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Posts Tagged ‘सत्य नारायण ठाकुर’

कुछ साथियों की धारणा है कि कालक्रम में उद्योग और कृषि के बीच के तथा मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच के न केवल मूलभूत विभेद समाप्त हो जाएँगे बल्कि उनके बीच के सभी विभेद समाप्त हो जाएँगे। यह सही नहीं है। कृषि और उद्योग के मूलभूत विभेदों की समाप्ति से उनके बीच के सभी विभेदों का अंत नहीं होगा। उद्योग और कृषि के कामों की स्थितियों में भिन्नता के चलते कुछ ऐसे विभेद, जो मूलभूत नहीं हो सकते हैं, अवश्य ही आगे बने रहेंगे। उद्योग में भी श्रम की स्थितियाँ इसकी सभी प्रशाखाओं के समान नहीं है। उदाहरण के लिए कोयला मजदूरों की श्रम स्थिति मशीनीकृत जूता कारखाने में काम करने वालों की श्रम स्थिति से भिन्न हैं। इसी तरह कच्चा लोहा के खनिज मजदूरों की श्रम स्थिति अभियंत्रण उद्योग में कार्यरत मजदूरों की श्रमस्थिति से भिन्न होती है। अगर उद्योग के अंदर विभिन्न प्रशाखाओं की श्रम स्थितियों में भिन्नता है तो फिर उद्योग और कृषि के बीच निश्चय ही कुछ ज्यादा भिन्नताएँ होंगी।
निश्चय ही ऐसा शारीरिक और मानसिक श्रम के विभेदों के बारे में भी कहा जाएगा। इनके बीच के मूलभूत विभेद और इनके सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर का फर्क निश्चिय ही मिट जायगा। किन्तु कुछ विभेद जो मूलभूत नहीं होंगे (गौण प्रकृति के विभेद) बने रहेंगे। ऐसा इसलिए रहेगा क्योंकि प्रबंधन कर्मियों और मजदूरों की श्रम स्थितियाँ जब भी बिल्कुल एक समान नहीं रहेंगी।
कुछ कामरेड जो इसके विपरीत धारणा रखते हैं, वे शायद मेरे पूर्व के कतिपय बयानों को आधार बना रहे हों जिनमें, उद्योग और कृषि के बीच तथा मानसिक एवं शारीरिक श्रम के बीच के विभेदों के विलोपन की अवधारणा व्यक्त की गई है, इसके बारे में अब बिना किसी हिचक के स्पष्टता के साथ कहा जाना चाहिए कि उसका जो अर्थ है, वह यह कि मूलभूत विभेदों का विलोपन न कि सभी प्रकार के विभेदों का। मेरी अवधारणा को उन कामरेडों ने ठोस रूप में समझा कि यह सभी प्रकार के विभेदों की समाप्ति पर लागू है। कामरेडों ने इसे उस रूप में समझा यह साबित करता है किमेरी उन अवधारणाओं की अभिव्यक्ति सुस्पष्ट नहीं थी और इसलिए असंतोष जनक थी। अब उसे निश्चय ही छोड़ दिया जाना चाहिए और उसकी जगह यह अवधारणा बनानी चाहिए जो बताती है कि उद्योग और कृषि तथा शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच के मूलभूत विभेदों का विलोपन होता है और गैर मूलभूत (अर्थात गौण) विभेदों की अवस्थिति कायम रहती है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्यनारायणठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

लो क सं घ र्ष !

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शहर और देहात तथा मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के पारस्परिक विरोध का विलोपन और उनके बीच के विभेदों का अंत

यह शीर्षक ढेर सारी समस्याओं को समेटता है जो तात्विक रूप से एक दूसरे से भिन्न हैं। मैंने उन्हें एक साथ कर दिया है, इसलिए नहीं कि हम उनका घोरमठ्ठा करना चाहते हैं, बल्कि केवल इनकी व्याख्या की संक्षिप्तता के लिए ऐसा करना पड़ा है।
शहर और देहात के बीच तथा उद्योग और कृषि के बीच के पारस्परिक विरोध (Anti-Thesis) के विलोपन की जानी-मानी समस्या है, जिस पर माक्र्स और ऐंगेल्स ने विचार किया था। इस पारस्परिक विरोध का आर्थिक आधार शहर द्वारा देहात का शोषण है। पूँजीवाद के अंदर उद्योग, व्यापार और उधार ऋण (Creclit) के विकास के पूरे दौर में किसानों और देहात को अधिकांश आबादी की लूट और बर्बादी के कारण परस्पर विरोध (Anti-Thesis) पैदा हुआ है। इसलिए शहर और देहात के परस्पर विरोध को पूँजीवाद के अंदर स्वार्थ के प्रतिशोध के रूप में देखा समझा जा सकता है। यही वह चीज है जिसने देहात के अंदर शहर और शहरवासियों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण भावनाओं को उभारा।
निःसंदेह हमारे देश में पूँजीवाद और शोषण प्रणाली के अवसान के साथ और समाजवादी व्यवस्था के मजबूत होने के साथ ही देहात और शहर तथा कृषि और उद्योग के बीच स्वार्थ के प्रतिशोध के भाव का लुप्त होना लाजिमी था और यही हुआ भी। सामजवादी शहर द्वारा और मजदूर वर्ग के द्वारा किसानों को जमींदार और कुलकों को मिटाने में दी गई सहायता ने मजदूर और किसानों की एकता को मजबूत किया। किसानों को तथा सामूहिक फार्मों को प्रथम श्रेणी के ट्रैक्टर और अन्य मशीनों की आपूर्ति ने किसानों और मजदूरों की एकता को मित्रता में बदल दिया। यह सही हे कि मजदूर और सामूहिक फार्म के किसान दो भिन्न वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे एक दूसरे से भिन्न अवस्थाओं से आते हैं। लेकिन यह फर्क इनकी दोस्ती को किसी भी तरह प्रभावित नहीं करता। इसके विपरीत इनके स्वार्थ एक ही पंक्ति में खड़े होते हैं। वह स्वार्थ है समाजवादी समाज को मजबूत करना और साम्यवादी विजय हासिल करना। इसलिए यह आश्चर्यजनक नही ंहै कि देहातों में शहर के प्रति पुराना घृणाभाव की तो बात ही छोड़ दीजिए अब इनमें पुराने अविश्वास के चिन्ह भी शेष नहीं रह गए।
इन सबका अर्थ यह है कि शहर और देहात तथा उद्योग और कृषि के बीच परस्पर विरोध (Anti-Thesis) का आधार हमारी समाजवादी व्यवस्था में विलुप्त हो चुका है।
इसका निश्चय ही यह माने नहीं है कि नगर देहात के परस्पर विरोध भावों के विलोपन का यह परिणाम होगा कि ‘‘महानगर बर्बाद होंगे’’, (ऐंगेल्स, ऐंटीडयूहरिंग)। यही नही ंहोगा कि महानगर बर्बाद नहीं होंगे, बल्कि अधिकधिक सांस्कृतिक विकास के नये केन्द्रों के रूप में अनेकानेक महानगर प्रकट होंगे। ये नए महानगर न केवल बड़े उद्योगों के केन्द्र होंगे, बल्कि कृषि उत्पादों के प्रोसेसिंग तथा खाद्य सामग्रियों की विभिन्न प्रशाखाओं के जबर्दस्त विकास के केन्द्र भी होंगे। यह राष्ट्र के सांस्कृतिक विकास को आगे बढ़ाएगा और नगर तथा देहात की जीवन दशा को उन्नत करेगा।
शारीरिक और मानसिक श्रम के पारस्परिक विरोधाभास को समाप्त करने की समस्या को मामले में भी ऐसी ही स्थिति है।यह भी पुरानी समस्या है जिसे माक्र्स ऐंगेल्स द्वारा विचार किया गया। दोनों के बीच के पारस्परिक विरोधाभास का आर्थिक आधार है मानसिक श्रम द्वारा शारीरिक श्रम का शोषण। इस खाई से सब अवगत हैं जिसने पूँजीवाद के अंदर औद्योगिक प्रतिष्ठानों के प्रबंध कर्मियों और शारीरिक श्रमिकों को विभाजित कर दिया। हम जानते हैं कि इसी खाई ने मैनेजरों, फोरमैनों, इंजीनियरों एवं तकनीकी कर्मियों के प्रति मजदूरों के अंदर शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण पैदा किया और मजदूर इन्हें अपना शत्रु मानने लगे। स्वभावतः पूँजीवाद के अवसान के बाद मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के परस्पर शत्रुता पूर्ण विरोधाभास का विलोपन अवश्यम्भावी था और हमारी समाजवादी व्यवस्था में सचमुच यह अदृश्य हो गया। आज शारीरिक श्रमिक और प्रबंध-कर्मीगण आपस में दुश्मन नहीं हैं। वे उत्पादन कार्य के एक ही सामूहिक परिवार के सदस्य के रूप में कामरेड हैं, दोस्त हैं जो उत्पादन बढ़ाने और प्रगति के लिए महत्वपूर्ण अभिरुचि ले रहे हैं। उनमें पुरानी शत्रुता के चिह्न भी शेष नजर नहीं आते।
नगर (उद्योग) और गाँव (कृषि) के बीच तथा शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच के विभेदों ;क्पेजपदबजपवदद्ध को मिटाने की समस्या का चरित्र ही भिन्न है। इस समस्या पर माक्र्सवादी शास्त्रों में विचार नहीं किया गया। यह नई समस्या है जो हमारी समाजवादी रचना प्रक्रिया के आचरण से उभरी है।
क्या यह एक काल्पनिक समस्या है? क्या इसका हमारे लिए कोई व्यावहारिक या सैद्धांतिक महत्व है? नहीं, यह समस्या हमारे लिए काल्पनिक नहीं समझी जा सकती। इसके विपरीत, हमारे लिए यह गम्भीर महत्व की समस्या है।
उदाहरण के लिए कृषि और उद्योग के विभेद को लें। हमारे देश में यह विभेद केवल इस तथ्य में नहीं है कि कृषि के श्रम से भिन्न हैं उद्योग के श्रम, बल्कि मुख्य रूप से, प्रमुखतया इस तथ्य में कि जहाँ उद्योग में उत्पादन के साधनों और उत्पाद पर सार्वजनिक स्वामित्व है, वहीं कृषि में सार्वजनिक नहीं, किन्तु समूह का स्वामित्व वाला सामूहिक फार्म है। यह पहले ही कहा जा चुका है कि यह तथ्य माल परिचालन की प्रथा बनाए रखने की ओर ले जाता है और जब उद्योग और कृषि का विभेद मिटेगा तभी माल उत्पादन के मौजूदा परिणाम मिट सकेंगे। इसलिए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कृषि और उद्योग के बीच के इस मूलभूत विभेद को मिटाना हमारे लिए सर्वाधिक महत्व की बात है।
यही बात मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच के मूलभूत विभेद को मिटाने की समस्या के बारे में भी अवश्य कही जाएगी। यह सच है कि यह भी हमारे लिए सर्वाधिक महत्व की समस्या है। समाजवाद स्पर्धा आंदोलन ने जब तक जन अभियान का शकल अख्तियार नहीं किया था, तब तक हमारे उद्योग की प्रगति बहुत ही रुक-रुककर चल रही थी इसे देखकर अनेक साथियों ने सलाह दी कि औद्योगिक विकास की गति को धीमा कर दिया जाय। प्रगति में इस लड़खड़ाहट का कारण यह था कि हमारे मजदूरों का सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर नीचा था और हमारे प्राविधिक कर्मियों ;ज्मबीदपबंस चमतेवददमसद्ध से वे काफी पीछे थे। लेकिन तब स्थिति बदल गई जब समाजवादी स्पर्धा आन्दोलन ने जन आन्दोलन का रूप ले लिया। उसी क्षण से औद्योगिक विकास की गति तेज हो गई।
क्यों समाजवादी स्पर्धा आन्दोलन का चरित्र जन आंदोलन का हो गया? क्योंकि मजदूरों के बीच से कामरेडों के सभी के सभी ग्रुप आगे बढ़कर न केवल तकनीकी ज्ञान की न्यूनतम जरूरतों पर महारत हासिल कर ली, बल्कि और आगे बढ़कर प्राविधिक कर्मियों के स्तर तक पहुँच गए। उन्होंने प्राविधिकों और अभियंताओं को ठीक करना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने पहले से चल रहे तरीकों को पुराना घोषित कर तोड़ दिया और नई अद्यतन प्रणालियाँ अपनाईं। ऐसा ही बहुत कुछ किया। हमें क्या होना चाहिए था, अगर केवल अलग-अलग समूह नहीं, बल्कि मजदूरों का अधिकांश हिस्सा तकनीसियनों और इंजीनियरों के सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर तक पहुँच गया होता? तब हमारा उद्योग उस ऊँचाई पर पहुँच गया होता जहाँ दूसरे देशों के उद्योगों का पहुँचना असंभव था। इसलिए इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मजदूरों के सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर को ऊँचा उठाकर मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच के मूलभूत पारस्पिरिक विभेद को मिटाना हमारे लिए महत्वपूर्ण ही नहीं, बल्कि सर्वाधिक महत्व का है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

