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Posts Tagged ‘loksangharsha’

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2012 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

4,329 films were submitted to the 2012 Cannes Film Festival. This blog had 15,000 views in 2012. If each view were a film, this blog would power 3 Film Festivals

Click here to see the complete report.

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किसान, भारत भाग्य विधाता-किसान भगवान-अन्नदाता आदि नामों से पुकार कर उसको महिमा मंडित कर सबसे ज्यादा शोषण उसी का किया जाता है। किसान मुख्य उत्पादक है। उसी के द्वारा उत्पादित वस्तुओं से मानव शरीर संचालित होता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में उसी की व्यवस्था के लिए राजस्व, न्याय, लोकतंत्र, समानता जैसे शब्द बने हैं, लेकिन वस्तु स्थिति इसके विपरीत है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पंजाब मंे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार सन् 1995 से 2010 तक किसानों की आत्महत्या का आँकड़ा 2 लाख 56 हजार 9 सौ तेरह बताई गई है। वहीं राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आँकड़े भ्रमित करने वाले हैं। वास्तविकता यह है कि देश में हर घण्टे दो किसान आत्महत्याएँ कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण बढ़ती लागत, कम होती आमदनी से कर्ज का मकड़जाल कसना है।
किसान आत्महत्याओं को छुपाने के लिए शासन और प्रशासन तरह-तरह की बातें करता है। अखबारों में यह छपवाते हैं कि ‘नौजवान ने बीबी की आशनाई से मजबूर होकर आत्महत्या की, शराबी पति ने आत्महत्या की, गृहकलह के कारण आत्महत्या, सूदखोरों के उत्पीड़न से आत्महत्या, पुलिस उत्पीड़न से आत्महत्या समाचार प्रकाशित होते हैं। वास्तविक स्थिति यह है कि किसानों की आत्महत्याओं का ग्राफ सामने न आने पाए इसलिए यह बाजीगरी की जाती है।
राहुल गांधी, मुलायम सिंह यादव, मायावती, गडकरी, आडवाणी से लेकर विभिन्न राजनैतिक दलों के नेतागण किसानों की समस्याओं को हल करने के लिए परेशान, हैरान 24 घण्टे रहते हैं। इन लोगों की परेशानियों को ही देखकर शायद किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ये नेतागण जितना परेशान होते हैं, पूँजीपति वर्ग राष्ट्रीय से बहुराष्ट्रीय हो जाता है और किसान अपनी दयनीय हालत से मजबूर होकर आत्महत्या कर लेता है।
केन्द्र सरकार द्वारा 2007, 2008 में किसानों को कर्ज माफी के नाम पर 70 हजार करोड़ रूपये दिए गए, जिसका भी लाभ किसानों को नहीं मिला। किसानों के नाम पर बैंक
अधिकारियों और दलालों के गठजोड़ ने फर्जी ऋण निकाल लिए थे उसको कर्जमाफी योजना में समायोजित कर बैंक अधिकारियों व दलालों ने अपनी गर्दन बचा ली।
बुवाई के समय बाजार मंे ‘बीज’ और खाद गायब हो जाते हंै। किसान व उसके संगठन हल्ला मचाकर रह जाते हैं। शासन व अधिकारी गण व्यवस्था बनाने की बात करने लगते हैं और जब फसलें तैयार होती हैं तो उनको खरीदने के लिए सरकारी एजेंसियाँ कभी बोरा नहीं है तो कभी चेक बुक नहीं है, कभी ट्रान्सपोर्ट की व्यवस्था नहीं है, कहकर भुलावा देते हैं। किसान हल्ला मचाते रहते हैं और सरकारी एजेंसियाँ व्यापारियों का गेहूँ, धान चुपके-चुपके खरीदकर गोदामों को भर देती हैं और इसमें भी किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य न मिलने के कारण हजारों का नुकसान होता है।
यदि राहुल गांधी, मुलायम सिंह यादव, मायावती, गडकरी, आडवाणी जैसे नेतागण किसानों की चिंता छोड़कर अम्बानियों, टाटाओं, बिरलाओं की चिंता करने लगें तो शायद किसानों की स्थिति में सुधार संभव हो, क्योंकि इन राजनैतिक दलों की सहमति द्वारा इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, उद्योगपतियों को लाखों करोड़ रुपये के बेल आउट पैकेज दिए जाते हैं जिनकी चर्चा भी नहीं होती है।
किसानों की संख्या घट रही है, उनकी जमीने किसी न किसी बहाने छीनी जा रही हैं। ये सरकारें और इनके नेतृत्वकारी लोगों का चरित्र किसान विरोधी है। ये बहुराष्ट्रीय, राष्ट्रीय कम्पनियों के अभिकर्ता मात्र हैं।
लो क सं घ र्ष !

