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किताब चर्चा उपन्यास-नूर जहीर
हार्परकोलिन्स, नई दिल्ली
पृष्ठ:286; मूल्य : रु. 199 (पेपरबैक)
सामाजिक संरचना के भीतर छिपा है स्त्री मुक्ति का सपना

कथा कृतियां यथार्थ के प्रति आग्रही होने के बावजूद कल्पना के सहारे की मोहताज रही हैं। खांटी वास्तविकताओं पर आधारित होने पर भी। उपन्यास मेे यह मोहताजी कहानी की अपेक्षा अधिक होती है। यथार्थ अथवा वास्तविकताओं को भी तोड़ना मरोड़ना पड़ता है, उन्हे संवारना बिगाड़ना पड़ता है कि बहुधा उन्हे जस का तस प्रस्तुत नही किया जा सकता। 2011 में प्रकाशित चर्चित लेखिका नूर ज़हीर का उपन्यास ‘अपना खुदा एक औरत’ की भी यही स्थिति है। हार्पर कालिन्ससे आया 286 पृष्ठीय यह उपन्यास दरअस्ल उनके अंगे्रजी उपन्यास ‘माई गाड
इज़ अ वूमन’ का उन्हीं के द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद है। प्रकट न किए जाने के बावजूद उपन्यास उनकी मां रजि़या सज्जाद ज़हीर के जीवन संघर्ष पर आधारित है, जिसका ख़ासा हिस्सा उनके पति यानी नूर के पिता तथा भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के एक बड़े व्यक्तित्व सज्जाद ज़हीर के संघर्ष के साथ जुड़ा हुआ है। उपन्यास के लगभग सवा सौ पृष्ठ दिल्ली में मंच कलाओं का धंधा करने वाली अमृता गोविन्द उससे जुड़े कलाकारों के संघर्ष का विवरण लिए हुए है। इस ग्रुप से जुड़े होने का कारण यह संघर्ष रजि़या का भी है, जो उपन्यास में सफि़या के नाम से प्रस्तुत है। थोड़ा वृहत्तर रूप में देखिये तो यह संघर्ष सफि़या और अमृता से आगे जाते हुए भारतीय स्त्री के संघर्ष का विस्तार ग्रहण करता है। इस रूप मे वह मुखर रूप में इस त्रासदी को उभारता है कि गुलामी से आजा़दी की ओर आये एक देश में स्त्री की बेडि़यां वही हैं, उसकी वंचनाएं और यातना के अवसर उपक्रम भी वही हैं। संसद, न्यायालय, प्रशासन और धर्मगुरू सब उसके खि़लाफ़ एक पंक्ति में है। मुस्लिम स्त्री के लिए शरीअत अतिरिक्त विशिष्ट विपरीतता है। उपन्यास का नायक अब्बास जाफ़री, जो स्पष्ट ही कम्युनिस्ट भी है, इसमें समयानुरूप परिवर्तन का प्रबल समर्थक है। वह मानता है कि ईमान और कानून दो अलग वास्तविकताएं है। ‘अपना खुदा एक औरत’ का कालखण्ड बीसवीं सदी केवे साठ-सत्तर वर्ष हंै, जो घटना पूर्ण तो हैं ही, महत्वपूर्ण भी है, इन वर्षो में बड़ी तब्दीलियां घटित हुई, स्त्री मुक्ति के स्वप्न को ठोस वैचारिक-तार्किक आधार इसी अवधि में प्राप्त हुआ, न्याय के लिए वाजिब संघर्ष भी तेज हुए। यह अवधि है, चैथे दशक से शाह बानो केस का सर्वोच्च न्यायालय के फैसला आने तक यानी 1985-86 तक। इस फैसल ने भारतीय समाज और राजनीति में एक भूचाल सा पैदा कर दिया। शरीअत को लेकर सबसे ज्यादा प्रश्न भी तभी उठे। स्त्री के प्रति शरीअत यानी इस्लाम के रवैये को लेकर अनेक उत्तेजक बहसों ने जन्म लिया। हालत यह थी कि फैसले का विरोध करने वालें को इस्लाम व मुसलमान मुखालिफ़ मान लिया गया। उपन्यासकार ने उन क्षणों की भयावहता को पकड़ने का प्रयास किया है इस क्रम में कई चेहरों की तुच्छता स्वतः उघड़ आयी है-
‘फैसला आने में आधा घण्टा लगा। फैसला जिसने एक छिहत्तर साल की औरत को इजज़त से जीने और मरने का हक़ दिया। तक़रीबन उतना ही समय लगा, मुस्लिम दुनिया में कहर बरपा होने में वह क़हर जो सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए पूछ रहा है था कि हम अपनी औरतां का भेड़ बकरियों की तरह क्यों न रखंे, तुम हमें कुछ कहने वाले कौन होते हो।’ (पृ. 246)
सफि़या इस फैसले के पक्ष में खड़ी होती है, अपनी बेटी सितारा के साथ। वही सफि़या जो लखनऊ के एक अति चर्चित व प्रतिष्ठित परिवार के आक्सफोर्ड रिटर्न सैयदजा़दे अब्बास जाफ़री यानी सज्जाद जहीर की पत्नी है। जो शरीअत में समयानुसार परिवर्तन का प्रबल पक्षधर है। स्त्री मुक्ति का गंभीर समर्थक है। सफि़या शाह बानो का साथ देने के लिए अकेली बीमारी की हालत में दिल्ली से इंदौर जाती है, जहां विषम परिस्थितियांे में उसकी मौत उसके जीवन व संघर्ष का पटाक्षेप करती है। इस तरह चैथे दशक में आरम्भ हुआ स्त्री अस्मिता और आजा़दी का संघर्ष नौवे दशक में दुखद स्थितियों का शिकार होता है। चैथे ही दशक के चैथे वर्ष में विवादास्पद कहानी संग्रह ‘अंगारे’ प्रकाशित हुआ, किसी भी भाषा में स्त्री सरोकारों की, जिसमें मुस्लिम स्त्री के सरोकार प्रमुख है, इतनी शिद्दत भरी अभिव्यक्ति पहली बार हुई थी, इस चैथे दशक में सफि़या का विवाह अब्बास जाफ़री के साथ हुआ और प्रगतिशील लेखक संघ का पहला व दूसरा राष्ट्रीय अधिवेशन भी। नूर ने इसी चर्चित कहानी संग्रह ‘अंगारे’ को लपटें नाम दिया है, इसके प्रकाशन वर्ष को बदलते हुए उन्होने उससे जुड़े अनेक पक्षों को कथा की ज़रूरत के अनुरूप इधर-उधर किया है। ज़्यादा चिंताजनक यह है कि उन्हांेने यह तथ्य प्रतिपादित करना चाहा है कि कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘लपटंे’ लिखने तथा मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहंचाने के आरोप में अब्बास जाफ़री को पार्टी से निकाल दिया था। शाह बानो प्रकरण में भी वह तथ्य रोपती हैं कि सवोच्च न्यायालय के फैसले पर माक्र्सिस्ट पार्टी ने मौन साधे रखा या फैसले का विरोध किया। इसी तरह अमृता गोविन्द के कला संस्थान में बोनस की मांग को लेकर चले कलाकारों के आंदोलन में पार्टी नेताओं के चरित्र को नकारात्मक बताया है। निः संदेह पार्टी या पार्टी नेताओ को इन तमाम नकारात्मकताओं से पूरी तरह मुक्त नहीं माना जा सकता लेकिन यथार्थ को एकदम उलट देने को अवश्य ही कथा साहित्य में तथ्यों की वास्तविकता की पड़ताल गैर मुनासिब है, कुछ लोग इसे कथा विरोधी प्रवृति भी कह सकते है, फिर भी यदि कथानक ऐसे जीवन को लेकर बुना गया है, जिसके तथ्य या घटनाक्रम बहुत सार्वजनिक हों, तब ऐसे सवाल जरूर खड़े हो सकते है। क्योकि इससे धारणाएं बनती या बिगड़ती हैं।
