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कुछ अरसा पहले नरेंद्र मोदी से पूछा गया था कि स्वामी विवेकानंद की तरह क्या भगवान बुद्ध का भी प्रभाव आप पर पड़ा। यह वह दौर था जब मोदी के ट्विटर पर स्वामी जी का एक उद्धरण प्रतिदिन आया करता था। मोदी का उत्तर था, ‘‘मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि जिस गाँव में मेरा जन्म हुआ था, उस पर बौद्ध प्रभाव था। ह्वेन सांग ने मेरे गाँव का भ्रमण किया था। उन्होंने लिखा था कि मेरे गाँव में दस हजार बौद्ध भिक्षुओं के आवास की व्यवस्था थी। मेरा सपना है कि गुजरात में बुद्ध का एक विशाल मंदिर बनवाऊँ।’’
    23 जनवरी को मोदी ने गोरखपुर में भाजपा की सभा को संबोधित किया। मतलब की अर्थात राजनैतिक लाभ की शायद ही ऐसी कोई बात हो जो मोदी ने न की हो। कांग्रेस और सपा पर एक से एक जहरीले तीर छोड़े। बसपा पर घुमा-फिरा कर चोट की। उन्हें डर रहा होगा कि सीधी चोट से बसपा के अधिकतर मतदाता कहीं नाराज न हो जाएँ। इसलिए दलित वर्ग से अपनी पार्टी की दोस्ती का बखान किया। होम वर्क इस तरह करके आए थे कि गोरखपुर के बंद कारखानों का उल्लेख करना भी नहीं भूले। लेकिन बुद्ध को वह भूल गए। बुद्ध का गोरखपुर से घनिष्ठ संबंध रहा है। गोरखपुर से सिर्फ 52 किलोमीटर दूर कुशीनगर है। यहाँ बुद्ध ने परिनिर्वाण प्राप्त किया था। दुनिया भर से लाखों बौद्ध और अन्य लोग यहाँ आते हैं। बुद्ध की स्मृति में यहाँ स्मारक बना हुआ है।
    गोरखपुर से करीब सौ किलोमीटर दूर नेपाल में लुंबिनी है, जहाँ बुद्ध का जन्म हुआ था। पाँचवे-आठवें दर्जे तक बच्चे पढ़ चुके होते हैं किउनकी माता का नाम रानी मायादेवी और पिता का नाम का  राजा शुद्धोधन था। लुंबिनी इधर कुछ वर्षों से बड़ी चर्चा में है, क्योंकि कई देशों के आर्थिक सहयोग से वहाँ पर्यटन स्थल का विकास किया जा रहा है। इसमें चीन की सक्रियता पर विवाद भी उठ चुका है। आशा थी कि मोदी गोरखपुर की सभा में भगवान बुद्ध का पवित्र स्मरण  करेंगे और कुशीनगर के विकास के लिए कुछ योगदान की भी घोषणा कर डालेंगे। मोदी की जुबान पर बुद्ध का नाम ही नहीं आया।
    कहा जा सकता है कि संघ परिवार के जीवनदायिनी विषय, राममंदिर पर जब मोदी कुछ नहीं बोले तो बुद्ध की याद क्यों दिलाई जा रही है। मोदी नहीं बोले तो क्या हुआ, अरुण जेटली और अन्य कई नेताओं पर राम मंदिर का मुद्दा छोड़ दिया गया है। वह तो सरेआम कह रहे हैं कि राममंदिर का मुद्दा न तो छोड़ा है और न छोड़ेंगे। एक और फर्क है। अयोध्या में मंदिर का निर्माण एक विवादास्पद विषय है। बुद्ध और कुशीनगर पर तो कोई विवाद ही नहीं है। मोदी अपने गुजरात में बुद्ध का विशाल मंदिर जब बनवाएँगे तब, बनवाएँ भी या नहीं, कुशीनगर के लिए तो कुछ घोषणा कर ही सकते थे।
    मोदी अपने इतिहास ज्ञान की कई बार खिल्ली उड़वा चुके हैं, जैसे तक्षशिला बिहार में है। लेकिन जब उन्हें यह मालुम है कि चीनी विद्वान और यात्री हवेन सांग सातवीं शताब्दी में भारत आया था और बुद्ध का मंदिर भी बनवाने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं तो कुशीनगर और लुंबिनी के बारे में भी जरूर मालूम होगा। उन्होंने भगवान बुद्ध और उनके जीवन से जुड़े इन पवित्र स्थलों का स्मरण शायद इसीलिए नहीं किया कि इससे वोटों का फायदा नहीं होने वाला। सेक्युलरिज्म का विरोध कर धर्म और राजनीति के घालमेल में यही होता है कि धर्मों और अवतारों की याद फायदे के लिए मौके-मौके पर ही की जाती है।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

 

 