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पश्चिम बंगाल में वामपंथी मोर्चा बुरी तरह से पूंजीवादी शक्तियों से पराजित हुआ है। सत्ता में आने के बाद वामपंथी मोर्चे ने किसान, खेत मजदूर सम्बन्धी बहुत सारे कार्य किये थे जिसके सहारे 34 वर्ष तक लगातार राज्य किया। जनता ने लगातार 34 वर्ष तक अपना मत व समर्थन बड़े धैर्य के साथ दिया। लेकिन वामपंथी दलों ने पूंजीवादी शक्तियों से लड़ने के लिये नयी तकनीक नहीं ईजाद की और न ही वैचारिक आधार पर जनता को शिक्षित ही कर पाए। सत्ता में रहने के साथ-साथ वामपंथी नेतागण भी पूंजीवादी विधर्म के शिकार हुए। जिसका नतीजा आज आया है। बंगाल में वामपंथी सरकार को हटाने के लिये सी.आई.ए से लेकर साम्राज्यवादी शक्तियां कई वर्षों से लगातार प्रयासरत थी। वहीँ वामदलों के नेता सत्ता में मदांत होकर 25 साल पहले किये गए कार्यों का ही राग अलापते रहे जबकि वामदलों को जनता की बुनियादी आवश्यकताओं के अनुरूप अपने कार्यक्रमों को नई दिशा देकर लागू करना चाहिए था। काडर से अगर जनता अपने को पीड़ित महसूस करे तो उस काडर को तुरंत नष्ट कर देना चाहिए। जब मोटी चर्बी होने लगे तब के लिये माओ त्से तुंग ने कहा था कि बम्बार्ड टू हेड क्वाटर ।
दूसरी तरफ वर्ग शत्रुवों ने पार्टी के अन्दर घुस कर वही विकृतियाँ पैदा कर दीजो विकृतियाँ पूंजीवादी दलों में होती हैं यू.एस.एस. आर की कम्युनिस्ट पार्टी इसका सबसे बड़ा उदहारण है कि कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव भष्मासुर गोरवा चेव हो गया जिसने सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी को ही ख़त्म कर दिया था।
वाम दलों को ईमानदारी आत्म चिंतन करने की जरूरत है। अपने वर्ग शत्रुवों को चिन्हित करने की आवश्यकता है । पार्टी के अन्दर भी वर्ग शत्रु घुस आये हैं उनका भी उपचार करने की आवश्यकता है। अमेरिकन साम्राज्यवादी शक्तियों का दुनिया में अगर कोई मुकाबला कर सकता है तो वह कम्युनिस्ट है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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किसानो का खरगोश की तरीके से शिकार करने के लिये मुस्तैद पुलिस