लो क सं घ र्ष !

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राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का संतुलित (सानुपातिक) विकास नियम भी इसी दिशा में काम करता है जिसने उत्पादन में प्रतियोगिता और अराजकता को समाप्त कर दिया है।
हमारी वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाएँ भी इसी दिशा में काम करती हैं, जिनकी आर्थिक नीतियाँ आमतौर पर राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के संतुलित विकास नियम की आवश्यकताओं पर आधारित हैं।
सब मिलाकर परिणाम यह है कि हमारे देश में मूल्य नियम परिचालन का प्रभाव क्षेत्र सीमित है और इसलिए हमारी व्यवस्था में मूल्य नियम उत्पादन का नियामक नहीं बन सकता।
सचमुच यही उस ज्वलंत तथ्य की व्याख्या है कि हमारे देश में इसके बावजूद कि समाजवादी उत्पादन का अनवरत तेज विकास अति उत्पादन का संकट पैदा नहीं करता, वहीं पूँजीवादी देशों में जहाँ इसी मूल्य नियम का प्रभाव-क्षेत्र व्यापक है, उत्पादन के धीमा विकास के बावजूद समय-समय पर अति उत्पादन का संकट पैदा करता है।
कहा गया है कि मूल्य नियम एक ऐसा चिर स्थायी कानून है जो ऐतिहासिक विकास की सही अवधि में लागू होता है। यहाँ तक कि कम्युनिस्ट में भी यह बिल्कुल सच नहीं है। मूल्य नियम की तरह मूल्य भी एक ऐतिहासिक श्रेणी है जिसका सम्बंध माल उत्पादन के अस्तित्व के साथ जुड़ा है। माल उत्पादन के विलुप्त होने के साथ ही मूल्य और इसका स्वरूप तथा मूल्य नियम भी विलुप्त हो जाएगा।
समाजवादी समाज के दूसरे चरण में उत्पादित सामानों पर खर्च किए गए श्रम की गणना मोटा मोटी अनुमानित तरीके से इसके मूल्य और परिणाम के आधार पर नहीं किया जाएगा, जैसा माल उत्पादन प्रक्रिया के अंदर होता है, बल्कि उत्पादित सामानों पर सीधे और तुरन्त खर्च किए गए समय के परिमाण और उसके घंटो की संख्या के आधार पर किया जाएगा। चूँकि श्रम विभाजन, उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं में इसका वितरण मूल्य नियम से विनियमित नहीं होगा क्योंकि जब तक इसका परिचालक बंद हो गया रहेगा, बल्कि यह सामानों के लिए समाज की बढ़ती माँगों से विनियमित होगा। तब समाज की निरंतर बढ़ती आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन प्रक्रिया संचालित होगी। यह ऐसा समाज होगा जब उत्पादन का नियमन समाज की आवश्यकताओं द्वारा होगा। इस तरह समाज की आवश्यकताओं का आकलन करना हमारे योजना निकायों के लिए सबसे बड़े महत्व का कार्य हो जाएगा।
यह अवधारणा भी पूर्णतः गलत है कि हमारी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था के अंतर्गत साम्यवादी समाज के प्रथम चरण में उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं में श्रम विभाजन के अनुपात का निर्धारण मूल्य नियम द्वारा होता है।
अगर यह सच होता तो यह समझ पाना कठिन होता कि आखिर हमारे हल्के उद्योंगों, जो काफी लाभदायक हैं, को पूरी तरह क्यों नहीं विकसित किया जा रहा है, जबकि भारी उद्योगों को प्राथमिकता दी जा रही है जो कम लाभ देने वाले हैं और कुछ तो बिल्कुल घाटे पर चल रहे हैं।
अगर यह सच होता तो इसे भी नहीं समझा जा सकता था कि हमारे अनेक भारी उद्योगों संयंत्रों, जो अभी भी लाभदायक नहीं है, और जहाँ मजदूरों के श्रम का समुचित रिटर्न भी नहीं आता है, को बंद क्यों नहीं कर दिया जाता और उसकी जगह हल्का उद्योग संयंत्रों जो निश्चिय यही लाभदायक होते और जहाँ मजदूरों के श्रम का रिटर्न काफी बड़ा आता, क्यों नहीं चालू कर दिया जाता है?
अगर यह सच होता तो इसे भी समझना मुश्किल होता कि ऐसे संयंत्रों से, जो कम लाभदायक हैं (यद्यपि हमारी अर्थ व्यवस्था के लिये आवश्यक हैं) मजदूरों का स्थानांतरण ऐसे संयंत्रों के क्यों नहीं कर दिया जाता जो मूल्य नियम के मुताबिक ज्यादा लाभदायक हैं और जिनके बारे में माना जाता है कि वह (अर्थात मूल्य नियम) उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं के बीच श्रम विभाजन का अनुपात निर्धारित करता है।
यह स्पष्ट है कि अगर हम इन कामरेडों का नेतृत्व मान लें तो उपभोक्ता सामानों के उत्पादन के पक्ष में उत्पादन के साधनों के उत्पादन की प्राथमिकता देना हमें रोक देना चाहिए। लेकिन इसका क्या परिणाम होगा जब उत्पादन के साधनों के उत्पादन की प्राथमिकता समाप्त कर दी जाएगी? परिणाम होगा राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के निरंतर विकास की संभावनाओं को बर्बाद कर देना क्योंकि उत्पादन के साधनों के बगैर उत्पादन के राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का निरंतर विकास एवं विस्तार नहीं किया जा सकता।
ये कामरेड भूल जाते हैं कि मूल्य नियम केवल पूँजीवाद में उत्पादन का नियामक होता है जहाँ उत्पादन साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व, उत्पादन अराजकता और अति उत्पादन का संकट होता है। वे भूलते हैं कि हमारे देश में उत्पादन साधनों पर सामाजिक स्वामित्व और संतुलित राष्ट्रीय विकास नियम दरअसल मूल्य नियम के प्रभाव क्षेत्र को सीमित करते हैं और हमारे वार्षिक एवं पंचवर्षीय योजनाओं के प्रावधान तदनुसार बने हैं भी, मूल्य नियम के प्रभाव को कटाते हैं।
कुछ कामरेड इससे यह नतीजा निकालते हैं कि राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का संतुलित विकास नियम और अर्थ नियोजन उत्पादन की लाभदायकता को ही अभिशून्य का देते हैं। यह बिल्कुल सच नहीं है। बल्कि बात उल्टी है। अगर लाभदायकता को प्रत्येक प्लांट और प्रत्येक उद्योग के साथ अलग-अलग नहीं देखें, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्रीय विकास को दृष्टि में रखते हुए आगामी दस वर्षों को देखें, जो इस मुद्दे पर सही दृष्टिकोरण होगा, तो तात्कालिक और क्षणिक लाभदायकता का प्रश्न नीचे चला जाएगा। राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के संतुलित विकास नियम और तदनुसार अर्थ नियोजन ;म्बवदवउपब च्संददपदहद्ध से अपेक्षाकृत ऊँचा विकास सुनिश्चित होता हैं और इस राष्ट्र को नुकसान पहुँचाने वाले सामाजिक आर्थिक संकटों से बचते हैं।
संक्षेप में, निःसंदेह यह कहा जा सकता है कि हमारे समाजवादी उत्पादन की वर्तमान अवस्था में उत्पादन की विभिन्न प्रभाखाओं के बीच श्रम विभाजन का ‘अनुपात-नियामक’ मूल्य का नियम कभी नहीं बन सकता।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

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कभी-कभी यह पूछा जाता है कि हमारे देश में समाजवाद के अंदर क्या मूल्य के नियम का अस्तित्व है? और क्या वह काम करता है?’

