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फर्जी लघु उद्योगो के नाम पर हजारो टन
कागजो पर चल रहे 78 उद्योगो के कोयले की काला बाजारी
बीते वर्ष सतपुड़ा थर्मल पावर स्टेशन सारनी के लिए कोयला संकट को लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पाथाखेड़ा की कोयला खदानो के कोयले पर सारनी थर्मल पावर स्टेशन को कोयला आपूर्ति न करने एवं कोयला की कालाबाजारी का आरोप लगाते हुये एक बड़ा राजनैतिक ड्रामा किया था। वे एक टोकड़ी में कोयला लेकर सारनी की ओर कूच किये थे लेकिन एक साल बाद केन्द्र एवं राज्य भाजपा शासित होने के बाद भी पाथाखेड़ा की कोयला खदानो से निकलने वाला अधिकांश कोयला सारनी थर्मल पावर स्टेशन के लिए न जाकर उसे रोड़ सेल की आड़ में फर्जी उद्योगो के परमीटो पर महंगे दामों में बेचा जा रहा है। मजेदार बात तो यह है कि अधिकांश भाजपा से जुड़े कोल टं्रासपोर्टर ही अब रोड़ सेल की कालाबाजारी का आरोप लगाने लगे है। काली माई ट्रक ओनर्स नामक संस्था ने जिला कलैक्टर बैतूल से लेकर पुलिस अधिक्षक एवं कोल सेल्स आफिसर वेस्टर्न कोल फिल्ड लिमीटेड नागपुर को भेजे शिकायती पत्र में आरोप लगाया है कि मध्यप्रदेश लघु उद्योग के नाम पर जारी कोयले के परमीट पर प्राप्त कोयले की कालाबाजारी हो रही है। कोल इंडिया को प्रति माह दो करोड़ रूपये की कोयले की आर्थिक क्षति के पीछे कारण बताते हुये ट्रक ओनर्स यूनियन के अध्यक्ष शिवनाथ सिंह का आरोप है कि लघु उद्योग का कोयला तवा वन , शोभापुर, तथा सारनी मांइस से रोड सेल के नाम पर जिन उद्योगो के नाम पर बाहर निकलता है उसकी शोभापुर काली मांई से फर्जी बिल्टी तैयार करके उसे खण्डवा, मण्डीदीप, भोपाल, इन्दौर, सीहोर, में नीजी उद्योगो को बेच कर कोयला माफिया करोड़ो रूपैया का मुनाफा कमा कर सेल टैक्स की भी चोरी कर रहा है। पड़ौसी राज्य महाराष्ट्र के नागपुर स्थित वेस्टर्न कोल फिल्ड के मुख्यालय नागपुर से लगी चन्द्रपुर जिले की कोयला खदानो से निकलने वाले कोयले की कालाबाजारी से सेल टैक्स की क्षति के मामलें में चन्द्रपुर जिला कलैक्टर ने सख्ती से कार्रवाई करके हडकम्प मचा दी है। चन्द्रपुर जिले की 34 कोयला खदानो से निकलने वाले कोयले की गुजरात तक हो रही कालाबाजारी की शिकायत चन्द्रपुर जिले के काग्रेंस नेता नन्दू नागरकर ने की थी। चन्द्रपुर कलैक्टर श्री दीपक महसेकर ने टीपी परमीट को ही कानून की नज़र में अपराध बताते हुये स्वंय भी कार्रवाई की एवं पुलिस तथा सेल टैक्स विभाग को भी कार्रवाई करने के निर्देश जारी किये। जिला उद्योग केन्द्र एवं राज्य लद्यु उद्योग मध्यप्रदेश , छत्तिसगढ़ द्वारा एक हजार परमीट जारी किये गये है जिन पर हजारो मैट्रिक टन कोयला प्रति दिन ब्लेक मार्केटिंग में चला जाता है। मध्यप्रदेश के सेल टैक्स कमिश्रर को प्रेषित शिकायत के अनुसार देश के माडल राज्य गुजरात की एक कंपनी कोयला का परमीट जारी किया गया है लेकिन कोयला गुजरात के बदले मध्यप्रदेश में ही मंहगे दामो पर बेचा जा रहा है। मध्यप्रदेश लघु उद्योग ने सीधे परमीट का कोयला उद्योगो को न देकर उसके लिए बकायदा नियम विरूद्ध एक बिचौलिये को अधिकृत कर दिया है। मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम भोपाल के पत्र दिनांक 23 8 2014 के अनुसार संजय कुमार वर्मा (रघुवंशी) आत्मज गणेश प्रसाद वर्मा को 15 सौ मैट्रिक टन बिक्स कोयले के परमीट के लिए अधिकृत किया है जो कि 78 उद्योगो के नाम पर आवंटित किया गया है। उक्त कोयला शोभापुर खदान से दिया जाना है। श्री बीएन तिवारी जनरल मैनेजर बीडीसी द्वारा आदेशित पत्र में लिखा गया है कि उक्त 15 सौ मैट्रिक टन कोयला शोभापुर , तवा टू एवं तवा खदान से दिया जाना है। यहां पर सूचि दिनांक शोभापुर खदान से मिक्स क्वालिटी का कोयला जिन उद्योगो के नाम पर आवंटित है उनके नाम इस प्रकार है:-
1.गोयल इंडस्ट्रिज होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
2. गायत्री कोंटिंग इंडस्ट्रीज प्रायवेट लिमीटेड बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन,
3.गुप्ता शाप इंडस्ट्रीज खिलचीपुर राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
4. गणेश एग्रो इंडस्ट्रीज राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
5.गुरू इंडस्ट्रीज राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
6. हनु मान उद्योग बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
7. हरिहर शाप मिल होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
8. हीरो इंटर प्राइजेस होशंगाबाद 17 मैट्रिक टन
9. इंडिया इंजीनिरींग होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
10. इव्स ड्रग्स इंडिया प्रायवेट लिमीटेड प्रीथमपुर 10 मैट्रिक टन
11. जय भवानी ड्रिट्रीजेन्ट शाप इंडस्ट्रीज शाजापुर 14 मैट्रिक टन
12. जीवन उद्योग बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
13. ज्योति ट्रिम्बर इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
14. जीवन शीजिंग वक्र्स बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
15. जानू उद्योग होशंगाबाद 17 मैट्रिक टन
16. जुगनू केलसिनटन छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
17. जे के उद्योग छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
18. कैलाश टैक्स टाइल इंडस्ट्रीज बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
19. के एस आइल मुरैना 12 मैट्रिक टन
20. किशन इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 14 मैट्रिक टन
21. खान मेन्यूफेक्चर होशंगाबाद 17 मैट्रिक टन
22. करिश्मा एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
23. किशन एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
24. किशना एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
25. किशन एग्रो यंत्र शाजापुर 12 मैट्रिक टन
26. कान्हा शाफ फैक्ट्ररी इन्दौर 15 मैट्रिक टन
27. ख्यात्री फूडस रायसेन 13 मैट्रिक टन
28. महाराजा प्रोसेसर बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
29. महेन्द्रा एण्ड महेन्द्रा शीजिंग मिल्स बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
30.मैक्सो हेल्थ केयर प्रायवेट लिमीटेड मण्डीदीप 17 मैट्रिक टन
31.मालवा टायर रिमोल्ड शाजापुर 10 मैट्रिक टन,
32. मां काली एग्रो इंडस्ट्रीज राजगढ 10 मैट्रिक टन
33. मालवा टायर रिमोल्डींग धोबी चौराहा शाजापुर 13 मैट्रिक टन
34. मारवाड़ी एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
35. मंगलम् केमिक्स मण्डीदीप 15 मैट्रिक टन
36.मध्यप्रदेश एग्रो फूडस इंडस्ट्रीज लिमीटेड मण्डीदीप 10 मैट्रिक टन
37. महाकाल उद्योग उज्जैन 15 मैट्रिक टन
38. मध्य भारत फोसाटे लिमीटेड यूनिट 2 झाबुआ 14 मैट्रिक टन
39. एमपी एग्रोटेनिक मण्डीदीप 10 मैट्रिक टन,
40. एमपी बोर्ड एवं पेपर मिल प्राय. लिमी. विदिशा 18 मैट्रिक टन
41. महाकाली फूडस लिमीटेड देवास 18 मैट्रिक टन
42. एम पी एग्रो न्यूचरी फूडस लिमी. इन्दौर 10 मैट्रिक टन
43 मध्य भारत प्रोसेसट रायसेन 10 मैट्रिक टन
44. मनीष एग्रोटेक लिमी. प्रीथमपुर 18 मैट्रिक टन
45. नवभारत पावरलूम बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
46. नोशलर इंटरनेशनल प्राय. लिमी. मण्डीदीप 13 मैट्रिक टन
47. नाकोडा एग्रो इंडस्ट्रीज राजगढ़ 10 मैट्रिक टन,
48. नील कमल प्रोसेसकार बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
49. सुधीर इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
50. श्री कुंज बिहारी प्रोसेस बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
51.श्री नर्मदा प्रोजेक्ट होशंगाबाद 15 मैट्रिक टन
52. सम्यक फ्रेबरीक प्राय. लिमी. बुरहानपुर 10 मैटिक टन
53. सूरजभान आइल प्राय. लिमी. मुरैना 10 मैट्रिक टन
54. सिंग एग्रो इंडस्ट्रीज मालवीय गंज इटारसी होशंगाबाद 10 मैट्रिक टन
55.श्रीजी इंडस्ट्रीज सोहागपुर बैतूल 13 मैट्रिक टन
56. शिव इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
57. श्री कृष्णा इंडस्ट्रीज उज्जैन 15 मैट्रिक टन
58. सम्राट प्रोसेसर बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
59. एस एम टैक्स टाइल वक्र्स बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
60. संघर्ष एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
61. सूरज कोल कंटीना इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
62. श्री ईश्वर इंडस्ट्रीज प्राय. लिमी. छिन्दवाड़ा 11 मैट्रिक टन
63. शिवम इंडस्ट्रीज बैतूल 13 मैट्रिक टन
64. श्रीजी कारर्पोरेशन इन्दौर 10 मैट्रिक टन
65. सर्वोत्तम वेजीटेबल रिफाइनरी प्राय. लिमी. इन्दौर 10 मैट्रिक टन
66. साई शक्ति एग्रोटे धार 10 मैट्रिक टन
67. श्री पंकज इंडस्ट्रीज बैतूल 13 मैट्रिक टन
68. तिरूपति एग्रो प्रोसेसस खरगोन 14 मैट्रिक टन
69. तिरूमला सिजिंग मिल बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
70. टरबो टायर छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
71. यूनीटी पल्प पेपरर्स होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
72. यूनिवर्सल इंडस्ट्रीज होंशंगाबाद 18 मैट्रिक टन
73. विश्वकर्मा एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
74. विश्व मंगलम इंटरप्राइजेस झाबुआ 10 मैट्रिक टन
75. वानटेक फूडस इंडिस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 12 मैट्रिक टन
76. व्येंकटेश न्यूचरल एक्साट्रेक छिन्दवाड़ा 12 मैट्रिक टन
77. वंशीका इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
78. योगेश इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 14 मैट्रिक टन
कोयला का आवंटन
बाक्स में
पाथााखेड़ा में एक बार फिर कोयला माफिया के रूप में पुन: रक्त संघर्ष की स्थिति
दो कौड़ी का कोयला दलाल बना कोल माफिया, बनाई करोड़ो की संपत्ति का मालिक