भूमि अधिग्रहण के विरोध में किसानो के आन्दोलन को कुचलने के लिये सरकारी अमले में ग्रेटर नोएडा के भट्ठा व पारसोल गाँव में अंग्रेजो को भी मात देते हुए किसानो की खड़ी फसल में आग लगा दी है। विपक्षी दलों के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। विशेष पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था बृजलाल ने 6 अन्य किसान नेताओं के ऊपर गिरफ्तारी लिये इनाम घोषित किया है। जबकि इसके विपरीत प्रदेश में आये दिन हो रहे बड़े-बड़े हत्याकांडो में पुलिस की भूमिका निरर्थक साबित हो रही है। राजधानी में डॉक्टर वी.पी सिंह हत्याकांड में पुलिस कोई कार्यवाई नहीं कर पा रही हैं क्योंकि उसमें सत्तारूढ़ दल के नेताओं के भ्रष्टाचार का भी मामला छिपा हुआ है। पुलिस फिर कैसे कोई कार्यवाई करे। रूसी नाटकार चे ख्येव द्वारा लिखित नाटक गिरगिट में जो पुलिस की भूमिका है वही भूमिका उत्तर प्रदेश पुलिस की वर्तमान दौर में है। चूंकि मामला किसानो से सम्बंधित है इसलिए पुलिस ने तमाम सारे गाँव में तोड़फोड़, आग लगाना, बीमारों वृद्धों को पीटना, गिरफ्तार लोगों को जम कर पीटना, घरेलू सामानों को नष्ट कर देना। आज के सरकार की लोकतांत्रिक न्याय पर आधारित व्यवस्था का कार्यक्रम जारी है।
अब सरकारों में इस बात की होड़ लगी हुई है कि हम हिन्दुस्तानी अपनी जनता को किस कदर लूट कर नादिर शाह, तैमूरलंग, चंगेज खां को पीछे छोड़ दें और यह लोग शरमाएं की इतना तो हम भी भारत की जनता के साथ नहीं कर पाए।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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ट्युनेसिया, मिस्र में बदलाव हो रहा है, बहरीन में बदलाव की रस्साकशी जारी है। मिस्र में अमेरिका की कुख्यात खुफिया एजेंसी सी.आई.ए का यातना सेंटर है। मिस्र की फौजों का खर्चा भी लगभग अमेरिका ही उठता है। वहीँ, बहरीन में अमेरिकी फ्लीट के तीस हजार सैनिक तैनात हैं। पैट्रिक मिसाइल लगी हुई हैं जिनका रुख ईरान की तरफ है। बहरीन की राजधानी मनामा से अमेरिका खाड़ी के देशों तथा अफगानिस्तान तक को नियंत्रित करता है। इस तरह से अमेरिकी साम्राज्यवाद ने मध्य एशिया के देशों को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से अपना गुलाम बना रखा है। जहाँ पर लोकतंत्र, न्याय, समता जिनका ढिंढोरा अमेरिका पीटता रहता है, नहीं हैं। अगर आप अमेरिकी पिट्ठू देशों की सूची उठाकर देखें तो उनमें किसी भी देश में इन शब्दों का कोई अर्थ नहीं है।
महंगाई, बेरोजगारी तथा देश के तानाशाह के कुकर्मों से ऊब कर जनता अपनी जान पर खेल कर आन्दोलनरत है। बहरीन में सेना सड़कों पर है, निहत्थी जनता पर गोलियां चलाई जा रही हैं लेकिन अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष चुप हैं।
अमेरिका विरोध के नायक कर्नल गद्दाफी जो स्वयं में एक तानाशाह हैं। उनके मुल्क लीबिया में भी जनता आन्दोलनरत है, सेना जनता का दामन कर रही है। अब तक लगभग 35 लोग मारे जा चुके हैं। सैकड़ों लोग घायल हैं। जहाँ भी तानाशाह हैं उनके कुकर्मों से जनता ऊब चुकी है। यह लोग जनता को व्यवस्था देने में नाकामयाब हैं इनकी सनक ही इनका कानून है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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दोषी हूँ लेकिन जेल जाने भर का दोषी नहीं हूँ

भारत के प्रधानमंत्री तथा पूर्व नौकरशाह डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा कि वह उतने दोषी नहीं हैं जितना उनके बारे में प्रचार किया गया है। तो प्रधानमंत्री जितना दोषी हैं उतना दोष जनता को बता दें, लेकिन उन्होंने अपने से सम्बंधित भ्रष्टाचारों के मुद्दों पर बड़ी नाटकीयता के साथ निकलने की भी कोशिश की। इसरो से सम्बंधित देवास समझौता सीधे प्रधानमंत्री से सम्बद्ध है ( जिससे देश को दो लाख करोड़ रुपये की हानि होती ) रद्द किया गया। स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला सहित जितने घोटाले हैं। सामूहिक जिम्मेदारी के तहत उसके जिम्मेदार डॉक्टर मनमोहन सिंह हैं। भारतीय संघ के प्रधानमंत्री को मजबूर होना या मजबूरियां गिनाना शोभा नहीं देता है। जमाखोरों को खुली छूट पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में आये दिन बढ़ोत्तरी करना, राज्यों में अव्यवस्था का दौर जारी रहना। अमेरिका के सामने हमेशा घुटने टेके रहने में आपकी कौन सी मजबूरी है। आप इस देश के अक्षम प्रधानमंत्री हैं। आपकी सरकार भ्रष्टाचार में डूबी हुई सरकार है। आपकी सरकार ने जिन इजारेदार पूंजीपतियों से चंदा लिया है उनके काम करने के लिए आपके पास कोई मजबूरी नहीं होती है। रही भारतीय जनता पार्टी की बात उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण से लेकर प्रमोद महाजन तक के कार्य कलापों की जानकारी सबको है। जनता मजबूर है आप जैसे कुछ दोषी प्रधानमंत्री को ढ़ोने के लिए। अगर प्रधानमंत्री जी आपमें जरा सा भी नैतिक आत्मबल है तो मजबूरियां छोड़ कर, बातें बनाने से अच्छा है कि आप अपने पद से हट जाइये। प्रधानमंत्री जी बेशर्मी की एक हद होती है उस सीमा को भी पार कर चुके हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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सुमन
लो क सं घ र्ष !