आज जब बी.जे.पी. के नेता राष्ट्रीय सुरक्षा पर घडि़याली आँसू बहाते हैं, हँसी नहीं आती, बल्कि चिंता होती है। चिंता इसलिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे पर भी वह दुष्प्रचार से बाज नहीं आते। देखते हैं ‘‘राॅ’’ के एक बड़े अधिकारी की गैरकांग्रेसी सरकारों के बारे में राय। ‘‘राॅ’’ के अतिरिक्त निदेशक बी. रमन ने रिटायरमेंट के बाद लिखा, ‘‘आतंकवादियों के सामने दयनीय आत्मसमर्पण के केवल दो उदाहरण हैं। एक 1989 में जब वी.पी. सिंह (इस सरकार का समर्थन भाजपा बाहर से कर रही थी) प्रधानमंत्री थे और मुफ्ती मुहम्मद सईद गृहमंत्री। दो, 1999 में जब भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार तीन आतंकवादियों की रिहाई के लिए सहमत हुई।’’
रमन लिखते हैं, ‘‘भाजपा ने चुनाव से पहले वादा किया था कि आई.एस.आई. के प्रॉक्सी वार पर श्वेतपत्र जारी करेगी और पाकिस्तान को आतंकवाद का संचालक घोषित करवाएगी। दोनों वादों पर अमल में वह विफल रही। इससे भी ज्यादा यह हुआ कि इस सरकार ने प्रच्छन्न कार्रवाई की क्षमता समाप्त करने के गुजराल सरकार के फैसले को भी नहीं पलटा। इससे सुरक्षा तंत्र को बहुत आश्चर्य हुआ।
इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरसिंह राव की, पाकिस्तान से पेश आने की नीति में दृढ़ता की निरंतरता थी। वाजपेयी सरकार की नीति में इसका अभाव था। अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर यात्रा या जनरल मुशर्रफ को शिखर वार्ता के लिए आगरा आमंत्रित करने से पहले खुफिया तंत्र से राय नहीं ली गई। नतीजा यह हुआ कि ये दोनों यात्राएँ विफल रहीं।’’
प्रधानमंत्री वाजपेयी की सरकार कश्मीरी अलगाववादियों और आतंकवादियों से बात करने की बहुत इच्छुक थी। इस हद तक कि वाजपेयी ने कहा, ‘‘इंसानियत के दायरे में तो बात हो सकती है।’’ रमन इस बारे में हकीकत बयान करते हैं, ‘‘अटल सरकार 2001 में हिजबुल मुजाहिदीन के एक वर्ग की ओर से वार्ता के
संबंध में उचित कदम नहीं उठा सकी। इससे पाकिस्तान स्थित हिजबुल मुजाहिदीन के नेतृत्व को, इस वर्ग की पहचान करने और उसे खत्म कर देने में कामयाबी मिल गई।’’
रमन ने इसका खुलासा नहीं किया है। लेकिन अंदर की कहानी यह है कि हिजबुल मुजाहिदीन के इस वर्ग से संपर्कों के दौरान सतर्कता नहीं बरती गई। इस अहम पहलू की अनदेखी कर दी गई कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. उग्रवादियों, अलगाववादियों के नरम पड़ रहे खेमे को सफल नहीं होने देगी। अगर उनकी सफलता की गुंजाइश रहे, तब तो कश्मीर में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के खत्म होने की भी संभावनाएँ पैदा हो जाएँगी। यहाँ यह सवाल उठता है कि राजनैतिक नेतृत्व ने भारत की खुफिया एजेंसियों को विश्वास में क्यों नहीं लिया? सम्भावित उत्तर यही हो सकता है कि आज भाजपा नेता जिस सरकार को एक आदर्श बताकर पेश कर रहे हैं, वह पाकिस्तान के फौजी जनरलों पर बहुत भरोसा करने लगी थी। कारगिल का विश्वासघात एक स्वाभाविक परिणाम था।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका चुनाव विशेषांक से

 

 