बैतूल, मध्यप्रदेश लघु उद्योग भोपाल द्वारा कुछ माह पूर्व तक कोयले के परमीट और आंवटन का काम सीधे फम्र्स को जाता था उसकी एक प्रति सेल्स आफिसर को आती थी। अब कोयला आवंटन एवं परमीट तथा टीपी परमीट का पूरा काम बिचौलियें के माध्यम से होने लगा है। छै माह पूर्व झोपड़ी में रहने वाले छिन्दवाड़ा जिले की कोयला खदानो में कोयले की दलाली का काम कर रहे संजय की किस्मत अचानक पलटी खाई और वह झोपड़ी से महलो में जा पहुंचा। भोपाल के किसी बलवीर नामक व्यक्ति के लिए काम करने वाला संजय आज करोड़ो की बेनामी संपत्ति का मालिक बन गया है। सोचो कल तक जिसके पास ढंग की मोटर साइकिल नहीं थी आज वह 15 लाख की गाडिय़ों में घुम कैसे रहा है। पर्दे के पीछे की कहानी कुछ इस प्रकार है कि कोयला खदानो से स्ट्रीक एवं सिलेक कोयला जिन लघु उद्योगो के नाम पर जारी किया जाता है उन्हे उक्त कोयला 25 सौ रूपये प्रति मैट्रिक टन के हिसाब से दिया जाता है लेकिन उसकी यदि निलामी की जाये तो वहीं कोयला 5500 सौ के हिसाब से बिकता है। भोपाल – मण्डीदीप, इन्दौर, प्रीथमपुर, देवास सीहोर के बाजार में उक्त कोयले की पहुंच कीमत 9 हजार रूपये प्रति मैट्रिक टन तक हो जाती है। पाथाखेड़ा का खेल देखिये यहां पर दो भाईयों की जुगल जोड़ी हमेशा सुर्खियों में रही है। संतोष – मंतोष – संजय – विजय के बाद अब अजय और संजय की जोड़ी सुर्खियों में है। पीसीआर कंपनी से निकाले गये अजय के हाथ उस समय लाटरी लग गई जब उसका छोटा भाई भोपाल के किसी बलवीर सिंह नामक बिचौलियें की मदद से मध्यप्रदेश लघु उद्योग के अधिकारियों को मोटी रकम देकर सीधे 15 सौ मैट्रिक स्ट्रीम एवं 15 सौ टन स्लेक कोयले की सप्लाई के आर्डर अपने नामजद ले आया। नियम यह कहता है कि जिसके नाम का परमीट है वह या उसका कोई अधिकृत व्यक्ति ही उक्त कोयले को पा सकता है। पूरा कोयला आवंटन किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर नहीं जारी किया जा सकता। भोपाल के बीएन तिवारी ने सारे नियम कानून कायदे को ताक में रख कर बैतूल जिले के पाथाखेड़ा कोयलाचंल में बिहार की तर्ज पर कोल माफिया को जन्म दे दिया। लगभग साढ़े तीन दशक पहले पाथाखेड़ा में विश्राम सिंह नामक एक कोल माफिया का उदय हुआ था उस समय काफी रक्त संघर्ष होने के बाद उसके पर कतरने को जिला प्रशासन विवश हुआ लेकिन एक बार फिर उसी कोयला माफिया के रक्त बीज को जिंदा करके कोयलाचंल में वर्ग संघर्ष , रक्त संघर्ष को बढ़ावा देने की ओर कदम बढ़ा दिया गया है।
बाक्स
मोटी रकम का मोटा खेल
एन्ट्री का खेल सब कुछ हो जाए मेल
बैतूल, पाथाखेड़ा की कोयला खदानो से प्रति दिन रोड सेल का कोयला निर्घारित है लेकिन यहां पर पाथाखेड़ा की कोयला खदान के सब एरिया मैनेजर से लेकर बेरियर तक लम्बा चौड़ा खेल रहा है। नियम यह है कि कोयला खदान से परमीट धारक को बिना छंटाई के कोयला लेना है लेकिन 10 टन कोयला का परमीट धारक और 40 टन कोयले का परमीट धारक मजूदर लगा कर कोयले की प्रतिबंधित खदान एरिया में छटाई करके कोयला भरता है। ओव्हर लोड के नाम पर कोयला धारक 10 टन के बदले 15 टन और कभी – कभी तो 28 टन तक भर लेता है। एरिया मैनेजर एवं पूरे स्टाफ को एक परमीट धारक प्रतिदिन सौ रूपये तथा सेल्स विभाग को प्रति टन दो से तीन रूपैया देता है। एक नम्बर की गाड़ी एक ही बार में कोयला चेक पोस्ट से आती है और जाती है लेकिन बेरियर वालो की सेंटिग की वजह से एक नम्बर की गाड़ी समयावधि के पूर्व अपने वाहन का क्रासिंग 18 किमी के पूर्व करके पुन: उसी परमीट पर दुबारा कोयला प्राप्त कर लेता है। इस काम में बेरियर , वीटो मीटर एवं सेल्स आफिसर तथा सब एरिया मैनेजर की टं्रासपोर्टर एवं परमीट धारक से सीधी मिली भगत होती है। जानकार सूत्रो का दावा है कि कोयला खदानो से परमीट पर कोयला 22 सौ रूपये प्रति मैटिक टन मिलता है लेकिन कोयला खदान क्षेत्र से काली माई आने के बाद वही कोयला 6 हजार 500 सौ से 7 हजार रूपये प्रति मैट्रिक टन हो जाता है। स्लेक कोयला 22 सौ रूपये तथा स्ट्रीम कोयला 24 सौ रूपये प्रति मैट्रिक टन परमीट धारक को मिलता है। कोयला की भराई के पहले ही छटाई हो जाने से कोयला का स्तर काफी अच्छा हो जाता है। सी ग्रेड का कोयला छंटाई के बाद ए ग्रेड का हो जाता है। एक दिन में एक चौपहिया से लेकर बारह पहिया वाहन में कोयला की भराई नियमानुसार दस मैट्रिक टन होना चाहिए लेकिन एक ट्रक में कम से कम 10 और अधिक से अधिक 28 टन तक कोयला भरा जाता है। एक समय में एक ट्रांसपोर्टर ओव्हर लोड के लिए पुलिस और अन्य खर्च के लिए कालीमाई पर तीन सौ रूपये एन्ट्री देता है। क्रासिंग के काम का रूपैया अलग होता है जो कि कोई लालू भाई नामक व्यक्ति द्वारा पुलिस से लेकर विधायक तक के नाम पर वसूला जाता है। जानकार सूत्रो का यहां तक कहना है कि कालीमाई पर इस समय संजय सिंह रघुवंशी – अजय सिंह रघुवंशी नामक दोनो भाई प्रति दिन शोभापुर खदान से 15 सौ मैट्रिक टन कोयला आवंटित किया जाता है। इसी तरह तवा टू खदान से 71 परमीट धारको को 15 सौ मैट्रिक स्लेक कोयला आवंटित किया जाता है। इसी कड़ी में तवा खदान से 56 परमीट धारको को 12 सौ मैट्रिक टन स्ट्रीम कोयला आवंटित किया जाता है। जानकार सूत्रो का कहना है कि 42 सौ मैट्रिक टन कोयला प्रतिदिन मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम के पत्रानुसार परमीट धारको को दिया जाता है। मध्यप्रदेश में सबसे अधिक परमीट पर कोयला पड़ौसी होशंगाबाद जिले के 13 लघु उद्योगो को दिया जाता है। दुसरे नम्बर पर पड़ौसी छिन्दवाड़ा जिला आता है जिसके 10 लघु उद्योगो को कोयला दिया जाता है जबकि छिन्दवाड़ा जिले से कोयला दुसरे जिले के लघु उद्योगो को दिया जाता है। तीसरे नम्बर पर मध्यप्रदेश का बुरहानपुर जिला आता है जहां पर 9 लघु उद्योगो को स्ट्रीम कोयला दिया जाता है।
तवा टू खदान से जारी स्ट्रीम कोयला के परमीट धारको के नाम
अग्या आटो लिमीटेड युनिट टू धार 11 मैट्रिक टन
भारत टायर्स शाजापुर 10 मैट्रिक टन
कॉक्स इंडिया लिमीटेड छतरपुर 17 मैट्रिक टन
किसान इंडिस्ट्रीज होशंगाबाद 19 मैट्रिक टन
खान मेन्यूफेचर होशंगाबाद 21 मैट्रिक टन
कृष्णा एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 14 मैट्रिक टन
किसान एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 15 मैट्रिक टन
किसान एग्रो यंत्र शाजापुर 16 मैट्रिक टन
कान्हा शो फैक्ट्ररी इन्दौर 20 मैट्रिक टन
ख्याति फूडस रायसेन 18 मैट्रिक टन
महाराजा प्रोसेसर बुरहानपुर 16 मैट्रिक टन
महेन्द्र एण्ड महेन्द्र शाइजिंग मिल्स बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
मैक्सन हेल्थ केयर प्रा. लि. मण्डीदीप रायसेन 20 मैट्रिक टन
मालवा टायर रिमोल्ड शाजापुर 10 मैट्रिक टन
मां काली एग्रो इंडस्ट्रीज ब्यावरा राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
मालवा टायर रिमोल्डिींग धोबी चौराहा शाजापुर 18मैट्रिक टन
मारवाड़ी एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 15 मैट्रिक टन
मंगलम सेरामिक्स मण्डीदीप रायसेन 19 मैट्रिक टन
मध्यप्रदेश एग्रो फूडस इंडस्ट्रीज लिमीटेड मण्डीदीप 11 मैट्रिक टन
महाकाल उद्योग उज्जैन 20 मैट्रिक टन
मध्यभारत फोसफेट प्रा.लि. युनिट टू झाबुआ 19 मैट्रिक टन
एम पी एग्रोटोनिक्स मण्डीदीप 11 मैट्रिक टन
एम पी बोर्ड एण्ड पेपर मिल प्रा.लि. विदिशा 20 मैट्रिक टन
महाकाली फूडस प्रा.लि. देवास 20 मैट्रिक टन
रूसोमा लेबोस्ट्रीज प्रा.लि. इन्दौर 10 मैट्रिक टन
श्रीनिवास बोर्ड एण्ड पेपर प्रा.लि. देवास 15 मैट्रिक टन
साहू टायर रिमोल्डींग राजगढ़ 11 मैट्रिक टन
संदीप एग्रो राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
शीतल डिटर्जेन्ट राजगढ़ 11 मैट्रिक टन
शिवशक्ति पेपर मिल्स लिमी. विदिशा 17 मैट्रिक टन
स्वास्तीक एग्रो पार्क होशंगाबाद 14 मैट्रिक टन
सुधीर इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 13 मैट्रिक टन
श्री कुंज बिहारी प्रोसेस बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
श्री नर्मदा प्रोजेक्ट होशंगाबाद 19 मैट्रिक टन
सम्यक फेब्रिक्स प्रा.लि. बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
सूरजभान आइल्स प्रा. लि. मुरैना 12 मैट्रिक टन
सिंग एग्रो इंडस्ट्रीज मालवीय गंज इटारसी होशंगाबाद 10 मैट्रिक टन
श्री जी इंडस्ट्रीज सोहागपुर बैतूल 17 मैट्रिक टन
शिव इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 13 मैट्रिक टन
श्री कृष्णा इंडस्ट्रीज उज्जैन 19 मैट्रिक टन
सम्राट प्रोसेसर बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
एस.एम. टेक्सटाइल वक्र्स बुरहानपुर 16 मैट्रिक टन
संघर्ष एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 14 मैट्रिक टन
सूरज केलीसीनेशन इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
एस. ईश्वार इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 11 मैट्रिक टन
श्री नकोडा केमिकल्स छिन्दवाड़ा 13 मैट्रिक टन
शिवम इंडस्ट्रीज बैतूल 17 मैट्रिक टन
शोमी इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
श्रीजी कारपोरेशन इन्दौर 10 मैट्रिक टन
सर्वोत्तम वेजिटेबल आइल रिफाइनरी इन्दौर 10 मैट्रिक टन
साई शक्ति एग्रोटेक धार 10 मैट्रिक टन
श्री पंकज इंडस्ट्रीज बैतूल 17 मैट्रिक टन
तिरूपति एग्रो प्रोसेसर्स खरगोन 18 मैट्रिक टन
तिरूमला साइजींग मिल्स बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
टरबो टायर्स छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
युनिटी पल्प पेपर्स होशंगाबाद 15 मैट्रिक टन
युनिवर्सल इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 19 मैट्रिक टन
विश्वकर्मा एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 15 मैट्रिक टन
विश्वमंगल इंटर प्राईजेस झाबुआ 10 मैट्रिक टन
वंकटेश फूडस इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 16 मैट्रिक टन
वेंकटेश नेच्यूरल एक्सटे्रक्ट प्रा. लिमी. 16 मैट्रिक टन
वंशिका इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
योगेश इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 18 मैट्रिक टन
गणेश एग्रो इंडस्ट्रीज राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
गुरू शोप इंडस्ट्रीज राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
हनुमान उद्योग बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
हरि हर सॉ मिल होशंगाबाद 14 मैट्रिक टन
हीरो इंटरप्राइस होशंगाबाद 20 मैट्रिक टन
इंडिया इंजीनियरींग होशंगाबाद 14 मैट्रिक टन
आइव्स ड्रग्स इंडिया प्रा. लि. पीथमपुर 10 मैट्रिक टन
जय भवानी डिटर्जेन्ट शोप इंडस्ट्रीज शाजापुर 18 मैट्रिक टन
जीवन उद्योग बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
ज्योति टिम्बर इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 15 मैट्रिक टन
जीवन शाइजिंग वक्र्स बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
जानू उद्योग होशंगाबाद 20 मैट्रिक टन
जुगनू केल्सीनेशन छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
जे.के. उद्योग छिन्दवाड़ा 12 मैट्रिक टन
कैलाश टैक्सटाईल्स इंडस्ट्रीज बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
के. एस. ऑईल मुरैना 17 मैट्रिक टन
करिश्मा एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 15 मैट्रिक टन
लगातार प्रकाशित
———राम किशोर पंवार  बैतूल