हाँ वह अस्तित्व में है, और वह काम भी करता है। जहाँ कहीं माल और माल का उत्पादन होता है, वहाँ मूल्य का नियम काम करता है।
हमारे देश में मूल्य का नियम सबसे पहले माल के परिचलन, खरीद और बिक्री द्वारा माल का विनिमय, व्यक्तिगत उपभोग के लिए सामग्रियों का विनियम के क्षेत्र में काम करता है। यहाँ इस क्षेत्र में एक सीमा तक मूल्य का नियम सही माने में नियमन कार्य को संरक्षित करता है।
किन्तु मूल्य नियम केवल माल के परिचलन क्षेत्र तक ही सीमित नहीं होता है। इसका विस्तार उत्पादन क्षेत्र में भी है। यह सच है कि मूल्य नियम हमारे समाजवादी उत्पादन का नियामक नहीं है फिर भी यह हमारे उत्पादन को प्रभावित करता है। उत्पादन निर्धारित करते समय हम इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकते। वास्तव में उपभोक्ता सामान, जिसकी जरूरत उत्पादन प्रक्रिया में खर्चित श्रम शक्ति की क्षतिपूर्ति के किए होती है, हमारे देश में मूल्य नियम के अन्तर्गत ही माल के रूप में उत्पादित और प्राप्त किए जाते हैं। इसी रूप में मूल्य नियम उत्पादन पर प्रभाव डालता है। इस मामले में लागत लेखा ;बवेज ंबबवनदजपदहद्धए लाभदायकता, उत्पादन लागत, दाम, इत्यादि जैसी चीजें हमारे प्रतिष्ठानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मूल्य नियम को ध्यान में रखे बगैर हमारे प्रतिष्ठान काम नहीं कर सकते और अवश्य ही करना भी नहीं चाहिए।
क्या यह अच्छी बात है? यह बड़ी बात भी नहीं है। वर्तमान समय में यह सचमुच बड़ी बात नहीं है। यह हमारे प्रतिष्ठानों के व्यावसायिक प्रबंधकों को, उत्पादन को युक्तिसंगत मितव्ययिता कुशलता के आधार पर अनुशासित करने के क्षेत्र में प्रशिक्षित करता है। यह इसलिए बड़ी बात नहीं है क्योंकि यह हमारे प्रबंधकों को सिखाता है कि उत्पादन परिणाम की कैसे गणना की जाय, और यह भी कि इसके विस्तार और महत्व को ठोस रूप में कैसे रेखांकित किया जाय, अनुमानित आंकड़े जैसे गोल मटोल हवाई और वाहियात बातों से कैसे बचा जाय। यह बड़ी बात नहीं है, क्योंकि यह हमारे प्रबंधक को सिखाता है कि हमारे उत्पादन प्रक्रिया के अंतर्निहित आम स्रोतों को कैसे देखा जाय, उन्हेंकैसे पाया जाय और उनका बेहतर इस्तेमाल किया जाय तथा उन्हें पैसे तले रौंदकर बर्बाद होने से कैसे बचाया जाय। यह बड़ी बात नहीं है, क्योंकि यह हमारे प्रशासन को उत्पादन की सुसंगत उन्नति, उत्पादन लागत कम करने, लागत लेखा के अनुशासन के अनुपालन और प्रतिष्ठानों के अधिकाधिक उपयोगी एवं लाभदायक बनाने की विधि सिखाता है। यह एक अच्छा व्यावहारिक विद्यालय है जो हमारे प्रबंधक कर्मियों की क्षमता को बढ़ाता है और उन्हें हमारे समाजवादी उत्पादन की वर्तमान अवस्था के अच्छे परिपक्व नेता के रूप में विकसित करता है।
कठिनाई यह नहीं है कि हमारे देश का उत्पादन मूल्य नियम से प्रभावित है। कठिनाई यह है कि कुछेक अपवाद को छोड़कर हमारे प्रशासक और योजनाकार मूल्य नियम के परिचालन से बहुत कम अवगत हैं, वे उनका अध्ययन नहीं करते और अपनी गणना में इसका हिसाब रख पाने में असमर्थ हैं। दाम निर्धारण नीति के क्षेत्र में अस्पष्टता इस बात का प्रतीक है कि इस मामले में पूरी दिशाहीनता व्याप्त है। ऐसे अनेकों उदाहरणों में एक यह है कि कुछ समय पहले यह निश्चिय किया गया कि कपास और अनाज के दामों, कपास उगाने के हित में समंजन किया जाय, कपास उत्पादकों को बेचे जाने वाले अनाज की कीमत और ज्यादा सही किया जाय और राज्य को आपूर्ति किए जाने वाले कपास का दाम बढ़ा दिया जाय। हमारे प्रशासकीय प्रबंधन और योजनाकारों ने एक प्रस्ताव इसके लिए प्रस्तुत किया जा आश्चर्यजनक एवं अजीबोगरीब था। प्रस्ताव में सुझाव दिया गया कि एक टन अनाज का दाम व्यावहारिक रूप से एक टन कपास के बराबर निर्धारित किया जाय और फिर एक टन अनाज का दाम एक टन सेंकी हुई रोटी के बराबर किया जाय। केन्द्रीय कमेटी के सदस्यों द्वारा जब यह पूछा गया कि एक टन रोटी का दाम निश्चित रूप से एक टन अनाज से ज्यादा होना चाहिए क्योंकि उसे आटा पीसने और सेंकने में अतिरिक्त खर्च पड़ता है तो उसका कोई तर्क संगत उत्तर प्रस्तावक योजनाकारों द्वारा नहीं दिया जा सका। तब पूरे मामले को केन्द्रीय कमेटी ने अपने हाथों में लिया। अनाज का दाम कम कर दिया गया और कपास का दाम बढ़ा दिया गया। तब क्या होता अगर इन साथियों के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता? जाहिर है, कपास उगाने वालों का दिवाला पिट जाता और हम बिना कपास के हो जाते।
तो क्या इसका मतलब यह है कि मूल्य नियम के परिचालन का क्षेत्र हमारे यहाँ भी उतना ही बड़ा है जितना पूँजीवाद में? और क्या यह हमारे देश के उत्पादन का भी नियामक है?
नहीं, ऐसा नहीं है। असल में मूल्य नियम परिचालन का क्षेत्र हमारी आर्थिक व्यवस्था में अत्यंत ही सीमित है और उसे निश्चित बंधन में रखा गया है। पहले ही कहा जा चुका है कि माल उत्पादन का परिचालन क्षेत्र निर्धारित बंधनों के अंदर रखा गया है। यही बात मूल्य नियम के बारे में भी कही जानी चाहिए। निःसंदेह यह तथ्य कि हमारे यहाँ उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व का अस्तित्व नहीं है और इसका समाजीकरण (शहर और देहात में) हो गया है, मूल्य नियम के प्रभाव और क्षेत्र विस्तार को रोकता है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

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यह सही है कि जब वर्तमान के दो बुनियादी उत्पादन क्षेत्रों (राजकीय औद्योगिक पदों और सामूहिक फार्म क्षेत्र) के स्थान पर केवल एक ही समग्र उत्पादन क्षेत्र (One all embracing production sector) होगा, जिसे देश के अंदर समस्त उपभोक्ता सामग्रियों को निबटाने का अधिकार प्राप्त होगा तो मुद्रा के लिए माल का परिचलन लुप्त हो जाएगा क्योंकि वह राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था में अनावश्यक हो जाएगा। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, जब तक दो बुनियादी उत्पादन क्षेत्र बना रहता है, तब तक माल का उत्पादन और माल का चलन निश्चिय ही बन रहेगा। यह हमारी अर्थ व्यवस्था के लिए आवश्यक और बहुत ही उपयोगी तत्व है। इस प्रकार के एक मात्र एकीकृत क्षेत्र का निर्माण कैसे होगा? क्या राजकीय क्षेत्र द्वारा सामूहिक फार्म को हड़प लिए जाने से यह होगा? यह किसी तरह संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा करना वास्तविकता के सामूहिक फार्म को लूटना होगा। तब क्या एक ऐसा राष्ट्रीय निकाय के गठन से होगा जिसमें राजकीय उद्योगों और सामूहिक फार्मों के प्रतिनिधि शामिल किए जांच वह देश के सम्पूर्ण उपभोक्ता सामानों का हिसाब रखें और उसका वितरण करें, अर्थात वस्तुओं का विनियम करे? यह एक ऐसा विशेष प्रश्न है, जिस पर अलग से विचारने की जरूरत है।

