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गोंडा में  लोकसंघर्ष  पत्रिका के कार्यक्रम में हाथ में पीछे पत्रिका लिए है

‘समय से मुठभेड़’ करती सरयू पार की मोनालिसा

अपनी ग़ज़ल के प्रति यह एतमाद और फ़ख्ऱ भरा शेर कहने वाले रामनाथ सिंह ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लों में सचमुच एशियाई कविता की भाव-धारा और हिन्दी की संवेदनशील आक्रामकता अपने वास्तविक रूप में दिखती है। ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें जिस समय से मुठभेड़ कर रही हैं, वह समय कविता में प्रतिरोध की जिस क्षमता की माँग करता है ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लें उस प्रतिरोधात्मक भाषा की शक्ति से भरी-पूरी हैं। यह क्षमता हिन्दी के बहुत कम कवियों के पास रही है, शायद इसीलिए ‘अदम गोंडवी’ कबीर, मुक्तिबोध, नागार्जुन और धूमिल की परंपरा के कवि हैं। वही कबीर सी फक्कड़ मस्ती और सच कहने का हुनर जो बड़ी साधना के बाद, जीवन के कटु यथार्थ से दो-दो हाथ करने के बाद हासिल होता है, अदम के शेरों में मिलती है। जनवादी कविता जन की कसौटी पर कसी जाने के बाद अपने-आपको प्रासंगिक और प्रमाणित करने के लिए जन के बीच में उतरती है, इसलिए समकालीन कविता में ‘अदम गोंडवी’ की लोकप्रियता उन्हें सच्चे अर्थों में जनकवि की पदवी प्रदान  करती है।
छंद के रूप में ग़ज़ल को अपना लेना आसान है लेकिन इसे साधना बोधा के शब्दों में ‘तरवारि की धारि पै धावनो’ है। हिन्दी में ग़ज़ल कहने की परंपरा भारतेन्दु ही से प्रारम्भ हो जाती है। हिन्दी के निराला जैसे बड़े कवि भी-
‘खुला भेद विजयी कहाए हुए जो,
लहू दूसरों का पिए जा रहे हैं।

जैसी ग़ज़लें कहने से अपने आपको नहीं रोक पाए हैं। यह सिलसिला शमशेर और त्रिलोचन से होते हुए दुष्यंत तक पहुँचता है। दुष्यंत की ग़ज़लों से हिन्दी में ग़ज़ल को स्वीकृति मिल जाती है। ‘अदम गोंडवी’ ने दुष्यंत के विनम्र प्रतिरोध को धार और आक्रामकता के साथ व्यंग्य का जो दर्प दिया है, वह उन्हें हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लकार घोषित करता है। ‘‘एक ज़माना था जब आशिक और माशूक़ा की मुहब्बत भरी गुफ्तगू को ग़ज़ल कहा जाता था। हुस्न, इश्क और साकी-शराब की रसीली अभिव्यक्ति उसकी भाव-भूमि हुआ करती थी, जिससे परे जाकर दूसरी भाव-भूमि पर ग़ज़ल कहना ग़ज़लकारों के लिए दुस्साहस भरा कार्य हुआ करता था। ऐसी स्थिति में नई क्रांति की प्रस्तावना किसी भी कवि के लिए संभव नहीं थी। सच तो यह है कि ग़ज़ल के रूप में उसी कलाम को स्वीकार किया जाता था जो औरतों के हुस्न और जमाल की तारीफ करे। यहाँ तक कि जो हिन्दी की ग़ज़लें हुआ करती थीं उसमें उर्दू ग़ज़लों का व्यापक प्रभाव देखा जाता था। यही कारण था जब पहली बार शमशेर ने पारंपरिक रूमानी संस्कार से उठकर ग़ज़ल रचना की तो डॉक्टर रामविलास शर्मा ने यह कहकर खारिज़ कर दिया कि ग़ज़ल तो दरबारों से निकली हुई विधा है, जो प्रगतिशील मूल्यों को व्यक्त करने में अक्षम है।” 1 ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें रामविलास शर्मा जी की उस बात को ही खारिज़ कर देती हैं।  क्योंकि ये ग़ज़लें कविता की उस प्रगतिशीलता की पराकाष्ठा को छूती हैं जिसे बड़े पैमाने का प्रगतिशील साहित्य अपनी प्रगतिशीलता की चादर ओढ़कर भी नहीं छू पाता। “किताबी माक्र्सवाद सिर्फ उन्हें आकृष्ट कर सकता है, जिनकी रुचि ज्ञान बटोरने और नया दिखने तक है। पर जो सचमुच बदलाव चाहते हैं और मौजूदा व्यवस्था से बुरी तरह तंग और परेशान हैं, वे अपने आस-पास के सामाजिक भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण के खिलाफ  लिखना ज़रूर चाहेंगे। वे सचमुच के सर्वहारा हैं, जिनके पास खोने को न ऊँची डिग्रियाँ और ओहदे हैं, न प्रतिष्ठित जीवन शैली। अदम इन्हीं धाराओं के शायर हैं।” 2 अदम किताबी माक्र्सवादी नहीं हैं, यह उन्होंने अपनी कविता और जीवन दोनों से सिद्ध किया है। विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता मुक्तिबोध प्रभृति कवियों को भी पीछे छोड़ देती है। अदम का एक-एक शेर यथार्थवादी प्रगतिशील कविता की आबरू है। ग़ज़ल कहने की ज़मीन (मीटर और व्याकरण) होती है, लेकिन अदम ज़मीन (धरती) पर पाँव जमा कर ग़ज़ल कहते हैं शायद तभी उनकी ग़ज़लों का एक संग्रह ‘धरती की सतह पर’ नाम से प्रकाशित हुआ।
‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें मनुष्य और यथार्थ के बीच के संबंध को बहुत सहजता से व्यक्त करती हैं। इन सहज सम्बन्धों को व्यक्त करने के लिए बड़े-बड़े दार्शनिकों और समाज शास्त्रियों को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी है, लेकिन अदम का एक शेर इन्हें तरलता के साथ बेरोक-टोक हमारे हृदय पर तारी कर देता है। अदम बार-बार साहित्यकारों को ज़मीन की ओर लौटने के लिए कहते हैं-
अदीबों ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ ।
मुलम्मे के सिवा क्या है फलक के चाँद तारों में ।।