 देशी तालिबानियों से संघर्ष की शुरुआत

लोकसंघर्ष पत्रिका  का कवरअब मैं वे सब काम करने को तत्पर था, जो तालिबान के इस भारतीय संस्करण को चोट पहुँचा सके, इसकी शुरुआत मैंने छात्र राजनीति में विद्रोही कदम उठाने के जरिये की, भीलवाड़ा कॉलेज में आरएसएस के विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से बगावत करके एक नया छात्र संगठन बनाया गया, जिसे विद्यार्थी अधिकार रक्षक संघ (वार्स) नाम दिया गया, संघ के ही एक अन्य बगावती स्वयंसेवक बृजराज कृष्ण उपाध्याय इसका नेतृत्व कर रहे थे, मैं इसके प्रारंभिक काल का संगठन मंत्री बना, हमने संघी छात्र संगठन के पाँव उखाड़ना चालू कर दिया, जगह-जगह पर वार्स की इकाइयाँ स्थापित होने लगीं, लोग संघ की मानसिक गुलामी से निजात पाने के लिए वार्स को विकल्प के रूप में देखने लगे, हमारे नेता बृजराज में गजब की हिम्मत और लगन रही, अद्भुत जीवट वाला व्यक्ति, उस बन्दे पर आरएसएस के लोगों ने बहुत जुल्म ढाए अलग छात्र संगठन बनाना संघ को बर्दाश्त नहीं था, इसलिए आरएसएस और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं द्वारा उन पर कई बार जानलेवा हमले किए गए, एक बार तो मांडलगढ़़ इलाके में त्रिवेणी चैराहे के पास उनके साथ भयंकर मारपीट की गयी, सिर में पेचकश घुसेड़ दिया गया और फिर मरा समझ कर छोड़कर भाग गए, यह हमला इसलिए किया गया क्योंकि वार्स के साथी संघ से जुड़े लोगों के आपराधिक कृत्यों को उजागर कर रहे थे दरअसल उन दिनों संघ के अल्पकालिक प्रचारक और विस्तारक किस्म के जो लोग थे, वे इस खनन क्षेत्र में अवैध एक्सप्लोजिव तथा हथकड़ी शराब बेचने वालों को संरक्षण दे रहे थे, ऐसा हमें मालूम हुआ था, यह भी पता चला कि कुछ माननीय भाई साहब ऐसे लोगों से वसूली भी करते रहे थे, बस इन्हीं बातों के बारे में सार्वजनिक रूप से बोलना हमें भारी पड़ गया, निशाने पर पूरा संगठन ही था, मगर हत्थे सिर्फ बृजराज कृष्ण उपाध्याय ही चढ़े, सो उन्हें इतना मारा गया कि वे राष्ट्रभक्तों के हाथों शहीद होते-होते बचे वैसे भी मांडलगढ़    सेंड स्टोन माइनिंग का इलाका है जहाँ पर किसी की भी जान लेना खनन माफिया के दाहिने हाथ का खेल रहा है, ऐसे इलाके में उपाध्याय को मारने की साजिश की गई थी, लेकिंन किसी प्रकार से उनकी जान बचा ली गयी, आसपास के लोगों ने गंभीर रूप से घायल उपाध्याय को समय रहते उपचार के लिए महात्मा गांधी चिकित्सालय भीलवाड़ा पहुँचा दिया, जहाँ वे लम्बे उपचार के पश्चात ठीक हो पाए। बात सिर्फ संघ के कथित अनुशासित स्वयंसेवकों के धतकरमों को उजागर करने मात्र की ही नहीं थी बल्कि चरित्र, शील और संस्कार का दंभ भरने वाले उस छात्र संगठन की कारगुजारियों के पर्दाफाश की भी थी, जिन्होंने अपनी ही छात्रा इकाई की पदाधिकारियों के शील को भंग करने जैसे पाप कर्म करने से भी गुरेज नहीं किया था, हालत इतने संगीन थे कि उनमें से एक का गर्भपात करवा कर भ्रूण हत्या जैसी अधम कार्यवाही तक को अंजाम दिया गया था। इस फर्जी शील, चरित्र और संस्कार पर हम नहीं बोलते, ऐसा तो हो नहीं सकता था, हमने जब उनकी पोल खोलनी शुरू की तो वे अपने चिर परिचित हथियार डंडे के साथ हम लोगों से विचार विमर्श करने आ पहुँचे, संघ के लोग ज्यादातर मौकों पर तर्क के स्थान पर लट्ठ का उपयोग करते हैं, उन्हें यही सिखाया गया है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं खैर, संघी आकाओं के इशारे पर शिक्षा के मंदिरों को गुंडागर्दी के अड्डे बनाने की हर कोशिश को विफल करने के लिए वार्स बेहद मजबूती से कई साल तक भीलवाड़ा में सक्रिय रहा,कई कॉलेजों में कई बार छात्र संघ चुनाव में हमारे अभ्यर्थी जीते, हमने न केवल भाजपाई संघी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को, बल्कि कांग्रेसी छात्र संगठन एनएसयूआई को भी कॉलेज परिसर से खदेड़    दिया। वार्स एक वैकल्पिक छात्र संगठन के रूप में उभरा जिसने लम्बे समय तक केवल छात्र समस्याओं को ही नहीं उठाया बल्कि शहर और जिले की विभिन्न जन समस्याओं को भी प्रभावी तरीके से उठाया तथा युवाओं को जातिवादी और सांप्रदायिक छात्र संगठनों से भी दूर रखा।

ये कौन से ब्राह्मण हुए ?
संघ की वजह से अम्बेडकर छात्रावास छूट गया था और अब संघ कार्यालय भी, शहर में रहने का नया ठिकाना ढूँढना पड़ा, मेरे एक परिचित संत चैतन्य शरण शास्त्री, जो स्वयं को अटल बिहारी वाजपेयी का निजी सहायक बताते थे, वे उन दिनों कृषि उपज मंडी भीलवाडा में स्थित शिव हनुमान मंदिर पर काबिज थे, मैंने उनके साथ रहना शुरू किया, हालाँकि थे तो वे भी घनघोर हिन्दुत्ववादी लेकिन संघ से थोड़े    रूठे हुए भी थे, शायद उन्हें किसी यात्रा के दौरान पूरी तवज्जोह नहीं दी गयी थी, किसी जूनियर संत को ज्यादा भाव मिल गया, इसलिए वे खफा हो गए, हम दोनों ही खफा-खफा हिंदूवादी एक हो गए और एक साथ रहने लगे। मैं दिन में छात्र राजनीति करता और रात्रि विश्राम के लिए शास्त्री जी के पास मंदिर में रुक जाता, बेहद कठिन दिन थे, कई बार जेब में कुछ भी नहीं होता था, भूखे रहना पड़ता, ऐसे भी मौके आए जब किसी पार्क में ही रात गुजारनी पड़ी भूखे प्यासे ऊपर से एंग्री यंगमैन की भूमिका जहाँ भी जब भी मौका मिलता, आरएसएस के खिलाफ बोलता और लिखता रहता। उन दिनों कोई मुझे ज्यादा भाव तो नहीं देता था पर मेरा अभियान जारी रहता, लोग मुझे आदिविद्रोही समझने लगे। संघ की ओर से उपेक्षा का रवैय्या था ना तो वे मेरी बातों पर कुछ बोलते और ना ही प्रतिवाद करते, एकठंडी सी खामोशी थी उनकी ओर से, इससे मैं और भी चिढ गया। संत शास्त्री भी कभी कभार मुझे टोकाटाकी करते थे कि इतना उन लोगों के खिलाफ मत बोलो, तुम उन लोगों को जानते नहीं हो अभी तक, संघ के लोग बोरे में भर कर पीटेंगे और रोने भी नहीं देंगे। पर मैंने कभी उनकी बातों की परवाह नहीं की
वैसे तो चैतन्य शरण शास्त्री जी अच्छे इन्सान थे मगर थे पूरे जातिवादी। एक बार मेरा उनसे जबरदस्त विवाद हो गया, हुआ यह कि शास्त्री और मैं गांधी नगर में गणेश मंदिर के पास किसी बिहारी उद्योगपति के घर पर शाम का भोजन करने गए, संभवतः उन्होंने किन्हीं धार्मिक कारणों से ब्राह्मणों को भोजन के लिए आमंत्रित किया था, शास्त्री जी मुझे भी साथ ले गए, मुझे कुछ अधिक मालूम न था, सिर्फ इतनी सी जानकारी थी कि आज शाम का भोजन किसी करोड़पति बिहारी बनिए के घर पर है। इस प्रकार घर-घर जाकर भोजन करने की आदत संघ में सक्रियता के दौरान पड़ ही चुकी थी, इसलिए कुछ भी अजीब नहीं लगा, संघ कार्यालय प्रमुख रहते हुए मैं अक्सर प्रचारकों के साथ संघ के विभिन्न स्वयंसेवकांे के यहाँ खाने के लिए जाता था और वह भी कथित उच्च जाति के लोगों के यहाँ, सो बिना किसी संकोच के मैं शास्त्री जी के साथ चल पड़ा। भोजन के दौरान यजमान (दरअसल मेजबान) परिवार ने मेरा नाम पूछा, मैंने जवाब दिया-भंवर मेघवंशी, वे लोग बिहार से थे, राजस्थान की जातियों के बारे में ज्यादा परिचित नहीं थे, इसलिए और पूँछ बैठे कि-ये कौन से ब्राह्मण हुए? मैंने मुँह खोला-मैं अनुसूचित, मेरा जवाब पूरा होता उससे पहले ही शास्त्री जी बोल पड़े-ये क्षत्रिय मेघवंशी ब्राह्मण हैं। बात वहीं खत्म हो गई, लेकिन जात छिपाने की पीड़ा ने मेरे भोजन का स्वाद कसैला कर दिया और शास्त्री भी खफा हो गए कि मैंने उन्हें क्यों बताने की कोशिश की कि मैं अनुसूचित जाति से हूँ। हमारी जमकर बहस हो गई मैंने उन पर झूठ बोलकर धार्मिक लोगों की आस्था को ठेस पहँुचाने का आरोप लगा दिया तो उन्होंने भी आखिर कह ही दिया कि ओछी जाति के लोग ओछी बुद्धि के ही होते हैं। मैं तो तुम्हे ब्राह्मण बनाने की कोशिश कर रहा हूँ और तुम उसी गन्दी नाली के कीड़े बने रहना चाहते हो, मैं गुस्से के मारे काँपने लगा, जी हुआ कि इस ढोंगी की जमकर धुनाई कर दूँ पर कर नहीं पाया, मगर उस पर चिल्लाया, मैं भी कम नहीं मैंने भी कह दिया तुम भी जन्मजात भिखमंगे ही तो हो, तुमने कौन सी कमाई की आज तक मेहनत करके, तो शास्त्री ने मुझे नीच जाति का प्रमाण पत्र जारी कर दिया और मैंने उन्हें भिखारी घोषित कर दिया अब साथ रह पाने का सवाल ही नहीं था। मैं मंदिर से निकल गया, मेरे साथ रहने से उनके ब्राह्मणत्व पर दुष्प्रभाव पड़ सकता था और कर्मकांड से होने वाली उनकी आय प्रभावित हो सकती थी, वहीं मैं भी अगर ब्राहमणत्व की ओर अग्रसर रहता तो मेरी भी संघ से लड़ाई प्रभावित हो सकती थी, इसलिए हमारी राहें जुदा हो गईं, न मैं ब्राह्मण बन सका और न ही वे इन्सान बनने को राजी हुए, बाद में हम कभी नहीं मिले।

