जेड0 ए0 अहमद, नेहरू और ए0आई0सी0सी0 जैसा कि हमने देखा 1936 का वर्ष काफी महत्व का साबित हुआ। उसी वर्ष कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में बड़े पैमाने पर हुआ। सज्जाद जहीर ने जेड0 ए0 अहमद को लखनऊ जल्द से जल्द पहुँचने का आदेश देते हुए पत्र लिखा। अहमद तुरन्त चल पड़े। लखनऊ पहुँचकर वे कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू की तकरीर कुछ सुन पाए। नेहरू वैज्ञानिक समाजवाद की बात कर रहे थे।तैयार थे। अहमद ने मीटिंग के बाद सिंध जाकर अपनी कालेज की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और वापस इलाहाबाद लौट आए। सज्जाद जहीर ने उन्हें पं0 नेहरू से मिलने की सलाह दी। फिर वे लखनऊ जाकर जोशी से मिले। जोशी ने उन्हें पार्टी का सदस्य बनने के लिए कहा।
डाॅ0 अशरफ पहले ही कांग्रेस में शामिल हो चुके थे। उन्होंने अहमद को नेहरू से मिलवा दिया। नेहरू ने काफी बातचीत की और उनका काम कांग्रेस दफ्तर में तय कर दिया और साथ ही उनका माहवार भी। माक्र्सवाद, पार्टियों और विचार धाराओं के बारे में खुलकर बातें र्हुइं। अहमद को इलाहाबाद का ए0आई0सी0सी0 का दफ्तर सँभालना
था।
कुछ ही दिनों बाद पंडित नेहरू ने ए0आई0सी0सी0 दफ़्तर में एक मीटिंग बुलाई, उस मीटिंग में डाॅ0 लोहिया, डाॅ0 अशरफ, आचार्य कृपलानी और नेहरू के अलावा कुछ अन्य मौजूद थे। यह बैठक केन्द्र को मजबूत करने सम्बंधी सुझाव माँगने के लिए बुलाई गई थी। साथ ही कामों का बँटवारा भी किया गया। इसमें आखिरकार तय किया गया कि दैनिक राजनैतिक मार्ग दर्शन का काम डाॅ0 अशरफ के जिम्मे, डाॅ0 लोहिया को अन्तर्राष्ट्रीय विभाग मिला। उन्होंने ही विश्व साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष और उसके महत्व का उल्लेख किया था। डाॅ0 जेड0ए0 अहमद को आर्थिक विभाग दिया गया। जेड0ए0 अहमद ने कहा था कि वे एक अर्थशास्त्री हैं, और इसलिए जनता के बीच साम्राज्यवाद द्वारा आर्थिक शोषण का पर्दाफाश करने का महत्व वे समझते हैं। यह सब कुछ निश्चित हो जाने के बाद ए0आई0सी0सी0 दफ्तर का काम सुचारु और नियमित रूप से चालू हो गया। नेहरू ठीक नौ बजे सुबह हाजिर हो जाते थे और विभिन्न विभागों का काम देखते, आगे के कार्यक्रम तय होते। इस प्रकार ए0आई0सी0सी0 के केन्द्रीय काम में कम्युनिस्टों की बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका रही और जाहिर है इसमें यू0पी0 के कम्युनिस्ट आगे रहे।
डाॅ0 अशरफ ने मुस्लिम जनता को अपने साथ लाना शुरू किया। डाॅ0 जेड0ए0 अहमद ने कुछ ही समय में अर्थात 3-4 महीनों में ही आर्थिक परिस्थितियों पर कई पुस्तकें लिख डालीं। भारत की कृषि समस्याओं पर इनमें इस तरह लिखा गया था कि आसानी से समझ में आ सके। ये पुस्तकें हज़ारों की संख्या में बिकीं। इनमें एक किताब थी जो विशेष तौर पर प्रसिद्ध हुई, वह पुस्तक थी ‘‘अग्रेरियन प्राॅब्लम इन इन्डिया’’ अर्थात भारत में कृषि समस्या, यह पुस्तक भी खूब बिकी। नेहरू ने इतना पसन्द किया कि वे कांग्रेस की एक