ग़ज़ल उर्दू का छंद है और जाहिरी तौर पर उर्दू से ही हिन्दी में दाखिल हुआ है। ‘ग़ज़ल एक संकेतात्मक कविता है। यह गागर में सागर भरने की कला है। ग़ज़ल के संक्षिप्त कलेवर में प्रतीकों के माध्यम से वह बात कही जा सकती है जिसके लिए एक लंबी नज़्म दरकार है। इस तरह कुछ निश्चित प्रतीकों की सीमा में बँधकर भी ग़ज़ल में व्यापकता है। प्रभाव ग़ज़ल का गुण विशेष है, क्योंकि प्रेम, समर्पण और करुणा ग़ज़ल की आत्मा है, इनकी अभिव्यक्ति के लिए कोमल, सरस शब्दों का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है। शब्द केवल अर्थ के लिहाज से ही नहीं, ध्वनि में भी कोमल होने चाहिए। गीतात्मकता ग़ज़ल का प्राण है। शब्दों के सही रख-रखाव, बन्दिशों की चुस्ती, और अनुभूति के तीखेपन के साथ एक खास रंग होता है ग़ज़ल का, जिसके बिना ग़ज़ल निष्प्राण देह है। तग़ज़्जुल से शेर में जीवन का संचार होता है।”3 अदम ने ग़ज़ल की इस क्लासिक परिभाषा को तोड़ा ज़रूर है लेकिन ग़ज़ल उनकी ग़ज़लों में मौजूद है। उर्दू में ग़ज़ल शब्द की उत्पत्ति को ग़ज़ल से माना गया है जिसका अर्थ है प्रेमियों का आत्मीय वार्तालाप। अदम की ग़ज़लें गुफ्तगू  करती हैं लेकिन, महबूब से नहीं हाकिमों से, मुख्तारों से, पूँजीपतियों से और आततायी सत्ता से। उनकी ग़ज़ल यहाँ प्रतीकों और मुहावरों में तो शास्त्रीयता का निर्वाह करती है लेकिन लीक से हटकर तीखेपन के साथ! उर्दू की ग़ज़लगोई  की  ग़ज़ल बरकरार रखते हुए। वे हिन्दी की ग़्ाज़ल में दुष्यंत के उत्तराधिकारी बनकर आए थे। “दुष्यंत ने अपनी ग़्ाज़लों से शायरी की जिस नई ‘राजनीति’ की शुरुआत की थी, अदम ने उसे मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश की है जहाँ से एक-एक चीज बगैर किसी धुँधलके के पहचानी जा सके। यह शायरी, एक अर्थ में, सचमुच शायरी कम है सीधी बात कहीं अधिक है। इस रूप में यह एक ऐसी आपदधर्मी कला है, जो आग की लपटों के बीच धूँ-धूँ जलती बस्तियों को बचाने के लिए आगे आती है।”4
नई भाषा, रचाव और मुहाविरेदानी के साथ ग़्ाज़ल की मुलायमियत को आक्रामक तेवर में तब्दील कर अदम हिन्दी ग़्ाज़ल परंपरा का विकास तो करते हैं लेकिन परंपरा भंजक बनकर। उसका अनुसरण करके नहीं। रवीन्द्र प्रभात हिन्दी और उर्दू ग़्ाज़ल की परंपरा में भेद करते हुए इस प्रकार टिप्पणी करते हैं-“उर्दू ग़्ाज़ल मुख्यतः प्रेम-भावनाओं का चित्रण है। अच्छी ग़्ाज़लें वही समझी जाती हैं, जिसमें इश्को-मुहब्बत की बातें सच्चाई के साथ लिखी जाएँ, जबकि हिन्दी ग़्ाज़लकार इस परिभाषा को नहीं मानते। इनका उर्दू ग़्ाज़लकारों से सैद्धान्तिक मतभेद है।’’ नचिकेता का मानना है कि ‘हिन्दी ग़्ाज़ल उर्दू ग़्ाज़लों की तरह न तो असम्बद्ध कविता है और न इसका मुख्य स्वर पलायनवादी है, इसका मिजाज समर्पणवादी भी नहीं हैं। ज़हीर कुरैशी का मानना है कि-‘हिन्दी प्रकृति की ग़्ाज़लें आम आदमी की जनवादी  अभिव्यक्ति हैं, जो सबसे पहले अपना पाठक तलाश करती हैं।’ जबकि ज्ञान प्रकाश विवेक का कहना है कि हिन्दी कवियों द्वारा लिखी जा रही ग़्ाज़ल में शराब का जिक्र नहीं होता, जिक्र होता है गंगाजल में धुले तुलसी के पत्तों का, पीपल की छाँव का, नीम के दर्द का, आम-आदमी की तकलीफों का। हिन्दी भाषा में लिखा जा रहा हर शेर जिंदगी का अक्स होता है। बहुत नज़दीक से महसूस किए गए दर्द की अभिव्यक्ति होता है।”5 लेकिन क्या इन परिभाषाओं से अदम की शायरी मेल खाती है? गंगाजल के विषय में वे क्या कहते हैं?-
गंगाजल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है।
तिश्नगी को वोदका के आचमन तक ले चलो।।

बगैर उर्दू की मुहाविरेदानी के गजल  कही जा सकती है। स्वयं अदम ने ही शुद्ध हिन्दी में ग़्ाज़लें कही हैं:-
मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की।
ये समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की।।

लेकिन, उनकी प्रभावी ग़्ाज़लें वही हैं जिनमें उर्दू गजल का लबो-लहज़ा है। यह बात और है कि उनकी भाषा क्लिष्ट नहीं होने पाती है। ‘प्रेमचंदी हिन्दुस्तानी’, जो गँवई-गँवार की, आम-अवाम की  भी भाषा है अपने रचाव और अनुभूति की तीव्रता से व्यंग्य की मारक क्षमता बढ़ाती है।
‘समय से मुठभेड़’ संग्रह में तिरसठ गजलें  हैं, चैदह कत्आत हैं और तीन लंबी नज़्में हैं-
(क)-हथियार उठा ले
(ख)-चमारों की गली, और
(ग)-गाँव का परिवेश
सर्वप्रथम हम ग़्ाज़लों पर चर्चा करेंगे फिर क़त्आत और नज़्मों पर। ग़्ाज़लें प्रायः छोटी और मध्यम बहर की हैं। एक ग़्ाज़ल कुछ लंबी बहर की भी है-
कहीं फागुन की दिलकश शाम फाकों में गुजर जाए।
मेरा दावा है इसके हुस्न का जादू उतर जाए।।
तखय्युल में तेरे चेहरे का खाक़ा खींचने बैठे।
बड़़ी हैरत हुई जब अक्स रोटी के उभर आए।।

किन्तु यह भी मध्यम बहर की ग़्ाज़ल ही कही जाएगी। लंबी बहर की ग़्ाज़लें उर्दू में फिराक, इकबाल जैसे शायरों  ने लिखी हैं। उदाहरण के लिए लंबी बहर का एक शेर द्रष्टव्य है-
मैं फासला हूँ मुझे मिटा दो कि मेरे मिटने से दिल मिलेंगे,
मैं जब तलक दरमियाँ रहूँगा न फस्ले-गुल में भी गुल खिलेंगे।
-फिराक गोरखपुरी

अदम के यहाँ पहले तो व्यवस्था पर चोट है फिर श्रम की महत्ता है। किसान, मजदूर की पक्षधरता है। जनता (सर्वहारा) की शक्ति पर यकीन है क्योंकि वे प्रतिबद्ध माक्र्सवादी हैं। क्रांति करने के लिए वे हथियार उठाने तक के लिए तैयार हैं। सबसे मारक है व्यंग्य, जो तिलमिलाने पर मजबूर करता है। व्यंग्य इसलिए भी मजबूत है क्योंकि उनकी कर्मभूमि अवध है और मातृभाषा अवधी है। अवधीभाषी अच्छे व्यंग्य करते हैं क्योंकि अवधी भाषा अपने सामान्य वार्तालाप में ही व्यंग्यात्मक है। व्यंग्यात्मकता अदम के शेरों में चिंगारी की तरह व्याप्त है। उदाहरण के लिए कुछ शेर देखे जा सकते हैं-
जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे,
कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे।
कुछ राजनैतिक और अत्यंत चर्चित व्यंग्यात्मक शेर-
काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में।
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत,
इतना असर है खादी के उजले लिबास में।

यथा
कोई भी सरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले,
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है।

