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अम्बेडकर छात्रावास में विचारधारा भ्रष्ट हो जाएगी
गाँव से जो संघ के साथ सफर शुरू हुआ, वह तहसील मुख्यालय मण्डल होते हुए जिला स्तर भीलवाड़ा तक पहुँच गया, भीलवाड़ा शहर में मैं अम्बेडकर आवासीय छात्रावास का छात्र था, पर वहाँ भी आरएसएस के ही गुणगान करता था, चूँकि मैं नेकर पहन कर रोज शाम शाखा में जाता था, इसलिए कुछ सीनियर छात्र मुझे चड्डा साहब कह कर भी चिढ़ाते थे, लेकिन मुझमें श्रेष्ठता का भाव इतना प्रबल हो चुका था कि मैं अपने आगे सब को हीन मानता था, मुझे लगता था कि ये तुच्छ लोग अभी जानते नहीं हैं कि मैं कितनी महान ईश्वरीय कार्य योजना का हिस्सा हूँ, जिस दिन जान जाएँगे, ये सब लोग नतमस्तक हो जाएँगे। मैं अपनी ही धुन में सवार था, दलित और आदिवासी समुदाय के कई अन्य छात्र जो मेरे साथ हाॅस्टल में रहते थे, मैं उन्हें हिन्दुत्व की विचारधारा के बारे में जानकारियाँ देता था, उनमें से दो चार को तो मैं शाखा में ले जाने में भी सफल रहा, लेकिन वे जल्दी ही भाग छूटे, उन्हें संघ के ड्रेस और तौर तरीके पसंद नहीं आए फिर भी मैं डटा हुआ था, इस बीच भीलवाड़ा के नगर प्रचारक जी का आगमन हमारे छात्रावास में हुआ, मैं तो बहुत खुश था कि प्रचारक महोदय हमारे द्वार आ रहे हैं, वे वाकई आए, उन्होंने अम्बेडकर छात्रावास के स्टूडेंट्स के रंग ढंग देखे और मुझसे बोले-आपको यहाँ नहीं रहना चाहिए, इस अम्बेडकर छात्रावास में तो आपकी विचार धारा ही भ्रष्ट हो जाएगी। अब मैं विचारधारा को बचाने के लिए अम्बेडकर छात्रावास छोड़कर आरएसएस के जिला कार्यालय पहँुच गया था, जहाँ पर जल्दी ही मुझे जिला कार्यालय प्रमुख का दायित्व मिल गया, मुझमें शुद्धता और श्रेष्ठता का भाव और सघन हो गया, मुझे अपने हिन्दू होने पर बड़ा गर्व पैदा हो गया था, मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता था, मानू भी क्यों नहीं क्योंकि मेरे मन में समाया हुआ था कि हम हिन्दुओं ने ही दुनिया को सभ्यता सिखाई, हमने अंक और दशमलव दिया, हमारे वेद ईश्वरीय हैं, जिनके मुकाबले ज्ञान में विश्व के सभी धर्म ग्रन्थ बौने दिखाई पड़ते हैं, हमारे यहाँ हर प्राणी में भगवान माने गए और नारियों को देवियाँ, ऐसी महानतम संस्कृति का हिस्सा होना सबसे अधिक पुण्य और गर्व का ही तो काम है, उन दिनों हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान-माँग रहा है सकल जहान जैसे नारे लगा कर सीना फूल जाता था, संघ से पूरी तरह से सराबोर हो जाने के कारण किसी और विचार के लिए मेरे दिमाग में जगह ही नहीं बची थी। इसीलिए मनुस्मृति पर गर्व करना तो आ गया पर भारत का संविधान किस चिडि़या का नाम है, यह पता ही नहीं था, उन दिनों मैंने महाराणा प्रताप का यशोगान तो खूब गाया, पर भीलू राना पूंजा के बारे में कुछ भी नहीं जाना। मीरा के प्रेम और भक्ति के पद पायोजी म्हे तो राम रतन धन पायो तो याद रहा पर संत रैदास से जान पहचान ही नहीं हो सकी, खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी, की कीर्ति पताका तो फहराई, लेकिन कौन थी झलकारी बाई, कुछ पता नहीं लगा, अगर जाना भी तो वंचितों का यही इतिहास, जिसमें राम को जूठे बैर खिलाती शबरी, द्रोणाचार्य को श्रद्धावनत होकर अँगूठा काट कर देता गुरु भक्त एकलव्य, सीना चीरकर स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करते हनुमान, कपडे़ धोते धोबी, जूते बनाता चर्मकार, सफाई करता स्वच्छकार यानी कि वही प्राचीन जाति व्यवस्था और वही पुश्तैनी कर्म!
उन दिनों मेरे आदर्श अम्बेडकर, फुले, कबीर या बुद्ध नहीं थे, क्योंकि इन्हें तो जाना ही नहीं, जिन्हें जान पाया वे राष्ट्रनायक थे सावरकर, तिलक, गोखले और हेडगेवार तथा गुरूजी गोलवलकर ये ही आदर्श थे और ये ही मेरी प्रेरणा के स्रोत थे, नगर प्रचारक जी ने सही ही कहा था कि अगर मैं अम्बेडकर छात्रावास में टिक जाता तो शायद मेरी विचारधारा जल्दी ही भ्रष्ट हो जाती।
आचार्य रजनीश, आरएसएस और मैं
विचारधारा की चूल हिलने की शुरुआत मेरे संघ कार्यालय में रहते हुए अनायास ही हो गई, उन्हीं नगर प्रचारक महोदय के साथ एक दिन मैं तीरथ दास जी नामक स्वयंसेवक के घर गया, जो हाल में ओशो रजनीश से प्रभावित होकर संघ कार्य में शिथिलता बरतने लगे थे, हम उन्हें समझाने और वापस सही रास्ते पर लाने गए, हमें लगा कि वे वैचारिक विचलन के शिकार हो गए हैं, उनसे नगर प्रचारक जी ने लम्बी बातचीत की, लेकिन वे टस से मस भी नहीं हुए, आते वक्त उन्होंने एक अखबार ओशो टाइम्स भेंट किया, जो प्रचारक जी ने तो हाथ में भी नहीं लिया पर मैं ले आया और जिला कार्यालय में बैठ कर पढ़ने लगा, प्रचारक जी को यह सहन नहीं हुआ, उन्होंने ओशो टाइम्स मेरे हाथों से छीनकर फेंकते हुए कहा-यह आदमी विचारों में भटकाव लाता है, गुमराह कर देता है, इसको जिन्दगी में कभी मत पढ़ना।
मैं स्तब्ध रह गया, मेरे मन में यह सवाल उठा कि पढ़ने से विचारधारा में भटकन कैसे आ सकती है? इस एक घटना ने मेरी रुचि ओशो के साहित्य में जगा दी, मैंने चोरी छिपे ओशो टाइम्स पढ़ना शुरू कर दिया और इस तरह मेरे मस्तिष्क की अन्य खिड़कियाँ भी खुलने लगी और संघ की पवित्र और शुद्ध विचारधारा अंततः भ्रष्ट होने लगी।
गुलमंडी क्या पाकिस्तान में है ?