सभा में अहमद का हाथ पकड़ कर गांधी के पास ले गए, उनका परिचय कराते हुए कहा कि यह वही नौजवान है जिसने अंग्रेरियन प्राॅब्लम लिखी है। गांधी तुरन्त उठे और अहमद को गले लगा लिया। फिर कहा कि मुझे खुशी है कि तुम्हारे नौजवान को पंडित ने कांग्रेस आफिस में काम की जिम्मेदारी दी है। आचार्य कृपलानी को यह सब पसन्द नहीं आ रहा था, वे दक्षिणपंथ की ओर झुकाव रखते थे, उन्होंने नेहरू, गांधी जी, पटेल इत्यादि से शिकायतें कीं। फलस्वरूप, एआईआईसी केन्द्र में काम में कुछ उलटफेर करना पड़ा। इसके अलावा, कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी और दूसरों गुटों के बीच तनाव भी चल रहा था। इन सभी ने अपने-अपने त्याग पत्र दे दिए और फिर नेहरू से भविष्य के बारे में सलाह की। जेड.ए. अहमद को नेहरू ने लखनऊ जाकर कांग्रेस राज्य कमेटी के पुनर्गठन का काम दिया। लेकिन अहमद इलाहाबाद में ही रहे, क्योंकि वे तुरन्त नहीं जा सकते थे। वहाँ उन्होंने विभिन्न प्रकार के प्रेस मजदूर यूनियनों के निर्माण में मददकी। इन सारी गतिविधियों से इलाहाबाद में आगे चलकर पार्टी बनाने में सहायता मिली। इस प्रकार यदि देखा जाय तो जहाँ 1936 में यू0पी0 (उस वक्त संयुक्त प्रांत या यूनाइटेड प्राविन्सेज) में कुछ थोड़े से लोग पार्टी के साथ थे। वहाँ 1940 आते-आते पार्टी जनाधार काफी बढ़ा और विस्तृत हो गया था। उस समय तक आर0डी0 भारद्वाज, जेड0ए0 अहमद, रमेश सिन्हा, पी0सी0 जोशी, एस0एस0 यूसुफ, अजय घोष और अन्य कई कम्युनिस्ट नेता, यू0पी0 में उभर चुके थे। जिनका न सिर्फ पार्टी के दायरे मंे बल्कि उस के बाहर काफी व्यापक क्षेत्र में प्रभाव था। साथ ही साथ वे राष्ट्रीय आजादी के आन्दोलन के भी महत्वपूर्ण नेताओं में गिने जाने लगे थे, उनमें से कई कांग्रेस मंे भी काम कर रहे थे जिससे कांग्रेस के अंदर वामपंथी शक्तियाँ मजबूत हो रही थीं।
रमेश सिन्हा एक शिक्षित परिवार मंे जन्मे थे। रमेश सिन्हा और हर्षदेव मालवीय एक ही क्लास में पढ़ते थे। उन दोनों ने आगे चलकर कम्युनिस्ट वामपंथी और राष्ट्रीय आन्दोलन के निर्माण में बड़ा योगदान दिया। इन साथियों ने इलाहाबाद में छात्रों के बीच कम्युनिस्ट गु्रप बनाने का काम किया।
फिरोजाबाद में चूड़ी मजदूरों, आगरा मंे जूते बनाने वाले मजदूरों, अशफाक तथा अन्य कामरेडों की देखरेख में हरिजन और मुस्लिम लोगों में, हाफिज अहमद के नेतृत्व में रेलवे वर्कर के बीच, कानपुर मंे व्यापक तौर पर मजदूरों के बीच, खासकर पूर्वी यू0पी0 में और अन्य हिस्सों में किसानों में पार्टी और विभिन्न जन संगठनों का काम सक्रियता से छा पड़ा। आगे चलकर पार्टी के झारखंडे राय, सरजू पाण्डेय, जय बहादुर सिंह और अन्य कई नेता उभरे, जिनकी लिस्ट काफी लम्बी है। यू0पी0 भूमि कम्युनिस्टों के लिए काफी उर्वरा साबित हुई।