-संतोष अर्श
क्रमस:
लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

‘लव जिहाद’ के झूठ का सच

                                           मेरठ का खरखौदा सामूहिक बलात्कार और धर्म परिवर्तन मामला, जिसे  ‘लव जिहाद’ का नाम दिया गया, के झूठे होने की बात सामने आ रही है। पीडि़ता ने खुद ही पुलिस के पास जाकर यह बयान दिया है कि न तो उसका अपहरण और बलात्कार किया गया था और न ही उसका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया था। बल्कि, वह अपनी मर्जी से दूसरे समुदाय के अपने प्रेमी के साथ गई थी। उसने अपने परिवार से ही जान का खतरा होने की शिकायत दर्ज कराई है। उसने यह भी बताया कि घरवालों को नेताओं से पैसे मिलते थे जो कि अब बंद हो गए हैं। ऐसे में उससे पूछा जाता था कि आखिर अब पैसा क्यों नहीं आ रहा? इस वजह से घरवाले उसके साथ मारपीट भी करते थे और उसे जान से मारने की साजिश भी रच रहे थे। इसलिए, वह घर से चुपचाप भाग आई है। वहीं एक न्यूज चैनल ने सात अगस्त 2014 को भाजपा के व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष विनीत अग्रवाल द्वारा पीडि़त लड़की की माँ को पैसे देने की बात कहते हुए भाजपा को सवालों के घेरे में ला दिया है। अब आरोप और सबूत दोनों भाजपा को आईना दिखा रहे हैं। अब देखना है, सपा सरकार को कि क्या वह ‘लव जिहाद’ के नाम पर पीडि़ता के परिजनों को पैसा देकर झूठा मामला बनाने वाले सांप्रदायिक नेता के खिलाफ कोई कार्यवाही करने की हिम्मत करती भी है या नहीं? इस झूठे आरोप में फँसाए गए मुस्लिमों, जिनकी देश की जेलों में आबादी से ज्यादा संख्या होने की नियति हो गई है, को अगर ताक पर रख भी दिया जाए तो क्या इस सवाल को आधार बनाकर पूरे मुस्लिम समुदाय और मदरसों पर जो आरोप लगाए गए थे, वे खत्म हो गए? यह एक बड़ा सवाल है?
तो वहीं, खरखौदा प्रकरण को लेकर जिन हिन्दुत्ववादी संगठनों ने ‘लव जिहाद’ का माहौल बनाकर इसे अन्तर्राष्ट्रीय साजिश करार दिया था, के मकसद की तफ्तीश अनिवार्य हो गई हैं। पूरे प्रकरण को उनके द्वारा ‘दिखाने’ का और उसे ‘हल’ करने का क्या नजरिया था? ऐसा इसलिए कि इस प्रकरण की सच्चाई जो पहले भी सामने थी और आज भी है, से समाज में जो विघटन हुआ, उसे जोड़ना इतना आसान नहीं होगा। क्योंकि निर्माण एक धीमी गति से चलने वाली सृजनात्मक प्रक्रिया है और विघ्वंस एक तीव्र आक्रोश की प्रतिक्रिया है। यह हमारे समाज के हर उस ढांचे को नेस्तानाबूद कर देना चाहती है, जो हमें जोड़ती है। यहाँ हिन्दुओं की ‘बड़ी चिंता’ करने वाले विश्व हिन्दू परिषद सरीखे संगठनों से सवाल है कि अगर वे इस षड्यंत्र में नहीं शामिल हैं तो हिन्दू धर्म की एक लड़की को मोहरा बनाकर उसे बदनाम करके राजनीति करने वाली भाजपा के खिलाफ क्या वे जाएँगे, बहुसंख्यक हिन्दू समाज को बरगलाने वाले इन संगठनों की माँगों पर गौर करें तो इनकी सांप्रदायिक जेहनियत का पता चल जाएगा कि यह ‘हिन्दू लड़की’ को न्याय नहीं बल्कि मुस्लिम समाज को उत्पीडि़त करने के लिए ऐसा कर रहे थे।
विश्व हिंदू परिषद ने पीडि़ता को ‘हिन्दू अध्यापिका’ कहते हुए महिला उत्पीड़न की घटना को सांप्रदायिक रूप दिया। वहीं मदरसे में मोलवियों द्वारा सामूहिक बलात्कार और जबरन धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए, देशभर के मदरसों पर छापा मारकर खोई लड़कियों को तलाश करने की माँग की। ऐसा माहौल बनाया जैसे पूरे देश में जिन लड़कियों का अपहरण हो रहा है, उसके लिए मुस्लिम समाज और मदरसे ही जिम्मेदार हैं। विश्व हिंदू परिषद के ‘अन्तर्राष्ट्रीय’ अध्यक्ष प्रवीण तोगडि़या ने और आगे बढ़कर मेरठ, हापुड़, मुजफ्फरनगर व अन्य ऐसे मदरसों पर ताला लगाने की माँग करते हुए कहा कि मदरसे जिस इस्लामिक मूल संगठन से जुड़े हैं, उनके प्रमुखों और इन मदरसों के सभी मोलवियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए। बजरंग दल ने मदरसों को बदनाम करने के लए अफवाह फैलाई कि चार और हिंदू लड़कियों की बरामदगी मदरसे से हुई।
विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू जागरण मंच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोर्चा ने ’लव-जिहाद’ से लड़ने के लिए ’मेरठ बचाओ मंच’ तक का गठन कर दिया। हर बात के लिए इस्लाम को दोष देने वाले इन संगठनों ने इसे अन्तर्राष्ट्रीय साजिश करार देते हुए कहा कि मेरठ की ‘हिन्दू अध्यापिका’ अकेली इस गैंग की शिकार नहीं है। हिन्दू लड़कियों के साथ मदरसों में सामूहिक बलात्कार किया जा रहा है और उन्हें जबरन मुसलमान बनाकर अरबी शेखों के लिए दुबई भेजा जा रहा है।
‘सिर्फ यूपी के मदरसों में ही ऐसे ‘जिहादी गुनाह’ होते हैं, ऐसा नहीं है,’ कहते हुए पूरे देश में ‘लव जिहाद’ का माहौल बनाया गया। विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू हेल्प लाइन ने दावा किया कि केरल, तमिलनाडु, आंध्र, महाराष्ट्र, बंगाल समेत पूरे देश से उनके पास शिकायतें हैं। ऐसे में भारत का केंद्रीय गृह विभाग ऐसे मामलों में गंभीरता से संज्ञान लेकर देश के सभी मदरसों की तलाशी ले और ऐसी लड़कियों को मुक्त कराए।
बची-खुची कसर संचार माध्यमों ने घटना का नाट्य रूपांतरण कर पूरी कर दी। और हाँ कई ने तो नाट्य रूपान्तरण कर ‘लव जिहादियों’ के स्टिंग करने का दावा करते हुए, खूब टीआरपी बटोरी। चेहरे पर हल्की दाढ़ी दिखाते हुए, कैमरा उसके होठों पर जूम हो जाता और वह बताने लगता कि वह एक मुसलमान है। पर वह अपना हिंदू नाम बताता है और हिंदू लड़की को अपने प्रेम जाल में फँसाने के लिए कलावा बांधे हुए है, ऐसा वह एक साजिश के तहत कर रहा है। इस तरह से अफवाह वाले कार्यक्रम और पीडि़त लड़कियों के फर्जी नाट्य रूपान्तरण से समाज में एक दूसरे के प्रति गहरी खाई, टीवी स्क्रीनों ने प्रायोजित की। स्क्रीनों पर चीखती आवाजें जो ‘लव जिहाद’ की आड़ में एक पूरे समुदाय को हैवान के बतौर पेश कर रही थीं, को भूलना शायद मुश्किल होगा। लड़कियों के गायब होने, मानव अंग तस्करी और अमानवीय सेक्स व्यापार की घटनाओं व आकड़ों को एक सांप्रदायिक नजरिया दिया जा रहा था।
जिस मदरसे ने एक हिन्दू लड़की को आर्थिक सहयोग देने के लिए, बिना किसी धार्मिक भेद-भाव के उसे अध्यापिका के रुप में नियुक्त किया, वही उसका सबसे बड़ा गुनाह हो गया। हिन्दुत्वादी समूहों ने मदरसों के प्रति हीन भावना पैदा करते हुए प्रचारित किया कि ग्रेजुएट होकर भी मेरठ की हिन्दू लड़की को मदरसे जैसे स्थान पर नौकरी ढूँढने जाना पड़ता है। ‘लव जिहाद’ के बहाने वे अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की नीति पर निशाना साधते हुए, इसे बहुंसख्यकों के प्रति दोहरा रवैया बताकर, सांप्रदायिक विभाजन की अपनी रणनीति पर काम करते हैं। ‘लव जिहाद’ की ओट लेकर अल्पसंख्यक आयोग की तरह हिन्दू मानवाधिकार आयोग की ‘सख्त जरूरत’ की बात कही जाने लगी। इसके लिए प्रचारित किया गया कि विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू हेल्प लाइन का हिन्दू मानवाधिकार आयोग पहले से है। अब केंद्र सरकार को इस आयोग को कानूनन मान्यता देकर उसे कार्मिक और कानूनी अधिकार दे देना चाहिए।
हिन्दू अस्मिता के नाम पर ‘मेरठ बचाओं मंच’ जैसे संगठनों का निर्माण कर वे एक क्षेत्रीय आक्रामक अस्मितावादी सांप्रदायिकता को भड़काने की फिराक में हैं। खरखौदा प्रकरण की वास्तविकता के बाद वे थोड़ा ठहर भले सकते हैं। पर वे उस सांप्रदायिक जेहनियत के विस्तार में और तेजी लाएँगे, जिसे हमारे समाज में निहित पितृसत्ता खाद-पानी देती है। वे इसको प्रचारित करेंगे कि एक हिंदू लड़की जो एक मुसलमान के पास चली गई थी, को वापस लाने के लिए उन्होंने यह सब किया। जिसका, उनको समाज का रुढि़वादी ढाँचा मौन स्वीकृति देता है। ऐसे में हमें व्यापकता में प्रेम संबन्धों पर अपनी जेहनियत का विस्तार करना होगा। सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर 1857 की साझी शहादत और साझी विरासत की नगरी मेरठ को ठहर कर सोचना होगा, नहीं तो वे उसके इस ऐतिहासिक ढाँचे को ध्वस्त कर देंगे।
-राजीव कुमार यादव
मोबाइल: 09452800752
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
दिसम्बर –2014

क्या यह नये आतंकियों को तैयार करने की नर्सरी नहीं है
1925 के जन्मकाल से जो विष बेल समाज में बोई गयी थी उसका असर 30 जनवरी 1948 राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या के रूप में आया था . तत्कालीन गृह मंत्री पटेल ने नागपुरी आतंकवाद पर प्रतिबन्ध लगा दिया था किन्तु तमाम सारे माफीनामे लिखने के बाद सिर्फ सांस्कृतिक कार्यों को करने की छूट मिली थी . भारत सरकार ने इस आतंकवाद के सम्बन्ध में ध्यान नहीं दिया जिसके फलस्वरूप 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद का ध्वंस नागपुरी आतंकवाद की बड़ी घटना थी .