इन दिनों नरेंद्र मोदी से लेकर उनके आगे-पीछे चलने वाले बी.जे.पी. नेता यह कहते नहीं अघाते कि वह देश को मजबूत सरकार देंगे, राष्ट्रीय सुरक्षा की गारंटी करेंगे और न जाने क्या-क्या करेंगे। उन्हें गलतफहमी है कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है।
    एन.डी.ए. की सरकार में कैसे-कैसे समझौते हुए और देश की इज्जत को बट्टा लगा, इसकी कई मिसालें हैं। फिलहाल सबसे शर्मनाक घटना का उल्लेख।
    दिसंबर 1999 में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी भारतीय यात्री विमान का अपहरण
कर कंधार ले गए थे। सक्षम और दृढ़ संकल्प सरकार अमृतसर हवाई अड्डे पर अपहृत विमान का रास्ता अवरुद्ध कर सकती थी। वीरोचित मुद्राएँ दिखाने वालों को कुछ नहीं सूझा। विमान के कंधार पहुँच जाने के बाद तो वीरों के हाथ-पैर फूल गए। मोदी और अन्य नेता कांग्रेस का मजाक यह कह कर उड़ाते हैं कि अजमल कसाब को बिरियानी खिलाई गई। दुष्प्रचार तो दुष्प्रचार ही ठहरा। उन्हें कौन बताए कि खाना-पीना जेल मैनुअल के हिसाब से होता है। काला सच यह है कि भाजपा के विदेशमंत्री जसवंत सिंह तीन कुख्यात आतंकवादियों को साथ लेकर
कंधार गए होंगे और उनका खाना-पीना जेल मैनुअल देख कर नहीं हुआ था।
    छोटे सरदार (अब पूर्व छोटे सरदार कहें, क्योंकि वर्तमान छोटे सरदार तो मोदी हैं) यानी तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और कंधार गए विदेशमंत्री जसवंत सिंह सत्ता से हटने के बाद मोटी-मोटी किताबें लिख चुके हैं। लेकिन ईमानदारी से यह नहीं बताया कि पर्दे के पीछे हुआ क्या था। आडवाणी और जसवंत कई इंटरव्यू भी दे चुके हैं। फिर भी सच सामने नहीं आया है। जसवंत का कहना है, ‘‘मैं रहस्योद्घाटन नहीं कर सकता। वक्त आने पर करूँगा।’’ यह मान कर चलते हैं कि बाद में भारत पर आतंक का कहर बरपा करने वाले तीन आतंकवादियों की रिहाई का फैसला सारे वीरों का सामूहिक फैसला था।
    बस एक शख्स ने आतंकवादियों की रिहाई का कड़ा विरोध किया था। संघ परिवारियों को सुन कर अच्छा नहीं लगेगा, क्योंकि वह संविधान के अनुच्छेद 370 की स्थाई उपस्थिति पर कोई समझौता नहीं कर सकता और मुसलमान भी है। इस समय केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला उस समय जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। बकौल फारूक, ‘‘मैंने आडवाणी को फोन करके कहा था कि हम मसूद अजहर और मुश्ताक जरगर जैसे आतंकवादियों को रिहा नहीं कर सकते, उन पर कोर्ट में केस चल रहे हैं। इसलिए रिहा नहीं किया जा सकता।
    आडवाणी ने जवाब दिया कि यह केंद्रीय कैबिनेट का फैसला है, आप मदद करें। ‘‘यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि फारूक ने किन परिस्थितियों में आडवाणी को फोन किया था। फारूक के अनुसार उस समय जम्मू में उनके राजकीय आवास पर ‘‘राॅ’’ के चीफ ए.एस. दुलात के नेतृत्व में एजेंसी की टीम पहुँच चुकी थी। अर्थात, आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले राज्य के मुख्यमंत्री से सलाह-मशविरा किए बगैर कश्मीर की जेल में बंद (तीसरा शेख उमर शेख दिल्ली की तिहाड़ जेल में था ) दो आतंकवादियों की रिहाई का फैसला कर लिया गया था। आडवाणी, जसवंत या एन.डी.ए. सरकार के किसी भी मंत्री ने आज तक फारूक के बयान का खंडन नहीं किया है। 
