज यह स्वीकार कर सकता हूँ कि पांचजन्य ने ही मुझमंे वैचारिक और बौद्धिक कट्टरता भरी, वैसे तो कट्टरता संघ के विभिन्न प्रशिक्षण करने से भी खूब बढ़ी, पाँच दिवसीय आईटीसी से लगाकर बीस दिवसीय ओटीसी करने के अनुभव काफी कारगर रहे। इस दौरान कठोर अनुशासन की पालना की जाती थी, जमकर शारीरिक व्यायाम करवाए जाते थे, लाठी, चाकू, तलवार चलाने का प्रशिक्षण आत्मरक्षा के नाम पर दिया जाता था, उन दिनों शिविर स्थल से बाहर जाकर किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं होती थी, इस तरह की ट्रेनिंग को मीडिया से बचाकर करवाया जाता था, आज की तरह समाचार पत्रों में किसी तरह की कोई सूचना नहीं दी जाती थी, कहा जाता था कि प्रसिद्धि विमुख होकर निश्रेयस राष्ट्र सेवा में निमग्न रहना ही सच्चे स्वयंसेवक होने का गुण है। प्रशिक्षण और संघ साहित्य के तालमेल ने मेरे दिमाग को पूरी तरह से कट्टरपंथी बना दिया था। अब मैं किसी से भी बहस करने और भिड़ जाने को तैयार था खास तौर पर सेकुलर किस्म के कांग्रेसियों से, वही थे ज्यादातर मेरे इर्द-गिर्द, विधर्मी मुसलमान तो थे नहीं गाँव में उन्हें खोजने तो दूर जाना पड़ता था।
दुश्मन मिल गया
पर एक दिन अचानक ही मुझे बिन माँगे ही मेरा शत्रु घर बैठे ही मिल गया, हुआ यह कि मेरे ही गाँव के राजकीय प्राथमिक आयुर्वेदिक औषधालय में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कहीं से ट्रांसफर होकर आया, वह सर पर जालीदार टोपी लगाता था, दाढ़ी रखता था और सलवार कुर्ता पहनता था, नाम था-अमीर खान, मुझे उसे देखते ही पक्का विश्वास हो गया था कि यही है वह जो देश के दुश्मन लोगों की जमात का आदमी है। सौभाग्य से मुझे अपने घर के इतने करीब एक दुश्मन प्राप्त हो गया था। अब मुझे भाई साहब लोगों द्वारा बताई गई बातें ज्यादा ठीक से समझ में आने लगी, मैं हर बात से अमीर चाचा को जोड़कर देखता और वह विधर्मी मेरे दुश्मन की हर कल्पना पर खरा उतरता। अब तक मैंने सैंकड़ों बार सुना और पढ़ा था कि इन्हीं मलेच्छ विधर्मियों की वजह से हमारी भारत माता के दो टुकड़े हुए हैं, ये लोग भारत को माँ नहीं बल्कि डायन मानते हैं, क्रिकेट में पाकिस्तान की जीत पर खुशियाँ मनाते हैं, चार-चार औरतें रखकर चालीस-चालीस औलादें पैदा करते हैं, जल्दी से जल्दी अपनी आबादी बढ़ाकर शेष बचे भारत पर भी कब्जा करना चाहते हैं, ये लोग तो नसबंदी भी नहीं करवाते, इन्हें तो कानूनों में भी छूट है, सुप्रीम कोर्ट की भी बात नहीं मानते, शाहबानो नाम की बुढि़या के मामले में तो इन्हें खुश करने के लिए संसद ने कानून ही बदल दिया, इन्हें हज करने में अनुदान मिलता है जबकि हमें कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए भी टैक्स भरना पड़ता है, इनके लड़के दिन भर लोहा कूटते हैं और शाम होते ही बनठन कर हमारी बहु बेटियों को पटाने निकल पड़ते हैं, स्कूल कालेज में हिन्दू लड़कियों को प्यार के नाम पर फँसाकर भगा ले जाते हैं, यौन शोषण के बाद उन्हें बदनाम बस्तियों में बेच देते हैं, इनके मदरसों में ‘अ’ से आलिम नहीं ‘अलगाववाद’ पढ़ाया जाता है, सब तरह के उग्रवाद की जड़ में यही लोग होते हैं, इन्होंने मस्जिदों के नीचे हथियार छिपा रखे हैं, जब भी पाकिस्तान हमला करेगा, तब ये देश के भीतर उसके लिए हमसे लड़ेंगे, ये गोमांस खाते हैं, स्वभाव से निर्दय और क्रूर होते हैं, पाकिस्तान की जासूसी करते हैं, हमारे देश और धर्म किसी के भी सगे नहीं हैं इस तरह की सैंकड़ों बातें मेरे दिमाग में घर किए हुए थीं, जिसके चलते ही मुझे अमीर चाचा और उसके जैसे दिखाई पड़ने वाले हर व्यक्ति में एक उग्रवादी और देशद्रोही इन्सान नज़र आने लगा। मैं सोचता था कि इतने बुरे लोगों को भारत में क्यों रखा जा रहा है, सरकार इन्हें फौज के जरिये जबरन क्यों पाकिस्तान नहीं भेज देती, मगर मैंने सत्ता, कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण के बारे में भी पढ़ा था, ऐसी मुस्लिम परस्त पार्टी के सत्ता में रहते और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? मेरे तो अपने ही घर में सब कांग्रेसी भरे पड़े थे, तो क्या मैं राष्ट्रद्रोहियों के खानदान से हूँ? अक्सर ऐसे सवाल उठते रहते थे, जैसे-जैसे इस तरह के बहुत सारे सवाल मुझे घेरते, मैं और अधिक ताकत से हिन्दू समाज को संगठित करने के संघ कार्य में खुद को लगा देता, मुझे विश्वास था कि संगठित हिन्दू समाज ही समर्थ भारत बना सकता है, अब मेरे जीवन का एक ही लक्ष्य था हर हाल में भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
edc58-01

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