देश के अन्दर नागपुरी आतंकवादियों ने पूरे समाज में एक विष घोल दिया है और हिन्दू समाज के धार्मिक पुरुषों के स्थान पर राजनीती करने वाले तथा अपराधी तथ्यों का एक बड़ा तबका हिन्दू धर्म के मतावलंबियों की आस्था का लाभ उठा कर नये नये मठ व आश्रम खोल कर आतंकी घटनाओ को करने में लग गया है . बम्बई एटीएस चीफ हेमंत करकरे ने बहुत सारे नागपुरी आतंकवादियों को पकड़ कर विभिन्न बम विस्फोटों का पर्दाफाश किया था किन्तु मुंबई आतंकी घटनाओ में उनकी टीम शहीद हो गयी थी किन्तु दुर्भाग्यवश देश की राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी बदली की व्यापारी, अपराधी व चरित्र हीनता की पराकाष्ठा को पीछे छोड़ चुके कथित संतों की एक पूरी जमात तैयार हुई जो देश और प्रदेश की राजनीति की दिशा व दशा तय करने लगी. बड़े-बड़े राजनेता उनके भक्त हो गए . आज हरियाणा के सतलोक आश्रम में कथित संत रामपाल की गिरफ्तारी को लेकर हरियाणा सरकार बनाम रामपाल का युद्ध कई दिनों से चल रहा है . एक दिन का खर्चा लगभग 6 करोड़ रुपये आ रहा है  डीजीपी ने मौत के दावे को झूठा करार दिया है। उन्होंने कहा कि संत के समर्थकों के हमले में 105 पुलिसवाले जख्मी हो गए हैं। उन्होंने बताया कि दो पुलिसवालों को गोलियां लगी हैं। पुलिस महानिदेशक का कहना है कि रामपाल अब भी आश्रम में ही हैं जिन्हें बचाने के लिए कई लोगों को ‘बंधक बनाकर’ आश्रम में रखा गया है। . काफी लोगों के हताहत होने के समाचार मिल रहे हैं .

हरियाणा की पुलिस मोदी भक्त आज तक के रिपोर्टर नितिन जैन,  मीडिया वालों से मारपीट की और उनके कैमरे भी तोड़ दिए। पुलिस ने घटनास्थल पर रिपोर्टिंग कर रहे टाइम्स नाउ के अलावा एबीपी न्यूज के कैमरे तोड़ डाले। इंडिया न्यूज व अन्य कई चैनलों और अखबारों के पत्रकारों को चोटें आई हैं। डीजीपी की इजाजत से प्रेस भी पूरे वाकये को कवर कर रही थी, तो अचानक पुलिस ने मीडियाकर्मियों पर भी हमला बोल दिया। हमले में कई चैनलों और अखबारों के पत्रकार घायल हो गए हैं। एनडीटीवी के भी छह मीडियाकर्मियों को चोट लगी है। एनडीटीवी के लाइव कवरेज से जुड़े कई उपकरण और कैमरे पुलिसकर्मियों ने तोड़ दिए हैं।
लाठीचार्ज में एनडीटीवी के पत्रकार सिद्धार्थ पांडेय, पत्रकार मुकेश सेंगर, कैमरामैन सचिन गुप्ता, कैमरामैन फ़हद तलहा, कैमरामैन अश्विनी मेहरा और कैमरा सहयोगी अशोक मंडल घायल हुए हैं।पत्रकारों को घटनास्थल से करीब 2 किलोमीटर दूर खदेड़ दिया गया है।
कथित आतंकवादियों को कब्जे में करने की कार्यवाई करने के साथ हरियाणा सरकार मीडिया कर्मियों की पिटाई इस कारण से भी कर रही है कि हमारे हिसाब से चलो अन्यथा यह ट्रेलर पिक्चर में बदल जाएगा .

सुमन
लो क सं घ र्ष !

अपनी जान जोखिम में डालकर कर्तव्यनिष्ठा की पराकाष्ठा का परिचय देते हुए अदम्य शौर्य व साहस का प्रदर्शन करते हुए आतंकवादियों  द्वारा की जा रही गोलाबारी का मुंहतोड़ जवाब देते हुए तीन आतंकवादियों को मार गिराया गया तथा दो आतंकवादी भागने में कामयाब रहे . बड़ी मात्र में गोला बारूद हथियार व विस्फोटक बरामद जैसी खबरें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया पर दिखाई देती हैं . इस तरह की घटनाओ में 95 %  घटनाएं लोगों को घरों से कई-कई महीने पहले पकड़ कर अघोषित जेलों में रखकर प्रताड़ित करने के बाद पुरस्कार, सम्मान , इनाम , आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन, साहस और शौर्य का बखान करने जैसे शब्दों के लिए बराबर हत्याएं की जाती रही हैं. 
   अभी जम्मू और कश्मीर की सीमा पर हुए मछिल फर्जी मुठभेड़ कांड के सैन्य अधिकारीयों को आजीवन कारावास की  सजा सुनाई गयी है . उक्त फर्जी मुठभेड़ की जांच कराने के लिए जम्मू एंड कश्मीर में दो महीने जनता ने आन्दोलन चलाया था और 123 व्यक्तियों ने न्याय पाने के लिए जान दे दी थी तब जाकर जांच हुई थी . नवभारत टाइम्स के मुताबिक अप्रैल 2010 में उत्तरी कश्मीर में तैनात सेना की चार राजपूताना रेजिमेंट की कमान कर्नल डीके पठानिया के पास थी। कर्नल पठानिया ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों और जवानों के साथ एलओसी पर तथाकथित आतंकियों को मार गिराने की साजिश रची, ताकि मुखबिरों के नाम पर आने वाली राशि के साथ-साथ वीरता पुस्कार भी हासिल किया जा सके।
उन्होंने इस काम में सेना की 161 टेरिटोरियल आर्मी के एक जवान अब्बास सैयद हुसैन के अलावा दो स्थानीय नागरिकों बशारत लोन और अब्दुल हमीद की मदद ली। तीनों ने मिलकर बारामूला जिले के नादिहाल-रफियाबाद के तीन युवकों शहजाद अहमद खान, रियाज अहमद लोन और मुहम्मद शफी को सेना में नौकरी दिलाने का लालच दिया और अपने साथ 26 अप्रैल को मच्छल इलाके में ले गए। इसके लिए अब्बास और उसके दोनों साथियों को कथित तौर पर कर्नल पठानिया ने डेढ़ लाख रुपये दिए थे।
जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में मोहम्मद शफी, शहजाद अहमद और रियाज अहमद को बहला फुसलाकर मच्छल इलाके में लाया गया और तीनों को गोली मार दी गई। बाद में बताया गया कि तीनों पाकिस्तानी आतंकवादी थे, जो भारतीय सीमा में घुसपैठ का प्रयास करते मारे गए। हकीकत में तीनों जम्मू-कश्मीर के ही बारामूला सेक्टर स्थित नदिहल के निवासी थे।
शहजाद, रियाज और मुहम्मद शफी के परिवार वालों नों ने 27 अप्रैल 2010 को उनके लापता होने की रिपोर्ट लिखा दी। इसके बादे 30 अप्रैल को राजपूताना रेजिमेंट की तरफ से मच्छल में पुलिस को सूचित किया गया कि 29 अप्रैल की रात तीन पाकिस्तानी आतंकी मारे गए हैं। पुलिस ने तीनों शव कब्जे में लेकर दफना दिए, लेकिन जब इनकी तस्वीरें अखबारों में आईं तो मामला खुल गया। इस पर प्रदर्शन शुरू हो गए। पुलिस ने अब्बास सैयद और उसके दोनों साथियों को गिरफ्तार कर उनसे पूरी साजिश उगलवा भी ली।
अब्बास ने पुलिस को 4 राजपूताना रेजिमेंट के मेजर उपेंद्र के इसमें शामिल होने की बात बताई। फाइनल रिपोर्ट में पुलिस ने राजपूताना रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) कर्नल डी के पठानिया और मेजर उपेंद्र समेत कुल 11 सैन्यकर्मियों को आरोपी बनाया था। पुलिस की जांच रिपोर्ट आने के बाद सेना ने भी मामले की जांच शुरू कर दी थी। कर्नल पठानिया पर जांच पूरी होने तक कश्मीर से बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया, जबकि अन्य सैन्य अधिकारियों और जवानों को निलंबित कर दिया गया।
न्यायलय का फैसला 
साढ़े चार साल पुराने मछिल फर्जी एनकाउंटर केस में दोषी पाए गए कर्नल समेत सात सैन्यकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि सैन्य सेवा से बर्खास्त किए जा चुके इन सैनिकों को सेवा से जुड़ा कोई लाभ भी नहीं मिलेगा।
सेना के मुठभेड़ों की जांच कराना बेहद कठिन कार्य है वहीँ पूरे देश में पुलिस, स्पेशल सेल, एस टी एफ़ तथा ए टी एस जैसे सरकारी संगठन आये दिन मुठभेड़ों के नाम पर फर्जी मुठभेड़ करते रहते हैं तथा बेगुनाह लोगों को गंभीर अपराधों में निर्रुद्ध करने का काम पुरस्कार, सम्मान , इनाम , आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन, साहस और शौर्य का बखान करने जैसे शब्दों के लिए करते रहते हैं जिसकी सुनवाई आसानी से होना संभव नहीं है .
    उत्तर प्रदेश के कचेहरी सीरियल बम विस्फोट कांड के आरोपी तारिक काशमी व मृतक खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी व आर दी एक्स, डेटोनेटर की बरामदगी की जांच इन्क्वारी एक्ट तहत आर डी निमेष कमीशन ने किया तो पाया की गिरफ्तारी व बरामदगी दोनों संदिग्ध हैं उसके बावजूद भी तारिक काशमी व अन्य सात वर्षों से लखनऊ जेल की स्पेशल सेल में बंद हैं .
सुमन