     एक मिसाल, देखें कांग्रेस आतंकवाद से कैसे निपटती है। 1984 में कांग्रेस की सरकार थी। प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकवादियों ने बर्मिंघम (ब्रिटेन) में भारतीय राजनयिक रवींद्र हरेश्वर म्हात्रे का अपहरण कर हत्या कर दी। वह तिहाड़ जेल में बंद लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल भट की रिहाई की माँग कर रहे थे। अपहरण के तीसरे दिन म्हात्रे का शव बरामद हुआ। इसके बाद तिहाड़ जेल में ही भट को फाँसी दे दी गई। एन.डी.ए. के शासन में राष्ट्रीय सुरक्षा में ढिलाई और कांग्रेसी शासन में राष्ट्रीय हितों पर अडिग रहने और समझौतावादी नीति न अपनाने के अनेक उदाहरण हैं ,जिनके बारे में फिर। 

        -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

01
प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के वित्तमंत्री नितिन पटेल ने कहा है कि यूपी-बिहार से आए लोगों के कारण गुजरात में गरीबी बढ़ी है। इस बयान के कई दिन हो गए, नितिन पटेल ने न तो इसे वापस लेकर खेद प्रकट किया है और न मोदी ने ही कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की है। पटेल के कहने का अर्थ एक ही हो सकता है और वह यह कि नरेंद्र मोदी के ‘‘ऑटॉनमस रिपब्लिक ऑफ गुजरात’’ में यूपी और बिहार के लोगों को, और इस तर्क के आधार पर भारत के किसी भी भाग के लोगों को काम के लिए जाने का अधिकार नहीं है।
पटेल ने दरअसल बड़ी खतरनाक बात कही। याद करें ,संघ परिवार की लंगोटिया यार शिवसेना ने सबसे पहले मुंबई में दक्षिण भारतीयों के खिलाफ अभियान शुरू किया था। शिव सेना को हाजी मस्तान, यूसुफ पटेल और तस्करों की समूची काली दुनिया बुरा नजर नहीं आया था। मुंबई के अंडरवल्र्ड से भी कोई परेशानी नहीं हुई थी। उसने मुंबई में हर बुराई की जड़ दक्षिण भारतीयों में देखी। कुछ वर्ष बाद नफरत के लिए मुसलमानों को निशाना बनाया जाने लगा। तब तक पूर्वोत्तर राज्यों में हिंदी भाषियों के खिलाफ अभियान नहीं शुरू हुआ था। उगांडा और केन्या से भारतीय मूल के उद्यमियों ,जिनमें अधिकतर गुजराती थे, का निष्कासन भी नहीं शुरू हुआ था।

इन अलगाववादी-आतंकवादी संगठनों के विपरीत संघ परिवार अपने को एकमात्र राष्ट्रवादी मानता है। संघ की गुजरात रूपी महती प्रयोगशाला के एक वरिष्ठ कर्मी ने यूपी-बिहार के श्रमिकों के विरुद्ध विष वमन कर सिद्ध कर दिया है कि संघ के राष्ट्रवाद के सिद्धांत में राष्ट्रीय विखंडन के तत्व समाहित हैं। वैसे भी धर्म, जाति, संस्कृति, भाषा और क्षेत्र से परे एक समान भारतीय राष्ट्रीयता और नागरिकता में जिनकी आस्था नहीं होती, वह सच्चे राष्ट्रवादी नहीं हो सकते। नितिन पटेल के बयान और उस पर उनके वरिष्ठों की चुप्पी ने चेहरे बेनकाब कर दिए।