‘लपटंे’ ही वह पुस्तक है जो नितांत धार्मिक परिपाटीवादी घराने की सफि़या के अब्बास जाफ़री से शादी का प्रमुख कारण बनी। अब्बास के बाल्दैन ऐसी बहू चाहते थे, जो धार्मिक हो और नास्तिक अब्बास को, भटके हुए अब्बास को सही रास्ते यानी मजहब के रास्ते पर ला सके। हुआ इसके विपरीत। सफि़या काफी हद तक अब्बास के रंग में रंगते हुए आधुनिक, तर्क में विश्वास करने वाली, रूढि़ भंजक महिला बन गयी। अपनी अस्मिता, आत्म निर्णय का अधिकार मुनष्य के रूप में सम्मानजनक जीवन की पूर्णता, आत्म निर्भरता जिसकी प्रमुख चिंताएं बनीं अब्बास हर कदम उसके साथ था। इन चिंताओं को लेकर उसका पहला टकराव अब्बास की वालिदा लेडी ज़ीनत बेगम से हुआ। धार्मिक रूढि़यों और सामंती संस्कारों में लिप्त उनकी हैसियत परिवार में तानाशाह की सी थी, अब्बास और साफि़या ने समवेत रूप में इस तानाशाही को चुनौती दी। यह चुनौती ही बाद में व्यक्त की गयी मजाज़ की इस इच्छा को पूरा करना था कि तेरेे माथे पर यह आंचल बहुत ही खूब है लेकिन तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था। इस तरह औरत से इंसान बनने की जदोजहद शुरू होती है। लेडी जी़नत से टकराव का मतलब है, पराजित मूल्यों, जड़संस्कारों तथा मज़हबी सत्ता से टकराव, कि लेडी जी़नत की इस सत्ता से गहरी साँठ-गाँठ है। इस टकराव की आरंभिक परिणति होती है। ऐतिहासिक शानदार कोठी से तथा सर्वेन्ट क्वार्टर्स में पनाह लेने में जिसे उपन्यास में सागर पेशा, (शागिर्द पेशा) कहा गया है। रशीद जहां की कहानी ‘सिफ़र’ इसी घटना पर आधारित है। संयोग से उपन्यास में रशीद जहां ज़ाहिदा के रूप में मौजूद हैं और सफि़या व अब्बास के संघर्ष में प्रति पल उनके साथ हैं, यही हाल कात्यायनजी के रूप् में राहुल सांकृत्यायन तथा इरफ़ान के रूप में मजाज़ का भी है।
उपन्यास में कई क्षण ऐसे आए हैं जहां नूर ज़हीर की साहसिकता अभिभूत करती है। इसे उर्दू की महिला कथारों द्वारा व्यक्त बोल्डनेस का अगला पड़ाव भी कह सकते हैं। हिन्दी महिला कथा लेखन में शब्दबद्ध हुई बोल्डनेस से यह थोड़ा अलग इस अर्थ में है कि इसके सरोकार वैचारिक भी हैं और ज़्यादा बड़े फ़लक पर घटित होती है। नकारात्मकताओं के साथ ही सही, अपने खानदान के वैभव का बखान नूर ने भी किया है लेकिन उन्होंने जिस बेबाकी से इस वैभव के स्याह पहलुओं और दमनकारी प्रवृत्ति को तार-तार किया है, वह वास्तव में विरल है। उपन्यास बताता है कि सज्जाद जहीद की प्रसिद्ध ‘दुलारी’ की दुलारी को, जो एक खरीदी हुई लौंडी है, गर्भवती करने वाला कोई और नहीं अब्बास जाफरी का बड़ा भाई ही था। राज़ खुलने पर कुछ रक़म देकर उसे घर से निकाल दिया जाता है। बाद में वह एक जगह मरी हुई पायी जाती । जैसे लेडी ज़ीनत के जस्टिस पति, अब्बास जाफ़री के पिता, सफि़या के ससुर सफ़दर जाफ़री तथा उनकी अंग्रेज प्रेमिका एक जंगल में बुरी तरह घायल अवस्था में पड़े मिलते हैं प्रेमिका तो जान से जाती है और जस्टिस अपाहिज होकर हमेशा के लिए बिस्तरसे लग जाते हैं। कि इस तरह लेडी ज़ीनत का परिवार में एक छत्र साम्राज्य का सपना पूरा हुआ। वह नहीं चाहती थी कि जस्टिस साहब अकूत सम्पत्ति का कोई और हिस्सेदार भी हो और यह कि सैयर ज़ादे पति की संतान किसी फिरंगिन के गर्भ से हो। वह यह भी नहीं चाहतीं कि उनके अधर्मी नस्तिक पुत्र अब्बास जाफरी को जिसके खि़लाफ लखनऊ के शाही इमाम ने सामाजिक बहिष्कार का फ़तवा सादिर किया है, इस जायदद से एक लखौरी या कौड़ी भी दी जाय, अब्बास और सफि़या जिस जायदाद को ठोकर मारने का फैसला पहले से किये हुए हंै। इन क्षणों में लेखिका को पितृ सत्तात्मकता की वर्चस्व वादी मानसिकता के नंगेपन को बेबाकी से उधाड़ पाने का कौशल हासिल है। उन क्षणों में भी जब अब्बास जाफ़री जेल में है और सफि़या पहले प्रसव के लिए अस्पताल में। जिस दिन उसे अस्पताल से छुट्टी मिलती है, उसी दिन सागर पेशे यानी सर्वेन्ट कार्टर में ताला डाल दिया जाता है ताकि सफि़या समझ लें कि प्रतिष्ठित परिवार की विशाल कोठी के दरवाजे उसके लिए हमेशा के लिए बन्द हो गये हैं। यहां तक कि सर्वेनट क्र्वाटर के भी। सफि़या खुले मैदान में पेड़ के साथ में अपनी पहली संतान को, जो एक बेटी है, दूध पिलाती है। यह बेटी ही ‘सितारा’ है, सितारा जो भटके हुए पथिकों का सहारा होता है जो कल मां बनेगी और अगली पीढि़यों की जन्म दात्री जो होगी। योद्धा कल के संघर्षों की-यह जानते हुए, ‘कोई लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जाती, कोई जीत भी तन्हा हासिल नहीं होती। वह युद्ध का परचम चाहे न फहराये, युद्ध होगा तो उसी की वजह से। वह लौ न सही, लेकिन वह शान्त ठहरा हुआ तेल होगी, जो ख़ामोशी से तरक़्क़ी की लो को जलाये रखेगी। उसी की वजह से लौ जिन्दा रहेगी, भभककर बुझ नहीं जायेगी। वह जो बार-बार जन्म लेगी, क्योंकि धरती की गुज़र, बगैर जगत्धात्री के नहीं हो सकती, वह हस्ती जो अंधेरे जज़्ब करके, असाधारण, सर्व शक्तिमान, सर्वव्यापी। अगर कोई खु़दा है और वही जि़म्मेदार है, क़ुदरत की मुतवातिर रफ़्तार का, तो वह ख़ुदा औरत के सिवा कौन हो सकता है।’
यह शब्द सफि़या के लिए कहे गये हांे या सितारा के लिए इससे क्या अन्तर पड़ता है। चिंतन की यह धार स्त्री मात्र के लिए है।
आलीशान सफ़दर मंजिल छोड़ते हुए सफि़या सोचती है।
‘वह पलट कर उन बेडि़यों को दोबारा तो नहीं पहन सकती, जिन्हें उसने नकार दिया था, क्या कभी वह दिन आयेगा जब शरीअत दोबारा लिखी जायेगी, कभी उसमें औरत की भी आवाज़ शामिल होगी? कब खु़दा यह फैसला करेगा कि वह पुरुषों द्वारा शोषित नहीं होना चाहता? कब किसी मज़हब में कोई औरत पैग़म्बर होगी?
यहां यह विचार करने की आवश्यता है कि स्त्री के पैग़म्बर बन जाने से अथवा स्त्री प्रभुत्व वाले किसी धर्म के आ जाने से क्या सचमुच स्त्री मुक्ति का सपना साकार हो सकेगा। सामाजिक संरचना में बुनियादी परिवर्तन तथा सम्पत्ति के स्वामित्व की वर्तमान व्यवस्था के रहते और पुरुष की मानसिकता को बदले बिना स्त्री की सामाजिक अवस्था में बड़े ही परिवर्तन संभव नहीं है? आखिर बंगाल में मां दुर्गा की, कुछ दूसरी देवियांे की आराधना भी व्यापकता में होती है। बावजूद इसके पितृ सत्ता की सघनता वहां कई अंचलों की अपेक्षा अधिक जटिल है।
स्त्री पहले पराधीन हुई या धर्म की उत्पत्ति ने उसे पराधीन किया, बहस तलब है, जिसकी यहां गुंजाइश नहीं।
शाह बानो प्रकरण को कथा तत्व बनाते हुए आखि़र लेखिका ये कह ही गयीं कि
‘शाह बानो की लड़ाई आर्थिक न्याय की लड़ाई है।’
आर्थिक न्याय की लड़ाई को संभव करने तथा मुक्ति का पूरा चांद पाने के लिए आधुनिक शिक्षा को ज़रूरी माना गया, उत्तर भारत संयुक्त प्रांत में रशीदजहां के पिता शेख़ अब्दुल्लाह अलीगढ़ की कोशिशों के बाद लखनऊ में मौलवी और जस्टिस करामत हुसैन द्वारा स्त्री शिक्षा के पक्ष मंे किए गये प्रयासों का विशिष्ट महत्व है। उपन्यास ऐसे विवरणों से सामाजिक विकास के इतिहास का गवाह भी बना है। लेडी ज़ीनत के प्रबल विरोध के बावजूद सफि़या इस कालेज में नौकरी करती है और आर्थिक आत्मनिर्भरता का संतोष पाती है। धर्म गुरू आधुनिक शिक्षा के इस अभियान के खि़लाफ़ हैं, लेकिन न तो मुज्तबा हुसैन यानी करामत हुसैन हार मानते हैं और न सफि़या। लखनऊ के बड़े आभूषण व्यवसायी झुनझुन जी के साथ समाज में शिक्षा अभियान के समर्थक बढ़ते जाते हैं।
‘तो इस तरह, दो दोस्तों, एक उस्तानी जी जो मुज्तबा साहब के रिश्ते की बहन थीं और प्राथमिक गणित और क़ुरआन पढ़ाती थी, एक अंग्रेजी और सांइस की टीचर, एक ड्राइवर,नेक इरादों और बग़ैर ताम झाम के आठ मुसलमान औरदो हिन्दू लड़कियों के साथ साजिदा हुसैन मुस्लिम गल्र्स कालेज खुला। हफ्ते में छह दिन हरे पर्दे वाली भूरी बस, रबड़ भोंपू बजाते ड्राईवर रशीद की निगहबाजी में, नौ बजे की एसेम्बली से पहले पहुंचने की होड़ में लखनऊ में से खड़खड़ाती धूल उड़ाती गुज़रती।’
कालेज और सफि़या के बीच रिश्तों को लेकर रोचक अप्रिय प्रसंग आते हैं, रूढि़वाद का विस्फोट भी। इस प्रक्रिया में आगे बढ़ने से कतराते एक समाज के कई त्रासद बिम्ब भी उभरते हैं। जिसकी चरम परिणति सफि़या को नौकरी से निकाल देने के रूप में हेाती है। इस बीच देश अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद हो चुका था। सफि़या एक जम्हूरी देश में नौकरी से निकाली गयी क्योंकि लखनऊ के शाही इमाम ने उसके पति के खि़लाफ़ सामाजिक बहिष्कार का फ़तवा जारी कर रखा था।
ग़ुलामी से आज़ादी की ओर आये देश में समाज कितना मुक्तत हो पाय था। स्त्री के बंधन तो वही थे। धर्म अब भी सामाजिक विकास के पथ की बड़ी बाधा बना हुआ था। अंग्रेज चले गये थे लेकिन पुरूष का आधिपत्य क़ायम था। नूर ज़हीर के शब्दों में कहें तो मुसलमान मर्दों के लिए संभोग अब भ्ीा सबसे सृजनात्मक काम था- सफ़दर मंजिल और मुज्तबा कालेज से निकाली गयी सफिया गोद में नवजात शिशु लिए भविष्य के निश्चय को निहार रही थी, उम्मीद की किसी किरण की तलाश में। पाली के विद्वान, यायावर, अब्बास, जाफ़री के मित्र कात्यायनजी उसे राह दिखाते हैं।
उनका पत्र लेकर वह दिल्ली गन्धर्व संस्था की मालकिन अमृता गोबिन्द राम से मिलती है। नृत्य व अभिनय कला का धंधा करने वाली इस संस्था में वह एक नये जीवन की ओर बढ़ती है पौरूषी आधिपत्य पूंजी की चमक और कलाकारों के शोषण का नया अनुभव जन्य अध्याय उसके सामने खुलता है। पुरूष आधिपत्य के अधिक भयावह तुच्छ दृश्य उसके सामने आते हैं।
सफि़या के कानों में कोई जैसे कह रहा था- ‘जिस दिन तुम स्वीाकर कर लोगी कि भाग्य, कि़स्मत जैसा कुछ नहीं है, तुम अपनी जिन्दगी बदलना शुरू करोगी’ बदलती हुई सफि़या ज़़्यादा बदल जाती है। स्त्री बाहरी दबावों से अपनी चेतना और इच्छा से बदलती है, हालात भी बदलते हैं उसे समानता सम्पूर्ण मुक्ति का शिखर उसे न तो धार्मिक क़ानूनों से मिलने वाला है, न संविधान के संरक्षण से। वह मिलेगा उसे नई सामाजिक संरचना और मुक्ति की विवेकपूर्ण वैज्ञानिक समानता से।
अतीत से जड़ चिन्तन से मुठभेड़ करता यह उपन्यास भविष्य के लिए एक सुन्दर सपना रचता है, और यह हक़ीक़त है कि दुनिया को सर्वाधिक सुन्दरता तथा सुन्दर सपने स्त्री ही ने दिए हैं।
यथार्थ कथ्य की शक्ति होती हैतो विचारधारा सज्जा तथा कल्पना सौन्दर्य। इस पूर्णता को पाते हुए रचना जहां संघर्ष से जुड़ती है, वहीं मक़ाम है अपना ख़ुदा एक औरत।

-शकील सिद्दीक़ी

mo- 09839123525

पुलिस की कहानी को संदिग्ध
उत्तर प्रदेश सरकार ने आतंकवाद के नाम पर फर्जी फंसाए गए निर्दोष लोगों के ऊपर से मुकदमा हटाने की पहल शुरू की है जिसके तहत गोरखपुर में आतंकवाद के मामले में आरोपित तारिक कासमी का वाद वापसी का आदेश दिया है और कहा है कि जिला मजिस्ट्रेट गोरखपुर न्यायलय में वाद वापसी का शपथ पत्र दाखिल करें। यह समाचार आने के बाद खुफिया एजेंसियों के इशारे पर वाद वापसी का विरोध कुछ लोगों द्वारा नियोजित तरीके से प्रारंभ कर दिया गया है। यह वह लोग हैं जो जंग ऐ आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ थे और आज अमेरिकी साम्राज्यवाद के हित पोषक हैं। जब भी जनता से जुडी हुई बात आती है तो यह लोग व्यवस्था से लाभ लेने के लिए उसकी चापलूसी में लग जाते हैं. खुफिया एजेंसियों के लोग मीडिया में अपने समर्थकों से आतंकवाद के नाम पर की गयी गिरफ्तारियों को सही साबित करने के लिए माहौल बनाने में लग गयी हैं और मीडिया के कुछ लोग बड़ी तेजी से इस मुहीम में लग गए हैं कि केस वापस न होने पाए।
गृह सचिव सर्वेश चंद मिश्र ने पत्रकारों को सरकार के इस फैसले से अवगत कराया। गृह सचिव ने बताया कि गोरखपुर के डीएम व एसएसपी से आख्या प्राप्त करने और न्याय विभाग के परामर्श से मुकदमा वापस करने का निर्णय किया गया है। अग्रिम कार्रवाई के संदर्भ में उन्होंने बताया कि सम्बंधित अदालत, डीएम व एसएसपी को इस सिलसिले में न्याय विभाग से पत्र भेजा जायेगा। मुकदमा वापसी की प्रक्रिया पर उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों पर उच्च स्तरीय समिति का फैसला होता है, जिसमे प्रमुख सचिव न्याय और प्रमुख सचिव गृह का परामर्श होता है।बाराबंकी में तारिक की गिरफ्तारी को गलत ढंग से दिखाए जाने और निमेष आयोग की रिपोर्ट के मसले पर उन्होंने स्वीकार किया कि आयोग ने एसटीएफ की कार्रवाई पर संदेह व्यक्त किया है।
अब सरकार की नियत अगर साफ़ है तोह बाराबंकी, फैजाबाद, लखनऊ में चल रहे मुकदमों को वापस ले लेगी क्यूंकि आर डी निमेष कमीशन ने तारिक व खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी को संदेहस्पद माना है और बरामदगी को भी फर्जी माना है। इस तरह से आर डी एक्स , जिलेटिन राड, डेकोनेटर आदि एस टी एफ के लोग लाये कहाँ से। वैसे उक्त कथित सामग्री किसी न्यायलय के समक्ष पेश नही की गयी है। न्यायलय को यह सूचना दी गयी है कि उक्त विस्फोटक पदार्थ निष्क्रिय करा दिए गए हैं। अब खुफिया एजेंसियों की सारी बातें गलत साबित होने पर उनकी प्रतिष्ठा फंसी हुई है कि किसी भी तरह से केस वापसी न होने पाए और अपनी हिकमतमली से न्यायलय में फर्जी मुक़दमे में सजा करा दे। अभी हाल में झारखण्ड में जीतेन्द्र मरांडी को न्यायलय द्वारा फांसी की सजा सुनाई गयी थी किन्तु उच्च नयायालय ने उनको रिहा करने का आदेश पारित कर दिया। निचली अदालतों पर खुफिया एजेंसी व जिला प्रशासन अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सजा कराने का कार्य भी करती है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Indian opposition leader Advani lays flower wreath at mausoleum of Jinnah in Karachi
पाकिस्तान में कहा जाता है कि सिन्धु नदी के स्नान से बेवफाई आ जाती है। लाल कृष्ण अडवानी जब पाकिस्तान यात्रा पर गए तो शायद सिन्धु स्नान कर लिया था, तभी उनको जिन्ना याद आने लगे थे लेकिन अब सिन्धु स्नान का असर कम हो रहा है और भारतीय राजनीति में समन्वय वादी नेता के रूप में अपनी छवि स्थापित करना चाहते हैं। बाबरी मस्जिद ध्वंस के नायक और देश में साम्प्रदायिकता की लहर चलाने वाले अडवानी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं इसी लिए नागपुर मुख्यालय की छुपी हुई रणनीति के तहत गुजरात नरसंहार के नायक नरेन्द्र मोदी का नाम प्रधानमन्त्री पद के लिए उछाला गया है जिससे एनडीए के घटक दलों को यह सन्देश जाए कि यदि नरसंहारी प्रधानमंत्री नही चाहते हो तो उनसे कम अडवानी को प्रधानमंत्री का दावेदार मान लो इसी रणनीति के तहत शिवसेना जैसी उग्र हिन्दुवात्वादी पार्टी भी नरेन्द्र मोदी का विरोध कर रही है और अंत में अडवानी को नागपुर मुख्यालय प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाना चाहता है लेकिन सबसे बड़ा खतरा यह है की अडवानी ने अगर पुन: सिन्धु स्नान कर लिया तो देश के साथ कितना वफ़ा करेंगे। इन हिंदुत्व वादियों का इतिहास रहा है मुंह में राम बगल में छुरी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

किसी की अवमानना मकसद नहीं है। अगर होती है, तो ये उसके अपने कर्म हैं, जिसका जिम्मेदार किसी और को नहीं ठहराया जा सकता। सवाल उठते हैं, तो उठाना भी जरूरी है। लगभग चार महीने पहले वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट ने ‘रूल ऑफ लॉ इंडेक्स 2012’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें 97 देशों की सूची में भारत को 78वां स्थान मिला है। जबकि हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका को हमसे बेहतर बताया गया है जबकि वहां की स्थिति को भी हम अच्छी नहीं कह सकते। रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रशासनिक एजेंसियाँ बेहतर प्रदर्शन नहीं करती और न्यायिक प्रणाली की गति अत्यधिक धीमी है। इसकी मुख्य वजह अदालत की कार्यवाही में होने वाली देरी है। हाल में आई एक रिपोर्ट में जिक्र था कि देश की अदालतों में 3 करोड़ मुकदमें 15 साल या उससे ज्यादा समय से लम्बित हैं।
संविधान बनाने वाले हमारे बुजुर्गों ने लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए संविधान में तीन स्तम्भ कायम किये जिसमें एक महत्वपूर्ण स्तम्भ ‘न्यायपालिका’ है। न्यायपालिका भारतीय लोकतंत्र का एक ऐसा स्तम्भ है, जिसकी ओर कहीं और से न्याय न मिलने पर जनता ताकती है। पुरानी कहावत है कि समय से न्याय न मिलने का मतलब न्याय देने से मुकरना है और आज देश की पूरी न्यायपालिका नीचे से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक देश की जनता को न्याय देने से मुकर रही है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दौर में शासक वर्गों को न्याय प्रणाली पर खर्च करना फिजूलखर्ची लग सकती है और अहलूवालिया एवं थरूर जैसे बददिमाग राजनीतिज्ञ न्यायपालिका को गैरजरूरी भी करार दे सकते हैं। ऐसे दौर में भारतीय न्यायपालिका की जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं और उसे प्रोएक्टिव तरीके से न्याय मुहैया कराने की ओर बढ़ना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुसलमान युवकों को बिना मुकदमा चलाये जेल में रखने का जिक्र गाहे-बेगाहे हुआ करता है और इस मामले में गठित निमेष आयोग की रिपोर्ट में वर्णित कतिपय अन्य बातों का भी जिक्र होता है। ऐसे वाकये भी हैं जिसमें एक व्यक्ति को पिछले 10 सालों से विभिन्न जिलों में एक के बाद एक मुकदमें ठोके जा रहे हैं और वे लम्बे समय से जेलों में हैं। जिन मुकदमों में फैसला हो चुका है, उसमें वे बरी कर दिये गये हैं। चूंकि प्रदेश सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है, इसलिए उसके निष्कर्षों की अधिकारिक जानकारी नहीं हो सकती परन्तु बार-बार ऐसे नौजवानों की रिहाई की मांग उठती है और सत्तासीन सपा के नेतागण उस पर वायदे करते भी दिखाई देते हैं। अगर न्यायपालिका अपने कर्तव्यों को निभा रही होती तो क्या ऐसी नौबत नहीं आती?
दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्राविधानों के अनुसार किसी भी नागरिक को गिरफ्तार करने के 24 घंटों के अन्दर पुलिस को उसे न्यायालय के सामने पेश करना होता है। न्यायिक अभिरक्षा में किसी को जेल भेजने के 90 दिनों के अन्दर अदालत में आरोप पत्र न दाखिल होने पर उस व्यक्ति को जेल में नहीं रखा जा सकता। जिला न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक/मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जेलों का मुआईना करने के लिए अधिकृत होते हैं। जेलों के मुआइनों का मतलब जेल अधीक्षक के सामने बैठ कर चाय-नाश्ता करना नहीं होता। यह देखना होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई व्यक्ति बिना आरोपपत्र के 90 दिनों से ज्यादा जेल में है अथवा कोई कैदी अपने अपराध के लिए नियत सजा से अधिक समय से बिना सजा पाये ही जेल में है। यह निरीक्षण अमूमन वार्षिक और मासिक आधार पर किये जाते हैं। इस व्यवस्था के विपरीत जब देश की विभिन्न जेलों में तमाम कैदी अनाधिकृत रूप से बन्द हों, तो इसे किसकी लापरवाही कहा जायेगा?
दिल्ली में एक बालक के साथ एक पुलिस कांस्टेबल द्वारा किये यौन अनाचार को पांच साल से अधिक हो चुके हैं। मामला अभी लम्बित है। उस बेचारे को गाहे-बगाहे बिहार से दिल्ली गवाही देने के लिए आना पड़ता है और बिना किसी कार्यवाही के वह वापस लौट जाता है। उस बालक की पीड़ा को समझने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है और कौन उसे इस पीड़ा से निजात दिला सकता है।
दिल्ली में ही एक 12 वर्ष की बालिका का पहले अपहरण और फिर उसके साथ बलात्कार होता है। उसे बेहद दर्दनाक स्थिति में पाया गया था। इस मामले को भी पांच साल हो रहे होंगे। मामला अदालत में अभी भी लम्बित है।
दिल्ली कोई अपवाद नहीं है। देश के हर कोने में इस तरह के मामले मिल जायेंगे। सत्र न्यायालयों में गवाही का काम शुरू होने पर लगातार चलता था। अब ऐसा देखा जा रहा है कि एक-एक या दो गवाहियां ही एक बार में होती हैं और फिर उसके बाद लम्बी तारीख लगा दी जाती है।
आज कल एक चुटकुला बहुत प्रचलित है। कहा जाता है कि अगर आप 40-45 साल की उम्र पार कर चुके हैं, कोई भी अपराध कीजिए, आपको इस जिन्दगी में सजा भुगतनी नहीं पड़ेगी। दस-बारह साल मुकदमा निचली अदालत में चलेगा, फिर 20 साल उच्च न्यायालय में और उसके बाद जब तक अपील की सुनवाई का वक्त सर्वोच्च न्यायालय में मुकर्रर होगा, आप गत हो चुके होंगे।
दीवानी मामलों में और श्रम मामलों में तो स्थिति और भी खराब है। अमूमन देखा जाता है कि गांवों में दबंग लोग गरीबों की परिसम्पत्तियों पर लाठी-गोली के बल पर कब्जा कर लेते हैं। पहली बात, अगर आप गरीब हैं तो मुकदमा का खर्च बर्दाश्त कर मुकदमा लड़ नहीं सकते और किसी तरह आपने अगर ऐसी जहमत उठा भी ली तो कई पीढ़ियां पार हो चुकी होंगी। श्रम कानूनों का उल्लंघन आम हो चुका है और न्यायालयों में बढ़ते मामलों की सुनवाई नहीं हो रही है। सरकार को तो निवेशकों की चिन्ता है, वह कोई कार्यवाही क्यों करेगी?
न्यायपालिका के लोग दलील दे सकते हैं कि मुकदमें बढ़ते जा रहे हैं, न्यायधीशों की संख्या बहुत कम है। संसाधन नहीं हैं। सरकार न्यायिक सुधार करना नहीं चाहती। आदि-आदि। यह बात भी ठीक है, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दौर में सरकार का यह रवैया हो सकता है लेकिन भारतीय संविधान न्यायपालिका को ऐसी मुरव्वत नहीं देता। याद आता है न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर, चंद्राचूड और पी.एन. भगवती का कार्यकाल जब सर्वोच्च न्यायालय में वकीलों को मोटी फीस न दे सकने वाले भी एक पोस्ट कार्ड लिख कर न्याय पा जाते थे। मिनटों में बड़े से बड़े मुद्दों पर खुली अदालत में निर्णय हो जाता था।
उदाहरण के तौर पर गाजीपुर जिला सहकारी बैंक ने सन 1957 में एक ड्राईवर रामेश्वर राय को बर्खास्त कर दिया था, वह श्रम न्यायालय से जीत गया तो बैंक ने उच्च न्यायालय में और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में अपीलें कीं। बैंक की आखिरी अपील 1962 में सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दी थी। 1962 से 1984 तक रामेश्वर राय बहाली और तनख्वाह के लिए दर-दर की ठोकरें खाता रहा। फिर आया वह वक्त जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, श्रम सचिव, श्रमायुक्त तथा वाराणसी के सहायक श्रमायुक्त तथा गाजीपुर के जिलाधिकारी को सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे निर्देश जारी किये थे कि आदेश के 30 दिनों के अन्दर रामेश्वर राय न केवल बहाल हो गया था बल्कि उसे अपने पूरी पिछली मजदूरी का भी भुगतान मिल गया था।
यह उल्लेख जरूरी होगा कि अगर रामेश्वर राय सर्वोच्च न्यायालय में उस वक्त एक याचिका दाखिल भी करना चाहता तो उसे मिलने वाला पूरा एरियर पहले कहीं से कर्ज लेकर एडवोकेट को देना होता। फैसला जब आता तो मय ब्याज के इस पैसे को वह साहूकार को अदा नहीं कर सकता था। 27 साल की बेरोजगारी का दंश बहुत कष्टकर होता है। वह अपने परिवार के साथ दाने-दाने को मोहताज़ था। जब वह बहाल हुआ था, उसे सेवानिवृत्त होने में कुछ ही समय बचा था। आज का जमाना होता तो वह बिना न्याय पाये मर ही जाता।
विशेष परिस्थितियों में न्यायपालिका को कानून बनाने का भी अधिकार प्राप्त है और इस अधिकार का प्रयोग भारतीय न्यायपालिका ने किया भी है।
मी लार्ड! आप समर्थ हैं, लेकिन करेंगे तो तब जब करना चाहेंगे और आपके चाहने की प्रतीक्षा हिन्दुस्तान के तमाम दबे-कुचले पीड़ित नागरिक कर रहे हैं। उन्हें त्वरित न्याय चाहिए, जिसे आप उपलब्ध करा सकते हैं। कह नहीं सकते कि यह प्रतीक्षा कितनी लम्बी होगी…….
- प्रदीप तिवारी