पांच महीने अभी पूरे हुए हैं और मोदी के प्रचारकों का सुर बदल गया। देखिये कल, 24 अक्तूबर के ‘टेलिग्राफ’ में स्वपन दासगुप्त का लेख – Picky with his symbol (अपने प्रतीक का खनन)।
स्वपन दासगुप्त, मोदी बैंड के एक प्रमुख वादक, चुनाव प्रचार के दिनों में बता रहे थे – गुजरात का यह शेर सब बदल डालेगा। आजादी के बाद से अब तक जीवन के सभी क्षेत्रों में ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का जो नाटक चलता रहा है, उसका नामो-निशान तक मिट जायेगा। इतिहास की एक नयी इबारत लिखी जायेगी।
आज वही दासगुप्ता मोदी विरोधियों को इस बात के लिये लताड़ रहे हैं कि क्या हुआ, मोदी को लेकर इतना डरा रहे थे, कुछ भी तो नहीं बदला। मोदी की राक्षस वाली जो तस्वीर पेश की जा रही थी, अल्पसंख्यकों को डराया जा रहा था, पड़ौसी राष्ट्रों से भारी वैमनस्य की आशंकाएं जाहिर की जा रही थी – वैसा कुछ भी तो नहीं हुआ। बनिस्बत्, अपने राजतिलक के मौके पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री तक को आमंत्रित करके, जापान, अमेरिका सहित सारी दुनिया को आर्थिक उदारवाद की मनमोहन सिंह की नीतियों पर ही और भी दृढ़ता के साथ चलने का आश्वासन देकर और ‘स्वच्छ भारत’ आदि की तरह के अपने प्रचार अभियानों में आमिर खान, सलमान खान को शामिल करके, और तो और, स्वपन दासगुप्त के अनुसार, योगी आदित्यनाथ की जहरीली बातों का खुला समर्थन न करके मोदी ने अपने ऐसे सभी विरोधियों को निरस्त कर दिया है। उनके लेख की अंतिम पंक्ति है – ‘‘ मोदी के आलोचकों को अब उनकी पिटाई के लिए नयी छड़ी खोजनी होगी, पुरानी तो बेकार होगयी है।’’
(Modi’s critics must find a new stick to beat him with. The old one has blunted)
दासगुप्त का यह कथन ही क्या यह बताने के लिये काफी नहीं है कांग्रेस-शासन के दुखांत के बाद, यह ‘कांग्रेस-विहीनता’ का शासन प्रहसन के रूप में इतिहास की पुनरावृत्ति के अलावा और कुछ नहीं साबित नहीं होने वाला !
मार्क्स की विश्लेषण शैली का प्रयोग करें तो कहना होगा – मानव अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं पर मनचाहे ढंग से नहीं। वे अतीत से मिली परिस्थितियों में काम करते हैं और मृत पीढि़यों की परंपरा जीवित मनुष्यों के मस्तिष्क पर एक दुरूस्वप्न सी हावी रहती है। ‘‘ऐसे में कुछ नया करने की उत्तेजना में ही अक्सर वे अतीत के प्रेतों को अपनी सेवा में आमंत्रित कर लेते हैं। उनसे अतीत के नाम, अतीत के रणनाद और अतीत के परिधान मांगते हैं ताकि इतिहास की नवीन रंगभूमि को चिर-प्रतिष्ठित वेश-भूषा में, इस मंगनी की भाषा में पेश कर सके।’’
आरएसएस के प्रचारक और गुजरात (2002) के सिंह के जिन प्रतीकों के आधार पर स्वपन दासगुप्त मोदी को एक नये बदलाव का सारथी बता रहे थे, वे ही अब यह कह करे हैं कि ‘‘प्रधानमंत्री मोदी और चुनाव प्रचार के समय का अदमनीय मोदी बिल्कुल भिन्न है। यह नयी मोदी शैली अभी विकासमान है और इसकी कोई चौखटाबद्ध परिभाषा करना जल्दबाजी होगी।’’
(Modi the prime minister has chosen to be markedly different from Modi the indefatigable election campaigner. The style is still evolving and it would be premature to attempt a rigid definition of the new style)
नयी मोदी शैली ! पहले सरदार पटेल, अब गांधी, नेहरू भी – भारत की राष्ट्रीय राजनीति की चिरप्रतिष्ठित वेश-भूषा और मंगनी की पुरानी भाषा की सजावट से तैयार हो रही नयी शैली !
इसमें शक नहीं कि दुनिया के सभी बड़े-बड़े परिवर्तनों की लड़ाइयों को बल पहुंचाने के लिये अतीत के प्रतिष्ठित प्रतीकों का, आदर्शों और कला रूपों का भी प्रयोग होता रहा हैं। वर्तमान की लड़ाई के सेनानियों में एक नया जज़्बा पैदा करने के लिये अनेक मृतात्माओं को पुनरुज्जीवित किया जाता रहा है। भारत की आजादी की लड़ाई का इतिहास तो ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा हुआ है। आधुनिक जनतांत्रिक विचारों के साथ ही इसकी एक धारा स्पष्ट तौर पर पुनरुत्थानवादी धारा रही है। लेकिन उस लड़ाई में अतीत के आदर्शों और प्रतीकों का, अनेक मृतात्माओं का उपयोग गुलामी से मुक्ति की लड़ाई को गौरवमंडित करने के उद्देश्य से किया गया था, न कि किसी प्रकार की भौंडी नकल भर करने के लिएय उनका उपयोग अपने उद्देश्यों और कार्यभारों की गुरुता को स्थापित करने के लिये किया गया था, न कि अपने घोषित कार्यभारों को पूरा करने से कतराने के लिये, अपने चरित्र पर पर्दादारी के लियेय उनका इस्तेमाल कुंद की जा चुकी प्राचीन गौरव की आत्मा को जागृत करने के लिए किया गया था न कि उसके भूत को मंडराने देने के लिए, अपने समय को भूतों का डेरा बना देने के लिये।
गौरवशाली, वीरतापूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन की कोख से इस देश में एक पूंजीवादी जनतांत्रिक राज्य की स्थापना हुई। राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व से अबतक इसके विभिन्न चरणों में कई प्रवक्ता पैदा हुए – पंडित नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह। इनके अलावा गैर-कांग्रेस दलों से भी छोटे-बड़े अंतरालों के लिये मोरारजी देसाई, चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रवक्ता सामने आएं। यह कहानी, स्वतंत्र भारत में भारतीय पूंजीवाद के विकास की कहानी, पूरे सड़सठ सालों की कहानी है। इतने लंबे काल तक नाना प्रकार के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से लगातार धन के उत्पादन, लूट-खसोट और गलाकाटू प्रतिद्वंद्विताओं में तल्लीन हमारा आज का उपभोक्तावादी समाज इस बात को लगभग भूल चुका है कि उसका जन्म आजादी की लड़ाई के दिनों के वीर सेनानियों की मृतात्माओं के संरक्षण में हुआ हैं। राजनीति एक आदर्श-शून्य, शुद्ध पेशेवरों का कमोबेस खानदानी धंधा बन चुकी है।