नितिन पटेल की यू.पी.-बिहार विरोधी थिअरी पर अमल का अर्थ यह होगा कि इन राज्यों के श्रमिकों को हिंसक तरीकों से गुजरात से बाहर कर दिया जाए। असम में ‘उल्फा’ और बोडो उग्रवादी यही तो करते रहे हैं। वह मारवाड़ी उद्यमियों से लेकर साधारण हिंदी भाषी मजदूरों तक, सबको असम की आर्थिक-सामाजिक समस्याओं के लिए दोषी मानते हैं। लेकिन ‘उल्फा’ और बोडो उग्रवादी अखिल भारतीयता में आस्था नहीं रखते। ‘उल्फा’ पाकिस्तानी एजेंसी आई.एस.आई. की मदद से स्वतंत्र असम राज्य की स्थापना करना चाहता है। पूर्वोत्तर के राज्यों में सक्रिय कोई भी हथियारबंद संगठन भारतीय गणराज्य और राष्ट्रीय एकता की अवधारणा को स्वीकार नहीं करता।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका चुनाव विशेषांक से

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने देश में उत्तर को दक्षिण से जोड़ा था किन्तु ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सेवक हिन्दुत्ववादी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उसके अन्य आनुषांगिक संगठनों ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम की हमेशा मर्यादा भंग की है जो अक्षम्य अपराध है। इस हिन्दुत्ववादी संगठन ने अयोध्या में ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद को तोड़कर देश को गृह  युद्ध में झोंकने  का प्रयास किया और देश की एकता और अखण्डता को खतरे में डाला।इस बहुजातीय, बहुधर्मी देश में अगर भावनात्मक एकता न होती तो यह संगठन इस देश को भी यूगोस्लाविया बना देने में कोई कसर नही छोड़ी थी।          
         अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं ने सुनियोजित साजिश कर श्री राम सेना बनायी। श्री राम सेना के प्रमुख प्रमोद मुथालिक कर्नाटक के अन्दर जगह-जगह ‘हिन्दू जन जागृति‘ समितियाॅ बनाकर उग्र भाषणबाजी कर रहे है। जिसमें वह मालेगाॅव बम विस्फोट के  आतंकियोेें की प्रशंसा में भी कसीदे पढ़ रहे है जैसे  उनकी श्री राम सेना , श्रीराम की सेना न होकर आतंकियों की सेना हो। उनकी उग्र व गैर जिम्मेदाराना भाषणबाजी से समाज में विघटन पैदा हो रहा है भगवान राम को कलंकित करने का अधिेकार किसी को नही है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जिनका हिन्दू धर्म से कोई लेना देना नहीं है वह हिन्दू देवताओं के नाम पर भोली -भाली जनता को उग्र्र हिन्दुत्व का पाठ पढा रही हैै। समय रहते ऐसे संगठनों के ऊपर तुरन्त रोक न लगायी गयी तो देश की एकता और अखण्डता को गम्भीर खतरा पैदा होगा। साम्राज्यवादियों की साजिश है कि देश को कमजोर करके पूर्व की भांति फिर इसे उपनिवेश बनाकर रखा जाये।इसके लिए उसके एजेण्ट संगठन तरह-तरह के देवताओं के नाम पर सेनायें बनाकर आतंकवादी कार्यवाहियाॅ कर रहे है। देश की  जनता को चाहिए कि साम्राज्यवादियों की साजिश को समझकर उनका मुँहतोड़ जवाब दे। झारखण्ड के जिला धनबाद में बजरंग दल के नेता उमाकान्त तिवारी ने 430 बोरिया अमोनियम नाइटेªट लूटकर जितेन्द्र सिंह के घर छिपाया था किन्तु पुलिस की मुश्तैदी से दोनो बजरंगी पकड़े गये और अमोनियम नाइटेªट बरामद हुआ। इस तरह पता चलता है कि यह संगठन भी उग्रवादी संगठन की भाँति खुले आम इस तरह की साजिशें कर रहे है।

-पवन वर्मा
लोकसंघर्ष  पत्रिका मार्च २००९से