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सूफी संतो को कलंकित किया

पाकिस्तान के सुप्रसिद्ध सूफी गायक राहत फ़तेह अली खान के पास से 24000 डालर व दो सहयोगियों के पास से 50-50 हजार डालर बरामद हुए। पाकिस्तान में उनकी कला को चाहने वाले लोगो ने प्रदर्शन शुरू कर दिए। पकिस्तान सरकार ने भारत सरकार से बातचीत कर राहत फ़तेह अली को रिहा करवा लिया। भारतीय फिल्म जगत में मिडिल ईस्ट के लोगों का काला धन लगता है और अधिकांश कलाकार सफेदपोश आर्थिक अपराधी के रूप में विकसित होते हैं। इस सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने तो बाराबंकी जनपद में 419, 420, 467,468, 471 के अपराध किये। चूँकि वह महानायक हैं इसलिए उनको हर तरह के आर्थिक अपराध करने की छूट है। इसी तरह से उद्योग जगत के लोग आर्थिक अपराध करते रहते हैं और उनको हर तरह के अपराधों को संरक्षण मिलता रहता है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था का संचालन वही सब करते हैं।
कलाकारों को कला के नाम पर, साहित्यकारों को साहित्य के नाम पर, मंत्रियों को देश चलाने के नाम पर व उद्योगपतियों को अर्थ व्यवस्था चलाने के नाम पर आर्थिक अपराध करने की खुली छूट है। सूफी गायक राहत फ़तेह अली ने इससे पहले कितना डालर और हवाला किया होगा उसका कोई अंदाजा नहीं है। जैसे उत्तर प्रदेश के कई मंत्रियों के बारे में यह प्रकाशित हो चुका है कि उनकी सरकारी गाड़ियों से मार्फीन, हेरोइन की स्मगलिंग होती हैं लेकिन प्रदेश चलाने के नाम पर उनके सभी अपराध क्षम्य हैं। पंजाबी के महान गायक दलेर मेहन्दी कबूतरबाजी का कार्य करते थे। क्रिकेट स्टार मैच में फिक्संग का काम करते हैं। देश में सारे नियम कानून मेहनतकश जनता के लिए बनाए जाते हैं। जिसका उन्हें ईमानदारी से पालन करना चाहिए। पेट की ज्वाला अगर न शांत हो पावे तो आत्महत्या कर लेने की खुली आजादी है।
जबकि होना यह चाहिए कि किसी भी क्षेत्र में नामचीन हस्तियों को अपराध नहीं करने चाहिए और यदि वह अपराध में लिप्त पाए जाते हैं तो जनता को उनका समर्थन नहीं करना चाहिए। सिद्धांत तो यह होना चाहिए उनकी कला को सलाम और अपराध के लिए दंड।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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जनता की ताकत