इस तरह हमारा माल का उत्पादन सामान्य किस्म का नहीं है। यह विशेष किस्म का माल उत्पादन है। यह बगैर पूँजीपतियों के ऐसे माल का उत्पादन है जिसका संबंध मुख्य रूप से सम्बन्ध समाजवादी उत्पाकद को (राजकीय, सामूहिक फार्म, सहकारिता) की आवश्यक सामग्रियों से है, जिनका कार्य क्षेत्र व्यक्तिगत उपभोक्ता सामानों की किस्मों तक सीमित है जो स्पष्टतः पूँजीवादी उत्पादन की ओर नहीं जा सकता, क्योंकि दोनो क्षेत्रों को इस तरह बनाया गया है कि ये दोनों मिलकर समाजवाद उत्पादन को विकसित और सुदृ़ करेंगे।
इसलिए ऐसे साथी भी पूर्णतः गलत फहमी में है जिनका आरोप है कि चूँकि सामजवादी समाज का अवसान नहीं हुआ है (अर्थात साम्यवादी अवस्था नहीं उत्पन्न हुई है-अनु0) इसलिए माल के उत्पादन के चलते हम पूँजीवादी चरित्र की सभी आर्थिक श्रेणियों का पुनरोदय करने को बाध्य होंगे, जैसेमाल के रूप में श्रम शक्ति, अतिरिक्त मूल्य, पूँजी, पूँजीवाद मुनाफा, मुनाफा का सामान्य दर, इत्यादि। ऐसे साथी पूँजीवादी माल उत्पादन को हमारे माल उत्पादन के साथ मिला देते हैं और विश्वास कर लेते हैं कि जब कभी माल का उत्पादन होगा तो वह पूँजीवादी उत्पादन ही होगा। वे यह महसूस नहीं करते कि हमारा माल का उत्पादन मूल रूप से पूँजीवादी माल उत्पादन से भिन्न है।
और भी, मैं सोचता हूँ कि मार्क्स के “कैपिटल” से लिए गए कुछ दृष्टिकोणों को छोड़ दिया जाना चाहिए। जैसे मार्क्स जहाँ पूँजीवाद का विश्लेषण, वहाँ लिखी गई कुछ बातों को बनावटी तरीके से समाजवादी सम्बन्धों पर चिपका दिया गया है। मैं बताऊंगा ऐसे दृष्टिकोणों में कुछ हैं आवश्यक’ और अतिरिक्त मूल्य’, आवश्यक’ और अतिरिक्त उत्पादन’ मार्क्स पूँजीवाद का विश्लेषण इस रूप में करते हैं कि मजदूर वर्ग के शोषण की जड़ें अतिरिक्त मूल्य को उजागर किया जा सके। मजदूर वर्ग को, जिन्हें उत्पादन के साधनों से वंचित कर दिया गया है, सैद्घांतिक और वैचारिक हथियार से लैश किया जा सके ताकि वह पूँजीवाद के जुए को उतार फेंके। यह स्वाभाविक है कि माक्र्स ने जिन दृष्टिकोणों का इस्तेमाल किया वह पूर्ण रूप से पूँजीवादी सम्बन्धों पर लागू होता है। किन्तु उन्हीं बातों को इस समय लागू करन के बारे में बोलना आश्चर्यजनक है जब मजदूर वर्ग न केवल सत्ता और उत्पादन के साधनों से वंचित नहीं है, बल्कि वह इसके विपरीत सत्ता पर कब्जा किये है और उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण करता है। श्रम शक्ति को माल के रूप में समझना और मजदूरों को खरीदना’ (hising) जैसी बात करना अब हमारी व्यवस्था में बेतुका है क्योंकि यहाँ मजदूर वर्ग को उत्पादन साधनों का स्वयं स्वामी है, स्वयं अपने को खरीदता है और स्वयं अपनी श्रम शक्ति बेचता है। इसी तरह आवश्यक’ और अतिरिक्त श्रम’ की बात करना भी आश्चर्यजनक है क्योंकि हमारे यहाँ यह मजदूरों द्वारा उत्पादन ब़ाने के लिए समाज को दिया जाने वाला योगदान है। शिक्षा की उन्नति के लिए, जन स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए, सुरक्षा संगठन के लिए मजदूर योगदान करते हैं जो न केवल मजदूर वर्ग के लिए, जो आज सत्ता में है, बल्कि पूरे देश के लिए और यहाँ तक कि मजदूरों और उसके परिवारों की व्यक्तिगत जरूरतों के लिए भी मजदूर अपना श्रम खर्च करता है।
यह उल्लेखनीय है कि “गोथा कार्यक्रम की आलोचना’’ में मार्क्स जब पूँजीवाद की जाँच पड़ताल नहीं, बल्कि साम्यवादी समाज की प्रथम अवस्था का वर्णन कर रहे थे तो मार्क्स ने श्रम को उत्पादन ब़ाने के लिए, शिक्षा और जन स्वास्थ्य के लिए, प्रशासन खर्च के लिए, लोक निर्माण आदि के लिए समाज के प्रति किया गया योगदान के रूप में स्वीकार किया है और इसे उन्होंने उसी प्रकार आवश्यक माना है जैसे मजदूर वर्ग की उपभोक्ता जरूरतों की आपूर्ति के लिए श्रम खर्च किया जाता है।
मैं सोचता हूँ कि हमारे अर्थ शास्त्रियों को चाहिए कि इस विसंगति को समाप्त करें जो पुराने दृष्टिकोणों और हमारे देश की नई परिस्थितियों के बीच है। पुराने विचारों के स्थान पर नए दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जो नई परिस्थितियों से मेल खाते हैं।
हम इस विसंगति को कुछ समय के लिए सह सकते थे, किन्तु अब समय आ गया है कि इसे समाप्त करें।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

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आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

लो क सं घ र्ष !

कुछ साथी मानते हैं कि माल का उत्पादन बनाए रखकर पार्टी ने गलत काम किया है जबकि पार्टी ने देश में सत्ता हासिल कर ली और उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण कर लिया। उनकी सोच है कि पार्टी को चाहिए था कि माल का उत्पादन उसी समय और तत्काल बंद कर देते। इस सिलसिले में वे ऐंगेल्स को उद्घृत करते हैं जिन्होंने कहा है समाज द्वारा उत्पादन के साधनों पर कब्जा करना माल के उत्पादन को समाप्त कर देना है, उसी तरह उत्पादक के ऊपर उत्पादन के प्रभुत्व का भी’’। (ऐंटी ड्यूहरिंग) ऐसे साथी पूरी तरह गलतफहमी में हैं।
हम लोग ऐंगेल्स के फारमूले की जांच करें। ऐंगेल्स के फारमूले को साफ तौर पर इस रूप में नहीं लिया जा सकता है, क्योंकि उससे यह स्पष्ट नहीं है कि समाज द्वारा उत्पादन के सभी साधनों पर कब्जा की वे बात करते हैं या केवल उसके एक भाग का जिसका रूपांतरण सामाजिक सम्पत्ति के रूप में हो चुका है। इसलिए ऐंगेल्स के फारमूले को दूसरे तरीके से समझा जा सकता है।
ऐटीड्यूहरिंग’ में ही ऐंगेल्स एक जगह लिखते हैं कि उत्पादन के सभी साधनों पर कब्जा करना अर्थात उत्पादन के सभी साधनों पर नियंत्रण। इस तरह इस फारमूला के अंदर ऐंगेल्स के दिमाग में उत्पादन के साधनों पर एक भाग नहीं, बल्कि संपूर्ण साधनों का राष्ट्रीयकरण है। इसका मतलब है न केवल उद्योग में बल्कि कृषि में भी उत्पादन के सभी साधनों का सामाजिक सम्पत्ति के रूप में राष्ट्रीयकरण।
जहाँ उत्पादन का संकेन्द्रण इतना ऊँचा हो गया हो, उद्योग और कृषि के क्षेत्रों में वहाँ उत्पादन के सभी साधनों का सामाजिक सम्पत्ति के रूप में रूपांतरण संभव है। ऐंगेल्स ऐसे देशों के बारे में सोचते हैं कि उत्पादन के सभी साधनों के राष्ट्रीयकरण के साथ ही माल उत्पादन का अंत होना चाहिए और वह सचमुच सही है। जब ॔ऐंटीड्यूहरिंग’ का प्रकाशन हुआ था उस समय गत शताब्दी के अंत में, केवल एक देश वैसा था ब्रिटेन। वहाँ पूँजीवाद का विकास उस सीमा तक हो गया था, उद्योग और कृषि दोनों क्षेत्रों में कि सर्वधारा द्वारा सत्ता हाथ में लेने के बाद यह संभव था कि देश के संपूर्ण उत्पादन साधनों का राष्ट्रीयकरण करके उसे सामाजिक सम्पत्ति बना दिया जाय और माल उत्पादन का अंत कर दिया जाय।
मैं यहाँ इस प्रश्न को छोड़ देता हूँ कि ब्रिटेन के लिए विदेश व्यापार का कितना महत्व है। इसकी राष्ट्रीय व्यवस्था में विदेश व्यापार की बड़ी भूमिका है। मैं समझता हूँ इस प्रश्न की जांच करने के बाद ही अंतिम तौर पर निश्चय किया जा सकेगा कि ब्रिटेन में सर्वधारा के सत्ता में आने पर और उत्पादन के सभी साधनों के राष्ट्रीयकरण हो जाने पर वहाँ के माल के उत्पादन का क्या भविष्य होगा।
तो भी, पिछली शताब्दी के अंत ही नहीं, बल्कि आज तक भी कोई देश पूँजीवादी विकास के उस बिन्दु पर नहीं पहुँचा है और कृषि में उत्पादन का संकेन्द्रण वहाँ नहीं पहुँचा है, जैसा ब्रिटेन में देखा जा रहा है। देहातों में पूँजीवादी विकास के होते हुए भी, जैसे अन्य देशों में अनेक छोटे और मझोले देहाती माल उत्पादक होते हैं जिनके भविष्य के बारे में निश्चय किया जायगा, अगर सर्वहारा सत्ता में आएगा।
लेकिन यहाँ एक सवाल है हमारे जैसे देश में सर्वहारा और उसकी पार्टी क्या करेगी जहाँ सर्वहारा के सत्ता में आने की परिस्थिति अनुकूल है और पूँजीवाद के उखाड़ फेंकने की भी तथा जहाँ उद्योग में उत्पादन का संकेन्द्रण उस बिन्दू पर पहुँच गया है कि उसे सामाजिक सम्पत्ति में बदला जा सकता है, लेकिन जहाँ पूँजीवादी विकास के बावजूद कृषि क्षेत्र अनेकानेक छोटे एवं मझोले उत्पादक मालिकों में उस सीमा तक बँटा है कि उन्हें समाप्त करने के बारे में सोचना भी असंभव है।
ऐंगेल्स का फारमूला इस प्रश्न का उत्तर नहीं देता। लेकिन हमारे सामने जो प्रश्न है उसका उत्तर यहाँ नहीं है, क्योंकि यह प्रश्न एक दूसरे प्रश्न से खड़ा हुआ है कि माल के उत्पादन का क्या भविष्य होगा जहाँ उत्पादन के तमाम साधनों का समाजीकरण हो गया है?
और इसलिए वहाँ क्या करना है, आज तमाम नहीं बल्कि उत्पादन साधनों के केवल एक भाग का ही समाजीकरण हुआ है, तब भी सर्वहारा द्वारा सत्ता में आने की स्थिति अनुकूल है तो क्या सर्वहारा को सत्ता ग्रहण करना चाहिए और सत्ता ग्रहण करने के तुरन्त बाद माल उत्पादन समाप्त कर देना चाहिए?
ऐसे में कतिपय अपरिपक्व अधकचड़े माक्र्सवादियों के उत्तर को हम स्वीकार नहीं कर सकते जिनका विश्वास है कि वैसी स्थिति में जो कुछ करना है वह यह कि सत्ता ग्रहण करने से बचना चाहिए और तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक पूँजीवाद को लाखों छोटे एवं मझोले उत्पादकों को लूटने और उन्हें खेत मजदूरों में बदलने में सफलता नहीं मिल जाती और कृषि उत्पादन के साधनों का पूर्ण संकेन्द्रण नहीं हो जाता और इसके बाद ही सर्वहारा द्वारा सत्ता ग्रहण के बारे में सोचा जा सकता है एवं तभी उत्पादन के तमाम साधनों का समाजीकरण संभव होगा। जाहिर है, कोई माक्र्सवादी यह समाधान स्वीकार नहीं कर सकता।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

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आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

आर्थिक बहस में भाग लेने वालों को मंतब्य

नवम्बर 1951 की बहस से सम्बंधित आर्थिक प्रश्नों पर

राजनैतिक अर्थशास्त्र की पाठ्य पुस्तक के प्रारूप के मूल्यांकन के लिए चलाई जा रही आर्थिक बहस से सम्बन्धित सभी सामग्रियाँ मुझे मिली हैं। जो सामग्रियाँ मुझे मिली हैं उनमें राजनैतिक अर्थशास्त्र के प्रारूप में सम्बर्द्धन के लिए प्रस्ताव,’’ गलतियों और लुटियों के विलोपन के लिए प्रस्ताव’’ और विवादास्पद मुद्दों पर ज्ञापन’’ शामिल हैं। इन सभी सामग्रियों और पाठ्यपुस्तक के प्रारूप पर मैं निम्नांकित मंतब्य प्रकट करना जरूरी समझता हूँ :

1. समाजवाद में आर्थिक नियमों का चरित्र

कुछ साथी विज्ञान के नियमों के वस्तुगत चरित्र को और स्वाभकर समाजवाद के अंदर राजनैतिक अर्थतंत्र के नियमों को इंकार करते हैं। वे इस तथ्य का इंकार करते हैं कि राजनैतिक अर्थतंत्र का नियम उस विनियमित प्रक्रिया का प्रतिबिंब है जो मनुष्य की इच्छा से परे संचालित है। वे विश्वास करते हैं कि इतिहास ने सोवियत सत्ता के ऊपर जो विशेष जिम्मेदारी सौंपी है, उसे देखते हुए सोवियत राज्य और उसके नेता राजनैतिक अर्थ तंत्र के विद्यमान नियमों को विलोपित कर सकते हैं, नये नियम ग़ और बना सकते हैं।
ऐसे सभी गंभीर गलतफहमी के शिकार है। ऐसे साथी सरकार के बनाए कानूनों को वैज्ञानिक नियमों के समतुल्य मान लेने की भूल करते हैं। ये सभी प्रत्यक्षतः विज्ञान के नियमों जो प्रकृति का या समाज की वस्तुगत प्रक्रियाओं को प्रतिबंधित करते हैं, ऐसी प्रक्रियाएँ जो मानव इच्छा से परे स्वतंत्र रूप से क्रियाशील हैं, को सरकारी कानूनों, जो मानव इच्छा के अधीन बनाए जाते हैं और जिनका केवल न्यायिक महत्व है, के साथ मिलाकर भ्रांतिपूर्ण स्थिति पैदा करते हैं। लेकिन उन्हें निश्च्य ही भ्रमित नहीं होना चाहिए।
माक्र्सवाद विज्ञान के नियमों को मानता है। वैज्ञानिक नियम चाहे वे प्राकृतिक विज्ञान के हों या राजनैतिक अर्थतंत्र के, सभी ऐसी वस्तुगत प्रक्रियाओं के प्रतिरूप हैं और मनुष्य की इच्छा से परे क्रियाशील है। मनुष्य इन नियमों को जान सकता है, उन्हें पता लगा सकता है, उनका अध्यन कर सकता है, उन पर भरोसा कर सकता है और समाज के हित में उनका उपयोग कर सकता है। लेकिन उन्हें बदल नहीं सकता, उन्हें समाप्त नहीं कर सकता और न नया वैज्ञानिक नियम बना सकता है।
तो क्या इसका यह मतलब है कि प्राकृतिक नियमों की कारगुजारियों के परिणाम अर्थात प्राकृतिक शक्तियों द्वारा की गई कार्रवाइयों के परिणाम सामान्य रूप से बदले नहीं जा सकते? क्या प्रकृति की विनाशकारी शक्तियों की कार्रवाइयाँ बुनियाद की तरह सर्वथा अटल होती हैं जो मानव प्रभाव के समक्ष कभी झुकती नहीं? नहीं, ऐसा नहीं है। आकाशीय, भूगर्भीय या ऐसे अनेक क्षेत्रों को छोड़ दें, जिनके विकास नियमों को जान लेने के बाद भी मनुष्य उन्हें प्रभावित कर सकने में सर्वथा असमर्थ है, फिर भी अनेक मामलों में मनुष्य असमर्थता से काफी दूर है और वह प्राकृतिक प्रकियाओं को प्रभावित करता है। ऐसे सभी मामलों में मनुष्य प्राकृतिक नियमों को जानकर, उनका अंदाज कर, उन पर भरोसा कर, उनके बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग द्वारा प्रकृति की विनाशकारी शक्तियों की दिशा बदलकर समाज के सर्जनात्मक कार्यों में इस्तेमाल कर सकता है।
ऐसे अनेक दृष्टांतों में एक को लें। पुराने जमाने में विशाल नदियों के अनियंत्रित प्रवाह के चलते बा़ और परिणाम स्वरूप लोगों के घरों और फसलों की बर्बादी, जिनके बारे में पहले समझा जाता था कि यह दुर्जय विपदा है। मनुष्य असहाय था। लेकिन समय बीतने के साथ और जान वृद्धि के कारण जब मनुष्य ने बांध निर्माण तथा पन बिजली संयंत्र खड़ा करना सीखा तो बा़ की विभीषिका से समाज का बचाव संभव हो गया। ऐसा बचाव असंभव माना जाता था। और भी, इंसान ने प्रकृति की विनाशनी शक्ति को मोड़ना सीखा, उनका श्रंृगार कियाऐसा कहें। जल प्रवाह को समाज के हित में मोड़ा गया। खेतों की सिंचाई की गई और प्रवाह का उपयोग बिजली उत्पादन में किया गया।
क्या इसका यह अर्थ है कि इंसान ने इस तरह प्रकृति के नियमों, विज्ञान के नियमों को समाप्त कर दिया और प्रकृति के नए कानून या विज्ञान के नए नियमों का निर्माण किया? नहीं, ऐसा नहीं है। बात यह है कि वैज्ञानिक नियमों में बिना किसी बदलाव, बिना किसी उल्लंघन या उसे समाप्त किए बगैर अथवा किसी नए नियम के बनाए बगैर एक प्रक्रिया द्वारा पानी के विनाशकारी प्रवाह को बदला गया और उसे समाज के हित में इस्तेमाल किया गया। इसके विपरीत, इस प्रक्रिया को प्र्रकृति और विज्ञान के नियमों के अनुकूल अंजाम दिया गया क्योंकि प्राकृतिक नियमों का एक तनिक भी उल्लंघन पूरे मामले को उलट देता और संपूर्ण प्रक्रिया को बेकार बना देता।
यही बात आर्थिक विकास के नियमों, राजनैतिक अर्थतंत्र के नियमों, चाहे पूँजीवाद की अवधि में या समाजवाद की अवधि में, के बारे में निश्चय ही कही जाएगी। यहाँ भी प्रकृति विज्ञान की तरह आर्थिक विकास के नियम आर्थिक विकास प्रक्रिया को प्रतिबिंबित करते हुए वस्तुगत नियम हैं जो मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र परिचालित हैं। मनुष्य इन नियमों को जान सकता है, पता कर सकता है और उन पर भरोसा कर सकता है तथा समाज के हित में इस्तेमाल कर सकता है। यह भी कि कुछ विनाशकारी नियमों की दिशा में परिवर्तन कर सकता है, उसकी कार्रवाइयों के दायरे को सीमित कर सकता है और दूसरे नियमों को पूरा अवसर दे सकता है, जो सतह पर आने के लिए दबाव दे रहा है। लेकिन वह उन नियमों को विनष्ट नहीं कर सकता और न नया आर्थिक नियम बना सकता है।
प्रकृति विज्ञान के विपरीत राजनैतिक अर्थतंत्र की एक विशेषता यह होती है कि इसके नियम शाश्वत नहीं होते। इसके अधिकांश नियम इतिहास की खास अवधि में काम करते हैं और कालक्रम में इसकी जगह दूसरे नियम लेते हैं। यद्यपि ऐसे नियमों का विभाग नहीं होता, बल्कि नई परिस्थितियों में ऐसे नियमों की उपयोगिता नहीं रह जाती। नये नियमों को स्थान देने हेतु पुराने नियम दृश्य से ओझल हो जाते हैं, उन नये नियमों को स्थान देने हेतु जिन्हें मनुष्य की इच्छाओं ने नहीं बनाया है बल्कि वे नई आर्थिक स्थितियों से उभरे हैं।
॔ऐंटीड्यूहरिंग’ से ऐंगेल्स के सूत्र को उद्घृत किया जाता है जिसमें कहा गया है कि पूँजीवाद की समाप्ति और उत्पादनसाधनों के समाजीकरण के बाद मनुष्य उत्पादन साधनों पर नियंत्रण पाएगा कि सामाजिक और आर्थिक सम्बन्धों के बंधनों से मुक्त हो जाएगा और वह सामाजिक जीवन का स्वामी बन जायगा। ऐंगेल्स इस स्वतंत्रता को आवश्यकता का परिबोध ;ंचचतमबपंजपवद वि दमबमेपजलद्ध कहते हैं। इस आवश्यकता के परिबोध का क्या मतलब होता है? इसका मतलब होता है कि वस्तुगत नियमों ;दमबमेपजलद्ध को जान लेने के बाद मनुष्य इसका उपयोग पूरी चेतना के साथ समाज के हित में करेगा। यही कारण है कि उसी पुस्तक में ऐंगेल्स कहते हैं उसके अपने सामाजिक गतिविधियों के नियमों, जो अभी बाह्य प्राकृतिक नियमों से घिरा है और उसी का प्रभुत्व है, का उपयोग मनुष्य द्वारा पूरी चेतना के साथ किया जाएगा और इस तरह उस पर मनुष्य का प्रभुत्व होगा।’’
इस तरह हम देखते हैं कि ऐंगेल्स का सूत्र ऐसे लोगों के पक्ष में नहीं बोलता है जो यह सोचते हैं कि समाजवाद में आर्थिक नियम समाप्त किए जा सकते हैं और नए बनाए जा सकते हैं। इसके विपरीत यह नियमों की समाप्ति की मांग नहीं करता, बल्कि आर्थिक नियमों का समझने और उनके बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग की बात करता है।
यह कहा गया है कि आर्थिक नियम का चरित्र आधार मूल होता है, कि उसकी गति अपरिवर्तनीय होती है और उसके सामने समाज असहाय होता है। यह सही नहीं है। यह नियम को पूजावस्तु बनाना है और अपने को नियम का दास। ऊपर बताया गया है कि समाज नियम के सामने असहाय नहीं है, कि आर्थिक नियमों को जान लेने के बाद और उस पर भरोसा करते हुए समाज उसके कार्रवाई क्षेत्र को सीमित कर सकता है, समाज के हित में उसका उपयोग कर सकता है और उसका श्रंृगार कर सकता है। ठीक उसी तरह, जैसे प्राकृतिक शक्तियों और उनके नियमों के मामलों में ठीक उसी तरह जैसे बड़ी नदियों के उत्ताल प्रवाह के बारे में ऊपर उदाहरण दिए गए हैं।
