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Posts Tagged ‘सुमन’

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कारगिल -कारगिल ————के अपराधियों से जोड़ा खाने वाले.
अपराधियों ने नौजवानों को मरवा दिया था
आज वहीअपराधी
शहीद – शहीद चिल्ला रहे है
यानी पहले शहीद कराओ
-फिर फूल चढाओ
फिर अपराधियों से हाथ मिलाओ
फिर ताबूत में कमीशन खाओ
फिर स्मारक बनवाओ
उसमे भी कमीशन खाओ
राष्ट्र प्रेम की अलख जगाओ
फिर चिल्लाओ कश्मीर मांगोगे
तो फिर सीना चीर देगे
संदेश भेजोगे कश्मीर सुंदर
आजाद मुल्क बनाओ
रक्षा क्षेत्र में एफ डी आई
अमरीका की गुलामी
गुजरात में
फट्टा के साथ
हवाला की सलामी
हिन्दू की एकता में
आरक्षण का विरोध
धर्म के नाम पर
धार्मिक गुलामी
सहारनपुर में सद्भाव
काठ में दंगा
लखनऊ में चेलो से
हुरदंगा
वोट के लिए सब चंगा
गाजा की ख़ुशी
यू. एन में दुखी
बर्लिन में
सेतुवा
जिनपिंग से
हलुवा
जरूरत है
तो बाप
नही है तो
देगे श्राप
यही इनका
राष्ट्र प्रेम
राष्ट्रप्रेमी है
बाकी सभी देश
द्रोही है
खुद का बाप
गाँधी नही
हिटलर है
संसद में
गाँधी
बाहर गोडसे की
आंधी
आजादी युद्ध में
अंग्रेज भक्त
आज बड़े
स्वतंत्रता सेनानी
कायरो की ज़मात
देश रक्षक
है यही
नोट -सभी संघी मित्रो से अनुरोध है कि कविता में कामा फुल स्टॉप सही करने का कष्ट करे
सादर
उन्ही का कापीराइट युक्त
सुमन
लो क सं घ र्ष !

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पिछले जन्म के पाप प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। गुजरात में हिन्दू , मुस्लिम आर्थिक अपराधियों का समूह सदैव उनकी सरकार का समर्थन करता रहा है क्यूंकि उसके द्वारा किये जा रहे अपराधों को संरक्षण राज्य सरकार का मिलता रहा है। तुलसी, सोहराबुद्दीन एनकाउंटर का राज हिन्दू- मुस्लिम एकता नहीं थी बल्कि मोदी सरकार की तरफ से वसूली अभियान के हिसाब किताब में बेईमानी करने की सजा दी गयी थी
नव भारत टाइम्स के अनुसार गुजरात में हवाला के जरिए 5 हजार 395 करोड़ रुपये के लेन-देन का पता लगाया है और इस मामले में 79 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र जारी किए गए हैं। अधिकारियों ने इसे देश का सबसे बड़ा हवाला घोटाला करार दिया है जांच अधिकारियों के मुताबिक राज्य में हवाला के जरिए सोना और प्रॉपर्टी के लेन-देन का धंधा किया जा रहा था। इस काम के लिए पिछले साल दिसंबर और इस साल जनवरी, फरवरी में सूरत में आईसीआईसीआई बैंक के दो ब्रांच का इस्तेमाल किया गया।
अहमदाबाद में ईडी के अधिकारियों ने बताया कि इस मामले की जांच आईसीआईसीआई बैंक द्वारा सूरत में दर्ज कराई गई एफआईआर के बाद शुरू हुई।
इस मामले में शुक्रवार को 79 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किए गए हैं। मामले के तीन मुख्य आरोपियों में से 2 को गिरफ्तार कर लिया गया है और एक अभी भी फरार है।
इनमें से अफरोज हसन फट्टा को दो महीने पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था और मदन जैन को गुरुवार को गिरफ्तार किया गया। एक अन्य मुख्य आरोपी बिलाल हारून गिलानी अभी फरार है।