गोविल्स के प्रचार में फंसा मीडिया नायक मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर। जब राजीव गांधी की तूती बोलती थी तो उनकी जय जयकार और जब मीडिया ने एक भ्रामक हिन्दुवत्व की लहर भारतीय समाज में पैदा की तो उस भ्रम को फैलाने का कार्य करने वाले उसी भ्रम में एम जे अकबर साहब दिग्भ्रमित होकर फंस गए। उनका सारा इतिहास का ज्ञान सामर्थ्य नमो नमो करने के लिए समर्पित हो गया है उदारवादी नीतियों के चलते अपनी सुख सुविधाओं को बरक़रार रखने के लिए पतन की कोई सीमा रेखा इस घटना के बाद नहीं रेह जाती है। यह ऐतिहासिक सत्य भी है कि अवसरवादी बुद्धिजीवी अपनी सुख सुविधाओं के लिए कुछ भी कर सकता है। जिसका प्रत्यक्ष उद्धरण यह है. एम जे अकबर कांग्रेस से सांसद रह चुके हैं. वे बिहार के किशनगंज से दो बार सांसद रहे हैं. साथ ही वे राजीव गांधी के प्रवक्ता भी रहे हैं. वे इंडिया टुडे ग्रुप के एडिटोरियल डॉयरेक्टर भी रहे हैं. अकबर ने कहा, ‘‘यह हमारा कर्तव्य है कि हम देश की आवाज के साथ आवाज मिलाएं और देश को फिर से पटरी पर लाने के मिशन में जुट जाएं. मैं भाजपा के साथ काम करने को तत्पर हूं.’’ इसी तरह की बातें जब वह राजीव गांधी के प्रवक्ता थे तब कहा करते थे। असल में तथाकथित बड़े पत्रकार सत्ता के प्रतिस्ठानों में और कॉर्पोरेट सेक्टर के बीच में मीडिएटर का काम करते हैं और मीडिएट होने के बाद वह स्वयं भी देश की सेवा में सीधे सीधे उतर पड़ते हैं। यह कोई भी आश्चर्य की बात नही है।
भाजपा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अनुषांगिक संगठन है जो नागपुर मुख्यालय से संचालित होता है। जर्मन नाजीवादी विचारधारा से ओत प्रोत संगठन है। विश्व का कॉर्पोरेट सेक्टर अपनी पूरी ताकत के साथ भारत के ऊपर फासिस्ट वादी ताकतों का कब्ज़ा कराना चाहता है। जिससे यहाँ के प्राकृतिक संसाधनो का उपयोग कर अकूत मुनाफा कमाया जा सके। भाजपा में बाराबंकी से लेकर बाड़मेर तक और नागपुर मुख्यालय से लेकर झंडे वालान तक कुर्सी के लिए मारपीट हो रही है , मान मनौव्वल हो रही है। चुनाव हुए नहीं हैं , प्रधानमंत्री , उप प्रधानमंत्री, गृह मंत्री के पद बाटें जा रहे हैं . जगदम्बिका पाल से लेकर सत्यपाल महाराज, रिटायर्ड जनरल-कर्नल से लेकर वरिष्ठ नौकरशाह पुलिस अधिकारी पत्रकार गिरोह बनाकर देश सेवा अर्थात लुटाई में हिस्सेदारी के लिए अपनी नीति, विचार त्याग सबको तिलांजलि देकर रातों रात अपनी निष्ठाएं और आस्थाएं बदल रहे हैं। उसके बाद भी सरकार फासिस्टों की नहीं बनेगी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महात्मा गांधी की हत्या की थी।संघ इस आरोप को बेबुनियाद बता रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ का अप्रत्यक्ष हाथ था। हत्या का फैसला कोई प्रस्ताव पारित करके नहीं किया गया था परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संघ व हिन्दू महासभा के कुछ प्रमुख नेताओं को यह जानकारी थी कि महात्मा गांधी की हत्या होने वाली है। यह आरोप कि संघ को ज्ञात था कि महात्मा गांधी की हत्या होने वाली है, तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने लगाया था। पत्र में पटेल ने लिखा था ‘‘उसके (आर.एस.एस.) सभी नेताओं के भाषण साम्प्रदायिक जहर से भरे रहते थे। उन जहरीले भाषणों के चलते देश में ऐसा वातावरण बना जिससे यह बड़ी त्रासदी (गांधी जी की हत्या) घटी। हत्या के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने खुशियां मनाईं और मिठाई बांटी।’’