समाजवाद के निर्माण में सोवियत सरकार की विशिष्ट भूमिका का उल्लेख किया गया है और जैसा बतया गया है कि यह विद्यमान आर्थिक नियम के समाप्त करने में और नया आर्थिक विकास नियम बनाने में समर्थ है। यह भी सच नहीं है।
सोवियत सरकार की विशिष्ट भूमिका दो परिस्थितियों में है। सोवियत सरकार को जो कुछ करना है प्रथम तो ऐसा नहीं है कि एक प्रकार के शोषण को मिटाकर दूसरे प्रकार का शोषण जारी रखा जाय, जैसा कि पहले की क्रान्तियों में हुआ। हम तो शोषण का सर्वनाश चाहते हैं। द्वितीय, देश के अंदर किसी समाजवादी अर्थतंत्र की बनी बनायी पृष्ठ भूमि के पूर्ण अभाव की स्थिति में हमें नया निर्माण करना है, कहना चाहिए बिल्कुल शून्य से।
नि:संदेह यह कठिन, दुरूह और अभूतपूर्व कर्तव्य है। तो भी सोवियत सरकार ने इसे सफलतापूर्वक पूरा किया। लेकिन इसे इस तरह पूरा नहीं किया किया विद्यमान आर्थिक नियमों को तोड़ दिया और नया बना दिया। बल्कि इसके उस आर्थिक नियम पर भरोसा किया, जिसके मुताबिक उत्पादन सम्बन्ध अनिवार्य रूपेण उत्पादन शक्तियों से मेल खाता है। उत्पादन शक्तियों का चरित्र हमारे देश में, खासकर उद्योग में सामूहिक था, किन्तू दूसरी तरफ उसके स्वामित्व का स्वरूप निजी और पूँजीवादी था। इस आर्थिक नियम पर भरोसा करके कि उत्पादन सम्बन्ध अनिवार्य रूप से उत्पादन शक्तियों के चरित्र के अनुरूप होना चाहिए, सोवियत सरकार ने इसका समाजीकरण कर दिया, इसे सम्पूर्ण जनता की सम्पत्ति बना दिया और इस तरह शोषण प्रणाली का अंत कर दिया और समाजवादी अर्थतंत्र का निर्माण किया। अगर यह नियम नहीं होता और सोवियत सरकार ने उस पर भरोसा नहीं किया होता तो यह कार्यलक्ष्य पूरा नहीं किया जा सकता था।
यह आर्थिक नियम कि उत्पादन सम्बन्ध अनिवार्य रूप से उत्पादन शक्तियों केचरित्र के अनुकूल होता है, पूँजीवादी देशों में लंबे समय से रास्ता आगे निकालने हेतु दबाव डाल रहा है। किन्तु रास्ता फोड़कर आगे निकल पाने में विफल रहा है, क्योंकि समाज की पुरानी शक्तियों द्वारा जबरदस्त प्रतिरोध खड़ा किया जा रहा है। यहाँ हमारे सामने एक दूसरा विशिष्ट प्रभार का आर्थिक नियम खड़ा है। प्रकृति विज्ञान के नियमों के विपरीत जहाँ नए नियमों का चलन आमतौर से स्वाभाविक प्रक्रिया है, आर्थिक क्षेत्र में नये नियमों का आविष्कार और चलन चूँकि पुरानी सामाजिक शक्तियों को हितों के प्रभावित करती हैं, इसलिए इसे सशक्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है, अतएवं एक शक्ति, एक दूसरी सामाजिक शक्ति, जो उस प्रतिरोध पर काबू पा सके, की आवश्यकता होती है। हमारे देश में वह शक्ति किसानों का प्रतिनिधित्व करनी थी। इस तरह की शक्ति अन्य पूँजीवादी देशों में नहीं है। यह उस रहस्य को बताता है कि सोवियत सरकार कैसे पुरानी शक्तियों को शिकस्त देने में कामयाब हुई और क्यों हमारे देश में वह आर्थिक नियम कि उत्पादन शक्तियों के चरित्र के अनुरूप उत्पादन सम्बन्ध अनिवार्य रूप से होना चाहिए, के परिचालक का पूर्ण सुयोग मिला।
यह कहा गया है कि हमारे देश में राष्ट्रीय अर्थतंत्र के संतुलित विकास की आवश्यकता ने सोवियत सरकार के लिए पहले से मौजूद आर्थिक नियमों को बदलकर नये नियमों को लागू करना संभव कर दिया। यह बिल्कुल ही असत्य है। हमारा वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाओं का राष्ट्रीय अर्थतंत्र के सम्यक एवं संतुलित विकास के वस्तुगत नियमों के साथ घालमेल नहीं किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय अर्थतंत्र का संतुलित विकास नियम पूँजीवाद की अराजक प्रतियोगिता नियम के विरुद्ध खड़ा होता है। यह उत्पादन साधनों के सामाजीकरण के बाद आता है जब उत्पादन में प्रतियोगिता और अराजकता के नियमों का महत्व समाप्त हो जाता है। राष्ट्रीय अर्थतंत्र के संतुलित विकास नियम के आधार पर ही समाजवादी अर्थ व्यवस्था सम्पन्न की जा सकती है। इसका अर्थ है कि राष्ट्रीय अर्थतंत्र के संतुलित विकास नियम इसकी संभावना उत्पन्न करते हैं कि हमारे योजना निकाय सामाजिक उत्पादन की सही योजना बना सके। लेकिन संभावना को यथार्थ के साथ नहीं मिलना चाहिए। ये दो भिन्न चीजें हैं। संभावना को यथार्थ में बदलने के लिए जरूरी है कि इस आर्थिक नियम का अध्ययन किया जाय, इस पर महारत हासिल की जाय, पूरे समय के साथ इसे लागू करना सीखा जाय और ऐसी योजनाएँ बनाई जाएँ जो इस नियम के तकाजों को प्रतिबंधित करें। यह नहीं कहा जा सकता है कि हमारी वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी तरह इस आर्थिक नियम के तकाजों को प्रतिबिंबित करती हैं।
यह कहा गया है कि हमारे देश के समाजवाद के अंतर्गत क्रियाशील आर्थिक नियमों में कतिपय जिनमें मूल्य का नियम भी शामिल है, का रूपांतरण यहाँ तक कि पूरी तरह रूपांतरण नियोजित अर्थ व्यवस्था के आधार पर हो गया है। यह भी उसी तरह असत्य है नियमों का रूपांतरण नहीं होता। अगर उसका रूपांतरण हो सकता था तो उसे समाप्त भी किया जा सकता था और दूसरे नियमों से बदला जा सकता था। यह भी कि नियमों का रूपांतरण किया जा सकता है उस गलत फारमूले का अवशेष है कि नियमों को समाप्त किया जा सकता है अथवा बनाया जा सकता है। यद्यपि आर्थिक नियमों को रूपांतरित करने का सिद्घांत हमारे देश में काफी दिनों से प्रचलित है जिसे अब परिशुद्धता की दृष्टि से छोड़ दिया जाना चाहिए। इस या उस आर्थिक नियमों के कार्यों के दायरे को नियंत्रित किया जा सकता है, इसके विनाशकारी कार्य, निश्चय ही अगर वह विनाशकारी होने वाला है तो उससे बचा जा सकता है, किन्तु उसे न तो समाप्त किया जा सकता है और न उसे बदला जा सकता है।
उसी तरह जब हम प्राकृतिक और आर्थिक शक्तियों पर काबू पाने, उसे वश में रखने आदि की बात करते हैं तो इसका कतई अर्थ नहीं होता कि मनुष्य वैज्ञानिक नियमों का निर्माण कर सकता है या उसे समाप्त कर सकता है। इसके विपरीत, इसका केवल इतना ही अर्थ है कि मनुष्य इन नियमों को खोज ले सकता है, उन्हें जान सकता है, उन पर महारत हासिल कर सकता है, पूरी समझ के साथ उन्हें लागू करना सीख करता है, समाज के हित में उनका इस्तेमाल कर सकता है और इस तरह उन्हें अपने वश में रख सकता हैं, उन पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकता है।
इसलिए समाजवाद के अंतर्गत राजनैतिक अर्थतंत्र के नियम वस्तुपरक होते हैं जो इस तथ्य को प्रतिबिंबित करते हैं कि आर्थिक जीवन की प्रक्रियाएँ विनियमों से प्रभासित ;संहवतमेदमकद्ध हैं और हमारी इच्छाओं से स्वतंत्र होकर संचालित हैं। जो लोग इस अवधारणा का इंकार करते हैं वे सही माने में विज्ञान का इंकार करते हैं, वे पूर्वानुमान की सभी संभावनाओं से इंकार करते हैं, और परिणाम आर्थिक गतिविधियों को दिशानिर्देश करने की संभावनाओं को भी इंकार करते हैं।
यह कहा जा सकता है कि यह सच है, सबको मालूम है, इसमें कुछ भी नया नहीं है और इसलिए आम तौर पर ज्ञात सत्यों को दोहराने में समय खर्च करना उचित नहीं है। यह सही है कि इसमें कुछ भी नया नहीं है, लेकिन यह सोचना गलत होगा कि ऐसी सच्चाइयाँ, जो आमतौर पर हमें मालूम है, को दोहराते रहना समय बर्बाद करना है, तथ्य यह है कि हमारे नेतृत्व में प्रत्येक वर्ष नए नौजवान आते हैं जो उत्कटता से हमारा सहायता करना चाहते हैं, वे अपनी योग्यता प्रमाणित करना चाहते हैं, किन्तु उन्हें माक्र्सवादी शिक्षा नहीं है, वे ऐसी सच्चाइयों को नहीं जानते हैं, जिन्हें हम अच्छी तरह जानते हैं और इसलिए वे अंधकार में भटकने को विवश हैं। ऐसे नौजवान सोवियत सरकार की विराट सफलताओं से भौंचक हैं, वे सोवियत प्रणाली की आशातीत सफलताओं से इस प्रकार चकाचौंध हैं कि वे मान बैठे हैं कि सोवियत सरकार कुछ भी कर सकती है कि कुछ भी इससे परे नहीं है कि वैज्ञानिक नियमों को भी समाप्त कर सकती है और नया नियम बना सकती है। इन कामरेडों के लिए हमें क्या करना चाहिए? माक्र्सवादलेनिनवाद में हम उन्हें कैसे दीक्षित करें? मैं मानता हूँ कि सामान्य ज्ञान की सच्चाइयों को सुशांत तरीके से दोहराना और उनकी प्रासंगिक व्याख्या नये कामरेडों की शिक्षा के सबसे अच्छे तरीकों में एक है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