आपको बता दें कि अफरोज फट्टा हीरा कारोबारी हैं और पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी के साथ उनकी फोटो आने के बाद काफी विवाद हुआ था।
कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी पर सूरत के हवाला कारोबारी अफरोज फट्टा से करीबी रिश्ते होने का आरोप लगाया था। कांग्रेस ने मोदी के विकास यात्रा के दौरान मंच पर अफरोज के साथ मोदी एक की तस्वीर भी रिलीज की थी। इससे पहले मार्च में ईडी(एनफोर्समेंट डायरेक्टॉरेट) ने सूरत में अफरोज के घर पर छापा मारकर 700 करोड़ रुपए जब्त किए थे।
राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ का हिन्दुवत्व वादी चेहरा यही है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। अगर देश के अन्दर आर्थिक अपराधियों को समूल रूप से नष्ट कर दिया जाए तो हिन्दुवत्व की प्रयोगशाला अपने आप नष्ट हो जाएगी।
-सुमन
http://loksangharsha.blogspot.com/

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बाराबंकी। पूर्व विधायक, समाज सुधारक स्व0 गजेन्द्र सिंह की प्रथम पुण्य तिथि के अवसर पर पूर्व अध्यक्ष जिला बार एसोसिएशन बृजेश दीक्षित की अध्यक्षता में गांधी भवन देवां रोड पर एक स्मृति सभा का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का प्रारम्भ महन्त गुरूशरण दास ने स्व0 गजेन्द्र सिंह के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धासुमन पेश करते हुए किया।
इस अवसर पर अपने संबोधन में बृजेश दीक्षित ने कहा कि दादा गजेन्द्र सिंह समाज के हर वर्ग के प्रेरणा दायक थे। उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि उनके विचारों का अनुसरण करने में ही है।
गांधी वादी विचारक एवं गांधी समारोह ट्रस्ट के अध्यक्ष प0 राजनाथ शर्मा ने पूर्व विधायक को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि उनका जीवन एक सच्चे एवं निर्भीक इंसान के जीवन की अभिव्यक्ति थी और गांधी समारोह ट्रस्ट के वह संस्थापक सदस्य थे और उन्हीं की प्रेरणा से ट्रस्ट द्वारा अनेको कार्यक्रम सम्पन्न कराए गए।
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वरिष्ठ पत्रकार हशमतउल्ला ने पूर्व विधायक के जीवन व उनके कार्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वह बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक थे। एक ओर जहां वह एक निर्भीक व बेबाक राजनेता थे तो वहीं उर्दू व हिन्दी साहित्य के प्रेमी थे, उन्हें यदि रामायण की चौपाइयों , गीत, श्लोक व प्रमुख कवियों की कविताएं कठस्थ थी तो वहीं उर्दू के ऐसे नायाब अशआर याद थे जो किसी ने कभी सुने भी न हों।
फखरूद्दीन अली अहमद कमेटी के पूर्व चेयरमैन निहाल रिजवी ने दादा गजेन्द्र सिंह के साथ बिताए गए अपने समय का स्मरण करते हुए कहा कि जिले में राजनीति की युवा पीढ़ी को तैयार करने में दादा की अहम भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि वह एक निर्भीक राजनेता थे और आम आदमी के सरोकारो के पैरोकार थे।
जिला उपभोक्ता फोरम के पूर्व सदस्य हुमायू नईम खां ने दादा गजेन्द्र सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वह अपने आदर्शों से कभी समझौता न करने वाले इंसान थे और सामाजिक समस्याओं के प्रति उनकी संवेदनाओं ने सदैव उन्हें आम इंसानों के करीब रखा।