ऐसे सामान्य परिवेश में, अतीत के सारे कूड़ा-कर्कट को साफ कर देने की दहाड़ के साथ सत्तासीन होने वाले शूरवीर द्वारा अपनी सेवा के लिये मृतात्माओं का आह्वान किस बात का संकेत है ? क्या तूफान की गति से इतिहास का पथ बदल देने का दंभ भरने वालों में सिर्फ पांच महीनों में ही सहसा किसी मृतयुग में पहुंच जाने का अहसास पैदा होने लगा है? वैसे भी, हाल के उपचुनावों और राज्यों के चुनावों के बाद एक सिरे से सब यह कहने लगे हैं कि भाजपा की बढ़त के बावजूद मोदी लहर जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं रहा है। राजनीति के नाम पर वही सब प्रकार की जोड़-तोड़, सरकारें बनाने-बिगाड़ने की अनैतिक कवायदें, अपराधियों को हर प्रकार का संरक्षण देने की शर्मनाक कोशिशें, एक-दूसरे की टांग खिंचाई की साजिशाना हरकतें, सार्वजनिक धन को निजी हाथों में सौंप देने की राजाज्ञाएं, सीमाओं को लेकर थोथा गर्जन-तर्जन और विश्व पूंजीवाद के सरगना अमेरिका की चरण वंदना। यही तो है, एक शब्द में – राजनीति का मोदी-अमितशाहीकरण !
इसीलिये, स्वपन दासगुप्त जो भी कहे, अब इतना तो साफ है कि मोदी का सत्ता में आना किसी आकस्मिक हमले के जरिये बेखबरी की स्थिति में किसी को अपने कब्जे में ले लेना जैसा ही था। वैसा धुआंधार, एकतरफा प्रचार पहले किसी ने नहीं देखा था। अन्यथा, न भ्रष्टाचार-कदाचार में कोई फर्क आने वाला है, न तथाकथित नीतिगत पंगुता में। जब आंख मूंद कर पुराने ढर्रे पर ही चलना है तो क्या सजीवता, और क्या पंगुता ! इस पूरे उपक्रम में यदि कुछ बदलेगा तो, जैसा कि नाना प्रकार की खबरों से पता चल रहा है, पिछली सरकार द्वारा मजबूरन अपनाये गये गरीबी कम करने के कार्यक्रमों में कटौती होगीय भूमि अधिग्रहण कानून में किसानों के हित में किये जारहे सुधारों को रोका जायेगाय और भारत में विदेशी पूंजी के अबाध विचरण का रास्ता साफ किया जायेगा। भारत सरकार गरीबों को दी जाने वाली तमाम प्रकार की रियायतों में कटौती करें, इसके लिये सारी दुनिया के  बाजारवादी अर्थशास्त्री लगातार दबाव डालते रहे हैं। इसीप्रकार भूमि अधिग्रहण के मामले में बढ़ रही दिक्कतों को खत्म करने और बैंकिंग तथा बीमा के क्षेत्र को विदेशी पूंजी के लिये पूरी तरह से खोल देने के लिये भी दबाव कम नहीं हैं। मनमोहन सिंह इन सबके पक्ष में थे, फिर भी विभिन्न राजनीतिक दबावों के कारण अपनी मर्जी का काम नहीं कर पा रहे थे। इसीलिये उनकी सरकार पर लगने वाले ‘नीतिगत पंगुता’ के सभी सच्चे-झूठे अभियोगों में ये सारे प्रसंग भी शामिल किये जाते थे। मोदी सरकार ने इसी ‘नीतिगत पंगुता’ से उबरने के लिये सबसे पहले गरीबी को कम करने वाली योजनाओं की समीक्षा करनी शुरू कर दी है। बीमा क्षेत्र को तो विदेशी पूंजी के लिये खोल ही दिया है, भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले में भी पहले सर्वसम्मति से जो निर्णय लिये गये थे, उन सबको बदलने के बारे में विचार का सिलसिला शुरू हो गया है।
चन्द रोज पहले ही प्रकाशित हुई विश्व बैंक की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि सन् 2011 से 2013 के बीच दुनिया में गरीबी को दूर करने में भारत का योगदान सबसे अधिक (30 प्रतिशत) रहा है। खास तौर पर मनरेगा और बीपीएल कार्ड पर सस्ते में अनाज मुहैय्या कराने  की तरह के कार्यक्रमों ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इन कार्यक्रमों के चलते भारत में मजदूरी के सामान्य स्तर में वृद्धि हुई है। लेकिन भारतीय उद्योग और मोदी सरकार भी सस्ते माल के उत्पादन की प्रतिद्वंद्विता में भारत को दुनिया के दूसरे देशों से आगे रखने के नाम पर मजूरी के स्तर को नियंत्रित रखना चाहती है। ‘श्रमेव जयते’ योजना, पूंजी और श्रम के बीच की टकराहट में सरकार की अंपायर की भूमिका के अंत की योजना, जिसकी घोषणा के दिन को खुद भाजपा के श्रमिक संगठन, भारतीय मजदूर संघ ने भारत के मजदूरों के लिये एक काला दिवस कहा, मोदी उसीकी शेखी बघारने में फूले नहीं समा रहे। हांक रहे हैं – ‘श्रमयोगी बनेगा राष्ट्रयोगी’।
इन सारी स्थितियों में, ‘कांग्रेस-विहीन’ भारत सिर्फ चमत्कारों पर विश्वास करने वाले कमजोर लोगों में ही किसी नये विश्वास का उद्रेक कर सकता है। भविष्य के उन कार्यक्रमों के गुणगान में, जिनकी उन्होंने अपने मन में योजनाएं बना रखी है, लेकिन उन पर असल में अमल की कोई मंशा या अवधारणा ही नहीं हैं, ये वर्तमान के यथार्थ के अवबोध को ही खो दे रहे हैं।
‘स्वच्छता अभियान’ का ही प्रसंग लिया जाए। साफ और स्वच्छ भारत के पूरे मसले को जनता के शुद्ध आत्मिक विषय में तब्दील करके पूरे मामले को सिर के बल खड़ कर दिया जा रहा है। इन्हीं तमाम कारणों से वह समय दूर नहीं होगा, जब यह प्रमाणित करने के लिये इकट्ठे हुए लोग कि हम अयोग्य नहीं है, अपना बोरिया-बिस्तर समेटते हुए दिखाई देने लगेंगे – ‘जो आता है वह जाता है’ का बीतरागी गान करते हुए। स्वपन दासगुप्त मोदी-विरोधियों से मोदी की पिटाई के लिये नयी छड़ी खोजने की बात करते हैं। यह नहीं देखते कि जो पिटे हुए रास्ते पर चलने की पंगुता का शिकार हो, उसे पीटने के लिये किसी छड़ी की जरूरत ही नहीं होगी। मोदी शासन के प्रारंभ में ही उसके दुखांत के बीज छिपे हुए हैं।