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आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन
लो क सं घ र्ष !

द्वितीय विश्व युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण प्रतिफल और उसका आर्थिक सम्पूर्ण समय में फैला हुआ एकछत्र विश्व बाजार का विघटन समझा जाना चाहिए। इसने विश्व पूँजीवादी व्यवस्था के आम संकट को और भी आगे गहरा कर दिया है।
द्वितीय विश्व युद्ध स्वयं ही संकट की उपज था। दोनों पूँजीवादी गठबंधनों में प्रत्येक ने, जिसने अपने सींग युद्ध में भिड़ाए के, सोचा था कि वे अपने प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ देंगे और विश्व प्रभुत्व हासिल कर लेंगे। संकट के उबड़ने का उन्होंने यही रास्ता निकाला। संयुक्त राज्य अमेरिका ने आशा की थी कि वह इस दौर में अपने अत्यंत भयंकर प्रतिद्वंद्वी जर्मनी और जापान को कार्य परिक्यि के किल बाहर कर देगा, विदेश व्यापार और दुनिया के कच्चे माल के श्रोतों पर कब्जा कर लोग और इस तरह विश्व प्रभुत्व स्थापित कर लेगा।
किन्तु युद्ध ने इस आशा को उचित नहीं ठहराया। यह सही है कि तीनो बड़े पूँजीवादी देशों, सं0रा0अ0, ब्रिटेन और फ्रांस के प्रतियोगी के रूप में जर्मनी और जापान को कार्य परिधि से निकाल बाहर कर दिया गया। किन्तु ठीक उसी समय चीन औ अन्य योरपीय गणतंत्रों ने पूँजीवाद व्यवस्था से नाता तोड़ लिया और सोवियत संघ के साथ मिलकर पूँजीवादी शिविर के मुकाबले एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर का निर्माण कर लिया। दो परस्पर विरोधी शिविरों के अस्तित्व का आर्थिक परिणाम यह हुआ कि संसार भर में छाया हुआ एक ध्रुव विश्व बाजार विघटित हो गया और इसलिए आज हमारे सामने दो समानांतर विश्व बाजार है जो एक दूसरे से टकराता भी है।
यह भी देखना चाहिए कि संयुक्त राज्य, ब्रिटेन और फ्रांस ने स्वयं ही, निश्चय ही स्वयं न चाहते हुए भी, नया समानांतर विश्व बाजार के बनाने और मजबूत करने में योगदान किया। उन्होंने सोवियत यूनियन, चीन, और योरपीय नवादी गणतंत्रों जो मार्शल प्लान में शामिल नहीं हुए, पर आर्थिक नाकेबंदी थोपी यह सोचते हुए कि इनका इस प्रकार गला घोंट देंगे। परिणाम यद्यपि यह हुआ कि इनका गला घोंटा नहीं गया, बकि नया विश्व बाजार मजबूत हुआ।
लेकिन बुनियादी बात निश्चय ही आर्थिक नाकेबंदी नहीं है, बल्कि तथ्य यह है कि युद्ध के सम से ही ये देश आर्थिक तौर पर आर्थिक सहयोग और परस्पर सहायता में जुड़ गये थे। इस प्रकार के सहयोग के अनुभव के साबित किया कि एक भी पूँजीवादी देश इतने प्रभावकारी दंग से सुयोग्य तकनीकी सहायता इन जनवादी गणतंत्रों को नहीं दे सकते थे। जैसा सोवियत संघ करते हैं। यहाँ विचार बिन्दु यह नहीं है कि यह सहायता यथासंभव सस्ता और अपेक्षाकृत उन्नत तकनीकी की है। मुख्य विचार बिन्दु यह है कि इस सहयता की तह में एक दूसरे को मदद करने और सबों की आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करने की सच्ची अभिलाषा है। इसी का सुफल है इन देशों में हो रही तेज औद्योगिक प्रगति। यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि औद्योगिक प्रगति की इस गति से जल्दी ही ये देश न केवल इस स्थिति में पहुँच जायेंगे कि इन्हें दूसरे देशों से आयात करने की जरूरत नहीं रह जायगी, बल्कि तब इन देशों को अपने अतिरिक्त माल की खपत के लिए बाहरी बाजार की दरकार होगी।
इसके साथ ही बड़े पूँजीवादी देशों (सं0रा0अ0, ब्रिटेन, फ्रांस) द्वारा दुनिया के श्रोतों का शोषण का दायरा ब़ेगा नहीं, बल्कि घटेगा। उनका व्यापार क्षत्र विस्तावितर नहीं होगा बल्कि सिकुड़ेगा। विश्व बाजार में बिक्री के उनके अवसर कम होंगे और उनके उद्योग उनकी क्षमता से नीचे काम करेंगे। सही में विश्व बाजार के विघटन के संदर्भ में विश्व पूँजीवाद के सामान्य संकट के गहराने का यही अर्थ है।
यह पूँजीपतियों द्वारा स्वयं ही महसूस किया जा रहा है। उनके लिए सोवियं संघ, चीन जैसे बाजारों के खाने का नुकसान सहन करना कष्ट दायक होगा। वे मार्शल प्लान, कोरिया युद्ध, उन्मत शस्थीकरण, औद्योगिक सैन्यीकरण आदि तरकों से उन नुकसानों की क्षतिपूर्ति करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह उसी प्रकार है जैसे डूबता आदमी तिनके का सहारा लेता है। इस परिस्थिति ने अर्थ शास्त्रियों के समक्ष दो प्रश्न उपस्थित कर दिये हैं :
क.क्या यह दृ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व स्तालिन द्वारा प्रतिपादित पूंजीवाद के सामान्य संकट के समय बाजार के सापेक्ष स्थाभित्व’’ का सिद्घांत आज भी मुक्ति युक्त है?
ख.क्या यह दृ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि पूंजीवाद के कमजोर पड़ने के बावजूद अपने समग्र रूप में पूँजीवादपहले की अपेक्षा तेजी से विकास कर रहा है’’ सन 1916 के बसंत में लेनिन द्वारा प्रतिपादित सिद्घांत आज भी मुक्ति युक्त है?
मैं सोचता हूं कि ऐसा नहीं हो सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न नई परिस्थिति के मद्देनजर इन दोनो सिद्घांत (thesis) के बारे में समझा जाना चाहिए कि अब इनकी प्रमाणिकता समाप्त हो गयी है।

लेखक – जोजेफ स्तालिन
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

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आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन
लो क सं घ र्ष !

द्वितीय विश्व युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण प्रतिफल और उसका आर्थिक सम्पूर्ण समय में फैला हुआ एकछत्र विश्व बाजार का विघटन समझा जाना चाहिए। इसने विश्व पूँजीवादी व्यवस्था के आम संकट को और भी आगे गहरा कर दिया है।
द्वितीय विश्व युद्ध स्वयं ही संकट की उपज था। दोनों पूँजीवादी गठबंधनों में प्रत्येक ने, जिसने अपने सींग युद्ध में भिड़ाए के, सोचा था कि वे अपने प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ देंगे और विश्व प्रभुत्व हासिल कर लेंगे। संकट के उबड़ने का उन्होंने यही रास्ता निकाला। संयुक्त राज्य अमेरिका ने आशा की थी कि वह इस दौर में अपने अत्यंत भयंकर प्रतिद्वंद्वी जर्मनी और जापान को कार्य परिक्यि के किल बाहर कर देगा, विदेश व्यापार और दुनिया के कच्चे माल के श्रोतों पर कब्जा कर लोग और इस तरह विश्व प्रभुत्व स्थापित कर लेगा।
किन्तु युद्ध ने इस आशा को उचित नहीं ठहराया। यह सही है कि तीनो बड़े पूँजीवादी देशों, सं0रा0अ0, ब्रिटेन और फ्रांस के प्रतियोगी के रूप में जर्मनी और जापान को कार्य परिधि से निकाल बाहर कर दिया गया। किन्तु ठीक उसी समय चीन औ अन्य योरपीय गणतंत्रों ने पूँजीवाद व्यवस्था से नाता तोड़ लिया और सोवियत संघ के साथ मिलकर पूँजीवादी शिविर के मुकाबले एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर का निर्माण कर लिया। दो परस्पर विरोधी शिविरों के अस्तित्व का आर्थिक परिणाम यह हुआ कि संसार भर में छाया हुआ एक ध्रुव विश्व बाजार विघटित हो गया और इसलिए आज हमारे सामने दो समानांतर विश्व बाजार है जो एक दूसरे से टकराता भी है।
यह भी देखना चाहिए कि संयुक्त राज्य, ब्रिटेन और फ्रांस ने स्वयं ही, निश्चय ही स्वयं न चाहते हुए भी, नया समानांतर विश्व बाजार के बनाने और मजबूत करने में योगदान किया। उन्होंने सोवियत यूनियन, चीन, और योरपीय नवादी गणतंत्रों जो मार्शल प्लान में शामिल नहीं हुए, पर आर्थिक नाकेबंदी थोपी यह सोचते हुए कि इनका इस प्रकार गला घोंट देंगे। परिणाम यद्यपि यह हुआ कि इनका गला घोंटा नहीं गया, बकि नया विश्व बाजार मजबूत हुआ।
लेकिन बुनियादी बात निश्चय ही आर्थिक नाकेबंदी नहीं है, बल्कि तथ्य यह है कि युद्ध के सम से ही ये देश आर्थिक तौर पर आर्थिक सहयोग और परस्पर सहायता में जुड़ गये थे। इस प्रकार के सहयोग के अनुभव के साबित किया कि एक भी पूँजीवादी देश इतने प्रभावकारी दंग से सुयोग्य तकनीकी सहायता इन जनवादी गणतंत्रों को नहीं दे सकते थे। जैसा सोवियत संघ करते हैं। यहाँ विचार बिन्दु यह नहीं है कि यह सहायता यथासंभव सस्ता और अपेक्षाकृत उन्नत तकनीकी की है। मुख्य विचार बिन्दु यह है कि इस सहयता की तह में एक दूसरे को मदद करने और सबों की आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करने की सच्ची अभिलाषा है। इसी का सुफल है इन देशों में हो रही तेज औद्योगिक प्रगति। यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि औद्योगिक प्रगति की इस गति से जल्दी ही ये देश न केवल इस स्थिति में पहुँच जायेंगे कि इन्हें दूसरे देशों से आयात करने की जरूरत नहीं रह जायगी, बल्कि तब इन देशों को अपने अतिरिक्त माल की खपत के लिए बाहरी बाजार की दरकार होगी।
इसके साथ ही बड़े पूँजीवादी देशों (सं0रा0अ0, ब्रिटेन, फ्रांस) द्वारा दुनिया के श्रोतों का शोषण का दायरा ब़ेगा नहीं, बल्कि घटेगा। उनका व्यापार क्षत्र विस्तावितर नहीं होगा बल्कि सिकुड़ेगा। विश्व बाजार में बिक्री के उनके अवसर कम होंगे और उनके उद्योग उनकी क्षमता से नीचे काम करेंगे। सही में विश्व बाजार के विघटन के संदर्भ में विश्व पूँजीवाद के सामान्य संकट के गहराने का यही अर्थ है।
यह पूँजीपतियों द्वारा स्वयं ही महसूस किया जा रहा है। उनके लिए सोवियं संघ, चीन जैसे बाजारों के खाने का नुकसान सहन करना कष्ट दायक होगा। वे मार्शल प्लान, कोरिया युद्ध, उन्मत शस्थीकरण, औद्योगिक सैन्यीकरण आदि तरकों से उन नुकसानों की क्षतिपूर्ति करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह उसी प्रकार है जैसे डूबता आदमी तिनके का सहारा लेता है। इस परिस्थिति ने अर्थ शास्त्रियों के समक्ष दो प्रश्न उपस्थित कर दिये हैं :
क.क्या यह दृ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व स्तालिन द्वारा प्रतिपादित पूंजीवाद के सामान्य संकट के समय बाजार के सापेक्ष स्थाभित्व’’ का सिद्घांत आज भी मुक्ति युक्त है?
ख.क्या यह दृ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि पूंजीवाद के कमजोर पड़ने के बावजूद अपने समग्र रूप में पूँजीवादपहले की अपेक्षा तेजी से विकास कर रहा है’’ सन 1916 के बसंत में लेनिन द्वारा प्रतिपादित सिद्घांत आज भी मुक्ति युक्त है?
मैं सोचता हूं कि ऐसा नहीं हो सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न नई परिस्थिति के मद्देनजर इन दोनो सिद्घांत (thesis) के बारे में समझा जाना चाहिए कि अब इनकी प्रमाणिकता समाप्त हो गयी है।

लेखक – जोजेफ स्तालिन
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

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                                                     लोकतंत्र का प्रश्न

भारतीय संविधान में राज्य के तीन स्तम्भ हैं – लोकतंत्र, समाजवाद और संप्रदाय निरपेक्षता। अर्थात देश को चलाने के लिये एक ऐसी सरकार हो, जिसे देश की जनता चुने, वह सरकार समाजवादी हो जो समाज में सुख-चैन स्थापित करे और वह सरकार संप्रदाय निरपेक्ष हो अर्थात किसी संप्रदाय विशेष की तरफदारी किये बगैर सभी जन सम्प्रदायों के प्रति समभाव का बर्ताव करे।
देश की जनता ने पूंजीवादी, उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी शोषण एवं दमन के खिलाफ लड़कर आजादी हासिल की थी। इसलिये यह स्वाभाविक ही था कि भारतीय संविधान का मूल चरित्र गैर-पूंजीवादी बनाया गया। देश की संपदा कुछेक व्यक्तियों के हाथों में सिमटने पर पाबंदी लगाने का प्रावधान संविधान के एक अनुच्छेद में किया गया। इस प्रावधान को मजबूती और स्पष्टता प्रदान करने के लिये बयालिसवें संशोधन के माध्यम से समाजवाद को संविधान का महत्वपूर्ण स्तम्भ घोषित किया गया।
भारतीय संविधान की विशेषता है कि सरकार को जनहित में क्या करना है, उसकी सूची राज्य के लिये निदेशक सिद्धान्तों के अध्याय में दी गयी है। इस अध्याय में राज्य के लिये स्पष्ट संवैधानिक निदेश है कि वह जनता की खुशहाली मुकम्मिल करने के लिए सबको रोजगार, जीने लायक आमदनी, आवास, स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा आदि प्रदान करेगा और बेरोजगार, अपंग, वृद्ध एंव अशक्त होने की स्थिति में सामाजिक सहायता का उपाय करे।
पर संविधान का कमजोर पक्ष यह है कि अनुच्छेद 37 में निदेशक सिद्धान्तों में वर्णित बातों का नागरिक अधिकार के रूप में न्यायालय में कानूनी दावा करने से मना कर दिया गया है। इसी अनुच्छेद का फायदा उठा कर शासक वर्ग ने जनता को संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर रखा है। अब समय आ गया है कि अनुच्छेद 37 को विलोपित किया जाये और संविधान के निदेशक सिद्धांतों का कार्यान्वयन सरकार के लिए बाध्यकारी बनाया जाये।
आजाद भारत में विकास की जो योजना बनायी गयी वह गैर-पूंजीवादी योजना नहीं थी। उसे मिश्रित अर्थव्यवस्था का नाम दिया गया। देश के पूंजीपतियों के दवाब में निजी पूंजी की भूमिका निर्धारित कर दी गयी। शुरू में मूल उद्योगों में पूंजीपति निजी पूंजी लगाने को उत्सुक नहीं थे, क्योंकि गेस्टेशन पीरियड लम्बा होने के कमारण रिटर्न देर से मिलता था। इसलिए सरकार ने मूल उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में रखकर पूंजीवादी विकास पथ का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया और उपभोक्ता वस्तुओं को निजी पूंजीपतियों के हवाले कर दिया।
आजादी के दूसरे और तीसरे दशक तक आते-आते पूंजीवाद की विफलता उजागर हुई। सरकार जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रही। जनता का आक्रोश उबल पड़ा। साठ के दशक में आठ राज्यों से कांग्रेसी राज का खात्मा, सत्तर के दशक में आपातकाल की घोषणा, केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार और 1980 में कांग्रेस की वापसी आदि इतिहास की बातें हैं।
पूंजीवाद और लोकतंत्र एक राह के सहयात्री नहीं हो सकते। पूंजीवाद जमींदार और पूंजीपतियों का अत्यंत अल्पमत लोगों का शासन होता है। पूंजीवाद में शोषितों-पीडि़तों का विशाल बहुमत शासित होता है।
इसके विपरीत लोकतंत्र बहुमत लोगों का शासन होता है। इसलिए सच्चा लोकतंत्र का भय हमेशा पूंजीपतियों को सताता है। भयातुर पूंजीपति छल, बल और धन का इस्तेमाल करके शोषितों-पीडि़तों के समुदाय को एक वर्ग के रूप में संगठित होने से रोकता है और उन्हें अपने पीछे चलने को विवश करता है। देश की वर्तमान संसद में साढ़े तीन सौ करोड़पति चुने गये, जबकि देश में 77 प्रतिशत गरीब लोग बसते हैं। ऐसा धनवानों के अजमाये तिकड़मों के चलने संभव होता है।
1980 और 90 के दशक में जातियों एवं सम्प्रदायों की उग्र गोलबंदी देखी जाती है। इस अवधि में जातियों और संप्रदायों की अस्मिता के हिंसक टकराव होते हैं, जनता की आर्थिक खुशहाली का एजेन्डा पृष्ठभूमि में ओझल हो जाता है और मंदिर-मस्जिद और मंडल-कमंडल के छलावरण में नग्न पूंजीवाद की नव उदारवादी नीति बेधड़क आगे बढ़ती है। जातियों, सम्प्रदायों और क्षेत्रों में विभाजित मतदाताओं ने मतदान करते समय अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि जाति सरदारों, धर्माधिकारियों और क्षेत्र के फैसलों का अनुशरण किया। यह सच्चा लोकतंत्र नहीं है। पूंजीवादी शक्तियां जातीयता, सम्प्रदायिकता और क्षेत्रीयता को हवा देकर संसद पर हावी हैं। इसी तरह संविधान को समाजवादी आदर्शों की बलि देकर प्रारम्भ हुआ है नग्न पूंजीवाद का वैश्वीकृत युग। नग्न पूंजीवाद भारतीय लोकतंत्र और संविधान में स्थापित मूल्यों का निषेध है। अगर इस प्रक्रिया को रोका नहीं गया तो दलित चिंतक डा। तुलसी राम की चेतावनी बिल्कुल सामयिक है कि इससे देश की राष्ट्रीय एकता को वास्तविक खतरा है।

– सत्य नारायण ठाकुर
समाप्त

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