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वरिष्ठ प्रवक्ता जवाहर लाल नेहरू परास्नातक महाविद्यालय डा. राजेश मल्ल ने अपने संबोधन में कहा कि दादा गजेन्द्र सिंह ने राजनीति में अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के प्रवेश पर वह सदैव चिन्तित रहे और इसका विरोध करने के दृष्टिकोण से ही वह काफी समय तक एक राज्यमंत्री द्वारा राष्ट्रीय ध्वजारोहण किए जाने के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द करते हुए अपनी गिरफ्तारी देते रहे।
इस अवसर पर पवन कुमार वैश्य, बृजमोहन वर्मा, डा. उमेश चन्द्र वर्मा, डा. एस.एम. हैदर, प्राचार्य रामस्वरूप यादव, पूर्व विधायक शिवकरन सिंह, हरिशरण दास, राकेश कुमार सिंह, दिलीप गुप्ता एडवोकेट, उपेन्द्र सिंह, श्रीमती नीरज सिंह, अजय सिंह, प्रशान्त मिश्र, सुरेन्द्र नाथ मिश्र, हरि गुप्ता, राजेन्द्र बहादुर सिंह, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, सलाम मोहम्मद, विजय प्रताप सिंह, आनंद सिंह, अरविन्द वर्मा, गनेश सिंह, धीरेन्द्र सिंह, राजेश्वर दयाल बाजपेयी, मेराज अहमद ने भी अपने विचार रखते हुए दिवंगत राजनेता को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम के अंत में रणधीर सिंह सुमन ने आए हुए सभी आगुन्तकों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।

रणधीर सिंह सुमन
एडवोकेट
जिला-बाराबंकी

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मानव खोपड़ी उबाल के पियो
इलाहाबाद के पत्रकार की हत्या के आरोप में राजा कोलंदर उर्फ़ राम निरंजन को आजीवन कारावास की सजा हुई है।साल 2000 में इलाहाबाद में पत्रकार धीरेन्द्र सिंह समेत चौदह लोगों को राजा कोलंदर के फ़ार्म हाउस में बेरहमी से क़त्ल कर उनकी लाश के टुकड़े- टुकड़े कर दिए गए थे. राजा कोलंदर ने काली प्रसाद श्रीवास्तव की हत्या कर उसकी खोपड़ी को उबाल कर पी लिया जिससे वह बुद्धिमान हो जाए। राजा कोलंदर ने काफी लोगों की हत्या कर उनकी खोपड़ी को उबाल कर पिया। मानव रक्त भी वह शौक से पीता था। नरमुंडो को जाति के अनुसार रंग कर रखता था।
राजा कोलंदर की शादी शंकरगढ़ के पत्रकार धीरेन्द्र सिंह के गाँव में हुई थी। उसकी पत्नी का नाम गोमती था वह जिला पंचायत सदस्य भी रही हैं। राजा कोलंदर ने उनका नाम बदलकर फूलन देवी रख दिया था। उनके बड़े बेटे का नाम जमानत था और छोटे बेटे का नाम अदालत था। बेटी का नाम क्रांती था।
भारतीय समाज में किवदंतियों, आख्यानो, मिथकों में बे सिर-पैर की बातें आती रहती है। जिससे कम बुद्धि वाले मानव मस्तिष्क पर चमत्कारी असर होता है जिसके फल स्वरूप राजा कोलंदर जैसे मानवों का निर्माण होता है जो तरह-तरह की उलूल जुलूल हरकतें करके मानव जाति को कलंकित करने का काम करती रहती है। विभिन्न धर्मों के आख्यानो में सुपर पावर जैसी संरचना निर्मित होती है और जब वह वास्तविक दुनिया में लोग सुपर पॉवर बनने लगते हैं तो उसका असली चेहरा नरभक्षी के रूप में प्रकट होता है। इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया भी भूत-प्रेत से लेकर ज्योतिष तक काल्पनिक मनोविकारों का प्रचार-प्रसार करते रहते हैं जिसका सीधा असर समाज पर होता है और उससे समाज विकृत भी होता है। देखने में तो यहाँ तक आ रहा है की बगैर मेहनत किये धन-धान्य से परिपूर्ण होने के लिए उँगलियों में दर्जनों अंगूठियाँ लोग पहनने लगे हैं, हीरा, पन्ना, पुखराज, मूँगा आदि पहनने से भाग्य परिवर्तन की आशा में करोडो लोग लगे रहते हैं और अंत में माया मिली न राम।