——अरुण माहेश्वरीphoto

दलित बहुजन राजनीति की ओर
दलित सेना से निकाले जाने के बाद मेरे लिए अगला स्वाभाविक ठिकाना बहुजन समाज पार्टी और उस जैसी सोच रखने वाले संस्था, संगठन थे, मैं अपने आपको अब वैचारिक रूप से इन्हीं के करीब पाता था, मैंने सोच रखा था कि किसी दिन अगर मैं सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनूँगा तो उसकी शुरुआत बसपा से ही होगी, बसपा उन दिनों मेरे लिए एक सामाजिक आन्दोलन थी, मेरे एक मित्र आर0पी0 जलथुरिया के घर बहुजन संगठक नामक अखबार आता था, मैं उसे नियमित रूप से पढ़ता था, बसपा सुप्रीमों मान्यवर कांशीराम के प्रति मन में बहुत अधिक सम्मान भी था, उनके द्वारा सोई हुई दलित कौमों को जगाने के लिए किए जा रहे प्रयासों का मैं प्रशंसक और समर्थक था, तिलक तराजू और तलवार को जूते मारने की बात मुझे अपील करती थी। उस वक्त का मीडिया आज जितना ही दलित विरोधी था, मान्यवर मीडिया के इस चरित्र का बहुत ही सटीक और सरल विश्लेषण करते हुए कहते थे कि मीडिया कभी भी बहुजन समर्थक नहीं हो सकता है, उसमें बनिए का पैसा और ब्राह्मण का दिमाग लगा हुआ है, अगर हम देखें तो हालात अब भी जस के तस ही है, अभी भी अधिकांश मीडिया हाउस के मालिक वैश्य हैं और संपादक ब्राह्मण।
कांशीराम को तत्कालीन मीडिया अक्सर एक अवसरवादी और जातिवादी नेता के रूप में पेश करता था, अवसरवाद पर बोलते हुए उन्होंने एक बार कहा था-हाँ मैं अवसरवादी हूँ और अवसर ना मिले तो मैं अवसर बना लेता हूँ समाज के हित में और वाकई उन्होंने बहुजनों के लिए खूब सारे मौके बनाए, उनके द्वारा दिए गए नारों ने उन दिनों काफी हलचल मचा रखी थी, मनुवाद को उन्होंने जमकर कोसा, जयपुर में हाईकोर्ट में खड़े मनु की मूर्ति को हटाने के लिए भी उन्होंने अम्बेडकर सर्कल पर बड़ी मीटिंग की, हम भीलवाड़ा से पूरी बस भर कर लोगों को लाए, मान्यवर की पुस्तक चमचा युग भी पढ़ी, उसमें चमचों के विभिन्न प्रकार पढ़कर आनंद आया, चमचों का ऐसा वर्गीकरण शायद ही किसी और ने किया होगा, वाकई कांशीराम का कोई मुकाबला नहीं था। बाबा साहब अम्बेडकर के बाद उन्होंने जितना किया, उसका आधा भी बहन कुमारी कर पातीं तो तस्वीर आज जितनी निराशाजनक है शायद नहीं होती, पर दलित की बेटी दौलत की बेटी बनने के चक्कर में मिशन को ही भुला बैठी।
मुझे मान्यवर से 5 बार मिलने का अवसर मिला, उनकी सादगी और समझाने के तरीके ने मुझे प्रभावित किया, वे जैसे थे, बस वैसे ही थे, उनका कोई और चेहरा नहीं था, तड़क भड़क से दूर, मीडिया की छपास लिप्सुता से अलग, लोगों के बीच जाकर अपनी बात को समझाने का उनका श्रम
साध्य कार्य मेरी नजर में वन्दनीय था, मैं उनकी बातों और नारों का तो दीवाना ही था, ठाकुर ब्राह्मण बनिया को छोड़कर सबको कमेरा बताना और इन्हें लुटेरा बताने का साहस वो ही कर सकते थे, ये मान्यवर कांशीराम ही थे जिन्होंने कांग्रेस को साँपनाथ, भाजपा को नागनाथ, जनता दल को सँपोला और वामपंथियों को हरी घास के हरे साँप निरूपित किया था, बसपा सपा गठबंधन सरकार के शपथ ग्रहण के वक्त लगा नारा-मिले मुलायम कांशीराम, भाड़ में जाए जय श्रीराम, उस वक्त जितना जरुरी था, आज भी उसकी उतनी ही या उससे भी अधिक जरूरत महसूस होती है।
चूँकि मेरा प्रारम्भिक प्रशिक्षण संघी कट्टरपंथी विचारधारा के साथ हुआ इसलिए चरमपंथी विचारधारा मुझे तुरंत लुभा लेती थी, उदारवादी और गांधीवादी टाइप के अम्बेडकरवादियों से मुझे कभी प्रेम नहीं रहा, समरसता, समन्वयन और भाईचारे की फर्जी बातों पर मेरा ज्यादा यकीन वैसे भी नहीं था, इसलिए मान्यवर जैसे खरी खरी कहने वाले व्यक्ति को पसंद करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं थी, एक और बात जो उनकी मुझे पसंद आती थी वह यह थी कि वे कभी किसी की चमचागीरी नहीं करते दिखाई पड़े, याचक सा भाव नहीं, बहुजनों को हुक्मरान बनाने की ललक और उसके लिए जीवन भर का समर्पण, इसलिए मैं सदैव ही कांशीराम को पसंद करता रहा और आज भी अपनी सम्पूर्ण चेतना के साथ उन्हें आदर देता हूँ। मेरी उनसे आखिरी मुलाकात चित्तौड़गढ़ के डाक बंगले में हुई, वे गाडि़या लोहारों के सम्मेलन को संबोधित करने आए थे, उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूँ की राजस्थान में कोई मेघवाल मुख्यमंत्री बने, मैं उन्हें राजा बनाने आया हूँ, लेकिन मान्यवर की इस इच्छा को परवान चढ़ाने के लिए बसपा कभी उत्सुक नहीं नजर आई, जो लीडरशिप इस समुदाय से उभरी शिवदान मेघ, भोजराज सोलंकी अथवा धरमपाल कटारिया के रूप में, उसे भी किसी न किसी बहाने बेहद निर्ममता से खत्म कर दिया गया, मैंने देखा कि ज्यादातर प्रदेश प्रभारी बहन जी उतर प्रदेश से ही भेजती हैं जिनका कुल जमा काम राजस्थान से पार्टी फण्ड, चुनाव सहयोग और बहन जी के बर्थ डे के नाम पर चंदा इकट्ठा करना रहता है,
जब तक मान्यवर कांशीराम जिंदा और सक्रिय रहे, तब तक बसपा एक सामाजिक चेतना का आन्दोलन थी ,उसके बाद वह जेबकतरों की पार्टी में तब्दील होने लगी, जिधर नजर दौड़ाओ उधर ही लुटेरे लोग आ बैठे, बातें विचारधारा तथा मिशन की और काम शुद्ध रूप से लूट-पाट। सेक्टर प्रभारी से लेकर बहनजी तक जेब गरम ही बसपा का खास  धरम हो गया, धन की इस वेगवान धारा में विचारधारा कब बह कर कहाँ जा गिरी, किसी को मालूम तक नहीं पड़ा, आज भी यह प्रश्न अनुत्तरित है कि बसपा नामक विचारधारा का आखिर हुआ क्या?
तिलक तराजू और तलवार को चार-चार जूते मारने वाले उन्हीं  तिलक धारियों के जूते और तलुवे चाटने लग गए, बसपा का हाथी अब मिश्रा जी का गणेश था, मनुवाद को कोसने वाले अब ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलनों में शंखनाद कर रहे थे और पूरा बहुजन समाज बहनजी की इस कारस्तानी को सामाजिक अभियांत्रिकी समझ कर ढपोरशंख बना मूक दर्शक बना हुआ था, किसी की मजाल जो दलित समाज की नई नवेली इस तानाशाह के खिलाफ सवाल उठाने की हिम्मत करता? बसपा अब द्विजों को जनेऊ बाँटने का गोरखधंधा भी करने लगी थी, दलितों को बिकाऊ नहीं टिकाऊ होने की नसीहत देने वाली पार्टी के चुनावी टिकट सब्जी मंडी के बैगनों की भाँति खुले आम बिकने लगे, पैसा इकट्ठा करना ही महानतम लक्ष्य बन चुका था, बर्थ डे केक, माथे पर सोने का ताज और लाखों रूपए की माला पहन कर बहनजी मायावती से मालावती बन बैठीं, बहुजन समाज स्वयं को ठगा सा महसूस करने लगा, सामाजिक परिवर्तन के एक जन आन्दोलन का ऐसा वैचारिक पतन इतिहास में दुर्लभ ही है, मैं जिस उम्मीद के साथ बसपा में सक्रिय हुआ, वैसा कोई काम वहाँ था ही नहीं, वहाँ कोई किसी की नहीं सुनता है, बहन जी तो कथित भगवानों की ही भाँति अत्यंत दुर्लभ हस्ती हैं , कभी कभार पार्टी मीटिंगों में दर्शन देतीं, जहाँ सिर्फ वे कुर्सी पर विराजमान होतीं और तमाम बहुजन कार्यकर्ता उनके चरणों में बैठ कर धन्य महसूस करते, बसपा जैसी पार्टी में चरण स्पर्श जैसी ब्राह्मणवादी क्रिया नीचे से ऊपर तक बेहद पसंद की जाती है, जो जो चरनागत हुए वे आज तक बहन जी के शरनागत है, शेष का क्या हाल हुआ, उससे हर कोई अवगत है, जो भी बहन जी को चमकता सितारा लगा, उसकी शामत आ गयी, बोरिया बिस्तर बँध गए, सोचने समझने की जुर्रत करने वाले लोग गद्दार कहे जा कर मिशनद्रोही घोषित किए गए और उन्हें निकाल बाहर किया गया, हालत इतने बदतर हुए कि हजारों जातियों को एकजुट करके बनी बहुजन समाज पार्टी सिर्फ ब्राह्मण चमार पार्टी बन कर रह गई, मान्यवर कांशीराम रहस्यमय मौत मर गए और धीरे-धीरे बसपा भी अपनी मौत मरने लगी, उसका मरना जारी है। सामाजिक चेतना के एक आन्दोलन का इस तरह मरना निःसंदेह दुख का विषय है पर किया ही क्या जा सकता है, जहाँ आलोचना को दुश्मनी माना जाता हो और कार्यकर्ता को पैसा उगाहने की मशीन, वहाँ विचार की बात करना ही बेमानी है, मैं बसपा का सदस्य तो रहा और मान्यवर ने मुझे राष्ट्रीय कार्यकारिणी के लिए भी नामित किया, लेकिन मैं कभी भी आचरण से बसपाई नहीं हो पाया, मुझमें वह क्षमता ही नहीं थी, यहाँ भी लीडर नहीं डीलर ही चाहिए थे, जिन कारणों ने पासवान जी से पिंड छुड़वाया वे ही कारण बहनजी से दूर जाने का कारण बने, दरअसल जिस दिन कांशीराम मरे, उस दिन ही समाज परिवर्तन का बसपा नामक आन्दोलन भी मर गया, मेरे जैसे सैंकड़ों साथियों के सपने भी मर गए, उस दिन के बाद ना मुझे बसपा से प्यार रहा और ना ही नफरत।