मोहल्ले के दादा को जब दादागिरी मिली तो उसने अपनी धौंस ज़माने के लिये बहुत छोटे से व्यक्ति से लड़ गया और 25 साल तक लड़ता रहा। दादा के घर में जब लाशें जाने लगीं तब रोना पीटना मच गया और कुछ समय के लिये वह चुप हो गया। फिर उसने ताकत बटोरी और तमाम सारे लोगों के घर लोगों को मार – मार कर कब्ज़ा कर लिये और फिर वह अपने को शेरे बब्बर समझने लगा। उसकी समझ में आ गया कि मोहल्ले में उसके बगैर पत्ता नहीं हिलना चाहिये लेकिन फिर भी उस दादा के दूसरे प्रतिद्वंदी ने चुनौती दे दी। आजा तेरी दादागिरी भुला देंगे, तेरी टाँग तोड़ देंगे, मेरे बाप दादाओं ने तुमको हमेशा ठीक किया था और जब-जब ठीक किया तो तुम कई कई साल तक मोहल्ले में मुँह दिखने के काबिल नहीं रहे।

उसी तरीके से इस दुनिया में अमेरिका जब विएतनाम से लड़ा तो 25 साल तक लड़ने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादी अपनी पूँछ दबा कर मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहे थे किन्तु इराक युद्ध के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद ने कई देशों की सम्प्रभुता का हरण कर दुनिया के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। दुनिया के इस दरोगा के पीछे संयुक्त राष्ट्र संघ, यूरोपीय यूनियन तथा कई अन्य देश विभिन्न देशों की प्राकृतिक सम्पदा को लूटने के लिये लामबन्द हो गये।

रणधीर सिंह सुमन, लेखक जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता, अधिवक्ता और हस्तक्षेप.कॉम के सह सम्पादक हैं

संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका यह हो गयी है कि जो देश अमेरिकी साम्राज्यवाद के दिशा निर्देशों को न माने उसके ऊपर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा कर उसकी ताकत को समाप्त करना और आर्थिक ताकत की कमी आते ही अमेरिकी साम्राज्यवादी मुल्क बाज की तरीके से उसको झपट लेते थे किन्तु उत्तरी कोरिया ने इस दुनिया के दादा को चुनौती देकर कहा है कि आ निपट ले तुझे छठी का दूध याद दिला दिया जायेगा। किम जोंग उन ने चुनौती देकर कहा कि है अमेरिकी साम्राज्यवादी तू मुझसे क्या लड़ेगा तेरे बाप दादाओं का पानी का जहाज जब हमने छीना था वह आज तक ले नहीं पाया।

बात सन 1968 की है। दुनिया में महाशक्ति होने का दंभ भरने वाले अमेरिका के लिये यह साल बहुत फजीहत भरा था। उत्तर कोरिया ने इसी साल अमेरिकी नौसेना के पोत को अपने कब्जे में ले लिया था। यही नहीं, जहाज में मौजूद सभी सैनिकों को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। बाद में इन अमेरिकी सैनिकों को रिहा कर दिया गया, लेकिन अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस पब्लो को उत्तर कोरिया ने कभी अमेरिका के हवाले नहीं किया। आज भी उत्तर कोरिया में यहां जहाज खडा है।

1968 में अमेरिकी जहाज को अपने कब्जे में ले दुनिया भर में सनसनी मचा चुका उत्तर कोरिया एक बार फिर हरकत में आया। इस बार उत्तर कोरिया ने एक कदम आगे बढ़ते हुए एक अमेरिकी टोही विमान को मार गिराया। नतीजा यह हुआ कि इस घटना में कुल 31 अमेरिकी मारे गए।

ऐसा नहीं है कि उत्तर कोरिया सिर्फ अमेरिका से वैर पाल कर बैठा है, बल्कि उसके निशाने पर उसके सहयोगी भी हमेशा रहते हैं। इसका सबसे बड़ा सुबूत देखने को मिला था सन् 1998 में जब ऐसी ही तनातनी के दौर में उत्तर कोरिया ने दो मिसाइलें दाग दीं। ये जापान का आसमान चीरते हुए निकली और जापानी सरकार की नींद उड़ गई। उत्तर कोरिया की इस हरकत की अंतरराष्ट्रीय मंच पर खूब आलोचना भी हुई, लेकिन इससे उसे कोई फर्क नहीं पडा।

वर्तमान में उत्तरी कोरिया ने सभी देशों से कहा है कि वह अपने दूतावास 10 अप्रैल तक खाली कर दें अन्यथा उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उत्तरी कोरिया की नहीं होगी। इस घटना के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद की स्थिति मोहल्ले के उसी दादा के तरीके से हो गयी है कि वह मोहल्ले के चौराहे पर अपनी शर्ट के बटन खोल कर खड़ा नहीं हो सकता है और मोहल्ले के दादा के चमचे मर्सिया पढ़ने लगे हैं। परमाणु युद्ध हो जायेगा, मानवता नष्ट हो जायेगी, लाखो लोग मारे जायेंगे, शांति के गीत गाये जाने चाहिये लेकिन जब दादा मोहल्ले में लोगों के घरों में घुसकर कत्लेआम कर रहा होता है या लूटपाट कर रहा होता है तब उसके चमचे उसके शौर्य गाथा और चरण वंदना में लग जाते हैं और कोई भी पिटने वालों को बचाने के लिये आगे नहीं आता है तब न्याय, समानता, लोकतन्त्र, विश्व बंधुत्व किताबी हो जाता है।

आज जरूरत है कि साम्राज्यवाद का नाश हो और इसके लिये दुनिया की इंसानी ताकतों को हर कुर्बानी देने के लिये तैयार रहना चाहिये। उत्तरी कोरिया के ललकारने से दुनिया का जन गण प्रसन्न है। विशेषकर मेहनत कश अवाम।
-रणधीर सिंह सुमन