पटेल ने इस पत्र की कापी जनसंघ के प्रथम अध्यक्ष और हिन्दू महासभा नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी को भी भेजी थी। सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर को एक पत्र लिखासंदेह नहीं कि नाथूराम गोडसे, जिसने गांधीजी की हत्या की थी, वे संघ के सदस्य रहे थे। उन्हें बौद्धिक प्रचारक का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उनके भाई गोपाल गोडसे लिखते हैं कि ‘‘नाथूराम गोडसे ने अदालत को बताया था कि उन्होंने 1934 में संघ छोड़ दिया था परंतु वास्तविकता यह है कि उन्होंने (नाथूराम गोडसे) संघ को कभी नहीं छोड़ा’’ गोपाल गोडसे के इस कथन से स्पष्ट होता है कि वे उस समय भी संघ से जुड़े थे जब उन्होंने गांधी की हत्या की थी।
गोडसे की वास्तविक स्थिति के बारे में आउटलुक पत्रिका ने सरसंघचालक प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह से एक साक्षात्कार में पूछा था। राजेन्द्र सिंह ने उत्तर दिया था कि ‘‘नाथूराम गोडसे अखंड भारत का सपना देखता था। उसका इरादा ठीक था परंतु उसने जो तरीका अपनाया वह गलत था।’’
संघ ने कभी भी नाथूराम गोडसे से अपना संबंध नहीं तोड़ा। इसके ठीक विपरीत, संघ उसके विचारों को प्रचारित करता रहा है। संघ वर्षों तक नाथूराम गोडसे और उनके भाई की किताबों के विज्ञापन अपने साप्ताहिक समाचारपत्र आर्गनाईजर में छापता रहा है। जैसे दिनांक अक्टूबर 5, 1997 के संस्करण में रीडेबल अटरेक्टिव न्यू बुक्स शीर्षक से विज्ञापन छपा था। इन किताबों में नाथूराम गोडसे की किताब ‘‘मे इट प्लीज युअर आनर’’ और गोपाल गोडसे की किताब ‘‘गांधीज मर्डर एंड आफ्टर’’ शामिल हैं। इस तरह के विज्ञापन समय-समय पर छपते रहे हैं।
सरदार पटेल ने, जिन्हें नरेन्द्र मोदी और संघ अपना हीरो मानता है, गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया था। 4 फरवरी 1948 को प्रतिबंध लगाया गया था। ‘भारत सरकार ने 2 फरवरी को अपनी घोषणा में कहा है कि उसने (भारत सरकार) उन सभी विद्वेश कारी तथा हिंसक शक्तियों को जड़मूल से नष्ट कर देने का निष्चय किया है, जो राष्ट्र की स्वतत्रंता को खतरे में डालकर उसके उज्जवल नाम पर कलंक लगा रही हैं। उसी नीति के अनुसार, चीफ कमिश्नरों के अधीनस्थ सब प्रदेशों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अवैध घोषित करने का निर्णय भारत सरकार ने कर लिया है। गवर्नरों के अधीन राज्यों में भी इसी ढंग की योजना जारी की जा रही है।’’ सरकारी विज्ञप्ति में आगे कहा गया: ‘‘संघ के स्वयंसेवक अनुचित कार्य भी करते रहे हैं। देश के विभिन्न भागों में उसके सदस्य व्यक्तिगत रूप से आगजनी, लूटमार, डाके, हत्याएं तथा लुकछिप कर श स्त्र, गोला और बारूद संग्रह करने जैसी हिंसक कार्यवाहियां कर रहे हैं। यह भी देखा गया है कि ये लोग पर्चे भी बांटते हैं, जिनसे जनता को आतंकवादी मार्गों का अवलंबन करने, बंदूकें एकत्र करने तथा सरकार के बारे में असंतोश फैला कर सेना और पुलिस में उपद्रव कराने की प्रेरणा दी जाती है।’’