मेरे प्रचारक बनने का सपना भले ही धराशायी हो गया था और थोड़ा बहुत ओशो को भी पढ़ने लगा था, मगर संघ, राष्ट्र निर्माण और हिन्दुत्व से मोह बरकरार था, अम्बेडकर छात्रावास छोड़ देने के बाद पूरी तरह से आरएसएस के जिला कार्यालय में रहते हुए एक निष्ठावान स्वयंसेवक के तौर पर मैं अब भी कार्यरत था। किसी विकल्प या वैकल्पिक विचारधारा के बारे में सोचने जितना खुलापन अभी नहीं आ पाया था इसलिए हिन्दू राष्ट्र के निर्माण हेतु रात दिन लगा हुआ ही था, अयोध्या की पहली कारसेवा की असफलता के बावजूद देश भर में राम मंदिर बनाने के लिए हिन्दू जन मानस में उबाल आया हुआ था, संघ परिवारीय संस्थाएँ मंदिर बनाओ या गद्दी छोड़ो आन्दोलन चला रही थीं। 12 मार्च 1992 का दिन था, हम राम मन्दिर निर्माण की माँग को लेकर एक विशाल जुलूस सांगानेरी गेट भीलवाड़ा से प्रारम्भ करके मुस्लिम बहुल इलाके गुलमंडी में होते हुए जिला कलेक्टर कार्यालय तक ले जाना चाहते थे, हजारों की तादाद में उत्साही रामभक्त सिर पर भगवा पट्टी बांधकर सौगन्ध राम की खाते हैं, के नारे लगाते हुए दूधाधारी मन्दिर के बाहर खड़ेे थे। हालाँकि प्रदेश में भाजपा का राज था, ौरों सिंह शेखावत मुख्यमंत्री थे और बंशी लाल पटवा भीलवाड़ा के विधायक, मतलब यह कि प्रदेश में अपनी ही सरकार थी, लेकिन पुलिस वाले रास्ता रोके खड़े थे, जुलूस आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा था।
उस दिन शुक्रवार था, जुम्मे की नमाज और हमारे जुलूस का वक्त लगभग एक ही होने की वजह से पुलिस को कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती नजर आ रही थी, इसलिये प्रशासन हम आन्दोलनकारियों को समझाने की कोशिश में लगा था, पुलिसया रिपोर्टों ने दोनों समुदायों के बीच भिडंत की आशंका जताई थी, पुलिस ने राम के भक्तों से रास्ता बदल देने का आग्रह किया, पर स्टेट में संघ की ही सत्ता थी, इसलिए हम तो बेखौफ थे पुलिस जरुर दबी हुई सी थी, उनके आला अधिकारियों ने हमारे बड़े नेताओं से खूब मिन्नतें की, हम कहाँ मानने वाले थे। हमने रास्ता बदलने से यह कह कर साफ इंकार कर दिया कि हमारा जुलूस गुलमंडी में क्यों होकर न जाएँ, वह क्या पाकिस्तान में है? हमने कहा-जाएँगे तो उधर से ही, चाहे जो हो जाएँ। अभी पुलिस और रामभक्तों में तकरार चल ही रही थी कि जुलूस के पीछे से पथराव शुरू हो गया, स्थितियाँ बिगड़ती देखकर पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा, घुड़सवार पुलिस ने रामभक्तों को निर्ममता से कुचला, फिर भी स्थिति बेकाबू ही बनी रही, हालात और बिगड़े तो हवाई फायर हुए और अंततः कई राउंड गोलियाँ बरसाई गई, जिसमें दो लोग शहीद हो गए। एक खामोर के रतन लाल थे तो दूसरे भीलवाड़ा के रतन लाल, एक सेन थे तो दूसरे जैन, दोनों का ही राम जन्मभूमि आन्दोलन और इस उपद्रव से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था, हकीकत तो यह थी कि भीलवाड़ा निवासी रतन लाल जैन डेयरी में रात्रिकालीन ड्यूटी करके लौटे थे और दिन के वक्त घर में आराम कर रहे थे, धाय धाय की आवाजों से जगे और बाहर यह देखने निकले कि हो क्या रहा है, इतने में पुलिस की एक गोली उनकी छाती में समा गई, दूसरे खामोर गाँव के निवासी रतन लाल सेन बाजार में खरीददारी करने आए हुए थे और पुलिस की गोली के शिकार हो गए, लेकिन संयोग से दोनों ही मरने वाले हिन्दू थे, इसलिए दोनों को शहीद घोषित करके उनका अस्थि कलश निकाले जाने की घोषणा तुरत फुरत ही कर दी गयी।
हालाँकि दोनों ही मृतकों का राम जन्मभूमि और संघ परिवार से कोई लेना देना नहीं था, उन्होंने दुर्घटनावश ही अपने प्राण खोए थे मगर फिर भी उन्हें शहीद का दर्जा मिल गया, अच्छा हुआ कि दोनों मरने वाले हिन्दू थे, इसलिए ‘शहीद’ हो गए, मुसलमान होते तो ‘ढेर‘ हो जाते।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

साहित्य में समाज के खोज के अर्थ को जानने से पहले हमें इस बात पर विचार कर लेना आवश्यक जान पड़ता है कि साहित्य और समाज में किस तरह के सम्बन्ध हैं ? क्योंकि साहित्य की अनेक परिभाषाएँ दी गईं हैं । बालकृष्ण भट्ट ने साहित्य को ‘जन समूह के हृदय का विकास’ माना है तो महावीर प्रसाद द्वेदी ने साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ माना है । मुक्तिबोध ने ‘कलाकृति को जीवन की पुनर्रचना’ माना है और रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्य को ‘जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब’ माना है । साहित्य समाज में होने वाली घटनाओं को केवल हूबहू प्रस्तुत नहीं कर देता बल्कि समस्याओं से निकलने की राह भी दिखाता है । शायद इसीलिए प्रेमचंद ने ‘साहित्य को समाज के आगे.आगे चलने वाली मशाल’ कहा है । इसके साथ ही वह साहित्य का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन करना नही मानते हैंए बल्कि साहित्य को व्यक्ति के ‘विवेक को जाग्रत करने वाला’ तथा ‘आत्मा को तेजोदीप्त’ बनाने वाला मानते हैं । कहने का अर्थ यह है कि सभी विद्वान साहित्य से समाज के घनिष्ट सम्बन्ध तो स्वीकार करते हैं ।
अब प्रश्न उठता है कि साहित्य में अभिव्यक्त समाज को कैसे देखा जाए ! इस पर कई सवाल उठते हैं । क्या साहित्य में अभिव्यक्त समाज को हम प्रामाणिक मान सकते हैं ? जबकि साहित्य में साहित्यकार की कल्पनाएँए आशाएँ एवं आकांक्षाएँ भी व्यक्त होती हैं । इन प्रश्नों पर विचार करते हुए हमें पाश्चात्य जगत् के विद्वानों की मान्यताओं पर भी ध्यान देना चाहिए । ‘साहित्य से समाज का घनिष्ट संबंध सबसे पहले नारी मादाम स्तेल स्वीकार करते हुए साहित्य, समाज और राजनीति में भी घनिष्ट संबंध स्थापित किया ।’1 ‘आगे चलकर मादाम स्तेल की मान्यता का विकास तेन ने किया । तेन साहित्य को समाज के बारे में जानने के लिए प्रमुख स्रोत स्वीकार करते थे रिचर्ड हो गार्ड ने भी ‘साहित्य कल्पना’ से ‘समाजशास्त्रीय कल्पना’ का संबंध स्वीकार करते हैं ।’2 चूंकि साहित्यकार भी सभ्यताए संस्कृति और समाज की ही निर्मित है । उनकी कलपनाएँ और आकांक्षाएँ भी इसी समाज से अर्जित होती हैं, अत: साहित्य में समाहित कलपनाओं का भी समाजशास्त्रीय अधययन संभव है ।
हम देखते हैं कि साहित्यिक रचना एक सामाजिक कर्म है और कृति एक ‘सामाजिक उत्पादन’ । रचना दृ भाषाए भाव और विचारों का विन्यास है । रचना का मर्म उसकी संवेदना और उसकी मानवीय चिंताएं सामाजिक मनोभूमि पर ही प्रतिष्ठित होती हैं । एक सर्जक किसी रचना को जो रूप.आकार और कल्पना देता है वह समाजनिष्ठ होती है । समाज जो कि एक अमूर्त अवधारणा है, उसका सघन और अधिक वर्चस्वकारी रूप हम समूह और समुदाय में देखते हैं । साहित्य रचना और बोध की प्रक्रिया कभी भी अपने सामाजिक संदर्भ से अप्रभावित नहीं रही है । चूंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और मनुष्य की मनुष्यता की अभिव्यक्ति कला और साहित्य के माघ्यम से होती है । साहित्य यदि संवेदनवान होता है तो इसीलिए की उसमें मानव जीवन की उपस्थित भी है । मानव वस्तु नही है इसीलिए उसकी संवेदना वस्तु की तरह ठोस नही होती । साहित्य सृजन हमारा भौतिक सौन्दर्य नही है बल्कि वह हमारी आत्मा का सौन्दर्य हैए वह हमारी भावना और मानस का सौन्दर्य है । मनुष्य के प्रत्येक विचार उसके भाव, उसके कार्य, समुदाय अथवा समाज के भावों,विचारों तथा कार्यों से अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध रहते हैं । क्योंकि समाज से बाहर व्यक्ति का सामाजिक अस्तित्व ही नही रहता । इसीलिए तो जिसे असामाजिक या व्यक्तिवादी साहित्य कहा जाता है उसका भी समाज से एक तरह का रिश्ता होता है और साहित्य में समाज को खोजने का अर्थ निश्चित करते समय इसका भी ध्यान रखना चाहिए ।
हम देखते हैं कि केवल रचना में ही समाज नही होता बल्कि रचना के हर स्तर पर यहाँ तक कि शिल्प, भाषा,संरचना सबमें समाज की अभिव्यक्ति होती है । अब सवाल उठता है कि क्या साहित्य में समाज सीधे.सीधे उतरता है ? अगर हमें कुछ साल पहले का इतिहास जानना हो तो क्या हम साहित्य की मदद ले सकते हैं ?यदि हम स्तंत्रता संग्राम के समय का साहित्य उठाते हैं तो पाते हैं कि उस समय का साहित्य लोगों को जागरुक कर रहा था । इस संदर्भ में अमृतलाल नागर की ‘गदर के फूल’ और मैथलीशरण गुप्त की ‘भारत.भरती’ जैसी रचनाएँ देखी जा सकती हैं । स्वतंत्रता संग्राम के समय की रचनाओं में विद्रोह के स्वर मुखर हो रहे थे, इसलिए उस समय की कविताओं, कहानियों,उपन्यासों और नाटकों को प्रतिबंधित किया जा रहा था । अत: स्पष्ट है कि साहित्य समाज और राजनीति से निर्पेक्ष नहीं होता है और अगर देखा जाए तो साहित्य का इतिहास भी समाज के इतिहास से कटा नहीं रह सकता क्योंकि साहित्य का इतिहास भी समाज से जुड़ा हुआ होता है । किसी विद्वान ने सही ही कहा है कि साहित्य में सिर्फ तिथियाँ नही हैं, बाकी वह पूर्ण सामाजिक इतिहास होता है । इसलिए यदि हम सामाजिक इतिहास को ठीक से समझना चाहते हैं तो हमें साहित्य के शरण में जाना पड़ेगा । आज तक जो भी इतिहास लिखे गये हैं उसमें अधिकांश शासक वर्ग के दृष्टिकोण से लिखे गये हैं जिसमें प्राय: कुलीन वर्ग का ही प्रतिनिधित्व रहता है । आम जन प्राय: उसमें से गायब ही रहता है । यह सब तभी जान पाते हैं जब हम उस इतिहास में अभिव्यक्त समाज की खोज करते हैं । शायद इसीलिए आज ‘सबल्टर्न हिस्ट्री’ की मांग हो रही है । और इस प्रकार के इतिहास लेखन में उस समय का साहित्य काफी मदद्गार साबित हो सकता है । जैसे मध्ययुगीन स्त्रियों, दलितों एवं वनवासियों की स्थिति के बारे में ‘रामचरितमानस’ से जाना जा सकता है ।
यदि हमें स्वतंत्रता के बाद आंचलिक क्षेत्र में किस तरह राजनीतिक स्थिति थी उसे समझना होता है तो हम रेणु के ‘मैला आंचल’ को लेते हैं । यदि हम दलित जीवन की यंत्रणा को समझना चाहते हैं तो ओमप्रकाश वाल्मीकि सहित अनेक दलित साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ते हैं,और वर्तमान समय में देखा जाय तो स्त्री जीवन की विडम्बनाओं, इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूरी अभिव्यक्ति मैत्रेयी पुष्पा, प्रभाखेतान, अनामिका आदि की रचनाओं में प्रखर रूप से सामने आयी हैं और यदि हम उत्तर भारत के किसानों के जीवन को समझना चाहते हैं तो ‘गोदान’ को उठाते हैं । यहाँ मेरे कहने का अर्थ यही है कि इन सारी रचनाओं नें अभिव्यकत समाज की खोज करते हैं तभी हम यह जान पाते कि’ ‘गोदान’ किसान जीवन की महागाथा है’ । हजारी प्रसाद द्वेदी ने तो प्रेमचंद के विषय में यहाँ तक कह देते हैं कि ‘अगर आप उत्तर भारत के समस्त जनता के आचार दृविचार जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता’ । इस प्रकार के विचार साहित्य में समाज के खोज के अर्थ को अच्छी तरह से साबित करते हैं । बीसवीं सदी के दूसरे.तीसरे दशक का सामाजिक इतिहास ‘गोदान’ से अच्छा कहाँ मिलेगा ।
साहित्य में समाज के खोज की प्रक्रिया में उपलब्ध समाजशास्त्रीय पद्धतियों से बहुत मदद मिल सकती है । उदाहरण के लिए रणेन्द्र के उपन्यास ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ में आदिवासी जीवन की समस्याओं, विस्थापन की समस्या तथा जमीन्दार एवं आदिवासी समुदाय के बीच के संघर्षों को मार्क्सवादी समाजशास्त्रीय पद्धति एवं ,अस्मितावादी, आलोचना पद्धति की मदद् से बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं । इसी तरह से विभिन्न रचनाओं में समाज की खोज संरचनावादी, अनुभववादी आदि अध्ययन पद्धतियों से भी की जा सकती है ।
साहित्य में समाज के खोज का उद्देश्य, साहित्य के सामाजिक आधार को रेखांकित करना है तथा समाज की बदलती परिस्थितियों के साथ साहित्य में परिवर्तन को बतलाना है । इस प्रक्रिया के तहत’नए समाज’ के निर्माण में रचनाकार की आकांक्षओं और ‘रचना प्रक्रिया’ को महत्व देना भी आलोचक का दायित्व हो सकता है ।
इस प्रकार साहित्य में समाज गहरे रूप से व्याप्त है और उसकी खोज की जानी चाहिए क्योंकि साहित्य ‘अंतत तिथिरहित सामाजिक इतिहास है ।’
संदर्भ.सूची
1- मैनेजर पाण्डेय . साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, तृतीय संस्करण – 2006, पृष्ठ संख्या – 13
2. वही पृष्ठ संख्या – 18
सहायक.ग्रंथ.सूची
1. मैनेजर पाण्डेय . आलोचना की सामाजिकता,वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,2005
2. संपा..निर्मला जैन . साहित्य का समाजशास्त्रीय चिंतनए हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, नई दिल्ली विश्वविद्यालय, 1986
-सोनम मौर्या
पी.एच.डी.
प्रथम वर्ष
मोबाइल नं.9013892748
जे. एन. यू.

हिन्दू राष्ट्र की ओर..
मेरी जल्दी ही पदोन्नति हो गई, मैं मुख्य शिक्षक से कार्यवाह बना दिया गया, दोनों ही नियुक्तियाँ जबानी ही थी, किसी प्रकार का लिखित आदेश नहीं, जब स्वयंसेवकों को ही सदस्यता की कोई रसीद या पहचान पत्र देय नहीं है तो पदाधिकारियों को भी उसकी क्या जरुरत है? मैंने पूछा था इस बारे में भी तो जवाब मिला कि संघ में इस प्रकार की कागजी खानापूर्ति के लिए समय व्यर्थ करने की परम्परा नहीं है।
खैर, कार्यवाह बनने के बाद मेरी जिम्मेदारियों में प्रखण्ड (ब्लॉक) स्तरीय बैठकों में भाग लेना भी शामिल हो गया, जब मैं पहली बार दो दिवसीय बैठक में भाग लेने तहसील मुख्यालय मण्डल गया, तो साथ में बिस्तर, गणवेश, लाठी और खाने के लिए थाली कटोरी भी साथ ले जानी पड़ी। किराया भी खुद देना पड़ा और बैठक का निर्धारित शुल्क भी चुकाना पड़ा। रात का खाना भी घर से बाँधकर ले गया। दूसरे दिन भोर में तकरीबन 5 बजे विसल की आवाज से नींद खुली, नित्यकर्म से निवृत होने के बाद संस्कृत में प्रातः स्मरण
मधुर समवेत स्वरों में दोहराया गया, प्रातःकालीन शाखा लगी, दिन में पूरे प्रखण्ड में आरएसएस के काम का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। भोजन और बौद्धिक सत्र चले, अलग-अलग समूहों में बैठकर राष्ट्र की दशा और दिशा पर गंभीर चर्चा हुई, इस दो दिन के एकत्रीकरण से मुझे स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राष्ट्र निर्माण का कार्य ‘मानवीय’ न होकर ‘ईश्वरीय’ कार्य है, इसमंे काम करने का अवसर बिरले और नसीब वाले लोगों को ही मिलता है, संघ कोई संस्था नहीं है, यह तो व्यक्ति निर्माण का कारखाना है। जिससे हम जैसे संस्कारवान युवाओं का निर्माण हो रहा है, जिला स्तर से आए प्रचारक जी और संघ चालक जी ने बहुत ही प्रभावी उद्बोधन दिया, उनका एक-एक वाक्य मुझे वेद वाक्य लगा, कितने महान और तपस्वी लोग है ये, जिन्होंने अपना जीवन राष्ट्र सेवा में समर्पित कर दिया, मैंने भी मन ही मन निश्चय कर लिया कि अपना जीवन भी संघ के पवित्र उद्देश्यों को पूरा करने में लगाऊँगा। मैंने जीवन व्रती प्रचारक बनने की ठान ली।
हमें प्रचारक चाहिए विचारक नहीं
घर परिवार त्याग कर सन्यासी की भाँति जीवन जीते हुए राष्ट्र सेवा में स्वयं को समर्पित करने के लिए पूर्णकालिक प्रचारक बनने की अपनी इच्छा को मैंने संघ के जिला प्रचारक जी के समक्ष रखा, उनके द्वारा दिए गए लम्बे जवाब में से दो बातें अब तक मुझे जस की तस याद है।
मैं: भाई साहब मैं प्रचारक बनना चाहता हूँ।
जिला प्रचारक: बन्धु, आपके विचार तो बहुत सुन्दर हैं, लेकिन दृष्टि समग्र नहीं है, आज उत्साह में हो तो प्रचारक बन जाना चाहते हो, लेकिन हमारा समाज काफी विषम है, कल कोई आपसे नाम पूछेगा, गाँव पूछेगा और अंततः समाज (जाति) भी पूछेगा और अगर उन्हें पता चला कि ये प्रचारक जी तो वंचित (दलित) समुदाय से आए हैं, तो उनका व्यवहार बदल सकता है, तब अपमान का घूँट भी पीना पड़ेगा, मुझे मालूम है, आप यह नहीं सह पाओगे, दुखी हो जाओगे, प्रतिक्रिया करने लगोगे, वाद विवाद होगा, इससे संघ का काम बढ़ने के बजाए कमजोर हो जाएगा, इसलिए मेरा सुझाव है कि आप प्रचारक नहीं विस्तारक बन कर थोड़ा समय राष्ट्र सेवा में लगाओ।
जिला प्रचारक के इस जवाब से मैं बहुत दुखी हुआ, मुझे अपने निम्न समाज में पैदा होने पर कोफ्त होने लगी, पर इसमें मेरा क्या कसूर था? यह कैसी विडम्बना थी कि मैं अपना पूरा जीवन संघ के ईश्वरीय कार्य हेतु समर्पित करना चाहता था, लेकिन मेरी जाति इसमें आड़े आ रही थी, पर यह सोच कर मैंने खुद को तसल्ली दी कि महर्षि मनु के विधान के मुताबिक हम सेवकाई करने वाले शूद्र समुदाय हैं, अभी सम्पूर्ण हिन्दू समाज में हमारी स्वीकार्यता नहीं बन पाई है, खैर, कोई बात नहीं है, संघ सामाजिक समरसता के लिए प्रयासरत तो है ही, जल्दी ही वह वक्त भी आ जाएगा, जब मेरे जैसे वंचित समुदाय के स्वयंसेवक भी पूर्णकालिक प्रचारक बन कर अपना जीवन राष्ट्र सेवा में लगा पाएँगे, ये वे दिन थे जब मैंने लिखना शुरू कर दिया था, मैं शुरू शुरू में उग्र राष्ट्रभक्ति की कविताएँ लिखता था, मैंने एक हस्तलिखित पत्रिका ‘हिन्दू केसरी’ का पाकिस्तान मिटाओ अंक भी निकाला था, स्थानीय समाचार पत्रों में राष्ट्र चिंतन नाम से स्तम्भ लिखने लगा था, कई शाखाओं में गणवेश धारण किए हुए जाकर बौद्धिक दे आया था मैंने खुद को हिंदूवादी बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रखी थी, फिर भी मैं महसूस करता था कि मुझे वह स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है, जिसका मैं हकदार था, लेकिन उस दिन प्रचारक बनने के सवाल पर जो उनकी दूसरी बात थी, उसने मुझे अपनी औकात दिखा दी, प्रचारक जी ने मेरे सिर की तरफ इशारा करके मेरी बुद्धिजीविता का मखौल उड़ाते हुए साफ तौर पर कह दिया कि-आप जैसे ज्यादा सोचने वाले लोग केवल अपनी गर्दन के ऊपर-ऊपर मजबूत होते है, शारीरिक रूप से नहीं, वैसे भी संघ को ‘प्रचारक’ चाहिए, जो नागपुर से कही गई बात को वैसा का वैसा हिन्दू समाज तक पहँुचाए, आप की तरह के सदैव सवाल करने वाले विचारक हमें नहीं चाहिए और इस तरह मैं विचारक से प्रचारक बनते बनते रह गया।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

भगवा ही गुरु है हमारा
उन दिनों संस्कृत सीखने और याद करने की मैं हर तरह से कोशिशें करता था, कई श्लोक मुझे कंठस्थ थे, जिन्हें मैं धारा प्रवाह बोल सकता था, मुझे पंचांग देखने का भी नया-नया शौक लग गया था। भगवत गीता और सुन्दर कांड तथा हनुमान चालीसा तो दिनचर्या का अंग ही बन गई थी। शाखा में ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दू भूमे नमस्ते नमस्ते’ की प्रार्थना की जाती थी। तब तक हमारी शाखा को भगवा झंडा (ध्वज) नहीं मिला था, इसलिए हम लोग एक गोल घेरा बनाकर उसके मध्य में एक बिंदु लगा लेते थे और कल्पना करते थे कि उस स्थान पर भगवा ध्वज लहरा रहा है, उसी की छत्र छाया में हम भारत माता की स्तुति करते थे, हमें बताया गया था कि मनुष्यों के मन में तो विकार आ जाते है मगर निष्कलंक और वैराग्य के प्रतीक भगवा ध्वज में किसी प्रकार का कोई खोट नहीं आ सकता है, इसलिए संघ (आरएसएस) ने उसे अपना गुरु माना है गाँव में शाखा लगते हुए 6 माह हो चुके थे, विजयदशमी का पर्व आ गया था, जिला प्रचारक जी ने हमारी शाखा को
ध्वज प्रदान करने की घोषणा कर दी, हम खुशी से झूम उठे, हमें हमारा गुरु मिल गया था, अब हम निगुरे नहीं रहे, एक बड़े लोहे का सरिया, स्टैंड और सूती कपडे़ का भगवा झंडा हमें मिल गया, हमने अपने जीवन की पहली गुरु दक्षिणा दी, पर मेरा सदैव सवाल करने वाला मन यहाँ भी चुप नहीं रह सका, मैंने पूछ ही लिया कि कोई वस्तु (एक झंडा) कैसे हमारा गुरु की भाँति मार्गदर्शन करेगी? तहसील के सेवा प्रमुख ने मुझे इस तरह जवाब दिया, उन्होंने हँसते हुए एक वैदिक ऋषि का उदाहरण दिया कि-उन्होंने पेड़, पौधे, नदियों, कुत्ते और बिल्ली जैसे 24 सजीव एवं निर्जीव पदार्थों तथा जीव जंतुओं को अपना गुरु माना था, हमारी हिन्दू संस्कृति तो इतनी उदार, उदात्त और विशाल रही है, फिर हम भगवा ध्वज को क्यों गुरु नहीं मान सकते है? मेरी शंका का समाधान हो चुका था, संघ के सब लोगों के पास प्राचीन समय के उदाहरण और तैयार जवाब होते हैं, मैंने मान लिया भगवे झंडे को अपना गुरु और शाखा के डंडे को अपना साथी, मेरी स्वयंसेवक के रूप में शेष यात्रा इसी तरह के जवाबों, तर्कों और कुतर्कों को सुनते हुए ही चली क्योंकि आरएसएस में संशय नहीं श्रद्धा का बड़ा महत्व है, यह मुझे पता चल गया था। एक बार मैंने एक प्रचारक महोदय से पूछा कि भारत में तो हम हिन्दू बहुसंख्यक हैं फिर असुरक्षित कैसे हैं? दरअसल मेरी समस्या यह थी कि मैं जिस गाँव का निवासी हूँ वहां आज तक एक भी मुस्लिम या अन्य धर्मावलम्बी रहते ही नहीं हैं, हमारे यहाँ तो नमाज या अजान की आवाज तक सुनाई नहीं पड़ती थी, इसलिए मैं इन धरम के लोगों को बड़ी मुश्किल से दुश्मन के रूप में देख पा रहा था इसलिए पूछ लिया सवाल, जवाब मिला कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी तक ने कहा था कि आम हिन्दू शांतिप्रिय कायर होता है जबकि आम मुसलमान उपद्रवी, गुंडा, इनका भरोसा नहीं, कब विश्वासघात कर दें इसलिए ज्यादा संख्या होने के बावजूद भी हम हिन्दू अपने ही देश में सुरक्षित नहीं हैं, उस दिन से मुझे यकीन आने लगा कि वाकई ये दूसरे धर्मो के लोग हम हिन्दुओं के दुश्मन है।
पांचजन्य ने बनाया बौद्धिक रूप से कट्टर
शाखा में कुछ साहित्य तो मुफ्त आता था, राजस्थान आरएसएस का मुखपत्र पाथेयकण 30 रुपये सालाना चंदा जमा करवाने पर आने लगा, संघ द्वारा प्रकाशित छोटी छोटी अन्य किताबें भी आती थीं, जिन्हें 2 से 5 रुपये में बेचा जाता था, मैंने उन्हीं दिनों सीताराम गोयल की लिखी पुस्तक ‘हिन्दू समाज खतरे में’ पढ़ी, मेरा मन तड़फ उठा, इसमें इस्लाम, ईसाइयत और कम्युनिस्ट लोगों द्वारा हिन्दू समाज के खिलाफ रचे जा रहे पूरे षड्यंत्र की जानकारी दी गई थी, बेचारा हिन्दू समाज चारों ओर से इन दुष्टों के चक्रव्यूह में फँसा हुआ था।
मेरी जानने की भूख बढ़ती ही जा रही थी, मैं साप्ताहिक समाचार पत्र पांचजन्य का भी नियमित ग्राहक और पाठक बन गया, इसके हर अंक को मंै किसी धर्म ग्रन्थ की तरह पूरे मनोयोग से पढ़ता था, जिस सप्ताह पांचजन्य नहीं पहँुचता, वह हफ्ता सूना-सूना सा गुजरता था, सच कहूँ तो संघ जिस हिन्दू राष्ट्र की बार-बार बात करता है, उसकी पहचान और समझ भी मुझे पांचजन्य पढ़ने से ही हुई, मैं आज यह स्वीकार कर सकता हूँ कि पांचजन्य ने ही मुझमंे वैचारिक और बौद्धिक कट्टरता भरी, वैसे तो कट्टरता संघ के विभिन्न प्रशिक्षण करने से भी खूब बढ़ी, पाँच दिवसीय आईटीसी से लगाकर बीस दिवसीय ओटीसी करने के अनुभव काफी कारगर रहे। इस दौरान कठोर अनुशासन की पालना की जाती थी, जमकर शारीरिक व्यायाम करवाए जाते थे, लाठी, चाकू, तलवार चलाने का प्रशिक्षण आत्मरक्षा के नाम पर दिया जाता था, उन दिनों शिविर स्थल से बाहर जाकर किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं होती थी, इस तरह की ट्रेनिंग को मीडिया से बचाकर करवाया जाता था, आज की तरह समाचार पत्रों में किसी तरह की कोई सूचना नहीं दी जाती थी, कहा जाता था कि प्रसिद्धि विमुख होकर निश्रेयस राष्ट्र सेवा में निमग्न रहना ही सच्चे स्वयंसेवक होने का गुण है। प्रशिक्षण और संघ साहित्य के तालमेल ने मेरे दिमाग को पूरी तरह से कट्टरपंथी बना दिया था। अब मैं किसी से भी बहस करने और भिड़ जाने को तैयार था खास तौर पर सेकुलर किस्म के कांग्रेसियों से, वही थे ज्यादातर मेरे इर्द-गिर्द, विधर्मी मुसलमान तो थे नहीं गाँव में उन्हें खोजने तो दूर जाना पड़ता था।
दुश्मन मिल गया
पर एक दिन अचानक ही मुझे बिन माँगे ही मेरा शत्रु घर बैठे ही मिल गया, हुआ यह कि मेरे ही गाँव के राजकीय प्राथमिक आयुर्वेदिक औषधालय में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कहीं से ट्रांसफर होकर आया, वह सर पर जालीदार टोपी लगाता था, दाढ़ी रखता था और सलवार कुर्ता पहनता था, नाम था-अमीर खान, मुझे उसे देखते ही पक्का विश्वास हो गया था कि यही है वह जो देश के दुश्मन लोगों की जमात का आदमी है। सौभाग्य से मुझे अपने घर के इतने करीब एक दुश्मन प्राप्त हो गया था। अब मुझे भाई साहब लोगों द्वारा बताई गई बातें ज्यादा ठीक से समझ में आने लगी, मैं हर बात से अमीर चाचा को जोड़कर देखता और वह विधर्मी मेरे दुश्मन की हर कल्पना पर खरा उतरता। अब तक मैंने सैंकड़ों बार सुना और पढ़ा था कि इन्हीं मलेच्छ विधर्मियों की वजह से हमारी भारत माता के दो टुकड़े हुए हैं, ये लोग भारत को माँ नहीं बल्कि डायन मानते हैं, क्रिकेट में पाकिस्तान की जीत पर खुशियाँ मनाते हैं, चार-चार औरतें रखकर चालीस-चालीस औलादें पैदा करते हैं, जल्दी से जल्दी अपनी आबादी बढ़ाकर शेष बचे भारत पर भी कब्जा करना चाहते हैं, ये लोग तो नसबंदी भी नहीं करवाते, इन्हें तो कानूनों में भी छूट है, सुप्रीम कोर्ट की भी बात नहीं मानते, शाहबानो नाम की बुढि़या के मामले में तो इन्हें खुश करने के लिए संसद ने कानून ही बदल दिया, इन्हें हज करने में अनुदान मिलता है जबकि हमें कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए भी टैक्स भरना पड़ता है, इनके लड़के दिन भर लोहा कूटते हैं और शाम होते ही बनठन कर हमारी बहु बेटियों को पटाने निकल पड़ते हैं, स्कूल कालेज में हिन्दू लड़कियों को प्यार के नाम पर फँसाकर भगा ले जाते हैं, यौन शोषण के बाद उन्हें बदनाम बस्तियों में बेच देते हैं, इनके मदरसों में ‘अ’ से आलिम नहीं ‘अलगाववाद’ पढ़ाया जाता है, सब तरह के उग्रवाद की जड़ में यही लोग होते हैं, इन्होंने मस्जिदों के नीचे हथियार छिपा रखे हैं, जब भी पाकिस्तान हमला करेगा, तब ये देश के भीतर उसके लिए हमसे लड़ेंगे, ये गोमांस खाते हैं, स्वभाव से निर्दय और क्रूर होते हैं, पाकिस्तान की जासूसी करते हैं, हमारे देश और धर्म किसी के भी सगे नहीं हैं इस तरह की सैंकड़ों बातें मेरे दिमाग में घर किए हुए थीं, जिसके चलते ही मुझे अमीर चाचा और उसके जैसे दिखाई पड़ने वाले हर व्यक्ति में एक उग्रवादी और देशद्रोही इन्सान नज़र आने लगा। मैं सोचता था कि इतने बुरे लोगों को भारत में क्यों रखा जा रहा है, सरकार इन्हें फौज के जरिये जबरन क्यों पाकिस्तान नहीं भेज देती, मगर मैंने सत्ता, कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण के बारे में भी पढ़ा था, ऐसी मुस्लिम परस्त पार्टी के सत्ता में रहते और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? मेरे तो अपने ही घर में सब कांग्रेसी भरे पड़े थे, तो क्या मैं राष्ट्रद्रोहियों के खानदान से हूँ? अक्सर ऐसे सवाल उठते रहते थे, जैसे-जैसे इस तरह के बहुत सारे सवाल मुझे घेरते, मैं और अधिक ताकत से हिन्दू समाज को संगठित करने के संघ कार्य में खुद को लगा देता, मुझे विश्वास था कि संगठित हिन्दू समाज ही समर्थ भारत बना सकता है, अब मेरे जीवन का एक ही लक्ष्य था हर हाल में भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
edc58-01

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कारगिल -कारगिल ————के अपराधियों से जोड़ा खाने वाले.
अपराधियों ने नौजवानों को मरवा दिया था
आज वहीअपराधी
शहीद – शहीद चिल्ला रहे है
यानी पहले शहीद कराओ
-फिर फूल चढाओ
फिर अपराधियों से हाथ मिलाओ
फिर ताबूत में कमीशन खाओ
फिर स्मारक बनवाओ
उसमे भी कमीशन खाओ
राष्ट्र प्रेम की अलख जगाओ
फिर चिल्लाओ कश्मीर मांगोगे
तो फिर सीना चीर देगे
संदेश भेजोगे कश्मीर सुंदर
आजाद मुल्क बनाओ
रक्षा क्षेत्र में एफ डी आई
अमरीका की गुलामी
गुजरात में
फट्टा के साथ
हवाला की सलामी
हिन्दू की एकता में
आरक्षण का विरोध
धर्म के नाम पर
धार्मिक गुलामी
सहारनपुर में सद्भाव
काठ में दंगा
लखनऊ में चेलो से
हुरदंगा
वोट के लिए सब चंगा
गाजा की ख़ुशी
यू. एन में दुखी
बर्लिन में
सेतुवा
जिनपिंग से
हलुवा
जरूरत है
तो बाप
नही है तो
देगे श्राप
यही इनका
राष्ट्र प्रेम
राष्ट्रप्रेमी है
बाकी सभी देश
द्रोही है
खुद का बाप
गाँधी नही
हिटलर है
संसद में
गाँधी
बाहर गोडसे की
आंधी
आजादी युद्ध में
अंग्रेज भक्त
आज बड़े
स्वतंत्रता सेनानी
कायरो की ज़मात
देश रक्षक
है यही
नोट -सभी संघी मित्रो से अनुरोध है कि कविता में कामा फुल स्टॉप सही करने का कष्ट करे
सादर
उन्ही का कापीराइट युक्त
सुमन
लो क सं घ र्ष !

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पिछले जन्म के पाप प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। गुजरात में हिन्दू , मुस्लिम आर्थिक अपराधियों का समूह सदैव उनकी सरकार का समर्थन करता रहा है क्यूंकि उसके द्वारा किये जा रहे अपराधों को संरक्षण राज्य सरकार का मिलता रहा है। तुलसी, सोहराबुद्दीन एनकाउंटर का राज हिन्दू- मुस्लिम एकता नहीं थी बल्कि मोदी सरकार की तरफ से वसूली अभियान के हिसाब किताब में बेईमानी करने की सजा दी गयी थी
नव भारत टाइम्स के अनुसार गुजरात में हवाला के जरिए 5 हजार 395 करोड़ रुपये के लेन-देन का पता लगाया है और इस मामले में 79 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र जारी किए गए हैं। अधिकारियों ने इसे देश का सबसे बड़ा हवाला घोटाला करार दिया है जांच अधिकारियों के मुताबिक राज्य में हवाला के जरिए सोना और प्रॉपर्टी के लेन-देन का धंधा किया जा रहा था। इस काम के लिए पिछले साल दिसंबर और इस साल जनवरी, फरवरी में सूरत में आईसीआईसीआई बैंक के दो ब्रांच का इस्तेमाल किया गया।
अहमदाबाद में ईडी के अधिकारियों ने बताया कि इस मामले की जांच आईसीआईसीआई बैंक द्वारा सूरत में दर्ज कराई गई एफआईआर के बाद शुरू हुई।
इस मामले में शुक्रवार को 79 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किए गए हैं। मामले के तीन मुख्य आरोपियों में से 2 को गिरफ्तार कर लिया गया है और एक अभी भी फरार है।
इनमें से अफरोज हसन फट्टा को दो महीने पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था और मदन जैन को गुरुवार को गिरफ्तार किया गया। एक अन्य मुख्य आरोपी बिलाल हारून गिलानी अभी फरार है।
आपको बता दें कि अफरोज फट्टा हीरा कारोबारी हैं और पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी के साथ उनकी फोटो आने के बाद काफी विवाद हुआ था।
कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी पर सूरत के हवाला कारोबारी अफरोज फट्टा से करीबी रिश्ते होने का आरोप लगाया था। कांग्रेस ने मोदी के विकास यात्रा के दौरान मंच पर अफरोज के साथ मोदी एक की तस्वीर भी रिलीज की थी। इससे पहले मार्च में ईडी(एनफोर्समेंट डायरेक्टॉरेट) ने सूरत में अफरोज के घर पर छापा मारकर 700 करोड़ रुपए जब्त किए थे।
राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ का हिन्दुवत्व वादी चेहरा यही है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। अगर देश के अन्दर आर्थिक अपराधियों को समूल रूप से नष्ट कर दिया जाए तो हिन्दुवत्व की प्रयोगशाला अपने आप नष्ट हो जाएगी।
-सुमन

http://loksangharsha.blogspot.com/

महात्मा गाँधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने नाथूराम गोडसे से अपने संबंधों से इनकार कर दिया था और तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को माफीनामा लिख कर अपने संगठन के ऊपर से प्रतिबन्ध हटवाया था कि वह सांस्कृतिक संगठन के रूप में काम करेगा राजनीति से उसका सम्बन्ध नहीं रहेगा . प्रतिबन्ध हटने के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने “गाँधी वध क्यों” किताब को अपने स्टालों से बेचना प्रारंभ कर दिया था और गाँधी वध को सही ठहराने का प्रयास आज भी जारी है . वध शब्द का अर्थ अच्छे कृत्य के रूप में लिखा जाता है जबकि गाँधी की हत्या की गयी थी .
आज जब डॉ वेद प्रताप वैदिक ने जाकर हाफिज सईद से मुलाकात की और फिर कश्मीर को स्वतन्त्र मुल्क घोषित करने की वकालत की और पाकिस्तान के न्यूज चैनल डॉन न्यूज को दिए वैदिक का इंटरव्यू भी सामने आ गया, जिसमें एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था कि अगर भारत और पाकिस्तान राजी हों तो कश्मीर की आजादी में कोई हर्ज नहीं है। अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि अगर दोनों तरफ के कश्मीरी तैयार हो और दोनों देश भी तैयार हो तो आजाद कश्मीर बनाने में कोई बुराई नहीं है। वैदिक ने आगे कहा कि गुलाम कश्मीर और आज़ाद कश्मीर से दोनों से सेना हटनी चाहिए, दोनों की एक विधानसभा हो, एक मुख्यमंत्री हो, एक गवर्नर हो, यही बात अमरीका व सी आई ए भी चाहता है ,तो आरएसएस से बीजेपी में गए राम माधव ने भी साफ किया है कि वैदिक संघ से नहीं जुड़े हैं। संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने भी सफाई देते हुए कहा कि वैदिक हमारे साथ जुड़े नहीं हैं। इन बातों से संघ की गिरगिट जैसी चालों का पर्दाफाश होता है . जबकि वास्तविकता ये है कि डॉ वेद प्रताप वैदिक बीजेपी सरकार बनवाने के लिए कार्य कर रहे थे . डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने कहा है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में उनका भी योगदान है।
संघ कभी भी नेहरु या गाँधी के योगदान को नहीं मानता है और आजादी के बाद से ही नेहरु और गाँधी की चरित्र हत्या सम्बंधित समाचार, आलेख प्रकाशित करता रहता है और जब जरूरत होती है तो उसी गाँधी और नेहरु की कसम भी खाता है. संघ का प्रेरणा श्रोत्र हिटलर और मुसोलिनी है और वर्तमान में सबसे प्रिय राष्ट्र इजराइल व अमेरिका है . आज संघी ताकतें खामोश हैं अगर हाफिज सईद से किसी अन्य व्यक्ति ने मुलाकात कर ली होती तो देश द्रोही का प्रमाणपत्र यह लोग जारी कर रहे होते और कश्मीर पर आये हुए डॉ वैदिक के साक्षात्कार को लेकर पूरे देश में पुतला दहन कर रहे होते . आज उनकी असली सूरत दिखाई दे रही है . आजादी की लड़ाई में एक भी संघी जेल नहीं गया था . उसके बाद भी सबसे बड़े देश प्रेमी व देश भक्त का प्रमाणपत्र स्वयं के लिए जारी करते रहते हैं और दुसरे लोगों को देशद्रोही बात-बात में कहना इनकी आदत का एक हिस्सा है .
रंगा सियार शेर नहीं हो सकता है लेकिन शेर बनने की कोशिश जरूर करता है .

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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