-भँवर मेघवंशी
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

अगर आपने हिटलर की आत्मकथा ‘माईन काम्फ़ ’ को पढ़ा हो तो इस बात को पकड़ने में शायद आपको एक क्षण भी नहीं लगेगा सांप्रदायिक नफरत फैलाने के उद्देश्य से भारत में अभी चल रहे ‘लव जेहाद’ नामक अनोखे अभियान का मूल स्रोत क्या है। हिटलर यहूदियों के बारे में यही कहा करता था कि ‘‘ये गंदे और कुटिल लोग मासूम ईसाई लड़कियों को बहला-फुसला कर, उनको अपने प्रेम के जाल में फंसा कर उनका खून गंदा किया करते हैं।’’

यहां हम हिटलर के शासन (थर्ड राइख) के दुनिया के सबसे प्रामाणिक इतिहासकार विलियम एल. शिरर की पुस्तक ‘The Rise and Fall of Third Reich’ के एक छोटे से अंश को रख रहे हैं, जिसमें शिरर ने हिटलर की ऐसी ही घृणित बातों को उद्धृत करते हुए उनको विश्लेषित किया है। शायद, इसके बाद भारत में संघ परिवार के लोगों के ‘लव जेहाद’ अभियान की सचाई के बारे में कहने के लिये और कुछ नहीं रह जायेगा। शिरर अपनी इस पुस्तक के पहले अध्याय ‘Birth of the Third Reich’ के अंतिम हिस्से में लिखते हैं :

‘‘ हिटलर एक दिन वियेना शहर के भीतरी हिस्से में घूमने के अपने अनुभव को याद करते हुए कहता है, ‘‘अचानक मेरा सामना बगलबंद वाला काला चोगा पहने एक भूत से होगया। मैंने सोचा, क्या यह यहूदी है? लिंत्स शहर में तो ऐसे नहीं दिखाई देते। मैंने चुपके-चुपके उस आदमी को ध्यान से देखा, उसके विदेशी चेहरे, उसके एक-एक नाक-नक्शे को जितना ध्यान से देखता गया, मेरे अंदर पहले सवाल ने नया रूप ले लिया। क्या वह जर्मन है?’’(अडोल्फ हिटलर, ‘माईन काम्फ़ ’, अमरीकी संस्करण, बोस्तोन, 1943, पृष्ठ : 56)

‘‘हिटलर के जवाब का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। फिर भी वह कहता है, जवाब के पहले उसने ‘‘किताबों के जरिये अपने संदेह को दूर करने का फैसला किया।’’ उन दिनों वियेना में जो यहूदी-विरोधी साहित्य काफी बिक रहा था, वह उसमें खो गया। फिर सड़कों पर सारी स्थितियों को करीब से देखने लगा। वह कहता है, ‘‘मैं जहां भी जाता, हर जगह मुझे यहूदी नजर आने लगे और मैं उन्हें जितना अधिक देखता, वे मुझे बाकी लोगों से अलग दिखाई देने लगे। …बाद में चोगा पहने लोगों की गंध से मैं बीमार सा होने लगा।’’(वही, पृ : 56-57)

‘‘इसके बाद, वह कहता है, ‘‘उसने उन ‘चुनिंदा लोगों’ के शरीर पर नैतिक धब्बों को देख लिया। …खास तौर पर पाया कि सांस्कृतिक जीवन में ऐसी कोई गंदगी या लंपटगिरी नहीं है, जिसके साथ कोई न कोई यहूदी न जुड़ा हुआ हो। इस मवाद को यदि आप सावधानी से छेड़े तो रोशनी गिरते ही किसी सड़े हुए अंग के कीड़ों की तरह चौंधिया कर ये किलबिलाते दिख जायेंगे।’’ वह कहता है, उसने पाया कि वैश्यावृत्ति और गोरे गुलामों के व्यापार के लिये मुख्यत: यहूदी जिम्मेदार हैं। इसे ही आगे बढ़ाते हुए कहता है, ‘‘पहली बार जब मैंने बड़े शहर की गंदगी में इस भयानक धंधे को चलाने वाला घुटा हुआ, बेशर्म और शातिर यहूदी को देखा तो मेरी पीठ में एक सनसनी दौड़ गयी।’’(वही, पृ : 59)

‘‘यहूदियों के बारे में हिटलर की इन उत्तेजक बातों का काफी संबंध उसकी एक प्रकार की विकृत कामुकता से है। उस समय वियेना के यहूदी-विरोधी प्रकाशनों का यह खास चरित्र था। जैसाकि बाद में फ्रंखोनिया के हिटलर के एक खास चमचे, न्यूरेमबर्ग के अश्लील साप्ताहिक ‘Der Stuermer’ के मालिक में देखा गया, वह एक घोषित विकृत मानसिकता का व्यक्ति था और हिटलर के शासन (थर्ड राइख) का सबसे घृणास्पद व्यक्ति था। मीन कैम्फ में यहूदियों की ऐसी-तैसी करने के लिये जघन्य संकेतों वाली बातें भरी हुई हैं कि यहूदी मासूम ईसाई लड़कियों को फांसते हैं और इसप्रकार उनके खून को गंदा करते हैं। हिटलर ही ‘‘घिनौने, कुटिल, चालबाज हरामी यहूदियों द्वारा सैकड़ों हजारों लड़कियों को फुसलाने की डरावनी कहानियां’’ लिख सकता है। रूडोल्फ ओल्डेन कहता है कि हिटलर के इस यहूदी-विरोध की जड़ में उसकी दमित कामुक वासनाएं हो सकती है। यद्यपि तब वह बीस-पच्चीस साल का था। जहां तक जानकारी है, वियेना की उसकी यात्रा में उसका औरतों से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं हुआ था।

‘‘हिटलर आगे कहता है, ‘‘धीरे-धीरे मैं उनसे नफरत करने लगा। यही वह समय था जब मेरे जीवन में सबसे बड़ा आत्मिक भूचाल आया था। मैं अब कमजोर घुटनों वाला शहरी नहीं रह गया। यहूदी-विरोधी होगया।’’ (वही, पृ : 63-64)

‘‘अपने बुरे अंत के समय तक वह एक अंधा उन्मादी ही बना रहा। मौत के कुछ घंटे पहले लिखी गयी अपनी अन्तिम वसीयत में भी उसने युद्ध के लिये यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया, जबकि इस युद्ध को उसीने शुरू किया था जो अब उसे और थर्ड राइख को खत्म कर रहा था। यह धधकती हुई नफरत, जिसने उस साम्राज्य के इतने सारे जर्मनों को ग्रस लिया था, अंतत: इतने भयंकर और इतने बड़े पैमाने के कत्ले-आम का कारण बनी कि उसने सभ्यता के शरीर पर ऐसा बदनुमा दाग छोड़ दिया है जो उस समय तक कायम रहेगा जब तक इस धरती पर इंसान रहेगा।’’ (William L. Shirer, The Rise and Fall of the Third Reich, Fawcett Crest, New York, छठा संस्करण, जून 1989, पृष्ठ : 47-48)

यहां उल्लेखनीय है कि भारत में संघ परिवारियों के बीच हिटलर की आत्मकथा ‘माईन काम्फ़ ’ एक लोकप्रिय किताब है, जबकि साधारण तौर पर इस किताब को दुनिया में बहुत ही उबाऊ और अपठनीय किताब माना जाता है। लेकिन, जर्मन इतिहासकार वर्नर मेसर के शब्दों में, ‘‘लोगों ने हिटलर की उस अपठनीय पुस्तक को गंभीरता से नहीं पढ़ा। यदि ऐसा किया गया होता तो दुनिया अनेक बर्बादियों से बच सकती थी।’’ (देखें, हिटलर्स माईन काम्फ़ : ऐन एनालिसिस)

पूरी तरह से हिटलर के ही नक्शे-कदम पर चलते हुए भारत में सांप्रदायिक नफरत के आधार पर एक फासिस्ट और विस्तारवादी शासन की स्थापना के उद्देश्य से आरएसएस का जन्म हुआ था। इसके पहले सरसंघचालक, गुरू गोलवलकर के शब्दों में, “अपनी जाति ओर संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए जर्मनी ने देश से सामी जातियों – यहूदियों का सफाया करके विश्व को चौंका दिया है। जाति पर गर्वबोध यहां अपने सर्वोंच्च रूप में व्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी बता दिया है कि सारी सदिच्छाओं के बावजूद जिन जातियों और संस्कृतियों के बीच मूलगामी फर्क हो, उन्हें एक रूप में कभी नहीं मिलाया जा सकता है। हिंदुस्तान में हम लोगों के लाभ के लिए यह एक अच्छा सबक है।’’(एम.एस.गोलवलकर, वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड, पृष्ठ : 35)

‘लव जेहाद’ के मौजूदा प्रसंग से फिर एक बार यही पता चलता है कि संघ परिवार के लोग आज भी कितनी गंभीरता से हिटलर की दानवीय करतूतों से अपना ‘सबक’ लेकर ‘मूलगामी फर्क वाली जातियों और संस्कृतियों के सफाये’ के घिनौने रास्ते पर चलना चाहते हैं।
– अरुण माहेश्वरी
साभार

खुद को खत्म कर देने का ख़याल
मैंने सर संघचालक को जो चिटठी लिखी, उसका कोई जवाब नहीं आया, मैं हर स्तर पर जवाब माँगता रहा, लड़ता रहा लेकिन हर स्तर पर एक अजीब सी चुप्पी थी, हर तरफ से निराशा ही हाथ लगी, कोई भी इस घटना की गंभीरता को समझने को तैयार नहीं था, सबको लगता था कि यह एक बहुत ही सामान्य घटना है, ऐसा तो होता ही रहता है, इसमें क्या बड़ी बात है, जिससे मुझे इतना नाराज और तनावग्रस्त होना चाहिए। मैंने इतनी पीड़ा कभी नहीं महसूस की थी पहले, जितनी उन दिनों कर रहा था, वे दिन वाकई बेहद दुखद थे, मैं अक्सर खुद को किंकर्तव्यविमूढ़ पाता था, कुछ भी करने और सोचने की शक्ति नहीं बची थी, मैं अवसाद की स्थिति में जा रहा था, मुझे कहीं भी सुना नहीं जा रहा था, जो बात मेरे अन्दर इतनी उथल पुथल मचाए हुए थी, उससे लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ा, दुनिया तो वैसे ही चल रही थी, जैसी पहले चलती थी। मैं इतना निराश था कि मेरे दिमाग में खुद को खत्म कर देने के खयाल आने लगे, मैंने खुदकशी के बारे में सोचा, मैंने मरने की कईं तरकीबें सोची, कुएँ में कूद जाना, फाँसी लगाना या जहर खा कर मुक्त हो जाना, कुछ तो करना ही था, इसलिए विषपान का विकल्प ही मुझे सर्वाधिक उपयुक्त जान पड़ा, घर में चूहे मारने की दवा मौजूद थी, एक रात खाने के साथ ही मैंने उसे खा लिया और सो गया, मुझे नींद का आभास हो रहा था, मुझे लग रहा था कि अब मेरी जिन्दगी की फिर कोई सुबह नहीं होगी। मैं सोया हुआ था, शायद नींद में था या जग रहा था मैं जी रहा था या मैं मर रहा पेट में दर्द की एक भयंकर लहर सी उठी। उल्टी करने की अदम्य इच्छा और जरूरत ने मुझे झकझोर दिया, मैं दर्द के मारे दोहरा हो रहा था, मैं उठ बैठा और उल्टियाँ करने को बाहर भागा उल्टियों के चलते बुरा हाल था, कलेजा मुँह को आने लगा, अंतडि़याँ खिंची चली आती थी, सिर चकराता था और बेहोशी जारी थी, अचानक बिगड़ी तबियत से परिजन चिंतित हो उठे, बड़े भाईसाहब को तुरंत बुलाया गया, वे आए तब तक मेरी आँखें बंद होने लगी, भाईसाहब ने पूछा कि अचानक क्या हुआ, मैं बामुश्किल सिर्फ इतना बता पाया कि मैंने चूहे की दवा खायी। बाद में मुझे बताया गया कि भाईसाहब गाँव से डॉक्टर को लेने को भागे, डॉ0 सुरेश शर्मा तुरंत भागते हुए आ पहुँचे, उन्होंने ग्लूकोज में कई सारे इंजेक्शन डाले और इलाज प्रारंभ किया, चूँकि पुलिस और अन्य लोगों तक बात नहीं पहँुचे इसलिए अगले कई घंटों तक घर में ही गुपचुप इलाज चलाया गया, मेरे बड़े भाई बद्री जी भाईसाहब का इतना बड़प्पन रहा कि उन्होंने कभी भी किसी को इस घटना का जिक्र नहीं किया, मैं उनकी सक्रियता और डॉ0 शर्मा के त्वरित इलाज की वजह से बच गया पर ऐसी बातें अंततः बाहर आ ही जाती है, डॉ0 साहब ने गोपनीयता भंग कर दी, बात आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई, मैं स्वस्थ तो हो गया पर लज्जा और ग्लानि से भर गया, मैं उन दिनों हर जगह असफलता का सामना कर रहा था, आत्महत्या के प्रयास में भी सफल नहीं हो पाया, हर जगह की तरह यहाँ भी मैं हार गया था, मौत हार गई, जिन्दगी जीत गई थी, मुझे लगता था कि हर गाँव वासी को मेरी इस नादानी के बारे में जानकारी है इसलिए मैं मारे शर्म के कई महीनों तक लोगों का सामना नहीं कर पाता था, मैं वापस भीलवाड़ा चला गया। शहर आकर मैंने सोचना शुरू किया, खुद से ही पूछने लगा कि मैं क्यों मर रहा था और किनके लिए मर रहा था, किस बात के लिए? मेरे मर जाने से किसको फर्क पड़ने वाला था? ठन्डे दिमाग से सोचा तो अपनी तमाम बेवकूफियों पर सिर पीट लेने को मन करने लगा, मरने को तो मैं पहले भी उनके प्यार में राजी था अयोध्या जाकर और मरने को तो मैं बाद में भी तैयार हो गया था उनके नफरत भरे व्यवहार के कारण पर दोनों ही स्थिति मंे मरना तो मुझे ही था, कभी हँसते-हँसते तो कभी रोते-रोते क्या वे मेरी जिन्दगी के मालिक हैं? क्या मेरे जीने के लिए आरएसएस का प्यार या नफरत जरुरी है? मुझे क्यों मरना चाहिए, मुझे उनसे क्यों सर्टिफिकेट चाहिए, वे कौन होते हैं मेरे जीवन और सोच को नियंत्रित करने वाले? मैं अब तक भी उनके साथ क्यों बना हुआ हूँ? मैं ऐसे घटिया और नीच सोच विचार और पाखंडी व्यवहार वाले लोगों के साथ क्यों काम करना चाहता हूँ,जो मेरे घर पर बना खाना तक नहीं खा सकते हैं! मैं ऐसे लोगों का हिन्दू राष्ट्र क्यों बनाना चाहता हूँ? मैं एक ऐसा धार्मिक राष्ट्र बनाने का आकांक्षी क्यों था जिसमें मेरे साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार होने वाला है आखिर क्यों?
ऐसे ही जलते हुए सैंकड़ों सवालों ने मुझे जकड़ लिया था खूब अन्तद्र्वन्द्व मनन चिंतन और थक जाने की स्थिति तक मंथन के पश्चात मैंने तय किया कि मैं आरएसएस को न केवल पूरी तरह नकार दूँगा बल्कि उनके द्वारा मेरे साथ किए गए जातिगत भेदभाव को भी सबके समक्ष उजागर करूँगा, इस दोगले हिन्दुत्व और हिन्दुराष्ट्र की असलियत से सबको वाकिफ करवाना मेरा आगे का काम होगा। मैंने संकल्प कर लिया कि संघ परिवार के चेहरे से समरसता के नकाब को नोंचकर इनका असली चेहरा मैं लोगों के सामने लाऊँगा। मैंने अपनी तमाम सीमाओं को जानते हुए भी निश्चय कर लिया था कि मैं संघ परिवार के पाखंडी हिन्दुत्व को बेनकाब करूँगा और मैं अपनी पूरी ताकत के साथ अकेले ही आरएसएस जैसे विशालकाय अर्धसैनिक सवर्ण जातिवादी संगठन से दो-दो हाथ करने निकल पड़ा। मैंने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा और अपमान को निजी दुश्मनी बनाने के बजाए सामाजिक समानता, अस्मिता एवं गरिमा की सामूहिक लड़ाई बनाना तय किया और एक भीम प्रतिज्ञा की कि मैं अब हर तरीके से संघ और संघ परिवार के समूहों तथा उनके विघटनकारी विचारों की मुखालिफत बोलकर, लिखकर और अपने क्रियाकलापों के जरिये करूँगा, यह जंग जारी रहेगी।

-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
(लेखक की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा: हिन्दू तालिबान’ का पहला भाग)
मोबाइल: 09571047777edc58-01

बन्धु, खाना पैक कर दो
मैंने अस्थिकलश यात्रियों से भोजन करने का जैसे ही आग्रह किया, वे थोडा सा झिझके, मुझे सेवा भारती के तत्कालीन जिला प्रमुख और संघ के एक पदाधिकारी तुरंत एक तरफ ले कर गए, बहुत ही प्यार से उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, मेरे द्वारा किए गए इस शानदार आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की, मेरे काम को देर तक सराहने और मेरी संघ और राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर अतीव प्रसन्नता जाहिर करने के बाद वे अत्यंत ही धीमी आवाज में बोले-बन्धु, आप तो हमारे समाज की विषमता से परिचित ही है, संघ के सारे प्रयासों के बाद भी अभी तक हिन्दू समाज समरस नहीं हो सका, हम तो आप जब भी चाहोगे तब आपके साथ आपके ही घर पर एक ही थाली में बैठकर खाना खा लेंगे, पर आज हमारे साथ साधु संत और अन्य लोग भी हैं, वे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि हमने उन्हें किसी वंचित समुदाय के घर का खाना खिला दिया है, वे नाराज हो कर यात्रा छोड़कर वापस चले जाएँगे, मुझे काटो तो उस वक्त खून नहीं निकले, मैं स्तब्ध था, मेरे मस्तिष्क में विचारों की कई आँधियाँ एक साथ चल रही थी, मेरे जबान पर कोई शब्द ही नहीं आ रहे थे, जिससे मैं उन्हें अपनी परिस्थिति बता पाता, न मैं कुछ बोल पा रहा था और न ही उनके द्वारा दिए जा रहे तर्कों कुतर्कों को ही मैं सुन पा रहा था लेकिन उनके आखिरी वाक्य मुझे आज तक याद रह गए है-आप ऐसा करो कि खाना पैक करके गाड़ी में रखवा दो, अगले गाँव में कार्यक्रम के बाद सबको बैठाकर खिला देंगे मतलब साफ था कि वे बिना यह बताए कि यह मुझ दलित स्वयंसेवक के घर का बना खाना है, इसे चुपचाप सबको अगले गाँव में खिला दिया जाएगा। मेरी स्थिति उस वक्त बड़ी विचित्र हो गई थी, मैं अपने ही घर में हार महसूस कर रहा था, बिना कुछ किए ही मेरे पिताजी जीतते प्रतीत हो रहे थे, मैं उलझन में था कि पिताजी के सवालों का क्या जवाब दूँगा कि क्यों नहीं खाना खाया उन लोगों ने? फिर भी दिल कड़ा करके मैंने खाना पैक करवाना शुरू करवाया, घरवालों ने कारण पूछा तो मैंने कह दिया कि अगले गाँव भगवानपुरा में एक और कार्यक्रम है, पहले ही बहुत देरी हो गई है, इसलिए वहीं जाकर खाएँगे खाना, जैसे तैसे यह कह कर मैंने उस वक्त तो अपना पिंड छुड़वा लिया पर मन का सारा उत्साह जाता रहा, जाति से हीन होने का भाव हावी होने लगा, बार-बार यही सोच उभर कर आने लगी कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है? संघ के लोग मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं? मैं एक अनुशासित स्वयंसेवक, जुनूनी कारसेवक, जिला कार्यालय प्रमुख अगर मेरे साथ ही ऐसा छुआछूत, तो मेरे अन्य समाज बंधुओं के साथ कैसा दुर्व्यवहार हो रहा होगा? उस दिन पहली बार मैंने एक हिन्दू से परे हट कर सिर्फ निम्न जातिय दलित के नजरिए से सोचना शुरू किया, मैं जितना सोचता था, उतना ही उलझता जाता था सही बात तो यह है कि वह रात मेरे जीवन की सबसे लम्बी रात थी, बीतने का नाम ही नहीं लेती थी आँखों ही आँखों में गुजारी वह रात और कल का सूरज तो और भी भयंकर उदित होने जा रहा था, उसकी तो शायद मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
और उन्होंने खाना फेंक दिया
आज मेरे लिए कयामत का दिन था, कल की रात अभी बीती ही थी कि सुबह का भयावह सूरज अपनी तेज किरणों के साथ उपस्थित था, मेरे साथी स्वयंसेवक पुरुषोत्तम क्षत्रिय जो की अस्थि कलश यात्रा के साथ ही चल रहे थे, घर आ पहुँचे, वे मेरे अम्बेडकर छात्रावास के दिनों के पड़ोसी भी थे, कवि होने के नाते अच्छे दोस्त भी। हम लोग आजाद नगर शाखा में साथ साथ जाते थे, हर बात एक दूसरे को साझा करते थे, गहरी मित्रता थी, वे सुबह खीर की केतली लेकर लौटे थे, उन्होंने जो कुछ मुझे बताया, वह अविश्वसनीय और अकल्पनीय था, उनके द्वारा दी जा रही सूचना मेरे दिमाग पर हथौड़े मारने जैसी थी। पुरुषोत्तम जी ने बताया कि आपके यहाँ से ले जाई गई खीर, पूरी भगवानपुरा मोड़ पर सड़क किनारे फेंक दी गई और रात को खाना वैध शर्मा के यहाँ बनवा कर देर रात खाया गया, मुझे कहा गया है कि मैं आपको यह बात नहीं बताऊँ लेकिन मैं झूठ नहीं बोलना चाहता, आपके खाने को खाया नहीं गया बल्कि फेंक दिया गया, मैंने पुरुषोत्तम जी से साफ कहा कि कुछ भी हो लेकिन संघ के स्वयंसेवक इतने जातिवादी और निकृष्ट नहीं हो सकते हैं, आप मजाक करने के लिए इतना बड़ा सफेद झूठ नहीं बोल सकते हैं? उन्होंने कहा कि यकीन नहीं होता है तो चल कर देख लो, कुछ ना कुछ तो अवशेष वहाँ मिल ही जाएँगे हम दोनों दोस्त साईकिल पर सवार हुए और भगवानपुरा मोड़ पर पहँुचे, जाकर देखा, पुरुषोत्तम सही साबित हुए, वाकई मेरे घर से गया खाना सड़क किनारे बिखरा हुआ था, जिसे चील, कौव्वे, कुत्ते, चींटिया बिना किसी भेदभाव के लगभग चटकर चुके थे, यह मेरे बर्दाश्त के बाहर था। उस शाम अस्थि कलश यात्रा ब्राह्मणों की सरेरी पहँुचने वाली थी, मैंने वहा जाकर खुल कर बात करने का निश्चय कर लिया था, अब बहुत हो चुका था, निर्णायक जंग का वक्त आ पहँुचा था, लड़ाई शुरू हो गई थी, सिर्फ घोषणा बाकी थी।
कहीं कोई सुनवाई नहीं
शाम को मैं अत्यंत आक्रोश के साथ ब्राह्मणों की सरेरी पहुँचा, मैंने अस्थि कलश यात्रियों से इस शर्मनाक घटनाक्रम के बारे में सफाई माँगी, उन्होंने भोजन फेंकने की घटना से साफ इनकार कर दिया, जब मैंने उन्हें बताया कि पुरुषोत्तम जी ने मुझे यह जानकारी दी है तब उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि भोजन लिए गाड़ी में पीछे बैठे व्यक्ति के हाथ से भगवानपुरा के मोड़ पर जब गाड़ी स्पीड में मुड़ी तो खाना गिर गया, अब भला गिरा हुआ खाना कैसे खाते? इसलिए वैद जी के घर पर रात में खाना बनवा कर खाना पड़ा मैं उनके शब्दों और उनके चेहरे के भावों के बीच फंसे हुए सच को साफ-साफ देख पा रहा था, ये परम पूज्य भाई साहब सफेद झूठ भी कितनी आसानी से बोल रहे हैं। मुझे पक्का यकीन हो गया कि वे सरासर असत्य बोल रहे हैं। अगर खाना किसी के हाथ से गिरता तो सड़क के बीचों बीच गिरता, सड़क के किनारे पर जा कर कैसे गिरा खाना? दूसरे अगर पूरी गिरती तो खीर बची रहती और अगर खीर गिरती तो केतली पर मोच के निशान आते, मगर खीर और पूरी दोनों ही फेंके गए थे जान बूझ कर, उन्होंने पूरे होशोहवास में एक दलित स्वयंसेवक के घर से आया खाना फेंक दिया था, अब इस गलती को गलती मानने के बजाए अजीब से कुतर्क देने पर तुले हुए थे उनके झूठ और जूठ को सच के रूप में स्थापित करने की कोशिश से मेरा दिल फट गया, मुझे अत्यंत लज्जा और अपमान का अहसास हुआ, मैंने महसूस किया कि संघ के लोगों ने सिर्फ मेरे घर का बना खाना ही नहीं फेंका बल्कि मुझे भी दूर फेंक दिया है। मेरे सामने वह सारा समय और घटनाक्रम चलचित्र की भाँति गतिशील था, जब मैं अपनी पूरी क्षमता लगा कर संघ के काम को बढ़ाने पर तुला हुआ था। मैं उस मौके को याद कर रहा था, जब मैं रामजी के नाम पर शहीद होने के लिए घर से भाग गया था अगर मैं अयोध्या पहँुचने में सफल हो जाता और सरयू पुल पर पुलिस की गोली का शिकार हो जाता तो क्या वे मेरी लाश को भी छूते, मेरी मृतदेह घर भी पहँुचाई जाती या खाने की ही तरह सरयू में फेंक दी जाती? मैंने खुद से सवाल किया कि क्या मैं इसी हिन्दू राष्ट्र के लिए मरने मारने पर उतारू हूँ, जिसमें मेरा स्थान ही नहीं है। मेरी औकात क्या है? मेरी अपनी पहचान क्या है? मैं क्या हूँ? आखिर कौन हूँ मैं? एक रामभक्त कारसेवक हिन्दू या शूद्र अछूत जिसके घर का बना खाना भी स्वीकार नहीं। हिन्दू राष्ट्र की ध्वजा फहराने वालों के साथ मैं अपने को किस पहचान के साथ खड़ा करूँ?
बहुत सोचा पाया कि हिन्दू वर्ण व्यवस्था में शूद्र और जाति व्यवस्था में अछूत हूँ मैं अवर्ण मैं भले ही स्वयंसेवक था लेकिन पूरा हिन्दू नहीं था इसलिए मेरी स्वीकार्यता नहीं थी इसीलिए मुझे विस्तारक बनने की तो सलाह दी गई थी लेकिन प्रचारक बनने से रोक दिया गया था बस, अब मुझे खुद को जानना है, अपने साथ हुए हादसे के कारणों को खोजना है और उन कारणों को जड़ से मिटा देना है। मैंने इस अन्याय और भेदभाव के खिलाफ नागपुर तक अपनी आवाज बुलंद करने का निश्चय कर लिया मैं अस्थि कलश यात्रा के साथ चल रहे नेताओं से लेकर संघ के विभिन्न स्तर के प्रचारकों के पास गया मैंने कोई भी जगह और स्तर नहीं बाकी रख छोड़ा, जहाँ अपनी व्यथा नहीं पहँुचाई हो लेकिन सुनवाई कहीं भी नहीं होती दिखी, तब मैंने माननीय सर संघचालक रज्जू भैय्या तक भी अपनी गुहार लगाई। उन्हें पत्र लिखा, सारी बात लिखी और कहा कि आपके संगठन के स्थानीय ठेकेदार नहीं चाहते हैं कि मैं अब और एक भी दिन हिन्दू के नाते रहूँ और काम करूँ, लेकिन संघ के नक्कारखाने में मुझ तूती की आवाज को कौन सुनता? वहाँ भी किसी ने नहीं सुना सही बात तो यह थी कि सुनना ही नहीं था, जिन-जिन भी संघ प्रचारकों और पदाधिकारियों से मैं मिला, उन्होंने इसे एक बहुत छोटी सी बात कह कर टाल दिया, उल्टे मुझे ही नसीहतें मिलीं कि इस बात को छोड़कर मैं सकारात्मक काम में मन लगाऊँ पर मैं मानने को कतई तैयार नहीं था कि यह छोटी सी बात है, तब भी नहीं और आज भी नहीं, छुआछूत और भेदभाव किसी भी इन्सान की जिन्दगी में छोटी सी बात नहीं होती है, सिर्फ हिन्दू राष्ट्र के निर्माताओं के लिए यह छोटी सी बात हो सकती है।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
edc58-01

पुलिस वाले लाठियाँ लिए टूट पडे़
मैं इस उपद्रव बनाम आन्दोलन का हिस्सा था और कुछ हद तक अगुवाई में भी था, इसलिए थोड़ी बहुत देर तो पथराव में भागीदार रहा, फिर जब आस पास के लोग छँटने लगे तो मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ कि अकेले ही पत्थर फेंक रहा हूँ, कहीं पुलिस की लाठी गोली का शिकार हो गया, तो भय का अहसास हुआ इधर-उधर देखा, सामने ही भीमगंज स्कूल था, दौड़कर उसमंे घुस गया और बच्चों के बीच छिप कर बैठ गया, काफी देर तक बाहर से गोलियाँ चलने की आवाजें आती रही, पता चला कि कफ्र्यू लगाने की घोषणा की जा चुकी है, अब शायद बाहर जाना संभव नहीं हो पाएगा, तब चिंता हुई, क्या करूँ, कैसे बाहर जाऊँगा, पर यह सोच कर शांत रहा कि इतने सारे बच्चों को भी तो पहँुचाया जाएगा, उन्हीं के साथ चला जाऊँगा।
उपद्रव के शांत होते ही पुलिस की सुरक्षा में बच्चों को घर पहँुचाने का इंतजाम किया गया, पुलिस और शिक्षकों ने मिल कर सब बच्चों को बाहर निकाला, मैं भी अन्य बच्चों के साथ-साथ बाहर तक आया, ज्यों ही गली में पहँुचा, पाँच छह पुलिसवाले लाठियाँ लिए मुझ पर टूट पड़े, मैं समझ ही नहीं पाया कि इतने विद्यार्थियों में उन्होंने मुझ अकेले को ही कैसे पहचान लिया? मैं भी तो शेष बच्चों की तरह ही दुबला पतला किशोर था, उन्होंने कैसे जाना कि मैं स्टूडेंट नहीं उपद्रवकारी हूँ। मैं उस वक्त अपने ललाट पर तिलक और केसरिया पट्टी जो सिर पर बाँध रखी थी, उसे तो भूल ही चुका था, पुलिसकर्मी मुझ पर धुआँ धार लाठियाँ फटकार रहे थे, मैं गिरते पड़ते आगे-आगे भाग रहा था और वे पीछे-पीछे। अनगिनत लाठियों के वार से उठे दर्द से बिलबिलाता, पुलिस से बचता बचाता मैं भाग कर किसी तरह मानिकनगर होकर महात्मा गाँधी अस्पताल पहँुच गया, जहाँ पर सैंकड़ों की तादाद में आक्रोशित हिन्दू खड़े थे, दोनों मृतकों की लाशें वहाँ पहँुच चुकी थी, कई सारे घायल लोग भी वहाँ लाए जा रहे थे, मैं भी लहूलुहान था, मेरा भी प्राथमिक उपचार किया गया, वहाँ से मुझे संघ कार्यालय पहँुचाया गया, जहाँ पर कफ्र्यू के अगले पाँच दिनों तक मेरी चोट खाई पीठ की मालिश की गई, पंचमुखी बालाजी रिको एरिया के महंत लाल बाबा प्रेमदास महाराज भी हमारे साथ थे और भी लोग थे, किसी तरह वे बुरे दिन बीते, दर्द निवारक गोलियों से दर्द गया तो घर की याद आई, गाँव लौट कर आया, इस पूरे घटनाक्रम से मन में अजीब सा महसूस होने लगा, लगने लगा कि किसी न किसी दिन या तो पुलिस के हाथों अथवा विधर्मी लोगों के हाथों मारा जाऊँगा, हालाँकि उन दिनों बहुत बेचैनी थी फिर भी संघ के प्रतिष्ठा और समर्पण में कोई कमी नहीं आई थी, संघ कार्य को भगवान का काम मानने की प्रवृति इतनी हावी थी कि आरएसएस के खिलाफ एक भी शब्द मुझे बर्दाश्त नहीं होता था, मेरे पिताजी जो कि जन्मजात कट्टर किस्म के कांग्रेसी थे, जो मुझे खाकी नेकर और काली टोपी पहने शाखा में जाते वक्त अक्सर रोकते थे और टोकते हुए कहते थे-यह तुम्हारी बनिया बामन पार्टी कभी हम किसानों और नीची जात वालों की सगी नहीं होगी, ये मियाओं से लड़ाने के लिए हमें काम में लेते हैं, खुद तो लड़ नहीं सकते, डरपोक हैं। मुझे अपने पिताजी की बातों में कांग्रेसी शाख की बू आती थी, मुझे लगता था कि वे भी जातिवाद और मुस्लिम तुष्टिकरण की ओछी और घिनौनी राजनीति के एक मोहरे मात्र हैं, उनको राष्ट्रभक्ति का तनिक भी ज्ञान नहीं है, वरना भला भारत माता की सेवा में लगे एक पवित्र और राष्ट्रवादी संगठन के खिलाफ वे ऐसी बातें कह सकते हैं? मैंने उनकी कभी भी इस मामले में बात नहीं मानी, पहली बार आरएसएस की चड्डी पहनने से लेकर अयोध्या भाग जाने और अब जिला मुख्यालय से बुरी तरह से पिटकर आने तक के हर मौके पर वे विरोध में कर रहे थे। वैसे तो वे शुरू से ही मेरे शाखा में जाने के विरोधी ही थे, कभी कभार बहुत नाराज हो जाते तो मुझे और आरएसएस दोनों को ढेर सारी अश्लील गालियाँ देते। मुझे बुरा तो बहुत लगता, मन होता था कह दूँ कि मुझे दे दो गालियाँ पर संघ को क्यों देते हो? पर सच बताऊँ तो कभी इतनी हिम्मत नहीं हो पाई, सो मन ही मन कुढ़ता रहता था। शायद वे चाहते थे कि या तो मैं पढूँ अथवा खेतों में काम में मदद करूँ, पर मैं सोचता कि-मैं और खेतों में काम? मैं संघ जैसे महान संगठन का स्वयंसेवक, राष्ट्र निर्माण में निमग्न और वे चाहते हैं कि मैं मानव निर्माण की इस फैक्टरी को छोड़ कर उनके साथ भेड़ें चराऊँ? मैं प्रचारक बनने की क्षमता वाला इन्सान चरवाहा बन जाऊँ, नहीं बाबा नहीं, यह कभी भी नहीं होगा, मैंने ठान लिया था कि संघ कार्य जिन्दगी में कभी भी नहीं छोडूँगा, परम पूज्य डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने कहा था कि संघ का कोई भी स्वयंसेवक होता या नहीं होता, वह काम करे या नहीं करे सदैव ही स्वयंसेवक बना रहता है, इसलिए मैं तो सदा सदा स्वयंसेवक बना रहूँगा और सक्रिय ही रहूँगा। पिताजी और घर वाले कुछ भी सोचें या कहें, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, वैसे भी उन जैसे कांग्रेसियों को कभी संघ का ईश्वरीय काम समझ में न तो आया है और न ही आएगा, हम पिता पुत्र के बीच का रिश्ता भी कांग्रेस-आरएसएस के बीच के रिश्ते जैसा रूप लेता जा रहा था, उनका टोकना और चेताना जारी था और मेरी नहीं मानने और अधिकाधिक संघ कार्य में जुटे रहने की जिद जारी थी।
जब मेरे गाँव आई अस्थि कलश यात्रा
अयोध्या में मरे कारसेवकों और भीलवाड़ा में मारे गए रतन लालों को हुतात्मा (शहीद आत्मा) घोषित किया जा चुका था, अब उनकी हड्डियों की कलश यात्रा गाँव-गाँव घुमाई जा रही थी, साधु-संत, संघ, विहिप के पदाधिकारी गण और नौजवान स्वयंसेवक इस यात्रा में साथ चल रहे थे, गाँव-गाँव घूमते हुए मेरे गाँव भी आ पहँुची रामभक्तों की अस्थि कलश यात्रा, रात के 9 बजे मेरे गाँव पहँुचने पर यात्रा का हमने भव्य स्वागत किया, हम युवाओं ने अपनी दलित बस्ती को फूल पत्तियों की बन्दनवार से सजाया, ढोल, थाली, मांदल और शंख बजाते हुए नाचते गाते हुए हमने यात्रा का ‘न भूतो ना भविष्यति’ सत्कार किया। सभा हुई, अयोध्या के राम जन्मस्थल पर मुल्ला यम सिंह सरकार की पुलिस द्वारा की गई बर्बरता पर एक फिल्म का प्रदर्शन किया गया और बाद में संतों और अन्य हिन्दू नेताओं ने भीलवाड़ा में हुए पुलिसिया अत्याचार का बेहद मार्मिक वर्णन किया, मजे की बात यह थी कि उस दिन हुए उपद्रव के दौरान इनमंे से एक भी व्यक्ति को कोई चोट नहीं पहँुची थी लेकिन ऐसा आँखों देखा हाल प्रस्तुत किया कि मौजूद लोगों की ऑंखें भर आईं, हालाँकि मैं खुद भीलवाड़ा में पुलिस जुल्म का शिकार हुआ था, लेकिन इतने मार्मिक अंदाज में मैं भी इस बात को नहीं रख पाता, जितने अच्छे तरीके से उन लोगों ने रखा, जो वहाँ उस रोज मौजूद ही नहीं थे, शायद यही ट्रेनिंग है जो संघ में सीखनी पड़ती है, विद्वान लोग जल्दी ही सीख जाते हंै, वैसे भी इस देश में भूख पर भाषण भूखे इन्सान से ज्यादा अच्छा वे लोग देते हैं जिनका पेट भरा होता है, यहाँ भी वही हो रहा था, हृदय को छू लेने वाले भाषण ‘हिन्दुवः सोदरा सर्वे ‘मतलब कि’ हिन्दू-हिन्दू भाई भाई के नारे लगाए गए, हिन्दू समाज में फैली असमानता की सामाजिक विकृति पर प्रहार किया गया, हिन्दू एकता और संगठित रहने पर बल देते हुए तथा सभी वंचित समुदायों के समाज जनों को गले लगाने के आह्वान के साथ सभा का समापन हुआ।
सभा की समाप्ति पर मैंने सब लोगों से अपने घर भोजन करने का आग्रह किया, हमने अपने घर पर खीर पूरी का भोजन सबके लिए तैयार किया था, जब खाना बन रहा था, तब भी आदतन पिताजी ने टोका टोकी की थी कि-‘क्यों खाने का सामान खराब कर रहे हो, ये लोग यहाँ नहीं खाने वाले हैं, पाखंडी हैं सब, बोलते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं, इनके अन्दर हमारे लिए जहर भरा हुआ है। मैं जल भुन गया, पहली बार मैंने अपनी तमाम ताकत बटोर कर आखिर प्रतिवाद कर ही दिया-आप क्या जानते हैं संघ के बारे में? मैं पाँच साल से उनके साथ हूँ, उनके सबसे बड़े कार्यालय का प्रमुख हूँ, कितने ही स्वयंसेवकों के घर जा कर मैंने खाना खाया है, हमारे संघ में आपके गाँव की तरह छुआछूत और जाति भेदभाव नहीं चलता है, यह सब आपकी कांग्रेस की देन है, पिताजी बोले-‘बेटा कांग्रेस तो हम नीची कौम के लिए माँ का पेट है, तुम इसे कभी नहीं समझोगे। अच्छी बात है अगर तुम्हारी संस्था में सब जातियाँ बराबर हो गई है, तो बनाओ खाना मुझे भी उन्हें खिला कर खुशी होगी, हम बाप बेटे के बीच में यह एक प्रकार का युद्ध विराम था मैं भी राजी और वे भी नाराज नहीं, खाना तैयार था और अब खाने वाले भी तैयार होने वाले थे। मैं बेहद प्रसन्नता और विजयी मुद्रा में भाग-भाग कर काम कर रहा था मैं अपनी जिन्दगी में पहली और आखिरी बार शायद इस अस्थि कलश यात्रा के उसी दिन नाचा भी और गाया भी। मैंने ही आज की सभा का संचालन भी किया था ,मेरे उत्साह और हर्ष की कोई सीमा नहीं थी, मुझे लग रहा था कि मेरे घर रामभक्त नहीं बल्कि साक्षात् भगवान श्री राम पधार रहे हैं ठीक वैसे ही जैसे शबरी के बेर खाने उसकी झोंपडी चले गए थे राम। मैं मन ही मन इसलिए भी खुश था कि आज अपने कांग्रेसी पिता को मैं गलत साबित करने जा रहा था, मैंने उनके प्रभुत्व वाले कांग्रेसी गाँव में हिन्दुत्व का झंडा गाड़ दिया था आज की इस श्रद्धांजलि सभा का सफल आयोजन हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की दिशा में बढ़ता हुआ सफल कदम था, मैंने अपने घर के मुख्य दरवाजे पर आज ही दो स्टीकर लगाए थे-गर्व से कहो हम हिन्दू हैं और बड़े भाग्य से हम हिन्दू हैं।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
edc58-01

अम्बेडकर छात्रावास में विचारधारा भ्रष्ट हो जाएगी
गाँव से जो संघ के साथ सफर शुरू हुआ, वह तहसील मुख्यालय मण्डल होते हुए जिला स्तर भीलवाड़ा तक पहुँच गया, भीलवाड़ा शहर में मैं अम्बेडकर आवासीय छात्रावास का छात्र था, पर वहाँ भी आरएसएस के ही गुणगान करता था, चूँकि मैं नेकर पहन कर रोज शाम शाखा में जाता था, इसलिए कुछ सीनियर छात्र मुझे चड्डा साहब कह कर भी चिढ़ाते थे, लेकिन मुझमें श्रेष्ठता का भाव इतना प्रबल हो चुका था कि मैं अपने आगे सब को हीन मानता था, मुझे लगता था कि ये तुच्छ लोग अभी जानते नहीं हैं कि मैं कितनी महान ईश्वरीय कार्य योजना का हिस्सा हूँ, जिस दिन जान जाएँगे, ये सब लोग नतमस्तक हो जाएँगे। मैं अपनी ही धुन में सवार था, दलित और आदिवासी समुदाय के कई अन्य छात्र जो मेरे साथ हाॅस्टल में रहते थे, मैं उन्हें हिन्दुत्व की विचारधारा के बारे में जानकारियाँ देता था, उनमें से दो चार को तो मैं शाखा में ले जाने में भी सफल रहा, लेकिन वे जल्दी ही भाग छूटे, उन्हें संघ के ड्रेस और तौर तरीके पसंद नहीं आए फिर भी मैं डटा हुआ था, इस बीच भीलवाड़ा के नगर प्रचारक जी का आगमन हमारे छात्रावास में हुआ, मैं तो बहुत खुश था कि प्रचारक महोदय हमारे द्वार आ रहे हैं, वे वाकई आए, उन्होंने अम्बेडकर छात्रावास के स्टूडेंट्स के रंग ढंग देखे और मुझसे बोले-आपको यहाँ नहीं रहना चाहिए, इस अम्बेडकर छात्रावास में तो आपकी विचार धारा ही भ्रष्ट हो जाएगी। अब मैं विचारधारा को बचाने के लिए अम्बेडकर छात्रावास छोड़कर आरएसएस के जिला कार्यालय पहँुच गया था, जहाँ पर जल्दी ही मुझे जिला कार्यालय प्रमुख का दायित्व मिल गया, मुझमें शुद्धता और श्रेष्ठता का भाव और सघन हो गया, मुझे अपने हिन्दू होने पर बड़ा गर्व पैदा हो गया था, मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता था, मानू भी क्यों नहीं क्योंकि मेरे मन में समाया हुआ था कि हम हिन्दुओं ने ही दुनिया को सभ्यता सिखाई, हमने अंक और दशमलव दिया, हमारे वेद ईश्वरीय हैं, जिनके मुकाबले ज्ञान में विश्व के सभी धर्म ग्रन्थ बौने दिखाई पड़ते हैं, हमारे यहाँ हर प्राणी में भगवान माने गए और नारियों को देवियाँ, ऐसी महानतम संस्कृति का हिस्सा होना सबसे अधिक पुण्य और गर्व का ही तो काम है, उन दिनों हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान-माँग रहा है सकल जहान जैसे नारे लगा कर सीना फूल जाता था, संघ से पूरी तरह से सराबोर हो जाने के कारण किसी और विचार के लिए मेरे दिमाग में जगह ही नहीं बची थी। इसीलिए मनुस्मृति पर गर्व करना तो आ गया पर भारत का संविधान किस चिडि़या का नाम है, यह पता ही नहीं था, उन दिनों मैंने महाराणा प्रताप का यशोगान तो खूब गाया, पर भीलू राना पूंजा के बारे में कुछ भी नहीं जाना। मीरा के प्रेम और भक्ति के पद पायोजी म्हे तो राम रतन धन पायो तो याद रहा पर संत रैदास से जान पहचान ही नहीं हो सकी, खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी, की कीर्ति पताका तो फहराई, लेकिन कौन थी झलकारी बाई, कुछ पता नहीं लगा, अगर जाना भी तो वंचितों का यही इतिहास, जिसमें राम को जूठे बैर खिलाती शबरी, द्रोणाचार्य को श्रद्धावनत होकर अँगूठा काट कर देता गुरु भक्त एकलव्य, सीना चीरकर स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करते हनुमान, कपडे़ धोते धोबी, जूते बनाता चर्मकार, सफाई करता स्वच्छकार यानी कि वही प्राचीन जाति व्यवस्था और वही पुश्तैनी कर्म!
उन दिनों मेरे आदर्श अम्बेडकर, फुले, कबीर या बुद्ध नहीं थे, क्योंकि इन्हें तो जाना ही नहीं, जिन्हें जान पाया वे राष्ट्रनायक थे सावरकर, तिलक, गोखले और हेडगेवार तथा गुरूजी गोलवलकर ये ही आदर्श थे और ये ही मेरी प्रेरणा के स्रोत थे, नगर प्रचारक जी ने सही ही कहा था कि अगर मैं अम्बेडकर छात्रावास में टिक जाता तो शायद मेरी विचारधारा जल्दी ही भ्रष्ट हो जाती।
आचार्य रजनीश, आरएसएस और मैं
विचारधारा की चूल हिलने की शुरुआत मेरे संघ कार्यालय में रहते हुए अनायास ही हो गई, उन्हीं नगर प्रचारक महोदय के साथ एक दिन मैं तीरथ दास जी नामक स्वयंसेवक के घर गया, जो हाल में ओशो रजनीश से प्रभावित होकर संघ कार्य में शिथिलता बरतने लगे थे, हम उन्हें समझाने और वापस सही रास्ते पर लाने गए, हमें लगा कि वे वैचारिक विचलन के शिकार हो गए हैं, उनसे नगर प्रचारक जी ने लम्बी बातचीत की, लेकिन वे टस से मस भी नहीं हुए, आते वक्त उन्होंने एक अखबार ओशो टाइम्स भेंट किया, जो प्रचारक जी ने तो हाथ में भी नहीं लिया पर मैं ले आया और जिला कार्यालय में बैठ कर पढ़ने लगा, प्रचारक जी को यह सहन नहीं हुआ, उन्होंने ओशो टाइम्स मेरे हाथों से छीनकर फेंकते हुए कहा-यह आदमी विचारों में भटकाव लाता है, गुमराह कर देता है, इसको जिन्दगी में कभी मत पढ़ना।
मैं स्तब्ध रह गया, मेरे मन में यह सवाल उठा कि पढ़ने से विचारधारा में भटकन कैसे आ सकती है? इस एक घटना ने मेरी रुचि ओशो के साहित्य में जगा दी, मैंने चोरी छिपे ओशो टाइम्स पढ़ना शुरू कर दिया और इस तरह मेरे मस्तिष्क की अन्य खिड़कियाँ भी खुलने लगी और संघ की पवित्र और शुद्ध विचारधारा अंततः भ्रष्ट होने लगी।
गुलमंडी क्या पाकिस्तान में है ?
मेरे प्रचारक बनने का सपना भले ही धराशायी हो गया था और थोड़ा बहुत ओशो को भी पढ़ने लगा था, मगर संघ, राष्ट्र निर्माण और हिन्दुत्व से मोह बरकरार था, अम्बेडकर छात्रावास छोड़ देने के बाद पूरी तरह से आरएसएस के जिला कार्यालय में रहते हुए एक निष्ठावान स्वयंसेवक के तौर पर मैं अब भी कार्यरत था। किसी विकल्प या वैकल्पिक विचारधारा के बारे में सोचने जितना खुलापन अभी नहीं आ पाया था इसलिए हिन्दू राष्ट्र के निर्माण हेतु रात दिन लगा हुआ ही था, अयोध्या की पहली कारसेवा की असफलता के बावजूद देश भर में राम मंदिर बनाने के लिए हिन्दू जन मानस में उबाल आया हुआ था, संघ परिवारीय संस्थाएँ मंदिर बनाओ या गद्दी छोड़ो आन्दोलन चला रही थीं। 12 मार्च 1992 का दिन था, हम राम मन्दिर निर्माण की माँग को लेकर एक विशाल जुलूस सांगानेरी गेट भीलवाड़ा से प्रारम्भ करके मुस्लिम बहुल इलाके गुलमंडी में होते हुए जिला कलेक्टर कार्यालय तक ले जाना चाहते थे, हजारों की तादाद में उत्साही रामभक्त सिर पर भगवा पट्टी बांधकर सौगन्ध राम की खाते हैं, के नारे लगाते हुए दूधाधारी मन्दिर के बाहर खड़ेे थे। हालाँकि प्रदेश में भाजपा का राज था, ौरों सिंह शेखावत मुख्यमंत्री थे और बंशी लाल पटवा भीलवाड़ा के विधायक, मतलब यह कि प्रदेश में अपनी ही सरकार थी, लेकिन पुलिस वाले रास्ता रोके खड़े थे, जुलूस आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा था।
उस दिन शुक्रवार था, जुम्मे की नमाज और हमारे जुलूस का वक्त लगभग एक ही होने की वजह से पुलिस को कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती नजर आ रही थी, इसलिये प्रशासन हम आन्दोलनकारियों को समझाने की कोशिश में लगा था, पुलिसया रिपोर्टों ने दोनों समुदायों के बीच भिडंत की आशंका जताई थी, पुलिस ने राम के भक्तों से रास्ता बदल देने का आग्रह किया, पर स्टेट में संघ की ही सत्ता थी, इसलिए हम तो बेखौफ थे पुलिस जरुर दबी हुई सी थी, उनके आला अधिकारियों ने हमारे बड़े नेताओं से खूब मिन्नतें की, हम कहाँ मानने वाले थे। हमने रास्ता बदलने से यह कह कर साफ इंकार कर दिया कि हमारा जुलूस गुलमंडी में क्यों होकर न जाएँ, वह क्या पाकिस्तान में है? हमने कहा-जाएँगे तो उधर से ही, चाहे जो हो जाएँ। अभी पुलिस और रामभक्तों में तकरार चल ही रही थी कि जुलूस के पीछे से पथराव शुरू हो गया, स्थितियाँ बिगड़ती देखकर पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा, घुड़सवार पुलिस ने रामभक्तों को निर्ममता से कुचला, फिर भी स्थिति बेकाबू ही बनी रही, हालात और बिगड़े तो हवाई फायर हुए और अंततः कई राउंड गोलियाँ बरसाई गई, जिसमें दो लोग शहीद हो गए। एक खामोर के रतन लाल थे तो दूसरे भीलवाड़ा के रतन लाल, एक सेन थे तो दूसरे जैन, दोनों का ही राम जन्मभूमि आन्दोलन और इस उपद्रव से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था, हकीकत तो यह थी कि भीलवाड़ा निवासी रतन लाल जैन डेयरी में रात्रिकालीन ड्यूटी करके लौटे थे और दिन के वक्त घर में आराम कर रहे थे, धाय धाय की आवाजों से जगे और बाहर यह देखने निकले कि हो क्या रहा है, इतने में पुलिस की एक गोली उनकी छाती में समा गई, दूसरे खामोर गाँव के निवासी रतन लाल सेन बाजार में खरीददारी करने आए हुए थे और पुलिस की गोली के शिकार हो गए, लेकिन संयोग से दोनों ही मरने वाले हिन्दू थे, इसलिए दोनों को शहीद घोषित करके उनका अस्थि कलश निकाले जाने की घोषणा तुरत फुरत ही कर दी गयी।
हालाँकि दोनों ही मृतकों का राम जन्मभूमि और संघ परिवार से कोई लेना देना नहीं था, उन्होंने दुर्घटनावश ही अपने प्राण खोए थे मगर फिर भी उन्हें शहीद का दर्जा मिल गया, अच्छा हुआ कि दोनों मरने वाले हिन्दू थे, इसलिए ‘शहीद’ हो गए, मुसलमान होते तो ‘ढेर‘ हो जाते।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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