अमेरिकन आका भी बचा नहीं पाए

महंगाई बेरोजगारी उत्पीडन से परेशान बेहाल जनता ने 18 दिन सारा कामकाज छोड़ कर मिस्त्र में अमेरिकन साम्राज्यवाद के पिट्ठू तानशाह हुस्नी मुबारक को राष्ट्रपति पद से मुक्ति दिला दी। मध्य एशिया में इस तरह के तानाशाह बीस-बीस, पच्चीस-पच्चीस साल से विराजमान हैं और जनता की समस्याओं से उनका कोई लेने देना नहीं रहता है। विश्व स्तर की राजनीति में वह अमेरिकन साम्राज्यवाद की जी हजूरी में रहकर उसके हितों की परिपूर्ति करने का साधन बने रहते हैं। अमेरिकन साम्राज्यवादियों ने बड़ी ख़ूबसूरती से बूढ़े तानाशाह से मुक्ति पा ली क्योंकि आने वाले उसी के व्यक्ति हैं, जो राजसत्ता पर स्थापित हो रहे हैं। इस तरह से कोई व्यवस्थागत परिवर्तन नहीं हो रहा है जबकि इसके विपरीत जनता को रोजगार शिक्षा स्वास्थ्य तथा अपने शोषण से मुक्ति की आवश्यकता है लेकिन हर्ष इस बात की है कि जनता ने अपनी ताकत को पहचाना है। मिस्त्र की आत्मविश्वास भरी जनता आने वाले शासक को भी जनता के हितों के लिए काम करने को मजबूर करेगी।
मिस्त्र के जनांदोलन ने मध्य एशिया के देशों में नई आशा और विश्वास का संचार किया है और हो सकता है कि आने वाले दिनों में सूडान, यमन, सीरिया, टर्की सहित बादशाहत वाले अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रतिनिधियों को उखाड़ फेंकेगी और एक नए समाज की संरचना हेतु जनता में आशा और विश्वास को पुनर्जीवित करेगी। अपने देश के युवाओं में भी इन तानाशाह के पतन से नई आशा व विश्वास का जन्म हुआ है जो आने वाले दिनों में इन भ्रष्टाचारी राजनेताओं के पतन का कारण बनेगी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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देश में आजादी के बाद भी काले कानूनों का निर्माण हुआ है चाहे वो पोटा के रूप में हो चाहे एन.डी.पी.एस हो या टाडा। आतंकवाद व माओवाद से निपटने के नाम पर विभिन प्रदेशों में काले कानूनों का निर्माण हुआ है। इन काले कानूनों की एक विशेषता है कि यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम व भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता से हट कर इनका विचारण होता है। इसमें कुछ कानूनों में तो यह प्राविधान है कि पुलिस ने अंतर्गत धरा 161 सी.आर.पी.सी के तहत दिया गया बयान या पुलिस के समक्ष किसी भी आत्म स्वीकृति को सजा का आधार बना लिया जाता है। इन कानूनों के तहत यह भी व्यवस्था होती है कि इसमें सभी पुलिस वाले पेशेवर गवाहों की तरह गवाही देते हैं और उसी आधार पर सजा हो जाती है। जैसे एन.डी.पी.एस एक्ट के तहत अधिकांश मामलों में जिस व्यक्ति को जितने दिन जेल में रखना होता है उतनी ही मात्र में मार्फीन या हेरोइन की फर्जी बरामदगी दिखा दी जाती है इसमें भी जमानत आसानी से नहीं मिलती है। सजा, विचारण के पश्चात लगभग तयशुदा होती है। इन वादों में पुलिस की इच्छा ही महत्वपूर्ण है कि वह आपको समाज के अन्दर रखना चाहती है या कारागार में। कई बार ऐसा भी होता है कि पुलिस बेगुनाह नवजवानों को एन.डी.पी.एस एक्ट के तहत हँसते हुए न्यायालय रवाना कर देती है कि जाओ कुछ वर्ष अन्दर रह आओ और ऐसे वादों में न्यायालय के पास पुलिस की बातों को सच मानने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता है। बिनायक सेन के मामले में भी यही हुआ है कि छत्तीसगढ़ के काले कानून के तहत उनका वाद चलाया गया और सजा हुई और अब माननीय उच्च न्यायालय ने उनकी जमानत अर्जी ख़ारिज कर दी है। अगर आप यह भी कहते हें कि यह सरकार अच्छी नहीं है सरकार बदल दी जाएगी तो काले कानूनों के तहत आप आजीवन कारवास के भागीदार हो जायेंगे लेकिन प्रश्न यह है कि काले कानूनों के तहत हजारो लाखो लोग जेलों में बंद हैं। जनता अपनी समस्याओं से पीड़ित है कौन इन काले कानूनों का विरोध करे। विधि निर्माण करने वाली संस्थाएं संसद व विधान सभाएं अपने में मस्त हैं उनके पास सरकार बचने व सरकार गिराने के अतिरिक्त समय नहीं है। काले कानून बनाते समय यह संस्थाएं उस पर विचार नहीं करती हैं। नौकरशाही द्वारा तैयार ड्राफ्ट को हल्लागुल्ल के बीच कानून की शक्ल दे दी जाती है और फिर वाही नौकरशाही जिसको चाहे आजाद रखे जिसको चाहे निरुद्ध।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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