पीसी जोशी 1929 में मेरठ मुकदमे में गिरफ्तार हो गए। जोशी 1928 में यू0पी0 यंग कामरेड्स लीग के सचिव थे और साथ ही यू0पी0 में उभरते कम्युनिस्ट संगठन के भी सचिव थे। हालाँकि अभी यू0पी0 में औपचारिक तरीके से पार्टी नहीं बन पाई थी। पी0सी0 जोशी उस समय इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र थे, उनकी गिरफ्तारी के विरोध में यूनिवर्सिटी के छात्रों ने हड़ताल कर दी। छात्रों के कमरों की तलाशी ली गई, ताकि कम्युनिस्ट साहित्य मिल सके। इस दौरान गिरफ्तारी के खिलाफ छात्रों ने जुलूस भी निकाला। बाद में 500 से भी अधिक छात्रों ने यूथ लीग की सदस्यता ग्रहण कर ली।
नेहरू ने, पूछे जाने पर कम्युनिज्म के सिद्धांतों का समर्थन करते हुए कहा कि इसे समझने की जरूरत है और इसकी अच्छाइयों को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है।
जोशी की गिरफ्तारी के बाद नेहरू वाई0एल0 का दिशा निर्देशन करते रहे। 13 अप्रैल 1929 को इलाहाबाद में वाई0एल0 की एक मीटिंग हुई। 24 फरवरी को नेहरू ने लखनऊ में तिरंगा झण्डा इसी मीटिंग में फहराया। 13 अप्रैल 1929 को नेहरू ने वाई0एल0 की एक दिलचस्प मीटिंग इलाहाबाद में आयोजित की, इसमें छुट्टियों के दिनों में छात्रों के कार्यक्रम तय किए गए, इनमें सबसे महत्वपूर्ण था पी0सी0 जोशी का मेरठ षड्यंत्र मुकदमा लड़ने के लिए पैसे इकट्ठा करना।
इससे पता चलता है कि मेरठ मुकदमे के खिलाफ गोरखपुर तथा कुछ अन्य जगहों में भी वाई0एल0 काम कर रहे थे। 18-19 अगस्त 1929 को एक प्रांत-व्यापी छात्र नौजवान सम्मेलन वाई0एल0 के नेतृत्व में करने का निश्चय किया गया।
1936 में लखनऊ में ए0आई0एस0एफ0, अखिल भारतीय किसान सभा और और प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। स्थापना संबंधी इनमें से प्रत्येक का इतिहास अत्यंत ही रोचक और शिक्षा-प्रद है, लेकिन स्थान की कमी के कारण हम विस्तार में न जाकर केवल कुछ ही घटनाओं का जिक्र करेंगे।
ए0आई0एस0एफ0 बनाने से पहले अंग्रेज शासक भाँप गये थे कि एक मजबूत छात्र संगठन बनने वाला है, इसलिए उन्होंने स्वयं ही एक अखिल भारतीय छात्र संगठन बनाने की पहल की। उस समय यू0पी0 (यूनाइटेड प्राविन्सेज आॅफ आगरा एण्ड अवध) के गवर्नर सर मैल्कम हैली थे। उन्होंने यू0पी0 के वाइस चांसलरों और दूसरे अधिकारियों को सम्मेलन बुलाने का आदेश दिया, उनकी योजना थी कि आगे चलकर इस संगठन
की ओर से एक अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाया जा सके। इस संगठन का नाम था यू0पी0 यूनिवर्सिटी स्टुडेंट फेडरेशन। यह अंग्रेज समर्थित आधिकारिक छात्र संगठन था। इसकी एक बैठक 1936 के आरम्भ में बुलाई गई। राष्ट्रवादी, कम्युनिस्ट,
सोसलिस्ट और अन्य छात्रों ने इसमें भाग लेने का फैसला किया। अधिकारियों की ओर से राजा जार्ज पंचम की मृत्यु पर एक शोक प्रस्ताव लाया गया। राष्ट्रवादी छात्रों ने ब्रिटिश कम्युनिस्ट नेता शापुरजी सकलतवाला की मृत्यु पर भी एक शोक प्रस्ताव पेश किया। बस फिर क्या था, हंगामा मच गया, अंग्रेजों के पिट्ठू यह प्रस्ताव पास नहीं होने देना चाहते थे।