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा पारित आदेशों को देख कर यह लगता है कि उसके पीठासीन अधिकारी न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग नहीं कर रहे हैं अपितु पुलिस विभाग के एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के मामले में जितना दोषी पुलिस है उससे कहीं ज्यादा गैर जिम्मेदारी पूर्ण आदेश पुलिस  कस्टडी रिमांड का है। मुख्य बात यहाँ है की किस आधार पर न्यायलय श्रीमान ने उनको पुलिस कस्टडी रिमांड पर दिया था। कानून क तहत ही यह परिभाषित है की पुलिस कस्टडी रिमांड का उपयोग कभी-कभी विशेष परिस्तिथियों  में ही  है किन्तु न्यायलय में जैसे ही पुलिस प्रार्थनापत्र देती है वैसे ही पुलिस कस्टडी रिमांड स्वीकृत हो जाता है आखिर में इस मामले में पुलिस को इनकार करना पड़ा है की उसे पुलिस  कस्टडी रिमांड नहीं चाहिए। न्याय का यह सिद्धांत है की गुनाहगार से उसके ही खिलाफ उससे सबूत नहीं मांगे जा सकते हैं। भारतीय पुलिस का चरित्र चेखेव के नाटक ” गिरगिट ” की तरह है वह बार-बार रंग बदलती है और न्यायलय उसके हर रंग को स्वीकार करने के आदि हो गए हैं। प्रथम रिमांड क प्रस्तुत होते ही न्यायलय श्रीमान को देखना चाहिए था की उक्त धाराएं अभियुक्त के ऊपर आयत होती हैं या नहीं और प्रथम दृष्टया मामले को देखने के बाद न तो पुलिस  कस्टडी रिमांड देना चाहिए और न ही न्यायिक अभिरक्षा में भेजे जाने का आदेश पारित करना चाहिए। भारतीय कानून को जब कोई न्यायलय तख्ते लन्दन से जोड़कर देखता है तो उसके निर्णय सही नहीं हो सकते हैं और जब कानून को भारतीय संविधान और विधि के मूल सिद्धांतों से जोड़कर देखा जाता है तो निर्णय अवश्य सही होंगे। अब पीठासीन अफसर किस चश्मे से देख रहा है उसी से उसके निर्णय होते हैं।
 वहीँ, महाराष्ट्र के गृह मंत्री आरआर पाटिल ने मुंबई में कहा कि पुलिस को कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को हिरासत में लेने का कोई आधार नहीं था. पाटिल ने सोमवार 10 सितंबर को मुंबई में कहा कि इस मामले में पुलिस अपनी जांच का काम पूरा कर चुकी थी. उन्होंने कहा कि वह पूरे मामले को देख रहे हैं और जो कुछ भी उचित होगा उसे अदालत के सामने कहेंगे। तब यह सवाल उठ खड़ा होता है कि पुलिस कस्टडी रिमांड या न्यायिक अभिरक्षा का आदेश पारित करना कहाँ तक औचित्यपूर्ण था।
सुमन

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राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का संतुलित (सानुपातिक) विकास नियम भी इसी दिशा में काम करता है जिसने उत्पादन में प्रतियोगिता और अराजकता को समाप्त कर दिया है।
हमारी वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाएँ भी इसी दिशा में काम करती हैं, जिनकी आर्थिक नीतियाँ आमतौर पर राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के संतुलित विकास नियम की आवश्यकताओं पर आधारित हैं।
सब मिलाकर परिणाम यह है कि हमारे देश में मूल्य नियम परिचालन का प्रभाव क्षेत्र सीमित है और इसलिए हमारी व्यवस्था में मूल्य नियम उत्पादन का नियामक नहीं बन सकता।
सचमुच यही उस ज्वलंत तथ्य की व्याख्या है कि हमारे देश में इसके बावजूद कि समाजवादी उत्पादन का अनवरत तेज विकास अति उत्पादन का संकट पैदा नहीं करता, वहीं पूँजीवादी देशों में जहाँ इसी मूल्य नियम का प्रभाव-क्षेत्र व्यापक है, उत्पादन के धीमा विकास के बावजूद समय-समय पर अति उत्पादन का संकट पैदा करता है।
कहा गया है कि मूल्य नियम एक ऐसा चिर स्थायी कानून है जो ऐतिहासिक विकास की सही अवधि में लागू होता है। यहाँ तक कि कम्युनिस्ट में भी यह बिल्कुल सच नहीं है। मूल्य नियम की तरह मूल्य भी एक ऐतिहासिक श्रेणी है जिसका सम्बंध माल उत्पादन के अस्तित्व के साथ जुड़ा है। माल उत्पादन के विलुप्त होने के साथ ही मूल्य और इसका स्वरूप तथा मूल्य नियम भी विलुप्त हो जाएगा।
समाजवादी समाज के दूसरे चरण में उत्पादित सामानों पर खर्च किए गए श्रम की गणना मोटा मोटी अनुमानित तरीके से इसके मूल्य और परिणाम के आधार पर नहीं किया जाएगा, जैसा माल उत्पादन प्रक्रिया के अंदर होता है, बल्कि उत्पादित सामानों पर सीधे और तुरन्त खर्च किए गए समय के परिमाण और उसके घंटो की संख्या के आधार पर किया जाएगा। चूँकि श्रम विभाजन, उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं में इसका वितरण मूल्य नियम से विनियमित नहीं होगा क्योंकि जब तक इसका परिचालक बंद हो गया रहेगा, बल्कि यह सामानों के लिए समाज की बढ़ती माँगों से विनियमित होगा। तब समाज की निरंतर बढ़ती आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन प्रक्रिया संचालित होगी। यह ऐसा समाज होगा जब उत्पादन का नियमन समाज की आवश्यकताओं द्वारा होगा। इस तरह समाज की आवश्यकताओं का आकलन करना हमारे योजना निकायों के लिए सबसे बड़े महत्व का कार्य हो जाएगा।
यह अवधारणा भी पूर्णतः गलत है कि हमारी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था के अंतर्गत साम्यवादी समाज के प्रथम चरण में उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं में श्रम विभाजन के अनुपात का निर्धारण मूल्य नियम द्वारा होता है।
अगर यह सच होता तो यह समझ पाना कठिन होता कि आखिर हमारे हल्के उद्योंगों, जो काफी लाभदायक हैं, को पूरी तरह क्यों नहीं विकसित किया जा रहा है, जबकि भारी उद्योगों को प्राथमिकता दी जा रही है जो कम लाभ देने वाले हैं और कुछ तो बिल्कुल घाटे पर चल रहे हैं।
अगर यह सच होता तो इसे भी नहीं समझा जा सकता था कि हमारे अनेक भारी उद्योगों संयंत्रों, जो अभी भी लाभदायक नहीं है, और जहाँ मजदूरों के श्रम का समुचित रिटर्न भी नहीं आता है, को बंद क्यों नहीं कर दिया जाता और उसकी जगह हल्का उद्योग संयंत्रों जो निश्चिय यही लाभदायक होते और जहाँ मजदूरों के श्रम का रिटर्न काफी बड़ा आता, क्यों नहीं चालू कर दिया जाता है?
अगर यह सच होता तो इसे भी समझना मुश्किल होता कि ऐसे संयंत्रों से, जो कम लाभदायक हैं (यद्यपि हमारी अर्थ व्यवस्था के लिये आवश्यक हैं) मजदूरों का स्थानांतरण ऐसे संयंत्रों के क्यों नहीं कर दिया जाता जो मूल्य नियम के मुताबिक ज्यादा लाभदायक हैं और जिनके बारे में माना जाता है कि वह (अर्थात मूल्य नियम) उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं के बीच श्रम विभाजन का अनुपात निर्धारित करता है।
यह स्पष्ट है कि अगर हम इन कामरेडों का नेतृत्व मान लें तो उपभोक्ता सामानों के उत्पादन के पक्ष में उत्पादन के साधनों के उत्पादन की प्राथमिकता देना हमें रोक देना चाहिए। लेकिन इसका क्या परिणाम होगा जब उत्पादन के साधनों के उत्पादन की प्राथमिकता समाप्त कर दी जाएगी? परिणाम होगा राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के निरंतर विकास की संभावनाओं को बर्बाद कर देना क्योंकि उत्पादन के साधनों के बगैर उत्पादन के राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का निरंतर विकास एवं विस्तार नहीं किया जा सकता।
ये कामरेड भूल जाते हैं कि मूल्य नियम केवल पूँजीवाद में उत्पादन का नियामक होता है जहाँ उत्पादन साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व, उत्पादन अराजकता और अति उत्पादन का संकट होता है। वे भूलते हैं कि हमारे देश में उत्पादन साधनों पर सामाजिक स्वामित्व और संतुलित राष्ट्रीय विकास नियम दरअसल मूल्य नियम के प्रभाव क्षेत्र को सीमित करते हैं और हमारे वार्षिक एवं पंचवर्षीय योजनाओं के प्रावधान तदनुसार बने हैं भी, मूल्य नियम के प्रभाव को कटाते हैं।
कुछ कामरेड इससे यह नतीजा निकालते हैं कि राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का संतुलित विकास नियम और अर्थ नियोजन उत्पादन की लाभदायकता को ही अभिशून्य का देते हैं। यह बिल्कुल सच नहीं है। बल्कि बात उल्टी है। अगर लाभदायकता को प्रत्येक प्लांट और प्रत्येक उद्योग के साथ अलग-अलग नहीं देखें, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्रीय विकास को दृष्टि में रखते हुए आगामी दस वर्षों को देखें, जो इस मुद्दे पर सही दृष्टिकोरण होगा, तो तात्कालिक और क्षणिक लाभदायकता का प्रश्न नीचे चला जाएगा। राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के संतुलित विकास नियम और तदनुसार अर्थ नियोजन ;म्बवदवउपब च्संददपदहद्ध से अपेक्षाकृत ऊँचा विकास सुनिश्चित होता हैं और इस राष्ट्र को नुकसान पहुँचाने वाले सामाजिक आर्थिक संकटों से बचते हैं।
संक्षेप में, निःसंदेह यह कहा जा सकता है कि हमारे समाजवादी उत्पादन की वर्तमान अवस्था में उत्पादन की विभिन्न प्रभाखाओं के बीच श्रम विभाजन का ‘अनुपात-नियामक’ मूल्य का नियम कभी नहीं बन सकता।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

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यह सही है कि जब वर्तमान के दो बुनियादी उत्पादन क्षेत्रों (राजकीय औद्योगिक पदों और सामूहिक फार्म क्षेत्र) के स्थान पर केवल एक ही समग्र उत्पादन क्षेत्र (One all embracing production sector) होगा, जिसे देश के अंदर समस्त उपभोक्ता सामग्रियों को निबटाने का अधिकार प्राप्त होगा तो मुद्रा के लिए माल का परिचलन लुप्त हो जाएगा क्योंकि वह राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था में अनावश्यक हो जाएगा। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, जब तक दो बुनियादी उत्पादन क्षेत्र बना रहता है, तब तक माल का उत्पादन और माल का चलन निश्चिय ही बन रहेगा। यह हमारी अर्थ व्यवस्था के लिए आवश्यक और बहुत ही उपयोगी तत्व है। इस प्रकार के एक मात्र एकीकृत क्षेत्र का निर्माण कैसे होगा? क्या राजकीय क्षेत्र द्वारा सामूहिक फार्म को हड़प लिए जाने से यह होगा? यह किसी तरह संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा करना वास्तविकता के सामूहिक फार्म को लूटना होगा। तब क्या एक ऐसा राष्ट्रीय निकाय के गठन से होगा जिसमें राजकीय उद्योगों और सामूहिक फार्मों के प्रतिनिधि शामिल किए जांच वह देश के सम्पूर्ण उपभोक्ता सामानों का हिसाब रखें और उसका वितरण करें, अर्थात वस्तुओं का विनियम करे? यह एक ऐसा विशेष प्रश्न है, जिस पर अलग से विचारने की जरूरत है।

इस तरह हमारा माल का उत्पादन सामान्य किस्म का नहीं है। यह विशेष किस्म का माल उत्पादन है। यह बगैर पूँजीपतियों के ऐसे माल का उत्पादन है जिसका संबंध मुख्य रूप से सम्बन्ध समाजवादी उत्पाकद को (राजकीय, सामूहिक फार्म, सहकारिता) की आवश्यक सामग्रियों से है, जिनका कार्य क्षेत्र व्यक्तिगत उपभोक्ता सामानों की किस्मों तक सीमित है जो स्पष्टतः पूँजीवादी उत्पादन की ओर नहीं जा सकता, क्योंकि दोनो क्षेत्रों को इस तरह बनाया गया है कि ये दोनों मिलकर समाजवाद उत्पादन को विकसित और सुदृ़ करेंगे।
इसलिए ऐसे साथी भी पूर्णतः गलत फहमी में है जिनका आरोप है कि चूँकि सामजवादी समाज का अवसान नहीं हुआ है (अर्थात साम्यवादी अवस्था नहीं उत्पन्न हुई है-अनु0) इसलिए माल के उत्पादन के चलते हम पूँजीवादी चरित्र की सभी आर्थिक श्रेणियों का पुनरोदय करने को बाध्य होंगे, जैसेमाल के रूप में श्रम शक्ति, अतिरिक्त मूल्य, पूँजी, पूँजीवाद मुनाफा, मुनाफा का सामान्य दर, इत्यादि। ऐसे साथी पूँजीवादी माल उत्पादन को हमारे माल उत्पादन के साथ मिला देते हैं और विश्वास कर लेते हैं कि जब कभी माल का उत्पादन होगा तो वह पूँजीवादी उत्पादन ही होगा। वे यह महसूस नहीं करते कि हमारा माल का उत्पादन मूल रूप से पूँजीवादी माल उत्पादन से भिन्न है।
और भी, मैं सोचता हूँ कि मार्क्स के “कैपिटल” से लिए गए कुछ दृष्टिकोणों को छोड़ दिया जाना चाहिए। जैसे मार्क्स जहाँ पूँजीवाद का विश्लेषण, वहाँ लिखी गई कुछ बातों को बनावटी तरीके से समाजवादी सम्बन्धों पर चिपका दिया गया है। मैं बताऊंगा ऐसे दृष्टिकोणों में कुछ हैं आवश्यक’ और अतिरिक्त मूल्य’, आवश्यक’ और अतिरिक्त उत्पादन’ मार्क्स पूँजीवाद का विश्लेषण इस रूप में करते हैं कि मजदूर वर्ग के शोषण की जड़ें अतिरिक्त मूल्य को उजागर किया जा सके। मजदूर वर्ग को, जिन्हें उत्पादन के साधनों से वंचित कर दिया गया है, सैद्घांतिक और वैचारिक हथियार से लैश किया जा सके ताकि वह पूँजीवाद के जुए को उतार फेंके। यह स्वाभाविक है कि माक्र्स ने जिन दृष्टिकोणों का इस्तेमाल किया वह पूर्ण रूप से पूँजीवादी सम्बन्धों पर लागू होता है। किन्तु उन्हीं बातों को इस समय लागू करन के बारे में बोलना आश्चर्यजनक है जब मजदूर वर्ग न केवल सत्ता और उत्पादन के साधनों से वंचित नहीं है, बल्कि वह इसके विपरीत सत्ता पर कब्जा किये है और उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण करता है। श्रम शक्ति को माल के रूप में समझना और मजदूरों को खरीदना’ (hising) जैसी बात करना अब हमारी व्यवस्था में बेतुका है क्योंकि यहाँ मजदूर वर्ग को उत्पादन साधनों का स्वयं स्वामी है, स्वयं अपने को खरीदता है और स्वयं अपनी श्रम शक्ति बेचता है। इसी तरह आवश्यक’ और अतिरिक्त श्रम’ की बात करना भी आश्चर्यजनक है क्योंकि हमारे यहाँ यह मजदूरों द्वारा उत्पादन ब़ाने के लिए समाज को दिया जाने वाला योगदान है। शिक्षा की उन्नति के लिए, जन स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए, सुरक्षा संगठन के लिए मजदूर योगदान करते हैं जो न केवल मजदूर वर्ग के लिए, जो आज सत्ता में है, बल्कि पूरे देश के लिए और यहाँ तक कि मजदूरों और उसके परिवारों की व्यक्तिगत जरूरतों के लिए भी मजदूर अपना श्रम खर्च करता है।
यह उल्लेखनीय है कि “गोथा कार्यक्रम की आलोचना’’ में मार्क्स जब पूँजीवाद की जाँच पड़ताल नहीं, बल्कि साम्यवादी समाज की प्रथम अवस्था का वर्णन कर रहे थे तो मार्क्स ने श्रम को उत्पादन ब़ाने के लिए, शिक्षा और जन स्वास्थ्य के लिए, प्रशासन खर्च के लिए, लोक निर्माण आदि के लिए समाज के प्रति किया गया योगदान के रूप में स्वीकार किया है और इसे उन्होंने उसी प्रकार आवश्यक माना है जैसे मजदूर वर्ग की उपभोक्ता जरूरतों की आपूर्ति के लिए श्रम खर्च किया जाता है।
मैं सोचता हूँ कि हमारे अर्थ शास्त्रियों को चाहिए कि इस विसंगति को समाप्त करें जो पुराने दृष्टिकोणों और हमारे देश की नई परिस्थितियों के बीच है। पुराने विचारों के स्थान पर नए दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जो नई परिस्थितियों से मेल खाते हैं।
हम इस विसंगति को कुछ समय के लिए सह सकते थे, किन्तु अब समय आ गया है कि इसे समाप्त करें।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

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अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी हिंदुस्तान यात्रा पर आई थी और उन्होंने भारतीय संघवाद के विपरीत आचरण प्रदर्शित करते हुए बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सीधे मुलाकात की और अमेरिकी एजेंडे को संसद में पास कराने के लिये विचार विमर्श किया। उस में मुख्य रूप से यह बात भी शामिल थी कि भारत ईरान से पेट्रोलियम पदार्थों को न ख़रीदे। भारतीय राजनेताओं नागरिकों राजदूतों की जिस तरह से बेइज्जती तलाशी के नाम पर अमेरिकी हवाई अड्डों पर होती है। उसका कोई भी जवाब भारत सरकार नहीं दे पाती है उलटे अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी ने भारतीय संघ की परवाह न करके सीधे बंगाल की मुख्यमंत्री से सम्बन्ध कायम करने की कोशिश की अमेरिकी दबाव के बीच भारत ने मंगलवार को स्वीकार किया कि उसने ईरान से कच्चे तेल के आयात में बड़े पैमाने पर कटौती की है। पेट्रोलियम राज्य मंत्री आर पी एन सिंह ने कहा कि 2010-11 और 2011-12 के दौरान भारतीय तेल कंपनियों ने ईरान से 18.5 एमएमटी और 17.44 एमएमटी कच्चे तेल का आयात किया। उन्होंने बताया कि 2012-13 में ईरान से 15.5 एमएमटी कच्चे तेल का आयात किया जाना है। सिंह ने धर्मेद्र प्रधान के सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी।
ईरान द्वारा रुपये में पेमेन्ट लेने में हम इस जिम्मेवारी से मुक्त हो जाते हैं। तेल के लिये मिले रुपयों से ईरान कपड़े, अनाज अथवा अन्य दूसरा माल भारत से खरीद सकता है। यह सौदा भारत के लिये लाभप्रद है।
सुमन
लो क सं घ र्ष !

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