उत्तर प्रदेश की राजनीतिक भूमि पर कब्जे करने और उसे बचाने लेकर मुलायम सिंह यादव व उनके अनुयायियों द्वारा बेनी प्रसाद वर्मा के बीच वाक् युद्ध जारी है इस वाक् युद्ध में मुलायम खेमा कमजोर पड़ रहा है इसलिए वह भद्दी-भद्दी गालियों का प्रयोग करने पर उतर आया है। स्तर यह हो गया है कि एक मुलायम अनुयायी ने बेनी प्रसाद को तस्कर कहा व राकेश वर्मा के हारने की बात को कहा जा रहा है। जबकि बेनी ने कहा कि डिम्पल भी तो हार गयी थी वहीँ आज बेनी की बातों की गवाही में आज केन्द्रीय मंत्री अजित सिंह भी उतर आये हैं और उन्होंने मुलायम सिंह के ऊपर कई आरोप लगा दिए हैं।
मुलायम सिंह ने कांग्रेस को धोखे बाज व मक्कार कहा है जबकि मुलायम सिंह यादव लोगों को धोखा देने का कार्य किया है। वी पी सिंह, ममता बनर्जी को तो इन्होने धोखा दिया ही था और जिस कम्युनिस्ट पार्टी ने क्रांतिकारी मोर्चा बनाकर मुलायम सिंह यादव को प्रदेश स्तर का नेता बनाया था उसी पार्टी को धोखा देते हुए उसका विलय कुछ नेताओं को खरीद फरोख्त कर समाजवादी पार्टी में किया था। आज जब बेनी प्रसाद उनकी पोल खोलने पर तुल गए हैं तो तस्कर हैं बेहूदा हैं, मानसिक संतुलन खो बैठना जैसे अल्फाजों को बयान का हिस्सा समाजवादी पार्टी बना रही है

सपा नेताओं के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से नजदीकी रिश्ते हैं। इस बार उन्होंने कांग्रेस के रणनीतिकारों को भी नहीं बख्शा और कहा कि वर्ष 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में यदि अल्पसंख्यकों का आरक्षण तथा बाटला हाउस कांड की जांच पुन: खोल दी गई होती तो नतीजे कुछ और होते।
“मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों के साथ धोखा किया है और उनका असली चेहरा उजागर किए बिना मैं चुप बैठने वाला नहीं हूं, चाहे मुझे इसकी कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।”

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यदि कांग्रेस मुसलमानों को 4.5 फीसदी आरक्षण तथा बाटला हाउस कांड के मुद्दे से पीछे नहीं हटी होती तो परिणाम कुछ और होते। वर्मा ने यह भी कहा कि यदि इस बार भी कांग्रेस ने वही गलती की तो फिर उसे नुकसान उठाना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि मुलायम उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को हमेशा नीचे रखना चाहते हैं और इसीलिए उन्होंने पर्दे के पीछे भाजपा के साथ ‘डील’ कर रखी है। वर्मा ने कहा कि वर्ष 2003 में 135 विधायकों के साथ मुलायम प्रदेश में सिर्फ इसीलिए सरकार बना सके क्योंकि उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आशीर्वाद प्राप्त था। इसी तरह वर्ष 1990 में मुख्यमंत्री रहते मुलायम ने विहिप नेता अशोक सिंघल को इसलिए अयोध्या जाने दिया ताकि सांप्रदायिक उन्माद भड़के और इसका फायदा उन्हें मिलता।
बेनी ने कहा कि मुलायम ने गुजरात में इसीलिए प्रत्याशी उतारे, ताकि मुस्लिम मतों का विभाजन हो सके और नरेंद्र मोदी फिर मुख्यमंत्री बन सकें। मयावती की पार्टी के बावत पूछे जाने पर वर्मा ने कहा कि वह बसपा में नहीं जा रहे हैं, क्योंकि यदि वहां जाएंगे तो घुटकर मर जाएंगे।

‘मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा। माफी मांगने का सवाल ही नहीं। बाबरी मस्जिद गिराना आतंकवाद था, उसके दोषी कल्याण से मुलायम ने हाथ मिलाया। मेरे इस्तीफे की मांग करने वाले वह कौन हैं?’
-बेनी प्रसाद वर्मा, केंद्रीय इस्पात मंत्री
एसपी के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा कि बेनी प्रसाद वर्मा हद दर्जे तक बड़बोले हो गए हैं। वह इस तरह के बयान दे रहे हैं, जिसका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। उन्होंने कहा कि बेनी के बेटे राकेश वर्मा पिछले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए थे और उससे पहले हुए चुनाव में खुद बेनी की भी यही दुर्गति हुई थी।

बेनी को मुलायम के अहसानों को भूल जाने वाला अहसान फरामोश व्यक्ति बताते हुए चौधरी ने कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव में जनता उन्हें पूछेगी भी नहीं और उनके बेबुनियाद बयानों का खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा।
एसपी के राष्ट्रीय महासचिव राम आसरे कुशवाहा ने आरोप लगाया कि केंद्रीय इस्पात मंत्री का मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है और उन्हें इलाज की सख्त जरूरत है। वर्मा की केंद्रीय मंत्रिमंडल से बर्खास्तगी की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया और अन्य लोगों को वर्मा के बयानों का संज्ञान नहीं लेना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे व्यक्ति को केंद्र में मंत्री बनाया गया है।

बेनी प्रसाद वर्मा ने कहा कि समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव शुरू से ही अल्पसंख्यकों के साथ धोखाधड़ी करते रहे हैं। उन्होंने बीजेपी के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी की तारीफ यूं ही नहीं की है। बल्कि 2003 में प्रदेश में बीजेपी की इनायत से एसपी की सरकार प्रदेश में बनी थी। वर्मा ने अपने आवास पर बातचीत करते हुए कहा कि बाबरी मस्जिद को बचाने के नाम पर भी एसपी मुखिया ने अल्पसंख्यकों के साथ छल किया था।
उन्होंने कहा वर्ष 1990 में 29 अक्टूबर की रात को मुलायम सिंह यादव ने टेलीफोन कर मुझसे एक तरफ तो यह कहा था कि यह सुनिश्चित करो कि अयोध्या में कारसेवक न पहुंच पाएं, वहीं दूसरी तरफ विश्व हिन्दू परिषद नेता अशोक सिघंल को अयोध्या भिजवा दिया।

वर्मा ने कहा जब मैंने सिंघल के अयोध्या पहुंचने के बारे में यादव से पूछा तो उन्होंने बताया था कि अगर सिंघल नहीं पहुंचते तो गर्मी नहीं आती और यह भी साफ किया कि तत्कालीन एडीजी राम आसरे ने भी इस बात की मुझसे पुष्टि की थी। वर्मा ने परोक्ष रूप से यह भी आरोप लगाया कि मुलायम सिंह यादव और बीजेपी के रिश्ते हमेशा अच्छे रहे हैं यह बात दीगर है कि वह बाहर से एक-दूसरे की आलोचना करते हैं।

केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री अजित सिंह ने कहा कि मुलायम को बोलने से पहले सोच लेना चाहिए कि वह क्या बोल रहे हैं, क्योंकि वह सुबह कुछ बोलते हैं और शाम को कुछ और। अजित पर जवाबी हमला करते हुए समाजवादी पार्टी के महासचिव राम आसरे कुशवाहा ने बेनी प्रसाद वर्मा के साथ-साथ उन्हें भी गद्दार करार दे दिया है।अजित सिंह ने मेरठ में कहा, ‘मुलायम सिंह बार-बार कांग्रेस और केंद्र सरकार पर अशोभनीय टिप्पणी करके मास्टर जी से छात्र बन रहे हैं। उन्हें चाहिए कि वह राजनीति प्रजातंत्र के हित में करें, स्वार्थ की राजनीति से वशीभूत होकर बयानबाजी न करें।’