सरकारी आदेश में वे अन्य कारण भी गिनवाए गये जिनके चलते आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना जरूरी हो गया था। इस संदर्भ में जानने लायक एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया तब देश के गृहमंत्री सरदार पटेल ही थे, जिनको आरएसएस कांग्रेस में अपना प्रिय नेता मानती थी और आज भी मानती है। सरदार पटेल ने गांधी जी की हत्या में आरएसएस की भूमिका के बारे में स्वयं गोलवलकर को एक पत्र के माध्यम से जो कुछ लिखा था वह भी पढ़ने लायक है। सरदार पटेल ने 19.9.1948 के अपने पत्र में लिखा, ‘‘हिन्दुओं का संगठन करना, उनकी सहायता करना एक प्रश्न है पर उनकी मुसीबतों का बदला, निहत्थे व लाचार औरतों, बच्चों व आदमियों से लेना दूसरा प्रष्न है…उन्होंने कांग्रेस का विरोध करके और इस कठोरता से कि न व्यक्तित्व का ख्याल, न सभ्यता व शिष्टता का ध्यान, जनता में एक प्रकार की बेचैनी पैदा कर दी थी। इनकी सारी स्पीचिज सांप्रदायिक विष से भरी थीं। हिन्दुओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबन्ध करने के लिए यह आवश्यक न था कि वह जहर फैले। इस जहर का फल अन्त में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश को सहनी पड़ी और सरकार व जनता की सहानुभूति जरा भी आरएसएस के साथ नहीं रही, बल्कि उनके खिलाफ हो गयी। उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया था और मिठाई बांटी, उस से यह विरोध और बढ़ गया और सरकार को इस हालत में आरएसएस के खिलाफ कार्यवाही करना जरूरी ही था।
‘‘तब से अब 6 महीने से ज्यादा हो गए। हम लोगों की आशा थी कि इतने वक्त के बाद सोचविचार कर के आरएसएस वाले सीधे रास्ते पर आ जाएंगे। परन्तु मेरे पास जो रिपोर्ट आती हैं उनसे यही विदित होता है कि पुरानी कार्यवाहियों को नई जान देने का प्रयत्न किया जा रहा है।’’
प्रतिबंध लगने के बाद संघ की गतिविधियां ठप्प हो गईं। इसके बाद संघ द्वारा प्रतिबंध उठाने के लिए अथक प्रयास किए गए। अपने प्रयासों के दौरान गोलवलकर ने पटेल को अनेक पत्र लिखे। परन्तु पटेल ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि प्रतिबंध उठाने के अनुरोध पर उसी समय विचार किया जाएगा जब संघ उसके संविधान का प्रारूप पेश करे।
14 नवंबर 1948 को गृह मंत्रालय की ओर से एक विज्ञप्ति जारी की गई जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि गोलवलकर प्रतिबंध उठवाना तो चाहते हैं परंतु संघ अपने स्वरूप और गतिविधियों में किसी प्रकार का सुधार करने को तैयार नहीं है। पटेल ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखे एक पत्र में कहा कि संघ की गतिविधियों से देश को खतरा है। वे वास्तव में राष्ट्रविरोधी हैं। बाद में संघ ने अपने संविधान का प्रारूप पटेल को भेजा। इस प्रारूप में संघ ने यह स्पष्ट प्रावधान किया कि संघ, राजनीति में हिस्सा नहीं लेगा और अपनी गतिविधियों को सांस्कृतिक क्षेत्र तक सीमित रखेगा। यह आश्वासन देने के बावजूद, संघ अब सीधे राजनीति में भाग ले रहा है। इस तरह वह पटेल को दिए गए आश्वासन के ठीक विपरीत कार्य कर रहा है। आज भी संघ जिन उद्देश्यों के लिए काम कर रहा है वे उस संविधान के विरूद्ध हैं जिसके द्वारा हमारे राष्ट्र की सभी प्रकार की गतिविधियों का संचालन होता है।
-एल.एस. हरदेनिया

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