-भँवर मेघवंशी
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित
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रामविलास या भोगविलास
दलित साहित्य का पठन पाठन निरन्तर जारी था, अब मैंने दलित समुदाय के सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ताओं से भी मिलना जुलना प्रारम्भ कर दिया था, उन्हीं दिनों मुझे न्यायचक्र नामक पत्रिका पढ़ने को मिली, जिसे दलित नेता रामविलास पासवान सम्पादित करते थे, उस अंक के कवर पर लिखा उद्धरण मुझे बहुत अच्छा लगा, जिसमें पासवान कहते हैं कि ‘मैं उन घरों में दिया जलाने चला हूँ, जिनमें सदियों से अँधेरा है, मैंने सोचा, मुझे भी तो ऐसी ही आँखों से आँसू पोछने हैं जिनमें बरसों से आँसुओं के अलावा कुछ भी नहीं है, इस तरह तो पासवान जी और मेरी राह एक ही है, मैंने राम विलास पासवान से मिलने की ठान ली, और एक दिन मैं उनके 12 जनपथ, नई दिल्ली स्थित निवास पर जा पहुँचा, काफी प्रयास के बाद उनसे मुलाकात हो पाई। मैं दिखने में तो आज की तरह ही दुबला-पतला बिल्कुल बच्चे जैसा था, मेरी बातों पर वे यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि मैं आर0एस0एस0 जैसे विशाल अर्द्धसैनिक संगठन से अकेले लोहा ले रहा हूँ, जब मैंने उन्हें अपने द्वारा सम्पादित ‘ दहकते अंगारे ‘की खबरें और अपने नाम से विभिन्न अखबारों में छपे आलेख दिखाए तब उन्हें यकीन होने लगा, उनकी आँखों में विश्वास और प्रशंसा के भाव एक साथ ही दिखाई पड़े, इस मुलाकात का फायदा यह हुआ कि मैं मात्र 20 वर्ष की आयु में ही दलित सेना का भीलवाड़ा जिले का अध्यक्ष बना दिया गया, मैंने दलित सेना में रहते हुए जमकर काम किया, कई दलित चेतना शिविर आयोजित किए, रैलियों में जयपुर से लेकर प्रगति मैदान तक भीड़ लेकर गया, मेम्बरशिप में भी हमारा जिला काफी आगे रहा, नतीजतन पासवानजी मेरे काम से काफी खुश हुए और 1996 में जब वे रेल मंत्री बने तो उन्होंने मुझे पश्चिमी रेलवे का सलाहकार बना दिया। मंत्री रहते हुए पासवान और उनके नजदीकी दलित नेताओं की कार्यशैली और व्यवहार काफी बदल गए, जिस क्रांतिकारी दलित नेता रामविलास पासवान से मैं मिला और जिसके विचारों से मैं प्रभावित हुआ था, अब सत्ता की चकाचैंध और उनके आसपास उग आए दलालों ने उन्हें बिल्कुल ही बदल डाला था, पूरा राजनैतिक सामाजिक परिदृश्य ही बदल गया था, हर कोई भारतीय रेलवे को लूट खाने में लग गया, राम नाम की लूट मची हुई थी, दलित सेना के कई नेता जो रेलवे भर्ती बोर्ड के सदस्य बने हुए थे, भर्तियों के नाम पर खुल्लमखुल्ला पैसा बटोर रहे थे, छोटे-मोटे सब नेता अपनी अपनी क्षमता जितना लूटने में लगे थे, जिसे कुछ नहीं मिल सकता था, वे रेलवे में छोटे-मोटे ठेके ही लेने की कोशिश में लगे थे, रेलवे भवन से लेकर प्रत्येक रेलवे स्टेशन तक हर तरफ सिर्फ धन का साम्राज्य फैला हुआ था, अब दलित सेना में जय भीम सिर्फ एक नारा था, जो पैसा बटोर कर ला सके और दलाली कर सके वही कार्यकर्ता सबसे प्यारा था, मैं आया तो यहाँ मिशन के लिए था, पर हमारे मसीहाओं को तो कमीशन खाने से ही फुरसत न थी, मेरा यहाँ भी दम घुटने लगा, मुझे अपने आप पर ही शक होने लगा कि हर जगह मैं इतना जल्दी क्यों ऊबने लगता हूँ, कहीं पर भी फिट क्यों नहीं हो पाता हूँ, अब यहाँ तो सब लोग अपने ही हैं फिर भी सवाल उठने लगे कि मैं यहाँ क्यों हूँ? मैं यहाँ लीडरशिप करने आया था पर यहाँ तो डीलरशिप करने की जरूरत पड़ रही है, क्या मैं लोगों से पैसा बटोर-बटोर कर दिल्ली ले जाने का काम कर पाऊँगा ,मैं उन लोगों से नजरें कैसे मिलाऊँगा, जिनकों मैं बड़ी-बड़ी सैद्धांतिक बातें समझाता रहा हूँ, यह कैसा दीपक है जिसे मैं जलाने चला हूँ, इससे मैं किसी का घर रोशन कर पाऊँगा या उनका घर ही जला बैठूँगा, सैंकड़ों सवाल मेरे मन मस्तिष्क में उमड़ने लगे, एक बार फिर मैं बैचेनी और अवसाद का शिकार होने लगा था, मुझसे रहा नहीं गया, मैंने दलित मसीहा रामविलास पासवान की राजसी जीवनशैली और उनके इर्द गिर्द के चमचानुमा नेताओं द्वारा इकट्टा की जा रही अकूत धन सम्पदा पर एक सम्पादकीय दहकते अंगारे में लिख डाला, जिसका शीर्षक था ‘रामविलास या भोगविलास‘ ?
बस फिर क्या था, मुझे इस अपराध की तुरंत सजा दी गई, दलित सेना के राजस्थान प्रदेश के तत्कालीन अध्यक्ष ने मुझे अनुशासनहीनता के आरोप में जिलाध्यक्ष के पद से हटा दिया और प्राथमिक सदस्यता से भी निकाल बाहर किया, मैंने भी दलितों की इस दलाल सेना से बाहर हो जाने में ही अपनी भलाई समझी, कभी वापसी के बारे में नहीं सोचा, दलित सेना से निकाले जाने के लगभग 15 साल बाद अन्ना हजारे के आन्दोलन के साम्प्रदायिक चरित्र पर मेरे द्वारा उठाए गए सवालों को पढ़कर लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव खालिक साहब ने मुझे वर्ष 2012 में अपनी पार्टी के कैडर को
संबोधित करने के लिए सोमनाथ आमंत्रित किया, तब मंच पर पासवान और उनकी मंडली से पुनः मुलाकात हुई, बीच के दिनों में वे एन0डी0ए0 सरकार में मंत्री रह लिए थे, फिर गुजरात में किए गए अल्पसंख्यकों के एकतरफा नरसंहार को मुद्दा बनाकर वे राजग का डूबता जहाज छोड़ भागे छूटे, बाद में बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री का मुद्दा बनाए डोलते फिरे, असफल रहे। अंततः हाल ही में राजनाथ सिंह के पाँव पड़कर वापस राजग का हिस्सा बन बैठे, कभी मोदी को गुजरात नरसंहार के लिए दोषी बताने वाले रामविलास पासवान अब उन्हें पाप मुक्ति का प्रमाण पत्र बाँट रहे थे, अंततः अपना और अपने खानदान और अपनी जेबी पार्टी एल0जे0पी0 का भविष्य सँवारने के लिए तमाम पिछली बातों को भुला कर अपना ही थूँका हुआ चाटकर वे मोदी के शरणागत हो गए, गठबंधन में जीत कर आ गए और अब खाद्य एवं आपूर्ति मामलों के मिनिस्टर बन कर सत्ता का उपभोग करने को तत्पर हैं।
सत्ता की मछली थे, कुर्सी लिप्सुओं से मिलकर अब बेहद खुश हैं , अम्बेडकर के नाम और मिशन को बेच खाने में इनका कोई सानी नहीं है। जय भीम कहते-कहते जय सियाराम का जाप करने लगे हैं, समानता के प्रतीक नीले दुपट्टे की जगह गले में विषमता पैदा करने वाला भगवा पट्टा डाल कर ये फर्जी दलित मसीहा फिर हमारे आपके बीच आने वाले हंै, इन्हें जवाब देना कबीर, फुले अम्बेडकर के अनुयायियों का काम है, समाज को छोड़कर जो राज की ओर चले जाते हंै और सत्य के स्थान पर सत्ता को प्रमुखता दे देते हैं , वे बड़े से बड़े तिकड़मबाज तो हो सकते हंै, मगर हमारे मसीहा नहीं हो सकते है। हमें भेड़ की खाल ओढ़े भेडियों को पहचानना हंै, अब वक्त है कि हम अपने दोस्तों और दुश्मनों की शिनाख्त कर लें ।
-भँवर मेघवंशी
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित
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