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प्रदेश सरकार थ्री सी यानी कैश, क्राइम व कास्टिज्म को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से कहा कि यदि वह एक रात बागपत या मेरठ के किसी गांव में बिताएं तो विकास कार्य की पोल खुल जाएगी। प्रदेश में तबादला उद्योग चल रहा है।

बेनी ने कहा था, ‘कांग्रेस तुमको नहीं पूछने वाली है। समर्थन दे रहे हो इसलिए पैसा लेते रहो। खूब कमिशन खाओ…परिवार में लुटाओ। विदेश में जमा करो। बेनी प्रसाद वर्मा यह नहीं करेंगे। अपराध और बेईमानी तो तुम्हारा पेशा है। सबसे बड़ा अभिशाप है इस प्रदेश के लिए मुलायम सिंह यादव। मायावती भी लुटेरी थीं लेकिन ये लुटेरा और गुंडा दोनों है। कैसे बचाओगे अपने प्रदेश को। आतंकवादियों से इसके रिश्ते हैं। बेनी प्रसाद वर्मा को मरवा डालोगे तो सौ बेनी प्रसाद पैदा होंगे। अभी तुम्हारा आखिरी कार्यकाल है। तुम क्या डराना चाहते हो। कांग्रेस से हम नहीं डरे, तो तुम तो अभी चुहिया हो।’

पूंजीवादी राजनीति में जनता का ध्यान हटाने के लिए इस तरह के हथकंडे चुनाव से पूर्व प्रारंभ किये जाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक चैनल से लेकर प्रिंट मीडिया तक इन्ही बातों को उछाल-उछाल कर जनता का ध्यान महंगाई, बेरोजगारी, उत्पीडन, कानून व्यवस्था से हटाने का करता है। इस तरह इन सब के पाप चुनाव की गंगोत्री में धुल जाते हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

संघ और भा0ज0पा0 ने षिंदे के इस वक्तव्य पर अपनी राजनैतिक बिसात बिछाना शुरू कर दिया। बहुत साफ तरीके से इसे हिन्दुओं का अपमान बता कर भावनात्मक शोषण और नफरत की राजनीति का शंखनाद हो गया। हालाँकि अगर उन्होंने स्वंय आतंकवाद को धर्म से जोड़कर मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करने और उससे राजनैतिक लाभ उठाने की परम्परा कायम न की होती तो शायद आतंक के इस चेहरे के सामने आने के बाद भी इसे मात्र आतंकवाद ही कहा जाता। देष का सामाजिक ढाँचा भी और मजबूत होता और आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई भी। भा0ज0पा0 ने इतने ही पर बस नहीं किया उसने षिंदे के वक्तव्य पर हाफिज सईद की प्रतिक्रिया का भी भरपूर इस्तेमाल करने की कोषिष की। देष की अखंडता से जुड़े इस गम्भीर मुद्दे पर अपनी सांगठनिक वफादारी को कुर्बान कर देने के बजाए हाफिज सईद की बकवास के नाम पर आतंकवाद के इस दूसरे चेहरे को फिर से नकारने के प्रयास में लग गए। प्रचारित यह किया जाने लगा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का केस कमजोर हो गया। वास्तविक्ता तो यह है कि समझौता एक्सप्रेस धमाके के बाद लष्कर-ए-तैयबा और सिमी पर आरोप लगा कर इनकी संलिप्तता के जो सुबूत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को दिए गए थे वह झूठे और गढ़े हुए थे। बाद की तफतीष के नतीजे में होने वाली गिरफ्तारियों से उन प्रमाणों का दूर का भी कोई सम्बन्ध साबित न होने की वजह से हमारी विष्वसनीयता को गहरा आघात लगा था। परन्तु भा0ज0पा0 को इससे कोई आघात नहीं पहुँचा। उसने यह सवाल उस समय नहीं उठाया कि इससे आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई को नुकसान पहुँचा है। समझौता विस्फोट के मामले में पाकिस्तानी अधिकारियों की टिप्पणियों पर भी उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। इस बार भी संघ या भा0ज0पा0 को आतंकवाद के खिलाफ देष के अभियान के कमजोर पड़ने की चिन्ता नहीं है। दरअसल बौखलाहट उस हकीकत से है जिसका उल्लेख षिंदे ने पहली बार नाम लेकर कर दिया।
सवाल यह भी उठाया गया कि षिंदे ने यह बात 2014 के आम चुनाव के मद्दे नजर अल्पसंखयकों को लुभाने के लिए कही है परन्तु इससे सच्चाई तो नहीं बदल सकती। षिंदे के बयान और कांग्रेस सरकारों की आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों के साथ होने वाली ज्यादतियों के प्रति संवेदनहीन रवैयों को देखते हुए वक्तव्य के समय और कांग्रेस के दोगलेपन की आलोचना की जानी चाहिए। परन्तु इस बहाने से तथ्यों पर परदा डालने की कोई भी कोषिष निंदनीय है। सवाल यह भी है कि कांग्रेस सरकार के गृहमंत्री को अगर यह पता था कि धमाके करवा कर मुसलमानों को फँसाने का खेल खेला गया है तो उन्हें यह भी बताना चाहिए था कि उनकी सरकार ने इस सिलसिले में कौन से कदम उठाए हैं? आतंकवाद के आरोप में गिरफतार आरोपियों में कांग्रेस शासित प्रदेषों में धर्म के आधार पर भेदभाव क्यों हो रहा है? जिन स्थानों पर तफतीष से यह साबित हो चुका है कि धमाकों में उन बेकसूरों का हाथ नहीं था जिन्हें पहले गिरफ्तार किया गया था तो अब तक उनके ऊपर से मुकदमें उठा कर उनके पुनर्वास के लिए कुछ क्यों नहीं किया गया? महाराष्ट्र और केन्द्र में सरकार में होने के बावजूद नान्देड़, परभनी, जालना और पूरना के धमाकों की जाँच करवा कर इंसाफ क्यों नहीं किया गया? मामला इंसाफ करने और दोषियों पर षिकंजा कसने का नहीं है। बात वोट बैंक की है। सपा ने बेकसूर मुस्लिम नौजवानों को रिहा करने का वादा करके मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ लाने में सफलता पाई थी। कवायद बस इतनी है कि अखिलेष सरकार के वादा नहीं पूरा करने पर नाराज मुस्लिम मतदाता को अपनी ओर आकर्षित किया जाए। भा0ज0पा0 भी अपने उसी एजेन्डे पर है। आतंकवाद, मुसलमान, हाफिज सईद, पाकिस्तान किसी भी बहाने से ध्रुवीकरण हो और उसका लाभ उसे मिले, देष और समाज का उससे अहित होता है तो होता रहे।
षिंदे के वक्तव्य और संघ व भा0ज0पा0 की प्रतिक्रिया ने जो बहस छेड़ी है राष्ट्रीय स्तर पर इसकी आवष्यकता थी। इससे देष की सुरक्षा से जुड़े इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर जनता में सकारात्मक समझ विकसित होने का अवसर मिलेगा।
-मसीहुद्दीन संजरी

मोबाइल: 9455571488

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