राष्ट्रवादी छात्रों ने मंच पर कब्जा कर लिया। शापुरजी की मृत्यु पर प्रस्ताव लाने वालों में शफीक नकवी जो बाद में यू0पी0 पार्टी के नेता बने और ए0आई0एस0एफ0 के संगठनकर्ता थे, अंसार हरवानी, अहमद जमाल किदवई, जगदीश रस्तोगी इत्यादि थे। कई छात्रों को रेस्टीकेट कर दिया गया। वाइस चांसलर तथा अन्य अधिकारियों
ने धमकियाँ दीं, लेकिन वे सफल नहीं हुए।
कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी छात्रों ने जवाब में एक अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन बुलाने की तैयारियाँ शुरू कर दीं। इस प्रकार ए0आई0एस0एफ0 के प्रसिद्ध लखनऊ सम्मेलन की नींव डाली गई। आगे चलकर सी0पी0आई0, सी0एस0पी0, कांग्रेस और अन्य संगठनों तथा व्यक्तियों की पहल कर ए0आई0एस0एफ0 के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई।
यू0पी0 यू0एस0एफ0 ने लखनऊ में 23 जनवरी 1936 को एक मीटिंग में तय किया कि एक अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन लखनऊ में ही आयोजित किया जाए। सम्मेलन की तैयारियों के लिए यू0पी0 प्रांत के विभिन्न शहरों में समितियों का गठन किया गया। लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद, आगरा, अलीगढ़ और दूसरी जगहों में समितियाँ बनाई गईं। लखनऊ स्थित स्वदेशी लीग ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा की (कम्युनिस्टों का इस प्रक्रिया में काफी योगदान रहा), रमेश सिन्हा ने इलाहाबाद से ए0आई0एस0एफ0 के लखनऊ सम्मेलन में डेलीगेट की हैसियत से भाग लिया।
सम्मेलन को सुचारु रूप से चलाने के लिए स्वागत समिति बनाई गई, जिसमें यू0पी0 की महत्वपूर्ण हस्तियाँ शामिल की गईं। मई 1936 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के दौरान हरीश तिवारी और अन्य छात्र नेताओं ने पण्डित नेहरू से मुलाकात करके विस्तार से बातें कीं। साथ ही स्वयं नेहरू से सम्मेलन का उद्घाटन करने का अनुरोध किया गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।
लखनऊ में ए0आई0एस0एफ0 के स्थापना सम्मेलन की तैयारियों और कार्यवाहियों का अपने आप में एक रोचक इतिहास है। यू0पी0 के डेलीगेट्स को बलरामपुर हाउस (कैसरबाग) में ही ठहराया गया था। इसके अलावा छेदीलाल धर्मशाला मंे भी उनके रहने का इन्तजाम किया गया। बलरामपुर हाउस में विषय समिति की बैठक हुई। कुछ स्थानीय ‘‘राजाओं’’ ने रहने के इन्तजाम में सहायता की: जैसे बलरामपुर, महमूदाबाद, सलेमपुर, मनकापुर इत्यादि के राजा। यू0पी0 की विभिन्न स्वयं सेवक संस्थाओं ने ए0आई0एस0एफ0 सम्मेलन में सक्रिय भूमिका अदा की। मसलन – यू0पी0 एहरार लाल कुर्ता स्वयं सेवकों तथा अन्य ने अलग-अलग इन्तजाम के काम सँभाले।
ए0आई0एस0एफ0 के स्थापना सम्मेलन में यू0पी0 का अत्यंत ही सक्रिय और कई मौकों पर निर्णायक योगदान रहा। ए0आई0एस0एफ0 का केन्द्रीय कार्यालय लखनऊ से ही काम करने लगा और ए0आई0एस0एफ0 का सूचना केन्द्र भी यू0पी0 के अलीगढ़ में स्थापित किया गया। सम्मेलन मंे ए0आई0एस0एफ0 के कनविनर कैलाश नाथ वर्मा बनाए गए और एल0सी0 खन्ना तथा रमेश सिन्हा इसके सदस्य बनाए गए।
अनिल राजिमवाले
क्रमश:











